महाभारत की कथा

sn vyas
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1 days ago
#महाभारत की कथा महाभारत की सबसे बड़ी दुश्मनी शायद कौरवों और पांडवों के बीच नहीं थी, न ही कर्ण और अर्जुन के बीच। असली कहानी दो ऐसे मित्रों की थी, जिनकी दोस्ती कभी इतनी गहरी थी कि वे एक-दूसरे के बिना भोजन तक नहीं करते थे, लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि वही मित्र एक-दूसरे के सबसे बड़े शत्रु बन गए। यह कहानी है गुरु द्रोणाचार्य और पांचाल नरेश द्रुपद की। दोनों की कहानी केवल मित्रता और दुश्मनी की कहानी नहीं थी, बल्कि इसी रिश्ते ने आगे चलकर द्रौपदी के जन्म, धृष्टद्युम्न के जन्म और महाभारत के महासंग्राम की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कथा उस समय से शुरू होती है जब महान आचार्य भारद्वाज के पुत्र द्रोण ज्ञान और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। द्रोण बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे, लेकिन उनका जीवन राजमहलों की सुख-सुविधाओं में नहीं बीता। दूसरी ओर पांचाल के युवराज द्रुपद राजसी वैभव में पले-बढ़े थे। दोनों की मुलाकात महर्षि भरद्वाज और बाद में अग्निवेश के आश्रम में हुई बताई जाती है। आश्रम का जीवन राजकुमार और ब्राह्मण पुत्र के बीच कोई भेद नहीं करता था। वहां सभी विद्यार्थी एक समान रहते, साथ भोजन करते, साथ शिक्षा लेते और कठिन तप तथा अभ्यास से अपने ज्ञान को बढ़ाते थे। इसी वातावरण में द्रोण और द्रुपद की मित्रता इतनी गहरी हो गई कि द्रुपद ने द्रोण से एक वचन तक कह दिया कि जब वह पांचाल का राजा बनेगा, तब उसका राज्य और उसकी संपत्ति उसके मित्र द्रोण के लिए भी उतनी ही होगी। उस समय दोनों युवा थे और भविष्य की राजनीति, राजसत्ता और परिस्थितियों का उन्हें कोई अंदाजा नहीं था। द्रोण ने इस वचन को अपने हृदय में संभालकर रखा, लेकिन समय किसी के लिए एक जैसा नहीं रहता। शिक्षा पूरी होने के बाद दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए। द्रुपद अपने पिता के बाद पांचाल की गद्दी पर बैठा और धीरे-धीरे एक शक्तिशाली राजा बन गया, जबकि द्रोण का जीवन संघर्षों से भर गया। विवाह के बाद द्रोण के घर पुत्र अश्वत्थामा का जन्म हुआ, लेकिन गरीबी इतनी अधिक थी कि अपने बच्चे के लिए दूध जुटाना भी कठिन हो गया। कहा जाता है कि एक दिन अश्वत्थामा ने दूसरे बच्चों को दूध पीते देखा और स्वयं भी दूध मांगने लगा, लेकिन द्रोण के पास उसे देने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे। इस घटना ने द्रोण के मन में अपने जीवन को बदलने की तीव्र इच्छा पैदा कर दी। उन्हें याद आया कि उनके पुराने मित्र द्रुपद अब एक विशाल राज्य के राजा हैं और कभी उन्होंने स्वयं कहा था कि उनका राज्य उनके मित्र के लिए भी खुला रहेगा। इसी आशा के साथ द्रोण पांचाल पहुंचे। वे राजमहल में गए और राजा द्रुपद से मिलने की इच्छा जताई। द्रोण को विश्वास था कि वर्षों बाद उनका मित्र उन्हें देखकर उसी तरह गले लगा लेगा जैसे गुरुकुल के दिनों में लगाया करता था। लेकिन राजदरबार में पहुंचते ही परिस्थितियां बदल चुकी थीं। द्रुपद अब राजा था और