सीताराम भजन

-मनोहर सिंह राठौड़
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3 months ago
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १६☀️ पृष्ठ १७☀️ जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई ॥ राम बान रबि उएँ जानकी । तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥१॥ श्रीरामचन्द्रजी ने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी ! रामबाणरूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है ॥१॥ अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा । कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥२॥ हे माता ! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्र जी की शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरों सहित यहाँ आवेंगे ॥२॥ निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना । जातुधान अति भट बलवाना ॥३॥ और राक्षसों को मार कर आपको ले जायेंगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकों में उनका यश गावेंगे। [सीताजी ने कहा- हे पुत्र ! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥३॥ मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥४॥ अतः मेरे हृदय में बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान् जी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥४॥ सीता मन भरोस तब भयऊ । पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥५॥ तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्‌जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ॥५॥ दो०- सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥१६॥ हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्‌ को मार सकता है)॥१६॥ #सीताराम भजन
-मनोहर सिंह राठौड़
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3 months ago
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १३☀️ पृष्ठ १४☀️ तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर ॥ चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥१॥ तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगुठी को पहचान कर सीताजी आश्चर्य चकित हो कर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं ॥१॥ जीति को सकइ अजय रघुराई।माया तें असिरचि नहिंजाई॥ सीता मन बिचार करनाना। मधुरबचन बोलेउ हनुमाना॥२॥ [वे सोचने लगीं] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी (माया के उपादान से सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान् जी मधुर वचन बोले ॥२॥ रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥३॥ वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजी का दुःख भाग गया। वे कान और मन लगा कर उन्हें सुनने लगीं हनुमान् जी ने आदि से लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥३॥ श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किनभाई॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥४॥ [सीताजी बोलीं-] जिसने कानों के लिये अमृतरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान्‌जी पास चले गये। उन्हें देख कर सीताजी फिर कर (मुख फेर कर) बैठ गयीं; उनके मन में आश्चर्य हुआ ॥४॥ राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की ॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी।दीन्हि राम तुम्हकहँ सहिदानी॥५॥ [हनुमान् जी ने कहा- हे माता जानकी! मैं श्रीरामजी का दूत हूँ। करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजी ने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है ॥५॥ नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥६॥ [सीताजी ने पूछा-] नर और वानर का सङ्ग कहो कैसे हुआ? तब हनुमान्‌जी ने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही। दो०- कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास । जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥१३॥ हनुमान् जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्म से कृपासागर श्रीरघुनाथजी का दास है ॥१३॥ #सीताराम भजन
-मनोहर सिंह राठौड़
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4 months ago
