sn vyas
#पौराणिक कथा
शूरसेन देश के प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा 'चित्रकेतु' के पास सर्वसुलभ राजसी सुख थे। उनका कोष स्वर्ण-रत्नों से भरा था, सेना विशाल थी और उनकी हज़ारों सुंदर और गुणवती रानियाँ थीं। परंतु इतने बड़े साम्राज्य के स्वामी होने के बाद भी राजा का मन सदा अशांत और उदास रहता था।
इसका कारण यह था कि उनकी हज़ारों रानियों में से किसी से भी उन्हें संतान (पुत्र) की प्राप्ति नहीं हुई थी। राजा दिन-रात यही सोचते रहते थे—"मेरे बाद इस विशाल वंश और राज्य को कौन संभालेगा? बिना पुत्र के यह सारा वैभव, महल और मुकुट धूल के समान व्यर्थ है।
एक दिन अपनी स्वेच्छा से विचरण करते हुए ब्रह्मर्षि अंगिरा राजा चित्रकेतु के राजमहल में पधारे। राजा ने बड़े आदर से ऋषि का पूजन किया, परंतु ऋषि ने राजा के चेहरे पर उदासी की छाया देख ली महर्षि अंगिरा ने पूछा—हे राजन्! तुम्हारे चेहरे का तेज फीका क्यों है? क्या राज्य में सब कुशल है?
राजा चित्रकेतु ने अश्रु बहाते हुए अपने हृदय का दुख खोलकर रख दिया:
"हे ब्रह्मर्षि! जैसे भूखे-प्यासे मनुष्य के सामने फूलों की मालाएँ रख दी जाएँ, तो वे उसकी भूख नहीं मिटा सकतीं, वैसे ही बिना संतान के यह संपूर्ण पृथ्वी का राज्य मुझे केवल एक बोझ प्रतीत होता है। कृपा करके मुझे पुत्र-प्राप्ति का उपाय बताइए।"
महर्षि अंगिरा परम दयालु थे, परंतु वे त्रिकालदर्शी भी थे। उन्होंने एक विशेष यज्ञ संपन्न किया और यज्ञ का अवशिष्ट 'हविष्यान्न' (दिव्य खीर/फल) राजा की सबसे बड़ी और प्रिय पटरानी 'कृतद्युति' को खाने के लिए दिया।
ऋषि ने जाते-जाते राजा से एक गूढ़ बात कही:
राजन्! तुम्हें पुत्र की प्राप्ति अवश्य होगी, परंतु वह बालक तुम्हारे लिए 'हर्ष-शोक-प्रद' (अत्यंत खुशी और भारी शोक दोनों देने वाला) सिद्ध होगा पुत्र-मोह में अंधे हो चुके राजा ने ऋषि के अंत के शब्दों 'शोक' पर ध्यान ही नहीं दिया वे केवल 'पुत्र होगा' यह सुनकर आनंद से झूम उठे।
समय बीतने पर महारानी कृतद्युति ने एक अत्यंत तेजस्वी, सुंदर और सुलक्षण बालक को जन्म दिया। बालक के जन्म लेते ही पूरे शूरसेन देश में मंगलाचार होने लगा, ढोल-नगाड़े बजे और राजा ने दिल खोलकर दान-पुण्य किया।
राजा चित्रकेतु का पूरा ध्यान अब केवल बालक और उसकी माता (कृतद्युति) पर केंद्रित हो गया। वे दिन-रात बालक को दुलारते, गोदी में खिलाते और बड़ी रानी के महल में ही समय व्यतीत करते।
परिणाम यह हुआ कि राजा की अन्य रानियों को उपेक्षित महसूस होने लगा। उनके भीतर ईर्ष्या की आग धधकने लगी। वे आपस में फुसफुसाने लगीं:
राजा अब केवल बड़ी रानी को ही सम्मान देते हैं। यदि यह बालक बड़ा हो गया, तो राजा का संपूर्ण साम्राज्य इसी को मिलेगा और हमें जीवन भर दासी बनकर रहना पड़ेगा ईर्ष्या और डाह जब सीमा पार कर गई, तो उन सौतों का मति-भ्रम हो गया। एक दिन जब दासी बालक को सुलाकर बाहर गई, तो उन पापिनी रानियों ने छिपकर उस दूधमुँहे बालक को 'तीव्र विष' पिला दिया।