द्रोण एक निर्धन ब्राह्मण। द्रोण ने पुराने दिनों की मित्रता याद दिलाते हुए कहा कि हम दोनों ने साथ शिक्षा प्राप्त की थी और तुमने वचन दिया था कि तुम्हारा राज्य और तुम्हारी संपत्ति मेरे लिए भी होगी। लेकिन द्रुपद ने उस समय द्रोण की स्थिति देखकर उस मित्रता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि मित्रता समान लोगों के बीच होती है, राजा और निर्धन ब्राह्मण के बीच नहीं। यह बात द्रोण के हृदय में तीर की तरह लगी। जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने बचपन में अपना भोजन बांटा था, उसी ने आज उनकी गरीबी का मजाक बना दिया था। द्रोण ने उसी क्षण प्रतिशोध की प्रतिज्ञा कर ली। लेकिन उन्होंने स्वयं राजा द्रुपद पर हमला नहीं किया। उन्होंने तय किया कि वह ऐसे शिष्यों को तैयार करेंगे जो उनकी ओर से इस अपमान का उत्तर देंगे। यही वह मोड़ था जिसने आगे चलकर हस्तिनापुर के इतिहास को बदल दिया। कुछ समय बाद द्रोण हस्तिनापुर पहुंचे और वहां कौरवों तथा पांडवों के गुरु बने। उन्होंने राजकुमारों को धनुर्विद्या, युद्धकला और दिव्यास्त्रों का ज्ञान देना शुरू किया। अर्जुन उनकी विशेष प्रतिभा वाले शिष्य बने और द्रोण ने उसे ऐसा धनुर्धर बनाने का संकल्प लिया जो संसार में अद्वितीय हो। द्रोण ने अपने शिष्यों से गुरु दक्षिणा में राजा द्रुपद को बंदी बनाकर लाने की मांग की। पहले कौरवों ने प्रयास किया, लेकिन वे असफल रहे। इसके बाद अर्जुन और उसके भाइयों ने द्रुपद की सेना को पराजित किया और द्रुपद को बंदी बनाकर द्रोण के सामने ला खड़ा किया। अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी थीं। जिस द्रोण को कभी द्रुपद ने अपने बराबर का मित्र मानने से इनकार किया था, वही द्रोण अब उसके सामने विजेता के रूप में खड़ा था। द्रोण ने द्रुपद से कहा कि तुमने कहा था मित्रता केवल समान लोगों में होती है, इसलिए अब मैं तुम्हारा आधा राज्य ले रहा हूं और शेष आधा तुम्हें वापस देता हूं, ताकि हम दोनों फिर समान होकर मित्र कहलाने योग्य हों। यह केवल बदला नहीं था, बल्कि द्रोण के मन में वर्षों से जमा अपमान का उत्तर था। लेकिन द्रुपद के मन में भी आग जल उठी। वह इस अपमान को भूल नहीं सका। उसके मन में एक ही इच्छा पैदा हुई कि ऐसा पुत्र जन्म ले जो गुरु द्रोण का वध कर सके। इसी इच्छा ने एक ऐसी घटना को जन्म दिया जिसने महाभारत के युद्ध की दिशा बदल दी। द्रुपद ने महान ऋषियों की सहायता से एक यज्ञ कराया। मान्यता के अनुसार उस यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य योद्धा प्रकट हुआ, जिसका नाम धृष्टद्युम्न रखा गया। उसके जन्म का उद्देश्य ही द्रोणाचार्य का वध करना बताया गया। उसी अग्नि से एक दिव्य कन्या भी प्रकट हुई, जो आगे चलकर द्रौपदी के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार एक पुराने मित्र के अपमान और प्रतिशोध ने अग्नि से दो ऐसे पात्रों को जन्म दिया जिनकी भूमिका महाभारत के सबसे बड़े घटनाक्रमों में रही। सबसे विचित्र बात यह थी कि धृष्टद्युम्न, जिसका जन्म ही द्रोणाचार्य के वध के लिए हुआ था, आगे चलकर उसी द्रोणाचार्य से युद्ध की शिक्षा लेने पहुंचा। द्रोणाचार्य