माहाभरत

sn vyas
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6 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣9️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः अर्जुन के द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोण का ग्राह से छुटकारा और अर्जुन को ब्रह्मशिर नामक अस्त्र की प्राप्ति...(दिन 398) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः । मुञ्चस्वेत्यब्रवीत् पार्थं स मुमोचाविचारयन् ।। ८ ।। अर्जुनके यों कहनेपर द्रोणाचार्यके शरीरमें (हर्षातिरेकसे) रोमांच हो आया और वे अर्जुनसे बोले, 'चलाओ बाण'! अर्जुनने बिना सोचे-विचारे बाण छोड़ दिया ।। ८ ।। ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन च । शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः ।। ९ ।। फिर तो पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने चलाये हुए तीखे क्षुर नामक बाणसे वृक्षपर बैठे हुए उस गीधका मस्तक वेगपूर्वक काट गिराया ।। ९ ।। तस्मिन् कर्मणि संसिद्धे पर्यष्वजत पाण्डवम् । मेने च द्रुपदं संख्ये सानुबन्धं पराजितम् ।। १० ।। इस कार्यमें सफलता प्राप्त होनेपर आचार्यने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उन्हें यह विश्वास हो गया कि राजा द्रुपद युद्धमें अर्जुनद्वारा अपने भाई-बन्धुओंसहित अवश्य पराजित हो जायेंगे ।। १० ।। कस्यचित् त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः । जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ ।। ११ ।। भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर किसी समय आंगिरसवंशियोंमें उत्तम आचार्य द्रोण अपने शिष्योंके साथ गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये ।। ११ ।। अवगाढमथो द्रोणं सलिले सलिलेचरः । ग्राहो जग्राह बलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः ।। १२ ।। वहाँ जलमें गोता लगाते समय कालसे प्रेरित हो एक बलवान् जलजन्तु ग्राहने द्रोणाचार्य की पिंडली पकड ली ।। १२ ।। स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान् सर्वानचोदयत् । ग्राहं हत्वा मोक्षयध्वं मामिति त्वरयन्निव ।। १३ ।। वे अपनेको छुड़ानेमें समर्थ होते हुए भी मानो हड़बड़ाये हुए अपने सभी शिष्योंसे बोले- 'इस ग्राह को मारकर मुझे बचाओ' ।। १३ ।। तद्वाक्यसमकालं तु बीभत्सुर्निशितैः शरैः । अवार्यैः पञ्चभिर्ग्रहं मग्नमम्भस्यताडयत् ।। १४ ।। उनके इस आदेशके साथ ही बीभत्सु (अर्जुन) ने पाँच अमोघ एवं तीखे बाणोंद्वारा पानीमें डूबे हुए उस ग्राहपर प्रहार किया ।। १४ ।। इतरे त्वथ सम्मूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे । तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् ।। १५ ।। विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत् तदा । स पार्थबाणैर्बहुधा खण्डशः परिकल्पितः ।। १६ ।। ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः । अथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् ।। १७ ।। परंतु दूसरे राजकुमार हक्के-बक्के-से होकर अपने-अपने स्थानपर ही खड़े रह गये। अर्जुनको तत्काल कार्यमें तत्पर देख द्रोणाचार्यने उन्हें अपने सब शिष्योंसे बढ़कर माना और उस समय वे उनपर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुनके बाणोंसे ग्राहके टुकड़े-टुकड़े हो गये और वह महात्मा द्रोणकी पिंडली छोड़कर मर गया। तब द्रोणाचार्यने महारथी महात्मा अर्जुनसे कहा- ।। १५-१७ ।। गृहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् । अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम् ।। १८ ।। 'महाबाहो ! यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र मैं तुम्हें प्रयोग और उपसंहारके साथ बता रहा हूँ। यह सब अस्त्रोंसे बढ़कर है तथा इसे धारण करना भी अत्यन्त कठिन है। तुम इसे ग्रहण करो' ।। १८ ।। न च ते मानुषेष्वेतत् प्रयोक्तव्यं कथंचन । जगद् विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ।। १९ ।। 'मनुष्योंपर तुम्हें इस अस्त्रका प्रयोग किसी भी दशामें नहीं करना चाहिये। यदि किसी अल्प तेजवाले पुरुषपर इसे चलाया गया तो यह उसके साथ ही समस्त संसारको भस्म कर सकता है ।। १९ ।। असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते। तद् धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम ।। २० ।। 'तात! यह अस्त्र तीनों लोकोंमें असाधारण बताया गया है। तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर इस अस्त्रको धारण करो और मेरी यह बात सुनो ।। २० ।। बाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन । तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे ।। २१ ।। 'वीर! यदि कोई अमानव शत्रु तुम्हें युद्धमें पीड़ा देने लगे तो तुम उसका वध करनेके लिये इस अस्त्रका प्रयोग कर सकते हो' ।। २१ ।। तथेति सम्प्रतिश्रुत्य बीभत्सुः स कृताञ्जलिः । जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः । भविता त्वत्समो नान्यः पुमॉल्लोके धनुर्धरः ।। २२ ।। तब अर्जुनने 'तथास्तु' कहकर वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्रको ग्रहण किया। उस समय गुरु द्रोणने अर्जुनसे पुनः यह बात कही- 'संसारमें दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान धनुर्धर न होगा' ।। २२ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणग्राहमोक्षणे द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणाचार्यका ग्राहसे छुटकारा नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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6 days ago
