मार्को रूबियो भारत आते है और दिल्ली जाने की जगह सीधे कोलकाता में उतरते है, इसके बाद ये मदर टेरेसा की मिशनरी संस्था में घुसकर उनके पदाधिकारियों से कमरे के भीतर मुलाकात करते है
जिसके बाद ये दिल्ली जाते है,
ये सामान्य यात्रा बिल्कुल नहीं थी, ये अमेरिका का वहीं पुराना ढर्रा है जहां भारत को ब्लैकमेल करने का प्रयास हो रहा है
वरना जिस संस्था के विदेशी फंडिंग पर रोक लगी हो, जिनके लोगो पर गंभीर अपराध लगे हो, उनसे मिलना वो भी एक अमेरिकी विदेश मंत्री का साधारण नहीं हो सकता
इससे पहले नॉर्वे में पत्रकार वाला इंसीडेंट केवल इत्तेफाक नहीं हो सकता, अमेरिकन CIA इस तरह के हथकंडे अपनाती रही है दूसरे देश के सरकारों को कंट्रोल करने के लिए
इसका कारण बहुत हद तक तेल ही है, दरअसल इस समय भारत 40 से ज्यादा देशों से तेल खरीद रहा है जिस कारण हमें तेल संकट पर उतना फर्क नहीं पड़ा, पर क्योंकि हम दुनिया में सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाले देशों में से है तो अमेरिका चाहता है कि हम तेल उसके कंट्रोल वाले देशों से खरीदे
इसका कारण पेट्रोडॉलर को बचाना है और नई करेंसी को आने से रोकना है
ये अभी ज्यादा बड़ा लग रहा है लेकिन इस तेल क्लेश की शुरुआत बहुत पहले से हो गई थी जब अमेरिका ने क्वाड की स्थापना की थी, ये चीन से युद्ध के लिए नहीं था, बल्कि चीन के व्यापारिक जहाजों को कंट्रोल करने के लिए था, कुछ ऐसा ही इन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के साथ किया था
जब इनके सभी व्यापारिक जहाजों को खत्म कर जापान में घेर लिया था
लेकिन भारत चीन से क्लेश नहीं बढ़ाना चाहता था दूसरे देशों के फायदों के लिए, इसलिए क्वाड की अहमियत खत्म हो गई
अमेरिका ने बहुत नाक घिसे पर भारत तैयार नहीं हुआ, अमेरिका ने लद्दाख में घुसपैठ का प्रोपेगैंडा भी फैलाया, चीन से युद्ध का डर भी दिखाया लेकिन भारत ने फिर भी अमेरिका को घास नहीं डाला
जिसके बाद यूक्रेन वॉर हुआ, उसमें भी भारत ने कोई सहयोग नहीं दिया, जापान बिलियन डॉलर इन्वेस्ट का लालच लेकर आया था लेकिन फिर भी बात नहीं बनी
तो अब अमेरिका ब्लैकमेल और धमकियों पर उतर चुका है
हालांकि ये उनकी मजबूरी थी क्योंकि अमेरिका चाइना का विजन समझ चुका था, अमेरिका भले दक्षिण चीन सागर में फेल हो गया पर चीन नहीं हुआ, उसने साइलेंटली ईरान को परमाणु से लैस करने का प्रयास किया, ताकि अरब में पेट्रो डील को खत्म किया जा सके
अमेरिका ने भले युद्ध करके इस डाउनफॉल को कुछ समय के लिए रोक दिया हो, लेकिन अरब से अमेरिका नामक विश्वाश खत्म हो चुका है, हालांकि अब अमेरिका किसी को विश्वास में लाना भी नहीं चाहता
अब अमेरिका ओपेक को कमजोर कर रहा, और UAE का उनसे अलग होना बताता है कि तेल की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब अमेरिका अपने कंधों पर लेने वाला है
चीन को सबसे बड़ा फायदा यह है कि चीन को बस देखते रहना है क्योंकि अमेरिका का गिरना तय है, चाहे वे कितना भी जतन करे
तो फिर भारत किस चीज की चिंता कर रहा है, वो अमेरिका की दादागिरी का जवाब क्यों नहीं देता? जब वो इतने खराब सिचुएशन में है?
दरअसल भारत भी चाहता है कि अमेरिका कुछ ऐसा करे, अमेरिका चीन के विस्तार को कंट्रोल करे, चीन जो इतनी तेजी से नई महाशक्ति बन रहा है, अमेरिका अपनी साख बचाने के ही नाम पर, पर कुछ करे जो उनके विस्तार पर कुछ समय के लिए डिले हो
भारत बिल्कुल नहीं चाहेगा कि एक सुपरपावर की जगह फिर कोई दूसरा सुपरपावर आ जाए और दुनिया को कंट्रोल करने लग जाए
इस समय सबसे मजबूत करेंसी युआन डॉलर के विकल्प के रूप में देखी जा रही है लेकिन भारत नहीं चाहता कि युआन वैश्विक मुद्रा बने
हालांकि भारत ये भी जानता है कि वो अभी तैयार नहीं है, इसलिए बस दोनों के बीच सामंजस्य बना रहा है, भारत अमेरिका से सीधे पंगा लिए बिना बस उसे प्रोत्साहित कर रहा है और अपने लिए टाइम मांग रहा है
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