🙏🌹 जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ श्लोक ☀️ पृष्ठ १☀️ शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् । रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥१॥ शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले,ब्रह्मा,शम्भु और शेषजीसे निरन्तर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्य रूप में दीखनेवाले, समस्त पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरो- मणि, राम कहलानेवाले जगदीश्वर की मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा । भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥२॥ हे रघुनाथजी ! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अन्तरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिये और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिये ॥ अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥३॥ अतुल बलके धाम, सोनेके पर्वत (सुमेरु)के समान कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [को ध्वंस करने] के लिये अग्निरूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्रीरघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान्जी को मैं प्रणाम करता हूँ ॥३॥ #सीताराम भजन
-मनोहर सिंह राठौड़
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4 months ago
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ किष्किन्धाकाण्ड☀️ दोहा १८☀️ पृष्ठ १९☀️ बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई ॥ एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं । कालहु जीति निमिष महुँ आनौं ॥१॥ वर्षा बीत गयी, निर्मल शरद् ऋतु आ गयी। परन्तु हे तात! सीताकी कोई खबर नहीं मिली। एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो काल को भी जीत कर पल भर में जानकी को ले आऊँ ॥१॥ कतहुँ रहउ जौं जीवति होई । तात जतन करि आनउँ सोई॥ सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी ॥२॥ कहीं भी रहे, यदि जीती होगी तो हे तात ! यत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा। राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पा गया, इसलिये सुग्रीव ने भी मेरी सुधि भुला दी ॥२॥ जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥ जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा । ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा ॥३॥ जिस बाण से मैंने बालि को मारा था, उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूँ ! [शिवजी कहते हैं -] हे उमा ! जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? [यह तो लीलामात्र है] ॥३॥ जानहिं यह चरित्र मुनिग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥ लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना।धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना॥४॥ ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रीति मान ली है (जोड़ ली है), वे ही इस चरित्र (लीलारहस्य) को जानते हैं। लक्ष्मणजी ने जब प्रभु को क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ा कर बाण हाथ में ले लिये ॥४॥ दो०- तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव । भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव ॥१८॥ तब दयाकी सीमा श्रीरघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को समझाया कि हे तात ! सखा सुग्रीव को केवल भय दिखला कर ले आओ [उसे मारने की बात नहीं है] ॥१८॥ #सीताराम भजन
-मनोहर सिंह राठौड़
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4 months ago
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा १७☀️ पृष्ठ १८☀️ सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा॥ फूलें कमल सोह सर कैसा । निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा ॥१॥ जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्रीहरि के शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों के फूलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है ॥१॥ गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा ॥ चक्रबाक मन दुख निसि पेखी । जिमि दुर्जन पर संपति देखी ॥२॥ भौरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, तथा पक्षियों के नाना प्रकार के सुन्दर शब्द हो रहे हैं। रात्रि देख कर चकवे के मन में वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की सम्पत्ति देख कर दुष्ट को होता है ॥२॥ चातक रटत तृषाअति ओही।जिमिसुख लहइ न संकरद्रोही॥ सरदातप निसि ससि अपहरई । संत दरस जिमि पातक टरई ॥३॥ पपीहा रट लगाये है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्रीश‌ंकरजी का द्रोही सुख नहीं पाता (सुख के लिये झीखता रहता है )। शरद् ऋतु के ताप को रात के समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं ॥३॥ देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई॥ मसक दंस बीते हिम त्रासा । जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा ॥४॥ चकोरों के समुदाय चन्द्रमा को देख कर इस प्रकार टकटकी लगाये हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान्‌ को पा कर उनके [निर्निमेष नेत्रों से] दर्शन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़े के डर से इस प्रकार नष्ट हो गये जैसे ब्राह्मण के साथ वैर करने से कुल का नाश हो जाता है ॥४॥ दो०- भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ। सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥१७॥ [वर्षा-ऋतु के कारण] पृथ्वी पर जो जीव भर गये थे, वे शरद् ऋतु को पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सद्‌गुरु के मिल जाने पर सन्देह और भ्रम के समूह नष्ट हो जाते हैं ॥१७॥ #सीताराम भजन