#महाभारत पूर्व काल में एक ऋषि थे मुद्गल। उनका विवाह इन्द्रसेना नामक कन्या से हुआ जो बाद में अपने पति के नाम से मुद्गलनी भी कहलायी। दुर्भाग्य से मुद्गल की मृत्यु विवाह के तुरंत बाद हो गयी। तब इंद्रसेना को अपने पति के जाने का अपार दुःख हुआ किन्तु उसे इस बात का भी दुःख हुआ कि वो अपने वैवाहिक जीवन का भोग नहीं कर सकी। इसी कारण उसने भगवान शंकर की घोर आराधना की। जब महादेव प्रसन्न हुए तो इन्द्रसेना ने उनसे ये वर माँगा कि अगले जन्म में उसे एक ऐसा पति चाहिए जो धर्म का ज्ञाता हो, अपार बलशाली हो, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो, संसार में सर्वाधिक सुन्दर हो एवं जिसके सहनशीलता की कोई सीमा ना हो। महादेव मुस्कुराये और उन्होंने इन्द्रसेना से कहा कि एक ही पुरुष में ये सारे गुण होना असंभव है। किन्तु इन्द्रसेना अपनी इच्छा पर अड़ी रही और "वर देहि" का पाँच बार उच्चारण किया। तब महादेव ने उससे कहा कि मनुष्य को वरदान सोच समझ कर ही मांगना चाहिए अन्यथा उसका प्रतिकूल प्रभाव होता है। तुमने मुझसे पाँच बार पाँच अलग गुणों के पति की कामना की है इसी कारण अगले जन्म में तुम्हे इन गुणों के पाँच पति प्राप्त होंगे। ये कहकर भगवान शंकर अंतर्धान हो गए। समय बीता, महर्षि भारद्वाज के आश्रम में पृषत पुत्र द्रुपद एवं स्वयं भारद्वाज पुत्र द्रोण में घनिष्ठ मित्रता हो गयी। खेल-खेल में द्रुपद ने द्रोण से कह दिया कि जब वे राजा बनेंगे तो अपना आधा राज्य द्रोण को दे देंगे। जब दोनों बड़े हुए तो द्रुपद को अपने पिता से पांचाल का राज्य मिला और द्रोण एक निर्धन ब्राह्मण के रूप में दिन बिताने लगे। एक दिन ऐसा भी आया जब द्रोण की पत्नी कृपी के पास अपने पुत्र अश्वथामा को पिलाने हेतु दूध तक नहीं था। तब द्रोण द्रुपद के राज्य में पहुँचे और उन्हें मित्र कह कर सम्बोधित किया। इसपर द्रोण ने भरी सभा में उनका अपमान किया और तब उसका प्रतिशोध लेने के लिए द्रोण ने भगवान परशुराम से शिक्षा प्राप्त की और हस्तिनापुर के राजगुरु के पद पर आसीन हुए। जब कौरवों और पांडवों की शिक्षा समाप्त हुई तो द्रोण ने गुरु दक्षिणा में द्रुपद को माँगा। कौरवों के असफल होने के बाद अंततः पांडवों ने विजय प्राप्त की और अर्जुन ने द्रुपद को बंदी बना कर द्रोण के समक्ष प्रस्तुत किया। द्रोण ने पांचाल का विभाजन कर लिया और उत्तरी पांचाल का राजा अश्वथामा को बना दिया। दक्षिण पांचाल द्रुपद के पास ही रहा। द्रुपद की दो संतान थी - ज्येष्ठ थी शिखण्डिनी, जिसने बाद में पुरुषत्व प्राप्त किया और शिखंडी कहलायी एवं सत्यजीत। किन्तु द्रोण से प्रतिशोध लेने के लिए द्रुपद को एक दिव्य पुत्र की आवश्यकता थी। इसी लिए उन्होंने एक यज्ञ जिसकी अग्नि से उन्हें धृष्टधुम्न नामक पुत्र प्राप्त हुआ। फिर उसी यज्ञ से एक पुत्री का भी प्रादुर्भाव हुआ। द्रुपद की पुत्री होने कारण वो द्रौपदी कहलायी। पांचाल की राजकुमारी होने के कारण उनका नाम पांचाली, यज्ञ से प्रकट होने के कारण याज्ञसेनी और सांवले रंग के कारण उसका एक नाम कृष्णा भी पड़ा। द्रौपदी को इन्द्राणी शचि का अवतार भी माना जाता है। कहा जाता है समस्त संसार में उससे सुंदर स्त्री और कोई नहीं थी। अपनी चंद्रमुखी पुत्री के विवाह के लिए द्रुपद ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने अर्जुन का पराक्रम देखा था और वे चाहते थे द्रौपदी को अर्जुन पति रूप में मिले। इसी कारण उन्होंने एक अत्यंत कठिन धनुर्विद्या की प्रतियोगिता रखी जिसमें ऊपर घूमती हुई मीन के नेत्र को नीचे रखे तेल में उसका प्रतिबिम्ब देख कर बींधना था। उस कठोर धनुष को वहाँ उपस्थित प्रतियोगी हिला भी ना सके, किन्तु फिर अंगराज कर्ण ने सहज ही उस धनुष को उठा कर उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी। किन्तु द्रौपदी ने अपने कुल का ध्यान रखते हुए एक सूतपुत्र से विवाह करने से मना कर दिया। द्रौपदी के इस कृत्य को आज कल के लोग जातिवादी बताते हैं किन्तु उन्हें ये भी जानना चाहिए कि इस घटना के विषय में भी अलग-अलग मत हैं। महाभारत के दक्षिणात्य पाठ में ऐसा वर्णित है कि महारथी कर्ण ने वो धनुष उठा तो लिया किन्तु उसपर प्रत्यञ्चा चढाने में असफल रहे। अर्थात इसके अनुसार द्रौपदी ने स्वयंवर में कर्ण का अपमान नहीं किया था। तत्पश्चात ब्राह्मण रुपी अर्जुन ने उस धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ा कर मत्स्य की आँखों को एक ही बाण से बींध कर द्रौपदी का वरण कर लिया। उस समय तक द्रौपदी को ये नहीं पता था कि उसका पति सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन है। जब वे पांचों भाई आश्रम पहुँचे तो उन्होंने परिहास में ही अपनी माता कुंती से ये कहा कि वे दान में एक अद्भुत वस्तु लाये हैं। तब कुंती ने बिना देखे ही अनायास ये कह दिया कि उसे पाँचो भाई बराबर आपस में बाँट लें। अब उनके समक्ष एक घोर धर्म संकट आ गया। भला एक कन्या को पाँच पुरुषों में कैसे बाँटा जा सकता था। तभी महर्षि व्यास और श्रीकृष्ण वहाँ पहुँचे और द्रौपदी को धर्मपूर्वक पाँचों पांडवों से विवाह करने को कहा। उन्होंने जटिला नामक एक सती स्त्री का उदाहरण भी दिया जिसने ७ पुरुषों से विवाह किया था। इसके अतिरिक्त १० प्रचेताओं का विवाह भी मारिषि नामक कन्या से हुआ था। इसके पश्चात भी द्रौपदी के मन में संशय देख कर श्रीकृष्ण ने उन्हें उनके पूर्वजन्म की बात याद दिलाई जिसमें महादेव ने उन्हें पाँच पति पाने का वरदान दिया था। उसी वरदान के फलस्वरूप धर्म के प्रतीक युधिष्ठिर, महाबलवान भीम, परशुराम के सामन पराक्रमी अर्जुन, अद्भुत सौंदर्य के धनी नकुल और अपार सहनशीलता के स्वामी सहदेव उन्हें पति के रूप में मिले हैं। तब द्रौपदी ने कहा कि वो किस प्रकार पवित्र रहकर पाँच पतियों के साथ धर्मपूर्वक रह सकती है? इस दुविधा को समझते हुए महर्षि व्यास ने द्रौपदी को चिरकुमारी होने का वरदान दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक रात्रि के बाद उसका कौमार्य पुनः अक्षत हो जाएगा जिससे वो पवित्र भाव से अपने सभी पतियों के साथ रह सकती है। इसी कारण उन्हें पंचकन्याओं में भी स्थान मिला। जब वे द्रौपदी के साथ हस्तिनापुर लौटे और इंद्रप्रस्थ का विभाजन हुआ तब देवर्षि नारद युधिष्ठिर से मिलने आये। उन्होंने उन्हें सुन्द-उपसुन्द