जानते थे कि यह युवक भविष्य में उनकी मृत्यु का कारण बन सकता है, फिर भी उन्होंने उसे शस्त्रविद्या सिखाई। यही महाभारत की सबसे गहरी विडंबनाओं में से एक है कि कभी-कभी मनुष्य अपने ही भविष्य को अपने हाथों से तैयार करता है। समय बीतता गया और अंततः वह दिन आया जब कौरवों और पांडवों के बीच कुरुक्षेत्र का महासंग्राम शुरू हुआ। गुरु द्रोण कौरवों की ओर से सेनापति बने, जबकि धृष्टद्युम्न पांडवों की सेना के प्रमुख सेनापतियों में शामिल हुआ। अब वह पुरानी दुश्मनी एक बार फिर युद्धभूमि में आमने-सामने खड़ी थी। द्रोणाचार्य ने युद्ध में ऐसी भयंकर शक्ति दिखाई कि पांडवों की सेना के लिए उन्हें रोकना लगभग असंभव हो गया। वे अकेले ही हजारों योद्धाओं पर भारी पड़ रहे थे। तब उन्हें रोकने के लिए एक ऐसी योजना बनाई गई जिसने धर्म और युद्धनीति दोनों के बीच कठिन प्रश्न खड़ा कर दिया। द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा से अत्यंत प्रेम करते थे। श्रीकृष्ण जानते थे कि जब तक द्रोण को विश्वास रहेगा कि अश्वत्थामा जीवित है, तब तक वे शस्त्र नहीं छोड़ेंगे। इसलिए एक हाथी का नाम भी अश्वत्थामा रखा गया था। युद्ध में उस हाथी का वध हुआ और युधिष्ठिर ने द्रोण से कहा कि अश्वत्थामा मारा गया है। इसके बाद उन्होंने धीमी आवाज में स्पष्ट किया कि वह हाथी था। लेकिन युद्ध के शोर में द्रोणाचार्य तक केवल इतना पहुंचा कि अश्वत्थामा मारा गया। अपने पुत्र की मृत्यु की खबर सुनकर उनका मन टूट गया। उन्होंने अपने अस्त्र नीचे रख दिए और युद्धभूमि में ध्यान की अवस्था में बैठ गए। यही वह क्षण था जिसका वर्षों से इंतजार किया जा रहा था। धृष्टद्युम्न उनके सामने पहुंचा और उसने द्रोणाचार्य का वध कर दिया। इस प्रकार जिस योद्धा का जन्म ही द्रोण के अंत के लिए हुआ था, उसी ने अंततः अपने उद्देश्य को पूरा किया। लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसकी शुरुआत किसी युद्ध से नहीं हुई थी। शुरुआत हुई थी दो बच्चों की मासूम दोस्ती से, जिन्होंने गुरुकुल में साथ बैठकर भोजन किया था, साथ शिक्षा पाई थी और एक-दूसरे को अपना सबसे प्रिय मित्र माना था। फिर एक वचन, एक अपमान और एक प्रतिशोध ने उस दोस्ती को ऐसी दुश्मनी में बदल दिया जिसका प्रभाव कई पीढ़ियों तक चला। द्रोणाचार्य के जीवन में भी विरोधाभास कम नहीं थे। वे महान गुरु थे, उन्होंने अर्जुन जैसे अद्वितीय धनुर्धर को तैयार किया, कौरवों और पांडवों को युद्धकला सिखाई, लेकिन उनका अपना जीवन भी मोह, अपमान और प्रतिशोध से प्रभावित रहा। दूसरी ओर द्रुपद एक शक्तिशाली राजा थे, लेकिन उनके भीतर भी पुराने अपमान की आग शांत नहीं हुई। इसी आग से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी का जन्म हुआ, और आगे चलकर द्रौपदी का जीवन स्वयं महाभारत के सबसे बड़े संघर्ष का केंद्र बन गया। इसलिए महाभारत को केवल कौरवों और पांडवों की लड़ाई समझना अधूरा है। इसके पीछे असंख्य रिश्तों, वचनों, अपमानों, प्रतिज्ञाओं और कर्मों की एक लंबी श्रृंखला थी। द्रोण और द्रुपद की कहानी हमें यह बताती है कि कभी-कभी एक छोटी-सी घटना भी भविष्य में बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकती है। एक समय के दो मित्र इतने दूर हो गए कि उनके बीच की दुश्मनी ने अग्नि से जन्मे योद्धा को जन्म दिया, उस योद्धा ने उसी गुरु से शिक्षा ली जिसके वध के लिए वह पैदा हुआ था, और अंततः कुरुक्षेत्र की धरती पर वही शिष्य अपने गुरु की मृत्यु का कारण बना। यही महाभारत की सबसे बड़ी विडंबना है—जहां रिश्ते सीधे नहीं होते, कर्म कभी अकेले नहीं आते और एक व्यक्ति का निर्णय आने वाली कई पीढ़ियों की कहानी बदल सकता है। द्रोण और द्रुपद की मित्रता ने जो बीज बोया था, वह प्रतिशोध बनकर अंकुरित हुआ, धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के रूप में सामने आया और अंततः कुरुक्षेत्र के महासंग्राम में अपनी परिणति तक पहुंचा। इसीलिए महाभारत की असली शक्ति केवल उसके युद्ध में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में छिपी है जो युद्ध से बहुत पहले बन चुके थे और जिनके परिणाम युद्ध समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक दिखाई देते रहे। जय श्री कृष्णा 🙏🏻
sn vyas
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9 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मणी का स्वयं मरने के लिये उद्यत होकर पति से जीवित रहने के लिये अनुरोध करना...(दिन 459) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ ब्राह्मण्युवाच न संतापस्त्वया कार्यः प्राकृतेनेव कर्हिचित् । न हि संतापकालोऽयं वैद्यस्य तव विद्यते ।। १ ।। ब्राह्मणी बोली-प्राणनाथ! आपको साधारण मनुष्योंकी भाँति कभी संताप नहीं करना चाहिये। आप विद्वान् हैं, आपके लिये यह संतापका अवसर नहीं है ।। १ ।। अवश्यं निधनं सर्वैर्गन्तव्यमिह मानवैः । अवश्यम्भाविन्यर्थे वै संतापो नेह विद्यते ।। २ ।। एक-न-एक दिन संसारमें सभी मनुष्योंको अवश्य मरना पड़ेगा; अतः जो बात अवश्य होनेवाली है, उसके लिये यहाँ शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। २ ।। भार्या पुत्रोऽथ दुहिता सर्वमात्मार्थमिष्यते। व्यथां जहि सुबुद्धया त्वं स्वयं यास्यामि तत्र च ।। ३ ।। एतद्धि परमं नार्याः कार्यं लोके सनातनम्। प्राणानपि परित्यज्य यद् भर्तृहितमाचरेत् ।। ४ ।। पत्नी, पुत्र और पुत्री- ये सब अपने ही लिये अभीष्ट होते हैं। आप उत्तम बुद्धि-विवेकका आश्रय लेकर शोक-संताप छोड़िये। मैं स्वयं वहाँ (राक्षसके समीप) चली जाऊँगी। पत्नीके लिये लोकमें सबसे बढ़कर यही सनातन कर्तव्य है कि वह अपने प्राणोंको भी निछावर करके पतिकी भलाई करे ।। ३-४ ।। तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीदं सुखावहम् । भवत्यमुत्र चाक्षय्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम् ।। ५ ।। पतिके हितके लिये किया हुआ मेरा वह प्राणोत्सर्गरूप कर्म आपके लिये तो सुखकारक होगा ही, मेरे लिये भी परलोकमें अक्षय सुखका साधक और इस लोकमें यशकी प्राप्ति करानेवाला होगा ।। ५ ।। एष चैव गुरुर्धर्मो यं प्रवक्ष्याम्यहं तव । अर्थश्च तव धर्मश्च भूयानत्र प्रदृश्यते ।। ६ ।। यह सबसे बड़ा धर्म है, जो मैं आपसे बता रही हूँ। इसमें आपके लिये अधिक-से-अधिक स्वार्थ और धर्मका लाभ दिखायी देता है ।। ६ ।। यदर्थमिष्यते भार्या प्राप्तः सोऽर्थस्त्वया मयि । कन्या चैका कुमारश्च कृताहमनृणा त्वया ।। ७ ।। जिस उद्देश्यसे पत्नीकी अभिलाषा की जाती है, आपने वह उद्देश्य मुझसे सिद्ध कर लिया है। एक पुत्री और एक पुत्र आपके द्वारा मेरे गर्भसे उत्पन्न हो चुके हैं। इस प्रकार आपने मुझे भी उऋण कर दिया है ।। ७ ।। समर्थः पोषणे चासि सुतयो रक्षणे तथा । न त्वहं सुतयोः शक्ता तथा रक्षणपोषणे ।॥ ८ ॥ इन दोनों संतानोंका पालन-पोषण और संरक्षण करनेमें आप समर्थ हैं। आपकी तरह मैं इन दोनोंके पालन-पोषण तथा रक्षाकी व्यवस्था नहीं कर सकूँगी ।। ८ ।। मम हि त्वद्विहीनायाः सर्वप्राणधनेश्वर । कथं स्यातां सुतौ बालौ भरेयं च कथं त्वहम् ।। ९ ।। मेरे सर्वस्वके स्वामी प्राणेश्वर ! आपके न रहनेपर मेरे इन दोनों बच्चोंकी क्या दशा होगी? मैं किस तरह इन बालकोंका भरण-पोषण करूँगी? ।। ९ ।। कथं हि विधवानाथा बालपुत्रा विना त्वया । मिथुनं जीवयिष्यामि स्थिता साधुगते पथि ।। १० ।। मेरा पुत्र अभी बालक है, आपके बिना मैं अनाथ विधवा सन्मार्गपर स्थित रहकर इन दोनों बच्चोंको कैसे जिलाऊँगी ।। १० ।। अहंकृतावलिप्तैश्च प्रार्थ्यमानामिमां सुताम् । अयुक्तैस्तव सम्बन्धे कथं शक्ष्यामि रक्षितुम् ।। ११ ।। जो आपके यहाँ सम्बन्ध करनेके सर्वथा अयोग्य हैं, ऐसे अहंकारी और घमंडीलोग जब मुझसे इस कन्याको माँगेंगे, तब मैं उनसे इसकी रक्षा कैसे कर सकूँगी ।। ११ ।। उत्सृष्टमामिषं भूमौ प्रार्थयन्ति यथा खगाः । प्रार्थयन्ति जनाः सर्वे पतिहीनां तथा स्त्रियम् ।। १२ ।। साहं विचाल्यमाना वै प्रार्थ्यमाना दुरात्मभिः । स्थातुं पथि न शक्ष्यामि सज्जनेष्टे द्विजोत्तम ।। १३ ।। जैसे पक्षी पृथ्वीपर डाले हुए मांसके टुकड़ेको लेनेके लिये झपटते हैं, उसी प्रकार सब लोग विधवा स्त्रीको वशमें करना चाहते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! दुराचारी मनुष्य जब बार-बार मुझसे याचना करते हुए मुझे मर्यादासे विचलित करनेकी चेष्टा करेंगे, उस समय में श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा अभिलषित मार्गपर स्थिर नहीं रह सकूँगी ।। १२-१३ ।। कथं तव कुलस्यैकामिमां बालामनागसम्। पितृपैतामहे मार्गे नियोक्तुमहमुत्सहे ।। १४ ।। आपके कुलकी इस एकमात्र निरपराध बालिकाको मैं बाप-दादोंके द्वारा पालित धर्ममार्गपर लगाये रखनेमें कैसे समर्थ होऊँगी ।। १४ ।। कथं शक्ष्यामि बालेऽस्मिन् गुणानाधातुमीप्सितान् । अनाथे सर्वतो लुप्ते यथा त्वं धर्मदर्शिवान् ।। १५ ।। आप धर्मके ज्ञाता हैं, आप जैसे अपने बालकको सद्‌गुणी बना सकते हैं, उस प्रकार मैं आपके न रहनेपर सब ओरसे आश्रयहीन हुए इस अनाथ बालकमें वांछनीय उत्तम गुणोंका आधान कैसे कर सकूँगी ।। १५ ।। इमामपि च ते बालामनाथां परिभूय माम्। अनर्हाः प्रार्थयिष्यन्ति शूद्रा वेदश्रुतिं यथा ।। १६ ।। जैसे अनधिकारी शूद्र वेदकी श्रुतिको प्राप्त करना चाहता हो, उसी प्रकार अयोग्य पुरुष मेरी अवहेलना करके आपकी इस अनाथ बालिकाको भी ग्रहण करना चाहेंगे ।। १६ ।। तां चैदहं न दित्सेयं त्वद्‌गुणैरुपबृंहिताम् । प्रमथ्यैनां हरेयुस्ते हविर्ध्वाङ्क्षा इवाध्वरात् ।। १७ ।। आपके ही उत्तम गुणोंसे सम्पन्न अपनी इस पुत्रीको यदि मैं उन अयोग्य पुरुषोंके