थोड़ी देर बाद जब महारानी कृतद्युति अपने सोए हुए बालक को देखने गईं, तो उन्होंने देखा कि बालक की आँखें उठी हुई हैं, मुँह से झाग निकल रहा है और उसकी साँसें पूरी तरह थम चुकी हैं।
रानी 'हा पुत्र!' कहकर मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ीं। जब राजा चित्रकेतु ने यह भयंकर समाचार सुना, तो दौड़ते हुए आए। पुत्र के बेजान, नीले पड़े शरीर को देखकर राजा के होश उड़ गए। वे अपने मुकुट और राजसी वस्त्र उखाड़कर फेंकने लगे।
राजा पुत्र के शव को अपनी छाती से लगाकर रोने लगे। महारानी होश में आकर अपनी छाती पीट-पीटकर विलाप करने लगी:
"हे विधाता! तुमने यह कैसा अन्याय किया? जो बालक अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा था, उसे तुमने क्यों छीन लिया? हे प्रभु! बालक से पहले मुझे मृत्यु क्यों नहीं दी?पूरे राजमहल में हाहाकार मच गया। राजा चित्रकेतु शोक के भयंकर सागर में डूब गए और उन्होंने निर्णय लिया कि वे भी अपने पुत्र के शव के साथ ही अपने प्राण त्याग देंगे।
जब स्थिति अत्यंत विकट हो गई, तब देवर्षि नारद जी और महर्षि अंगिरा वहाँ प्रकट हुए।
अंगिरा ऋषि ने राजा से कहा:
राजन्! मैं वही अंगिरा हूँ जिसने तुम्हें यह पुत्र दिया था। मैं उस दिन तुम्हें तत्त्वज्ञान का उपदेश देने आया था, परंतु तुम्हारा मन केवल पुत्र-मोह में अटका था। देखो! संसारी पदार्थों का सुख स्वप्न की तरह है। जब तुम संतानहीन थे, तब भी दुखी थे, और आज पुत्र मिला तो उससे अनंत गुना बड़ा दुख मिल गया। अब इस माटी के पुतले के लिए रोना बंद करो परंतु राजा का विवेक शोक की अग्नि में जल चुका था। वे बिलखते हुए बोले—"हे ऋषिवर! आपका ज्ञान सत्य होगा, परंतु मेरा हृदय फट रहा है। यदि आप सामर्थ्यवान हैं, तो मेरे इस पुत्र को केवल एक बार जीवित कर दीजिए, ताकि मैं इससे बात कर सकूँ।
तब देवर्षि नारद जी ने अपनी सामर्थ्य और योगमाया का प्रयोग किया। उन्होंने अपनी विद्या से उस मृत बालक की 'आत्मा' (जीव) को, जो परलोक की ओर यात्रा कर रही थी, वापस बुलाया और पुनः उस शव में प्रवेश करा दिया बालक का मृत शरीर अचानक हिलने लगा। उसकी साँसें वापस आ गईं और उसने अपनी आँखें खोल दीं।
राजा चित्रकेतु, रानी कृतद्युति और वहाँ खड़ी सभी रानियाँ (विष देने वाली रानियाँ भी) आश्चर्य और खुशी से चीख उठीं।
देवर्षि नारद जी ने बालक की आत्मा को संबोधित करते हुए कहा:
हे जीव! ज़रा अपने माता-पिता की ओर देखो! ये तुम्हारे वियोग में अपने प्राण दे रहे हैं। तुम वापस अपने इस सुंदर शरीर में प्रवेश कर जाओ। राजा चित्रकेतु के पुत्र बनकर इस समृद्ध राज्य का सुख भोगो और अपनी प्रजा पर शासन करो।
तभी वह बालक उठा और बाल-सुलभ क्रीड़ा करने के बजाय एक अत्यंत परम ज्ञानी सिद्ध पुरुष की भांति हँसने लगा। बालक की आत्मा ने जो उत्तर दिया, उसने वहाँ खड़े हर व्यक्ति के चेतना के तार झंकृत कर दिए!