की कथा सुनाई और कहा कि उन्हें एक नियम बनाना चाहिए जिससे द्रौपदी एक समय में एक ही पांडव के साथ १ वर्ष तक रह सके। पांडवों ने उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार किया। भूलवश उसी अनुबंध का उलंघन करने पर अर्जुन को १२ वर्ष वनवास में बिताने पड़े। द्रौपदी को पांडवों से १-१ पुत्र प्राप्त हुए। युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, भीम से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकर्मा, नकुल से शतानीक एवं सहदेव से श्रुतसेन। ये सभी उप-पांडव कहलाये। दुर्भाग्य से अश्वत्थामा ने इन सभी का वध कर दिया। इसके बाद वो प्रसंग भी आया जहाँ कुरुकुल में द्रौपदी का भयानक अपमान हुआ। कुछ लोग ये मानते हैं कि इससे पूर्व द्रौपदी ने दुर्योधन को "अंधे का पुत्र अँधा" कहा था किन्तु इसका भी कोई सटीक वर्णन हमें मूल महाभारत में नहीं मिलता। कर्ण के अपमान की भांति ही ये भी लोक कथाओं के रूप में अधिक प्रचलित है जिसकी प्रमाणिकता सिद्ध नहीं है। जब पांडव द्युत में परास्त हुए तो द्रौपदी भी उसमें हारी जा चुकी थी। ऐसा उदाहरण संसार में और कही नहीं मिलता। उस सभा में दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन ने सती द्रौपदी के चीरहरण का प्रयास किया और तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई। उसी सभा में द्रौपदी ने अपने केशों को तब तक खुला रखने की प्रतिज्ञा की जबतक कौरवों का नाश नहीं हो जाता। तत्पश्चात जब पांडवों को वनवास मिला तो भी द्रौपदी ने एक सती की भांति उनका अनुसरण किया। द्रौपदी के पुण्यकर्मों के प्रभाव के कारण भगवान सूर्यनारायण ने उसे एक "अक्षय पात्र" प्रदान किया जिसका भोजन द्रौपदी के भोजन करने तक कभी समाप्त नहीं होता था। उसी की सहायता से वन में रहते हुए भी पांडव ऋषियों की सेवा और सत्कार करने में सक्षम हुए। वनवास के समय ही द्रौपदी का हरण दुःशला के पति जयद्रथ ने कर लिया। भीम और अर्जुन ने उसे मुक्त करवाया और युधिष्ठिर ने जयद्रथ को दण्डित कर उसे मुक्त कर दिया। वनवास की समाप्ति पर अगला १ वर्ष पांडवों ने गुप्तवास में बिताया। युधिष्ठिर कंक, भीम बल्लभ, अर्जुन बृहन्नला, नकुल ग्रन्थिक, सहदेव तन्तिपाल एवं द्रौपदी सैरंध्री के नाम से मत्स्यराज विराट के दास के रूप में दिन बिताने लगे। किन्तु द्रौपदी के दुर्भाग्य ने यहाँ भी उसका पीछा नहीं छोड़ा और विराट के साले कीचक की कुदृष्टि सैरंध्री पर पड़ी। उसकी रक्षा के लिए भीम ने कीचक और उसके १०५ भाइयों, जो उप-कीचक कहलाते थे, का वध कर दिया। अज्ञातवास के अंतिम दिन ही अर्जुन ने कौरव सेना को विराट युद्ध में परास्त किया और तत्पश्चात अपना राज्य ना मिलने पर महाभारत युद्ध हुआ। महाभारत युद्ध के १४वें दिन भीम ने दुःशासन का वध किया और तब उसके रक्त से प्रक्षालन कर अंततः द्रौपदी ने अपने केश बांघे। युद्ध के बाद ३६ वर्षों तक युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर पर राज्य किया और द्रौपदी पटरानी के पद पर आसीन हुई। संसार की श्रेष्ठ सतियाँ जैसे रुक्मिणी एवं सत्यभामा भी द्रौपदी को अपना आदर्श मानती थी। एक प्रसंग आता है जब सत्यभामा द्रौपदी से पूछती हैं कि वो किस प्रकार पांडवों को अपने वश में रखती है? ये सुनकर द्रौपदी उनसे कहती है कि कोई भी सती स्त्री अपने पति को वश में रखने का प्रयास नहीं करती। तत्पश्चात सत्यभामा लज्जित होकर उनसे क्षमा मांगती है और तब द्रौपदी उन्हें सतीधर्म की शिक्षा देती हैं। श्रीकृष्ण के निर्वाण के तत्पश्चात पांडवों ने शरीर त्यागने का निश्चय कर स्वर्गारोहण किया जहाँ द्रौपदी भी उनके साथ थी। एक एक कर के सभी पांडव और द्रौपदी मृत्यु को प्राप्त हुए किन्तु युधिष्ठिर स्वर्ग की ओर बढ़ते रहे। जब भीम ने पूछा कि पतिव्रताओं में श्रेष्ठ द्रौपदी अपने किस अपराध के कारण मृत्यु को प्राप्त हुई है तब युधिष्ठिर ने कहा कि द्रौपदी पाँचों पांडवों की पत्नी थी किन्तु उसने सदैव अर्जुन से सर्वाधिक प्रेम किया। अपने इसी पक्षपात के कारण वो मृत्यु को प्राप्त हुई। वैसे तो अन्य पंचकन्याएँ - अहिल्या, तारा, मंदोदरी एवं कुंती के चरित्र के विषय में भी मूढ़ लोग प्रश्न उठाते रहते हैं किन्तु जिस प्रकार के चरित्रहनण का प्रयास द्रौपदी का हुआ है उसकी कोई तुलना नहीं है। हमारे धर्म ग्रंथों में इतनी भरी मात्रा में मिलावट हुई है जिसकी कोई सीमा नहीं है। विशेष कर द्रौपदी के विषय में इतने अनर्गल प्रचार किये गए हैं कि क्या कहा जाये। कई घटिया ग्रन्थ जो आधुनिक काल में ही लिखे गए हैं, विशेष रूप से द्रौपदी की कर्ण के प्रति आसक्ति के विषय में लिखते हैं जो बिलकुल भी सत्य नहीं है। और तो और श्रीकृष्ण एवं द्रौपदी के विषय में भी कई अनर्गल प्रलाप आपको मिल जाएंगे जो बिलकुल निरर्थक हैं। द्रौपदी के पाँच पांडवों से सम्बन्ध के विषय में भी लोग प्रश्न उठाते हैं किन्तु वे ये भूल जाते हैं वो एक महासती थी जिसे समझना आजकल के अल्पबुद्धि व्यक्तियों के बस में नहीं है। इस अनर्गल तर्क का एक बड़ा कारण आज कल के अप्रासंगिक टीवी सीरियल्स भी हैं जिन्होंने पूरे गौरवशाली इतिहास को तोड़ने मड़ोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। तो इस लेख के साथ पंचकन्याओं की श्रृंखला समाप्त होती है। आशा है आपको ये श्रंखला पसंद आयी होगी। पंचकन्याओं के श्लोक से हम इसका अंत करते हैं - अहिल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा। पंचकन्या स्मरणित्यं महापातक नाशक॥ अर्थात: अहिल्या, द्रौपदी, कुन्ती, तारा तथा मन्दोदरी, इन पाँच कन्याओं का प्रतिदिन स्मरण करने से सारे पाप धुल जाते हैं।
sn vyas