-मनोहर सिंह राठौड़
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4 months ago
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा ११☀️पृष्ठ १२☀️ राम बालि निजधाम पठावा। नगर लोगसब ब्याकुल धावा॥ नाना बिधि बिलाप कर तारा । छूटे केस न देह सँभारा ॥१॥ श्रीरामचन्द्रजी ने बालि को अपने परम धाम भेज दिया। नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। बालि की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देह की सँभाल नहीं है ॥१॥ तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥ छिति जल पावक गगन समीरा । पंच रचित अति अधम सरीरा ॥२॥ तारा को व्याकुल देख कर श्रीरघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। [उन्होंने कहा- पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु-इन पाँच तत्त्वों से यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है ॥२॥ प्रगट सो तनु तव आगें सोवा । जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ॥ उपजा ग्यान चरन तबलागी। लीन्हेसि परम भगति बरमागी॥ वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिये रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान्‌ के चरणों लगी और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया ॥३॥ उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं ॥ तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिवत सबकीन्हा॥ [शिवजी कहते हैं-] हे उमा ! स्वामी श्रीरामजी सबको कठ- पुतली की तरह नचाते हैं। तदनन्तर श्रीरामजी ने सुग्रीव को आज्ञा दी और सुग्रीव ने विधिपूर्वक बालि का सब मृतक-कर्म किया ॥४॥ राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई ॥ रघुपति चरन नाइकरि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा॥५॥ तब श्रीरामचन्द्रजी ने छोटे भाई लक्ष्मण को समझा कर कहा कि तुम जाकर सुग्रीव को राज्य दे दो। श्रीरघुनाथजी की प्रेरणा (आज्ञा) से सब लोग श्रीरघुनाथजी के चरणों में मस्तक नवाकर चले ॥५॥ दो०- लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज। राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज॥११॥ लक्ष्मणजी ने तुरंत ही सब नगरनिवासियों को और ब्राह्मणों के समाज को बुला लिया और [उनके सामने] सुग्रीव को राज्य और अंगद को युवराज-पद दिया ॥११॥ #सीताराम भजन
-मनोहर सिंह राठौड़
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4 months ago
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा १०☀️ पृष्ठ ११☀️ सुमनत राम अतिकोमल बानी। बालि सीस परसेउ निजपानी॥ अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना ॥१॥ बालि की अत्यन्त कोमल वाणी सुन कर श्रीरामजी ने उसके सिर को अपने हाथ से स्पर्श किया [और कहा-] मैं तुम्हारे शरीर को अचल कर दूँ, तुम प्राणों को रखो। बालिने कहा- हे कृपानिधान ! सुनिये ॥१॥ जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥ जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी ॥२॥ मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) [अनेकों प्रकार का साधन करते रहते हैं। फिर भी अन्तकाल में उन्हें 'राम' नहीं कह आता (उनके मुख से रामनाम नहीं निकलता)। जिनके नाम के बल से शङ्करजी काशी में सबको समानरूप से अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं ॥२॥ मम लोचन गोचर सोइ आवा । बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा ॥३॥ वह श्रीरामजी स्वयं मेरे नेत्रों के सामने आ गये हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा ॥३॥ छ०-सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं। जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं॥ मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही। अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥ श्रुतियाँ 'नेति-नेति' कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मनको जीतकर एवं इन्द्रियोंको [विष- यों के रस से सर्वथा] नीरस बना कर मुनिगण ध्यान में जिनकी कभी क्वचित् ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु (आप) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं।आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो। परन्तु ऐसामूर्ख कौन होगा जो हठ पूर्वक कल्पवृक्ष को काट कर उससे बबूर के बाड़ लगावेगा (अर्थात् पूर्णकाम बना देनेवाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीरकी रक्षा चाहेगा) ॥ अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ। जेहिं जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥ यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिऐ। गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिए॥ हे नाथ! अब मुझ पर दयादृष्टि कीजिये और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिये। मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं श्रीराम जी (आप)के चरणोंमें प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये। और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! बाँह पकड़ कर इसे अपना दास बनाइये ॥ दो०- राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग । सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥१०॥ श्रीरामजी के चरणों में दृढ़ प्रीति करके बालि ने शरीर को वैसे ही (आसानी से) त्याग दिया जैसे हाथी अपने गले से फूलों की माला का गिरना न जाने ॥१०॥ #सीताराम भजन
-मनोहर सिंह राठौड़
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जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा ९☀️ पृष्ठ १०☀️ परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठिबैठ देखि प्रभुआगें॥ स्याम गात सिर जटा बनाएँ । अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ ॥१॥ बाण के लगते ही बालि व्याकुल हो कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। किन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को आगे देख कर वह फिर उठ बैठा। भगवान्‌ का श्याम शरीर है, सिर पर जटा बनाये हैं, लाल नेत्र हैं, बाण लिये हैं और धनुष चढ़ाये हैं ॥१॥ पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा । सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा ॥ हृदयँ प्रीति मुखबचन कठोरा।बोला चितइ राम की ओरा॥२॥ बालि ने बार-बार भगवान्‌ की ओर देख कर चित्त को उनके चरणों में लगा दिया। प्रभु को पहचान कर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदय में प्रीति थी, पर मुख में कठोर वचन थे। वह श्रीरामजी की ओर देखकर बोला ॥२॥ धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि ब्याध की नाईं ॥ मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहिमारा॥३॥ हे गोसाईं ! आपने धर्म की रक्षा के लिये अवतार लिया है और मुझे व्याध की तरह (छिपकर) मारा? मैं वैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ! किस दोष से आपने मुझे मारा ॥३॥ अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥ इन्हहि कुदृ‌ष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥ [श्रीरामजी ने कहा-] हे मूर्ख ! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या-ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता॥४॥ मूढ़तोहि अतिसय अभिमाना।नारिसिखावन करसि न काना॥ मम भुज बल आश्रित तेहि जानी । मारा चहसि अधम अभिमानी ॥५॥ हे मूढ़ ! तुझे अत्यन्त अभिमान है। तूने अपनी स्त्री की सीख पर भी कान (ध्यान) नहीं दिया। सुग्रीव को मेरी भुजाओं के बल का आश्रित जान कर भी अरे अधम अभिमानी! तूने उसको मारना चाहा ॥५॥ दो०- सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि । प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि ॥९॥ [बालि ने कहा-] हे श्रीरामजी ! सुनिये, स्वामी (आप) से मेरी चतुराई नहीं चल सकती। हे प्रभो! अन्तकाल में आपकी गति (शरण) पा कर मैं अब भी पापी ही रहा ॥९॥ #सीताराम भजन
-मनोहर सिंह राठौड़
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5 months ago
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ किष्किन्धाकाण्ड ☀️ दोहा ७☀️ पृष्ठ ८☀️ जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।तिन्हहि बिलोकत पातकभारी॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना । मित्रक दुख रज मेरु समाना ॥१॥ जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने ॥१॥ जिन्ह के असि मति सहज न आई । ते सठ कत हठि करत मिताई ॥ कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥२॥ जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसी से मित्रता करते हैं? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोक कर अच्छे मार्ग पर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपावे ॥२॥ देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥ बिपति काल कर सतगुन नेहा । श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ॥३॥ देने-लेने में मन में शंका न रखे। अपने बल के अनुसार सदा हित ही करता रहे। विपत्ति के समय में तो सदा सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्र के गुण (लक्षण) ये हैं। आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई॥ जाकर चित अहि गति सम भाई । अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई ॥४॥ जो सामने तो बना-बना कर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है- हे भाई ! [इस तरह) जिसका मन साँप की चालके समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्र को तो त्यागने में ही भलाई है ॥४॥ सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥ सखा सोचत्यागहु बलमोरें। सबबिधि घटब काज मैं तोरें॥५॥ मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र- ये चारों शूल के समान [पीड़ा देनेवाले] हैं। हे सखा! मेरे बल पर अब तुम चिन्ता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा (तुम्हारी सहायता करूँगा) ॥५॥ कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा ॥ दुंदुभि अस्थि ताल देखराए । बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए ॥६॥ सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर ! सुनिये, बालि महान् बलवान् और अत्यन्त रणधीर है। फिर सुग्रीव ने श्रीरामजी को दुन्दुभि राक्षस की हड्डियों और ताल के वृक्ष दिखलाये। श्रीरघुनाथजी ने उन्हें बिना ही परिश्रम के (आसानी से) ढहा दिया ॥६॥ देखि अमितबल बाढ़ीप्रीती।बालि बधब इन्ह भइ परतीती॥ बारबार नावइपद सीसा।प्रभुहि जानि मनहरष कपीसा॥७॥ श्रीरामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गयी और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालि का वध अवश्य करेंगे। वे बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे। प्रभु को पहचान कर सुग्रीव मन में हर्षित हो रहे थे ॥७॥ उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथकृपाँ मन भयउअलोला॥ सुखसंपति परिवार बड़ाई।सब परिहरि करिहउँ सेवकाई॥८॥ जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपा से अब मेरा मन स्थिर हो गया। सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई (बड़प्पन) सब को त्याग कर मैं आपकी सेवा ही करूँगा ॥८॥ ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तवपद अवराधक॥ सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। मायाकृत परमारथ नाहीं॥९॥ क्योंकि आपके चरणों की आराधना करनेवाले संत कहते हैं कि ये सब (सुख-सम्पत्ति आदि) रामभक्ति के विरोधी हैं। जगत्‌ में जितने भी शत्रु-मित्र और सुख-दुःख [आदि द्वन्द्ध] हैं, सब- के-सब मायारचित हैं, परमार्थतः (वास्तव में) नहीं हैं॥९॥ बालि परमहित जासु प्रसादा । मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा ॥ सपनें जेहिसन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई॥१०॥ हे श्रीरामजी! बालि तो मेरा परम हितकारी है, जिसकी कृपा से शोक का नाश करनेवाले आप मुझे मिले; और जिसके साथ अब स्वप्न में भी लड़ाई हो तो जागने पर उसे समझकर मन में संकोच होगा [कि स्वप्न में भी मैं उससे क्यों लड़ा]॥१०॥ अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती । सब तजि भजनु करौं दिन राती ॥ सुनिबिराग संजुत कपिबानी।बोलेबिहॅसि रामु धनुपानी॥११॥ हे प्रभो! अब तो इस प्रकार कृपा कीजिये कि सब छोड़कर दिन-रात में आपका भजन ही करूँ। सुग्रीव की वैराग्ययुक्त वाणी सुन कर (उसके क्षणिक वैराग्य को देखकर) हाथ में धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी मुसकरा कर बोले॥११॥ जो कछु कहेहु सत्य सबसोई। सखा बचन मम मृषा न होई॥ नट मरकट इव सबहि नचावत । रामु खगेस बेद अस गावत ॥१२॥ तुमने जो कुछ कहा है, वह सभी सत्य है; परन्तु हे सखा! मेरा वचन मिथ्या नहीं होता (अर्थात् बालि मारा जायगा और तुम्हें राज्य मिलेगा)। [काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि- हे पक्षियों के राजा गरुड़ ! नट (मदारी) के बंदर की तरह श्रीरामजी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते हैं ॥१२॥ लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा ॥ तब रघुपति सुग्रीव पठावा । गर्जेसि जाइ निकट बल पावा ॥१३॥ तदनन्तर सुग्रीव को साथ ले कर और हाथों में धनुष-बाण धारण करके श्रीरघुनाथजी चले। तब श्रीरघुनाथजी ने सुग्रीव को बालि के पास भेजा। वह श्रीरामजी का बल पा कर बालि के निकट जाकर गरजा ॥१३॥ सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा॥ सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा । ते द्वौ बंधु तेजबल सींवा ॥१४॥ बालि सुनते ही क्रोध में भर कर वेग से दौड़ा। उसकी स्त्री तारा ने चरण पकड़ कर उसे समझाया कि हे नाथ! सुनिये, सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं॥१४॥ कोसलेस सुत लछिमन रामा । कालहु जीति सकहिं संग्रामा ॥१५॥ वे कोसलाधीश दशरथजी के पुत्र राम और लक्ष्मण संग्राम में काल को भी जीत सकते हैं ॥१५॥ दो०- कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ । जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ॥७॥ बालि ने कहा- हे भीरु! (डरपोक) प्रिये! सुनो, श्रीरघुनाथजी समदर्शी हैं। जो कदाचित् वे मुझे मारेंगे ही तो मैं सनाथ हो जाऊँगा (परम पद पा जाऊँगा) ॥७॥ #सीताराम भजन