बालक की आत्मा बोली:
हे मुनिवर! आप मुझे किसका पुत्र कह रहे हैं और किन्हें मेरा माता-पिता बता रहे हैं?
कर्मों की अटवी (वन) में भटकती हुई मेरी यह आत्मा न जाने कितने हज़ारों-करोड़ों जन्म ले चुकी है। इस लंबे काल-चक्र में कभी ये राजा चित्रकेतु मेरे पिता बने थे, तो किसी जन्म में मैं इनका पिता बना था! कभी ये मेरे मित्र थे, तो किसी जन्म में मेरे घोर शत्रु थे। कभी ये मेरे पुत्र थे, तो कभी मैं इनकी माता था!
जैसे नदी के तेज बहाव में बहते हुए तिनके या बालू के कण आपस में आकर मिलते हैं, कुछ देर साथ बहते हैं और फिर नदी की तरंगों से अलग-अलग दिशाओं में बह जाते हैं... ठीक वैसे ही 'काल' की तरंगों में बहते हुए जीव पूर्वजन्मों के लेन-देन (ऋणानुबंध) के कारण माता-पिता, पति-पत्नी और पुत्र-पुत्री का मुखौटा पहनकर एक-दूसरे से मिलते हैं। जब लेन-देन पूरा हो जाता है, तो मृत्यु का एक झटका उन्हें अलग कर देता है।
इस जन्म में मेरा इस शरीर और इस राजा से जितना हिसाब-किताब था, वह पूरा हो चुका है। अब न कोई किसी का पिता है, न कोई किसी का पुत्र। आत्मा अजर, अमर और नित्य है; इसे न कोई मार सकता है, न कोई जन्म दे सकता है। फिर आप मुझे किस बंधन में बाँध रहे हैं?
यह कहकर बालक की वह जीवात्मा पुनः शांत हो गई और शरीर छोड़कर अपने कर्मों के अनुसार अपनी अगली यात्रा पर निकल गई।
बालक की आत्मा के इन सत्य और मर्मभेदी वचनों को सुनकर राजसभा में सन्नाटा छा गया। राजा चित्रकेतु और महारानी कृतद्युति के सिर से अज्ञान और मोह का भारी पत्थर क्षण भर में हट गया।
राजा को समझ आ गया कि यह संसार केवल एक रंगमंच है, जहाँ सब अपना-अपना अभिनय करके चले जाते हैं।जिन छोटी रानियों ने ईर्ष्या में आकर बच्चे को विष दिया था, वे अत्यंत लज्जित होकर राजा के चरणों में गिर पड़ीं। राजा चित्रकेतु ने ज्ञानी पुरुष की भांति उन्हें क्षमा कर दिया।राजा ने स्वयं अपने हाथ से उस बालक के शरीर का दाह-संस्कार किया और जल-तर्पण किया।
इसके बाद राजा चित्रकेतु ने अपना विशाल साम्राज्य, धन-कोष और राजमुकुट अपने मंत्रियों को सौंप दिया। वे देवर्षि नारद से 'संकर्षण (विष्णु) मंत्र' की दीक्षा लेकर गंगा-तट पर चले गए और कठोर तपस्या करके 'विद्याधर' (सिद्ध पुरुष) बन गए।
!! जय श्री कृष्णा!!