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11 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣9️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोणाचार्य द्वारा राजकुमारों की शिक्षा, एकलव्य की गुरुभक्ति तथा आचार्य द्वारा शिष्यों की परीक्षा...(दिन 394) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गदायुद्धेऽसिचर्यायां तोमरप्रासशक्तिषु । द्रोणः संकीर्णयुद्धे च शिक्षयामास कौरवान् ।। २९ ।। उन्होंने कौरवों को गदायुद्ध, खड्ग चलाने तथा तोमर, प्रास और शक्तियों के उन्होंने कौरवोंको गदायुद्ध, खड्ग चलाने तथा तोमर, प्रास और शक्तियोंके प्रयोगकी कला एवं एक ही साथ अनेक शस्त्रोंके प्रयोग अथवा अकेले ही अनेक शत्रुओंसे युद्ध करनेकी शिक्षा दी ।। २९ ।। तस्य तत् कौशलं श्रुत्वा धनुर्वेदजिघृक्षवः । राजानो राजपुत्राश्च समाजग्मुः सहस्रशः ।। ३० ।। द्रोणाचार्यका वह अस्त्रकौशल सुनकर सहस्रों राजा और राजकुमार धनुर्वेदकी शिक्षा लेनेके लिये वहाँ एकत्रित हो गये ।। ३० ।। ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः । एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह ।। ३१ ।। महाराज ! तदनन्तर निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र एकलव्य द्रोणके पास आया ।। ३१ ।। न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्। शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया ।। ३२ ।। परंतु उसे निषादपुत्र समझकर धर्मज्ञ आचार्यने धनुर्विद्याविषयक शिष्य नहीं बनाया। कौरवोंकी ओर दृष्टि रखकर ही उन्होंने ऐसा किया ।। ३२ ।। स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परंतपः । अरण्यमनुसम्प्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम् ।। ३३ ।। तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा । इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः ।। ३४ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले एकलव्यने द्रोणाचार्यके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और वनमें लौटकर उनकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी तथा उसीमें आचार्यकी परमोच्च भावना रखकर उसने धनुर्विद्याका अभ्यास प्रारम्भ किया। वह बड़े नियमके साथ रहता था ।। ३३-३४ ।। परया श्रद्धयोपेतो योगेन परमेण च । विमोक्षादानसंधाने लघुत्वं परमाप सः ।। ३५ ।। आचार्यमें उत्तम श्रद्धा रखकर उत्तम और भारी अभ्यासके बलसे उसने बाणोंके छोड़ने, लौटाने और संधान करनेमें बड़ी अच्छी फुर्ती प्राप्त कर ली ।। ३५ ।। अथ द्रोणाभ्यनुज्ञाताः कदाचित् कुरुपाण्डवाः । रथैर्विनिर्ययुः सर्वे मृगयामरिमर्दन ।। ३६ ।। शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय ! तदनन्तर एक दिन समस्त कौरव और पाण्डव आचार्य द्रोणकी अनुमतिसे रथोंपर बैठकर (हिंसक पशुओंका) शिकार खेलनेके लिये निकले ।। ३६ ।। तत्रोपकरणं गृह्य नरः कश्चिद् यदृच्छया । राजन्ननुजगामैकः श्वानमादाय पाण्डवान् ।। ३७ ।। इस कार्यके लिये आवश्यक सामग्री लेकर कोई मनुष्य स्वेच्छानुसार अकेला ही उन पाण्डवोंके पीछे-पीछे चला। उसने साथमें एक कुत्ता भी ले रखा था ।। ३७ ।। तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्मचिकीर्षया । श्वा चरन् स वने मूढो नैषादिं प्रति जग्मिवान् ।। ३८ ।। वे सब अपना-अपना काम पूरा करनेकी इच्छासे वनमें इधर-उधर विचर रहे थे। उनका वह मूढ़ कुत्ता वनमें घूमता-घामता निषादपुत्र एकलव्यके पास जा पहुँचा ।। ३८ ।। स कृष्णं मलदिग्धाङ्गं कृष्णाजिनजटाधरम् । नैषादिं श्वा समालक्ष्य भषंस्तस्थौ तदन्तिके ।। ३९ ।। एकलव्यके शरीरका रंग काला था। उसके अंगोंमें मैल जम गया था और उसने काला मृगचर्म एवं जटा धारण कर रखी थी। निषादपुत्रको इस रूपमें देखकर वह कुत्ता भौं-भौं करके भूकता हुआ उसके पास खड़ा हो गया ।। ३९ ।। तदा तस्याथ भषतः शुनः सप्त शरान् मुखे । लाघवं दर्शयन्नस्त्रे मुमोच युगपद् यथा ।। ४० ।। यह देख भीलने अपने अस्त्रलाघवका परिचय देते हुए उस भूकनेवाले कुत्तेके मुखमें मानो एक ही साथ सात बाण मारे ।। ४० ।। स तु श्वा शरपूर्णास्यः पाण्डवानाजगाम ह । तं दृष्ट्वा पाण्डवा वीराः परं विस्मयमागताः ।। ४१ ।। उसका मुँह बाणोंसे भर गया और वह उसी अवस्थामें पाण्डवोंके पास आया। उसे देखकर पाण्डव वीर बड़े विस्मयमें पड़े ।। ४१ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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17 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोण का द्रुपद से तिरस्कृत हो हस्तिनापुर में आना, राजकुमारों से उनकी भेंट, उनकी बीटा और अँगूठी को कुएँ में से निकालना एवं भीष्म का उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना...(दिन 389) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ द्रोण उवाच महर्षेरग्निवेशस्य सकाशमहमच्युत । अस्त्रार्थमगमं पूर्व धनुर्वेदजिघृक्षया ।। ४० ।। द्रोणाचार्यने कहा- अपनी प्रतिज्ञासे कभी च्युत न होनेवाले भीष्मजी! पहलेकी बात है, मैं अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा तथा धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये महर्षि अग्निवेशके समीप गया था ।। ४० ।। ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुलाः समाः । अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रतः ।। ४१ ।। वहाँ मैं विनीत हृदयसे ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सिरपर जटा धारण किये बहुत वर्षोंतक रहा। गुरुकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहकर मैंने दीर्घकालतक उनके आश्रममें निवास किया ।। ४१ ।। पाञ्चालो राजपुत्रश्च यज्ञसेनो महाबलः । इष्वस्त्रहेतोर्व्यवसत् तस्मिन्नेव गुरी प्रभुः ।। ४२ ।। उन दिनों पंचालराजकुमार महाबली यज्ञसेन द्रुपद भी, जो बड़े शक्तिशाली थे, धनुर्वेदकी शिक्षा पानेके लिये उन्हीं गुरुदेव अग्निवेशके समीप रहते थे ।। ४२ ।। स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्च मे । तेनाहं सह संगम्य वर्तयन् सुचिरं प्रभो ।। ४३ ।। वे उस गुरुकुल में मेरे बड़े ही उपकारी और प्रिय मित्र थे। प्रभो! उनके साथ मिल-जुलकर मैं बहुत दिनोंतक आश्रममें रहा ।। ४३ ।। बाल्यात् प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च । स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकरः ।। ४४ ।। बचपनसे ही हम दोनोंका अध्ययन साथ-साथ चलता था। द्रुपद वहाँ मेरे घनिष्ठ मित्र थे। वे सदा मुझसे प्रिय वचन बोलते और मेरा प्रिय कार्य करते थे ।। ४४ ।। अब्रवीदिति मां भीष्म वचनं प्रीतिवर्धनम्। अहं प्रियतमः पुत्रः पितुर्दोण महात्मनः ।। ४५ ।। भीष्मजी ! वे एक दिन मुझसे मेरी प्रसन्नता को बढ़ाने वाली यह बात बोले- 'द्रोण ! मैं अपने महात्मा पिता का अत्यन्त प्रिय पुत्र हूँ ।। ४५ ।। अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाञ्चालो यदा तदा । त्वद्भोग्यं भविता तात सखे सत्येन ते शपे ।। ४६ ।। मम भोगाश्च वित्तं च त्वदधीनं सुखानि च। एवमुक्त्वाथ वव्राज कृतास्त्रः पूजितो मया ।। ४७ ।। 'तात! जब पांचालनरेश मुझे राज्यपर अभिषिक्त करेंगे, उस समय मेरा राज्य तुम्हारे उपभोगमें आयेगा। सखे! मैं सत्यकी सौगंध खाकर कहता हूँ- मेरे भोग, वैभव और सुख सब तुम्हारे अधीन होंगे।' यों कहकर वे अस्त्रविद्यामें निपुण हो मुझसे सम्मानित होकर अपने देशको लौट गये ।। ४६-४७ ।। तच्च वाक्यमहं नित्यं मनसा धारयंस्तदा । सोऽहं पितृनियोगेन पुत्रलोभाद् यशस्विनीम् ।। ४८ ।। नातिकेशीं महाप्रज्ञामुपयेमे महाव्रताम् । अग्निहोत्रे च सत्रे च दमे च सततं रताम् ।। ४९ ।। उनकी उस समय कही हुई इस बातको मैं अपने मनमें सदा याद रखता था। कुछ दिनोंके बाद पितरोंकी प्रेरणासे मैंने पुत्र-प्राप्तिके लोभसे परम बुद्धिमती, महान् व्रतका पालन करनेवाली, अग्निहोत्र, सत्र तथा शम-दमके पालनमें मेरे साथ सदा संलग्न रहनेवाली शरद्वान्‌की पुत्री यशस्विनी कृपीसे, जिसके केश बहुत बड़े नहीं थे, विवाह किया ।। ४८-४९ ।। अलभद् गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमौरसम् । भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम् ।। ५० ।। उस गौतमी कृपीने मुझसे मेरे औरस पुत्र अश्वत्थामाको प्राप्त किया, जो सूर्यके समान तेजस्वी तथा भयंकर पराक्रम एवं पुरुषार्थ करनेवाला है ।। ५० ।। पुत्रेण तेन प्रीतोऽहं भरद्वाजो मया यथा । गोक्षीरं पिबतो दृष्ट्वा धनिनस्तत्र पुत्रकान् । अश्वत्थामारुदद् बालस्तन्मे संदेहयद् दिशः ।। ५१ ।। उस पुत्रसे मुझे उतनी ही प्रसन्नता हुई, जितनी मुझसे मेरे पिता भरद्वाजको हुई थी। एक दिनकी बात है, गोधनके धनी ऋषिकुमार गायका दूध पी रहे थे। उन्हें देखकर मेरा छोटा बच्चा अश्वत्थामा भी बाल स्वभावके कारण दूध पीनेके लिये मचल उठा और रोने लगा। इससे मेरी आँखोंके सामने अँधेरा छा गया- मुझे दिशाओंके पहचाननेमें भी संशय होने लगा ।। ५१ ।। न स्नातकोऽवसीदेत वर्तमानः स्वकर्मसु । इति संचिन्त्य मनसा तं देशं बहुशो भ्रमन् ।। ५२ ।। विशुद्धमिच्छन् गाङ्गेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम् । अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छं पयस्विनीम् ।। ५३ ।। मैंने मन-ही-मन सोचा, यदि मैं किसी कम गायवाले ब्राह्मणसे गाय माँगता हूँ तो कहीं ऐसा न हो कि वह अपने अग्निहोत्र आदि कर्मोंमें लगा हुआ स्नातक गोदुग्धके बिना कष्टमें पड़ जाय; अतः जिसके पास बहुत-सी गौएँ हों, उसीसे धर्मानुकूल विशुद्ध दान लेनेकी इच्छा रखकर मैंने उस देशमें कई बार भ्रमण किया। गंगानन्दन ! एक देशसे दूसरे देशमें घूमनेपर भी मुझे दूध देनेवाली कोई गाय न मिल सकी ।। ५२-५३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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18 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोण का द्रुपद से तिरस्कृत हो हस्तिनापुर में आना, राजकुमारों से उनकी भेंट, उनकी बीटा और अँगूठी को कुएँ में से निकालना एवं भीष्म का उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना...(दिन 388) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ द्रोण उवाच एषा मुष्टिरिषीकाणां मयास्त्रेणाभिमन्त्रिता ।। २७ ।। द्रोण बोले-ये मुट्ठीभर सींकें हैं, जिन्हें मैंने अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किया है ।। २७ ।। अस्या वीर्य निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते। भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया ।। २८ ।। तुमलोग इसका बल देखो, जो दूसरेमें नहीं है। मैं पहले एक सींकसे उस गुल्लीको बींध दूंगा; फिर दूसरी सींकसे उस पहली सींक को बींधूंगा ।। २८ ।। तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम । इसी प्रकार दूसरी को तीसरी से बींधते हुए अनेक सींकों का संयोग होने पर मुझे गुल्ली मिल जायगी ।। २८ ।। वैशम्पायन उवाच ततो यथोक्तं द्रोणेन तत् सर्वं कृतमञ्जसा ।। २९ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर द्रोणने जैसा कहा था, वह सब कुछ अनायास ही कर दिखाया ।। २९ ।। तदवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचोऽब्रुवन् ।। ३० ।। यह अद्भुत कार्य देखकर उन कुमारोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे इस प्रकार बोले ।। ३० ।। कुमारा ऊचुः मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर । कुमारों ने कहा- ब्रह्मर्षे! अब आप शीघ्र ही इस अँगूठीको भी निकाल दीजिये ।। ३० वैशम्पायन उवाच ततः शरं समादाय धनुर्द्राणो महायशाः ।। ३१ ।। शरेण विद्ध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत् प्रभुः । सशरं समुपादाय कूपादङ्गुलिवेष्टनम् ।। ३२ ।। ददौ ततः कुमाराणां विस्मितानामविस्मितः । मुद्रिकामुद्धृतां दृष्ट्वा तमाहुस्ते कुमारकाः ।। ३३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँ से बाण सहित अँगूठी निकालकर उन आश्चर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा ।। ३१-३३ ।। कुमारा ऊचुः अभिवादयामहे ब्रह्मन् नैतदन्येषु विद्यते । कोऽसि कस्यासि जानीमो वयं किं करवामहे ।। ३४ ।। कुमार बोले- ब्रह्मन् ! हम आपको प्रणाम करते हैं। यह अद्भुत अस्त्र-कौशल दूसरे किसीमें नहीं है। आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं- यह हम जानना चाहते हैं। बताइये, हमलोग आपकी क्या सेवा करें? ।। ३४ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो द्रोणः प्रत्युवाच कुमारकान्। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कुमारोंके इस प्रकार पूछनेपर द्रोणने उनसे कहा ।। ३४ ।। द्रोण उवाच आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्च माम् ।। ३५ ।। स एव सुमहातेजाः साम्प्रतं प्रतिपत्स्यते । द्रोण बोले-तुम सब लोग भीष्मजीके पास जाकर मेरे रूप और गुणोंका परिचय दो। वे महातेजस्वी भीष्मजी ही मुझे इस समय पहचान सकते हैं ।। ३५३ ।। वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचुः कुमारकाः ।। ३६ ।। ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम् । भीष्मः श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत ।। ३७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- 'बहुत अच्छा' कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्मणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया। कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं ।। ३६-३७ ।। युक्तरूपः स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च । अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम् ।। ३८ ।। परिपप्रच्छ निपुणं भीष्मः शस्त्रभृतां वरः । हेतुमागमने तच्च द्रोणः सर्वं न्यवेदयत् ।। ३९ ।। फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये। वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया ।। ३८-३९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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20 days ago
#महाभारत #श्रीमहिभारतकथा-3️⃣8️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोण का द्रुपद से तिरस्कृत हो हस्तिनापुर में आना, राजकुमारों से उनकी भेंट, उनकी बीटा और अँगूठी को कुएँ में से निकालना एवं भीष्म का उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना...(दिन 388) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् । अब्रवीत् पार्थिवं राजन् सखायं विद्धि मामिह ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! प्रतापी द्रोण राजा द्रुपदके यहाँ जाकर उनसे इस प्रकार बोले- 'राजन् ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं तुम्हारा मित्र द्रोण यहाँ तुमसे मिलनेके लिये आया हूँ' ।। १ ।। इत्येवमुक्तः सख्या स प्रीतिपूर्व जनेश्वरः । भारद्वाजेन पाञ्चालो नामृष्यत वचोऽस्य तत् ।। २ ।। मित्र द्रोणके द्वारा इस प्रकार प्रेमपूर्वक कहे जानेपर पंचालदेशके नरेश द्रुपद उनकी इस बातको सह न सके ।। २ ।। सक्रोधामर्षजिह्मभूः कषायीकृतलोचनः । ऐश्वर्यमदसम्पन्नो द्रोणं राजाब्रवीदिदम् ।। ३ ।। क्रोध और अमर्षसे उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, आँखोंमें लाली छा गयी; धन और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर वे राजा द्रोणसे यों बोले ।। ३ ।। द्रुपद उवाच अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन् नातिसमञ्जसा । यन्मां ब्रवीषि प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज ।। ४ ।। द्रुपदने कहा- ब्रह्मन् ! तुम्हारी बुद्धि सर्वथा संस्कारशून्य- अपरिपक्व है। तुम्हारी यह बुद्धि यथार्थ नहीं है। तभी तो तुम धृष्टतापूर्वक मुझसे कह रहे हो कि 'राजन् ! मैं तुम्हारा सखा हूँ' ।। ४ ।। न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरैः क्वचित् । सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रिया हीनैर्धनच्युतैः ।। ५ ।। ओ मूढ़ ! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता नहीं होती ।। ५ ।। सौहृदान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यतः । सौहृदं मे त्वया ह्यासीत् पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम् ।। ६ ।। समयके अनुसार मनुष्य ज्यों-ज्यों बूढ़ा होता है, त्यों-ही-त्यों उसकी मैत्री भी क्षीण होती चली जाती है। पहले तुम्हारे साथ जो मेरी मित्रता थी, वह सामर्थ्यको लेकर थी-उस समय में और तुम दोनों समान शक्तिशाली थे ।। ६ ।। न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित् । कालो होनं विहरति क्रोधो वैनं हरत्युत ।। ७ ।। लोकमें किसी भी मनुष्यके हृदयमें मैत्री अमिट होकर नहीं रहती। समय एक मित्रको दूसरेसे विलग कर देता है अथवा क्रोध मनुष्यको मित्रतासे हटा देता है ।। ७ ।। मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवत्वपाकृधि । आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् ।। ८ ।। इस प्रकार क्षीण होनेवाली मैत्रीका भरोसा न करो। हम दोनों एक-दूसरेके मित्र थे-इस भावको हृदयसे निकाल दो। द्विजश्रेष्ठ ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि स्वार्थको लेकर हुई थी ।। ८ ।। न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान् विदुषः सखा । न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्व किमिष्यते ।। ९ ।। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्‌का, मूर्ख विद्वान्‌का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो ।। ९ ।। ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम् । तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः ।। १० ।। जिनका धन समान है, जिनकी विद्या एक-सी है, उन्हींमें विवाह और मैत्रीका सम्बन्ध हो सकता है। हृष्ट-पुष्ट और दुर्बलमें (धनवान् और निर्धनमें) कभी मित्रता नहीं हो सकती ।। १० ।। नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते ।। ११ ।। जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता) का मित्र नहीं हो सकता। जो रथी नहीं है, वह रथीका सखा नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र कदापि नहीं हो सकता। फिर तुम पुरानी मित्रताका क्यों स्मरण करते हो? ।। ११ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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21 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣5️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामा की उत्पत्ति तथा द्रोण को परशुरामजी से अस्त्र-शस्त्र की प्राप्ति की कथा...