सीताराम भजन

-मनोहर सिंह राठौड़
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4 months ago
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १६☀️ पृष्ठ १७☀️ जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई ॥ राम बान रबि उएँ जानकी । तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥१॥ श्रीरामचन्द्रजी ने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी ! रामबाणरूपी सूर्य के उदय होने पर राक्षसों की सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है ॥१॥ अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा । कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥२॥ हे माता ! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्र जी की शपथ है, मुझे प्रभु (उन) की आज्ञा नहीं है। [अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरों सहित यहाँ आवेंगे ॥२॥ निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना । जातुधान अति भट बलवाना ॥३॥ और राक्षसों को मार कर आपको ले जायेंगे। नारद आदि [ऋषि-मुनि] तीनों लोकों में उनका यश गावेंगे। [सीताजी ने कहा- हे पुत्र ! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥३॥ मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥४॥ अतः मेरे हृदय में बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम जैसे बंदर राक्षसों को कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान् जी ने अपना शरीर प्रकट किया। सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥४॥ सीता मन भरोस तब भयऊ । पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥५॥ तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्‌जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ॥५॥ दो०- सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥१६॥ हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है (अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्‌ को मार सकता है)॥१६॥ #सीताराम भजन
-मनोहर सिंह राठौड़
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4 months ago
जय श्री सीताराम 🌹 जय हिन्दू राष्ट्र 🌹 🙏 ☀️ सुन्दर काण्ड ☀️ दोहा १३☀️ पृष्ठ १४☀️ तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर ॥ चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥१॥ तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगुठी को पहचान कर सीताजी आश्चर्य चकित हो कर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं ॥१॥ जीति को सकइ अजय रघुराई।माया तें असिरचि नहिंजाई॥ सीता मन बिचार करनाना। मधुरबचन बोलेउ हनुमाना॥२॥ [वे सोचने लगीं] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी (माया के उपादान से सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान् जी मधुर वचन बोले ॥२॥ रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥३॥ वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजी का दुःख भाग गया। वे कान और मन लगा कर उन्हें सुनने लगीं हनुमान् जी ने आदि से लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥३॥ श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किनभाई॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥४॥ [सीताजी बोलीं-] जिसने कानों के लिये अमृतरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान्‌जी पास चले गये। उन्हें देख कर सीताजी फिर कर (मुख फेर कर) बैठ गयीं; उनके मन में आश्चर्य हुआ ॥४॥ राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की ॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी।दीन्हि राम तुम्हकहँ सहिदानी॥५॥ [हनुमान् जी ने कहा- हे माता जानकी! मैं श्रीरामजी का दूत हूँ। करुणानिधान की सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजी ने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है ॥५॥ नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥६॥ [सीताजी ने पूछा-] नर और वानर का सङ्ग कहो कैसे हुआ? तब हनुमान्‌जी ने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही। दो०- कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास । जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥१३॥ हनुमान् जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन और कर्म से कृपासागर श्रीरघुनाथजी का दास है ॥१३॥ #सीताराम भजन