(दिन 385) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ स रामस्य धनुर्वेदं दिव्यान्यस्त्राणि चैव ह। श्रुत्वा तेषु मनश्चक्रे नीतिशास्त्रे तथैव च ।। ५२ ।। द्रोणने यह सुनकर कि परशुरामजीके पास सम्पूर्ण धनुर्वेद तथा दिव्यास्त्रोंका ज्ञान है, उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा की। इसी प्रकार उन्होंने उनसे नीति-शास्त्रकी शिक्षा लेनेका भी विचार किया ।। ५२ ।। ततः स व्रतिभिः शिष्यैस्तपोयुक्तैर्महातपाः । वृतः प्रायान्महाबाहुर्महेन्द्रं पर्वतोत्तमम् ।। ५३ ।। फिर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले तपस्वी शिष्योंसे घिरे हुए महातपस्वी महाबाहु द्रोण परम उत्तम महेन्द्र पर्वतपर गये ।। ५३ ।। ततो महेन्द्रमासाद्य भारद्वाजो महातपाः । क्षान्तं दान्तममित्रघ्नमपश्यद् भृगुनन्दनम् ।। ५४ ।। महेन्द्र पर्वतपर पहुँचकर महान् तपस्वी द्रोणने क्षमा एवं शम-दम आदि गुणोंसे युक्त शत्रुनाशक भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया ।। ५४ ।। ततो द्रोणो वृतः शिष्यैरुपगम्य भृगूद्वहम् । आचख्यावात्मनो नाम जन्म चाङ्गिरसः कुले ।। ५५ ।। तत्पश्चात् शिष्योंसहित द्रोणने भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीके समीप जाकर अपना नाम बताया और यह भी कहा कि 'मेरा जन्म आंगिरस कुलमें हुआ है' ।। ५५ ।। निवेद्य शिरसा भूमौ पादौ चैवाभ्यवादयत् । ततस्तं सर्वमुत्सृज्य वनं जिगमिषु तदा ।। ५६ ।। जामदग्न्यं महात्मानं भारद्वाजोऽब्रवीदिदम् । भरद्वाजात् समुत्पन्नं तथा त्वं मामयोनिजम् ।। ५७ ।। आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजर्षभ । इस प्रकार नाम और गोत्र बताकर उन्होंने पृथ्वीपर मस्तक टेक दिया और परशुरामजीके चरणोंमें प्रणाम किया। तदनन्तर सर्वस्व त्यागकर वनमें जानेकी इच्छा रखनेवाले महात्मा जमदग्निकुमारसे द्रोणने इस प्रकार कहा- 'द्विजश्रेष्ठ ! मैं महर्षि भरद्वाजसे उत्पन्न उनका अयोनिज पुत्र हूँ। आपको यह ज्ञात हो कि मैं धनकी इच्छासे आया हूँ। मेरा नाम द्रोण है' ।। ५६-५७३ ।। तमब्रवीन्महात्मा स सर्वक्षत्रियमर्दनः ।। ५८ ।। यह सुनकर समस्त क्षत्रियोंका संहार करनेवाले महात्मा परशुराम उनसे यों बोले ।। ५८ ।। स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ यदिच्छसि वदस्व मे । एवमुक्तस्तु रामेण भारद्वाजोऽब्रवीद् वचः ।। ५९ ।। रामं प्रहरतां श्रेष्ठं दित्सन्तं विविधं वसु । अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलव्रत ।। ६० ।। 'द्विजश्रेष्ठ ! तुम्हारा स्वागत है। तुम जो कुछ भी चाहते हो, मुझसे कहो।' उनके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजकुमार द्रोणने नाना प्रकारके धन-रत्नोंका दान करनेकी इच्छावाले, योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामसे कहा- 'महान् व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं आपसे ऐसे धनकी याचना करता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो' ।। ५९-६० ।। राम उवाच हिरण्यं मम यच्चान्यद् वसु किंचिदिह स्थितम् । ब्राह्मणेभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत् तपोधन ।। ६१ ।। तथैवेयं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना । कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी ।। ६२ ।। परशुरामजी बोले- तपोधन! मेरे पास यहाँ जो कुछ सुवर्ण तथा अन्य प्रकारका धन था, वह सब मैंने ब्राह्मणोंको दे दिया। इसी प्रकार ग्राम और नगरोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित होनेवाली समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी महर्षि कश्यपको दे दी है ।। ६१-६२ ।। शरीरमात्रमेवाद्य ममेदमवशेषितम् । अस्त्राणि च महार्हाणि शस्त्राणि विविधानि च ।। ६३ ।। अब मेरा यह शरीरमात्र बचा है। साथ ही नाना प्रकारके बहुमूल्य अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान अवशिष्ट है ।। ६३ ।। अस्त्राणि वा शरीरं वा वरयैतन्मयोद्यतम् । वृणीष्व किं प्रयच्छामि तुभ्यं द्रोण वदाशु तत् ।। ६४ ।। अतः तुम अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान अथवा यह शरीर माँग लो। इसे देनेके लिये मैं सदा प्रस्तुत हूँ। द्रोण! बोलो, मैं तुम्हें क्या दूँ? शीघ्र उसे कहो ।। ६४ ।। द्रोण उवाच अस्त्राणि मे समग्राणि ससंहाराणि भार्गव । सप्रयोगरहस्यानि दातुमर्हस्यशेषतः ।। ६५ ।। द्रोणने कहा- भृगुनन्दन ! आप मुझे प्रयोग, रहस्य तथा संहारविधिसहित सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्रदान करें ।। ६५ ।। तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रादादस्त्राणि भार्गवः । सरहस्यव्रतं चैव धनुर्वेदमशेषतः ।। ६६ ।। तब 'तथास्तु' कहकर भृगुवंशी परशुरामजीने द्रोणको सम्पूर्ण अस्त्र प्रदान किये तथा रहस्य और व्रतसहित सम्पूर्ण धनुर्वेदका भी उपदेश किया ।। ६६ ।। प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं कृतास्त्रो द्विजसत्तमः । प्रियं सखायं सुप्रीतो जगाम द्रुपदं प्रति ।। ६७ ।। वह सब ग्रहण करके द्विजश्रेष्ठ द्रोण अस्त्र-विद्याके पूरे पण्डित हो गये और अत्यन्त प्रसन्न हो अपने प्रिय सखा द्रुपदके पास गये ।। ६७ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणस्य भार्गवादस्त्रप्राप्तौ ऊनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १२९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-विद्याकी प्राप्तिविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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21 days ago
#महाभारत #महाभारत की कथा #महाभारत एवं गीता ज्ञान 🌸 उलूपी द्वारा अर्जुन को पुनर्जीवित करने की अद्भुत कथा 🌸 महाभारत में अर्जुन के जीवन से जुड़ी अनेक रहस्यमयी घटनाएँ मिलती हैं, लेकिन उनमें से एक अत्यंत भावुक और अद्भुत प्रसंग है — नागकन्या उलूपी द्वारा अर्जुन को पुनः जीवित करना। यह कथा प्रेम, श्राप, प्रायश्चित और पुनर्जन्म जैसे गहरे भावों से भरी हुई है। 🙏 🌿 अर्जुन का वनवास और उलूपी से भेंट जब पांडव इंद्रप्रस्थ में रहते थे, तब एक नियम बनाया गया था कि यदि कोई भाई दूसरे भाई और द्रौपदी के एकांत में प्रवेश करेगा, तो उसे वनवास जाना होगा। एक दिन एक ब्राह्मण सहायता के लिए अर्जुन के पास आया। उसकी गायों को चोर ले गए थे। अर्जुन को अपने शस्त्र लेने पड़े, लेकिन वे उसी कक्ष में रखे थे जहाँ युधिष्ठिर और द्रौपदी उपस्थित थे। धर्म की रक्षा के लिए अर्जुन वहाँ गए और बाद में स्वयं वनवास पर निकल पड़े। 🌿 यात्रा करते हुए वे गंगा नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने स्नान किया। उसी समय पाताल लोक की नागकन्या उलूपी ने उन्हें देखा। उलूपी अत्यंत सुंदर, तेजस्विनी और मायावी शक्तियों वाली नाग राजकुमारी थीं। 🐍✨ वे अर्जुन के रूप, तेज और वीरता पर मोहित हो गईं। 🌊 उलूपी अर्जुन को पाताल लोक ले गई उलूपी ने अपनी नाग शक्ति से अर्जुन को जल के भीतर खींच लिया और उन्हें पाताल लोक ले गईं। अर्जुन आश्चर्यचकित रह गए। तब उलूपी ने विनम्रता से कहा— “हे पार्थ! मैं आपसे प्रेम करती हूँ। कृपया मुझे स्वीकार करें।” अर्जुन पहले संकोच में पड़े, क्योंकि वे वनवासी ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे। लेकिन उलूपी ने समझाया कि उनका व्रत केवल द्रौपदी के संदर्भ में था, अन्य विवाहों पर नहीं। अंततः अर्जुन ने उलूपी को स्वीकार किया। 🌸 कुछ समय बाद उनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम इरावान रखा गया। इरावान आगे चलकर कुरुक्षेत्र युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। ⚔️ भीष्म पितामह का वध और श्राप कुरुक्षेत्र युद्ध में भीष्म पितामह को पराजित करना लगभग असंभव था। वे इच्छामृत्यु वाले महान योद्धा थे। श्रीकृष्ण की योजना से अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके भीष्म पर बाण चलाए। भीष्म शिखंडी पर अस्त्र नहीं उठाते थे, क्योंकि वे उन्हें स्त्री मानते थे। अर्जुन के बाणों से भीष्म शरशय्या पर गिर पड़े। 🏹 हालाँकि यह धर्मयुद्ध की आवश्यकता थी, फिर भी भीष्म के दिव्य भाई — वसु — इससे अप्रसन्न हुए। उन्होंने अर्जुन को श्राप दिया— “जिस प्रकार तुमने छलपूर्वक भीष्म का वध किया है, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने ही पुत्र के हाथों मृत्यु प्राप्त होगी।” उलूपी को इस श्राप का ज्ञान था। 🌿 🐎 अश्वमेध यज्ञ और बभ्रुवाहन महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। उस यज्ञ के घोड़े की रक्षा का दायित्व अर्जुन को मिला। घोड़ा अनेक राज्यों में घूमता हुआ मणिपुर पहुँचा। मणिपुर वही राज्य था जहाँ अर्जुन ने पहले राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया था। चित्रांगदा और अर्जुन का पुत्र था — बभ्रुवाहन। 👑 जब बभ्रुवाहन को पता चला कि अर्जुन आए हैं, तो वे विनम्रता से उनका स्वागत करने पहुँचे। लेकिन उलूपी वहाँ पहले से उपस्थित थीं। वे जानती थीं कि अर्जुन को श्राप से मुक्त करने का समय आ चुका है। ⚡ उलूपी ने बभ्रुवाहन को युद्ध के लिए प्रेरित किया उलूपी ने बभ्रुवाहन से कहा— “तुम क्षत्रिय हो। यदि अश्वमेध का घोड़ा तुम्हारे राज्य में आया है, तो तुम्हारा धर्म है कि तुम युद्ध करो।” बभ्रुवाहन पहले संकोच में थे, क्योंकि सामने उनके पिता थे। लेकिन धर्म पालन के लिए उन्होंने युद्ध स्वीकार किया। 🏹 पिता और पुत्र का भयंकर युद्ध इसके बाद अर्जुन और बभ्रुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ। ⚔️ दोनों महान धनुर्धर थे। बाणों की वर्षा होने लगी। धरती काँप उठी और आकाश युद्ध की गर्जना से भर गया। अंततः बभ्रुवाहन ने एक दिव्य बाण चलाया, जो सीधे अर्जुन के हृदय में लगा। अर्जुन भूमि पर गिर पड़े। 😢 उनका शरीर निश्चल हो गया। 😭 चित्रांगदा का विलाप जब चित्रांगदा ने अर्जुन को मृत देखा, तो वे रोने लगीं। बभ्रुवाहन भी अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने कहा— “मैंने अज्ञानवश अपने ही पिता का वध कर दिया!” पूरा वातावरण शोक से भर गया। ✨ उलूपी लाई दिव्य नागमणि तब उलूपी आगे आईं। उन्होंने बताया कि यह सब एक श्राप को समाप्त करने के लिए आवश्यक था। इसके बाद वे पाताल लोक गईं और वहाँ से एक दिव्य नागमणि लेकर आईं। 🐍💎 वह मणि अत्यंत तेजस्वी थी। उससे दिव्य प्रकाश निकल रहा था। उलूपी ने वह नागमणि अर्जुन की छाती पर रख दी। क्षणभर में चमत्कार हुआ— 🌟 अर्जुन के शरीर में फिर से प्राण लौट आए। उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और उठ बैठे। सभी अत्यंत प्रसन्न हो गए। 🌸 श्राप से मुक्ति उलूपी ने अर्जुन को बताया— “हे पार्थ! यह सब वसुओं के श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए किया गया था। अब आप उस दोष से मुक्त हो चुके हैं।” अर्जुन ने उलूपी, चित्रांगदा और बभ्रुवाहन को प्रेमपूर्वक अपनाया। इस प्रकार यह दुखद घटना अंततः मंगलमय बन गई। 🙏 ✨ इस कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ 🌿 1. कर्म का फल अवश्य मिलता है महान योद्धा अर्जुन को भी अपने कर्मों का परिणाम भोगना पड़ा। 🌿 2. श्राप भी कल्याणकारी हो सकता है अर्जुन की मृत्यु वास्तव में उनके दोषों से मुक्ति का मार्ग बनी। 🌿 3. सच्चा प्रेम त्यागमय होता है उलूपी ने अपने प्रिय अर्जुन के कल्याण के लिए कठिन निर्णय लिया। 🌿 4. धर्म पालन सर्वोपरि है बभ्रुवाहन ने पुत्र धर्म से पहले क्षत्रिय धर्म निभाया। 🌸 अंत में यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर की योजना मनुष्य की समझ से कहीं अधिक गहरी होती है। जो घटना दुखद प्रतीत होती है, वही भविष्य में मुक्ति और कल्याण का कारण बन सकती है। #कृष्णा 🚩 जय श्री कृष्ण 🚩