हाथमें न देना चाहूँगी तो वे बलपूर्वक इसे उसी प्रकार हर ले जायेंगे, जैसे कौए यज्ञसे हविष्यका भाग लेकर उड़ जायँ ।। १७ ।। सम्प्रेक्षमाणा पुत्रं ते नानुरूपमिवात्मनः । अनर्हवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव ।। १८ ।। अवज्ञाता च लोकेषु तथाऽऽत्मानमजानती । अवलिप्तैर्नरैर्ब्रह्मन् मरिष्यामि न संशयः ।। १९ ।। ब्रह्मन् ! आपके इस पुत्रको आपके अनुरूप न देखकर और आपकी इस पुत्रीको भी अयोग्य पुरुषके वशमें पड़ी देखकर तथा लोकमें घमंडी मनुष्योंद्वारा अपमानित हो अपनेको पूर्ववत् सम्मानित अवस्थामें न पाकर मैं प्राण त्याग दूँगी, इसमें संशय नहीं है ।। १८-१९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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11 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣6️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ब्राह्मण परिवार का कष्ट दूर करने के लिये कुन्ती की भीमसेन से बातचीत तथा ब्राह्मण के चिन्तापूर्ण उद्‌गार...(दिन 468) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अर्थेप्सुता परं दुःखमर्थप्राप्तौ ततोऽधिकम् । जातस्नेहस्य चार्थेषु विप्रयोगे महत्तरम् ।। २४ ।। धनकी इच्छा सबसे बड़ा दुःख है, किंतु धन प्राप्त करनेमें तो और भी अधिक दुःख है और जिसकी धनमें आसक्ति हो गयी है, उसे उस धनका वियोग होनेपर इतना महान् दुःख होता है, जिसकी कोई सीमा नहीं है ।। २४ ।। न हि योगं प्रपश्यामि येन मुच्येयमापदः । पुत्रदारेण वा सार्धं प्राद्रवेयमनामयम् ।। २५ ।। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इस विपत्तिसे छुटकारा पा सकूँ अथवा पुत्र और स्त्रीके साथ किसी निरापद स्थानमें भाग चलूँ ।। २५ ।। यतितं वै मया पूर्व वेत्थ ब्राह्मणि तत् तथा । क्षेमं यतस्ततो गन्तुं त्वया तु मम न श्रुतम् ।। २६ ।। ब्राह्मणी! तुम इस बातको ठीक-ठीक जानती हो कि पहले तुम्हारे साथ किसी ऐसे स्थानमें चलनेके लिये जहाँ सब प्रकारसे अपना भला हो, मैंने प्रयत्न किया था; परंतु उस समय तुमने मेरी बात नहीं सुनी ।। २६ ।। इह जाता विवृद्धास्मि पिता चापि ममेति वै । उक्तवत्यसि दुर्मेधे याच्यमाना मयासकृत् ।। २७ ।। मूढमते ! मैं बार-बार तुमसे अन्यत्र चलनेके लिये अनुरोध करता। उस समय तुम कहने लगती थीं- 'यहीं मेरा जन्म हुआ, यहीं बड़ी हुई तथा मेरे पिता भी यहीं रहते थे' ।। २७ ।। स्वर्गतोऽपि पिता वृद्धस्तथा माता चिरं तव । बान्धवा भूतपूर्वाश्च तत्र वासे तु का रतिः ।। २८ ।। अरी! तुम्हारे बूढ़े माता-पिता और पहलेके भाई-बन्धु जिसे छोड़कर बहुत दिन हुए स्वर्गलोकको चले गये, वहीं निवास करनेके लिये यह आसक्ति कैसी? ।। २८ ।। सोऽयं ते बन्धुकामाया अशृण्वत्या वचो मम । बन्धुप्रणाशः सम्प्राप्तो भृशं दुःखकरो मम ।। २९ ।। तुमने बंधु-बान्धवोंके साथ रहनेकी इच्छा रखकर जो मेरी बात नहीं सुनी, उसीका यह फल है कि आज समस्त भाई-बंधुओंके विनाशकी घड़ी आ पहुँची है, जो मेरे लिये अत्यन्त दुःखका कारण है ।। २९ ।। अथवा मद्विनाशोऽयं न हि शक्ष्यामि कंचन । परित्यक्तुमहं बन्धुं स्वयं जीवन् नृशंसवत् ।। ३० ।। अथवा यह मेरे ही विनाशका समय है; क्योंकि मैं स्वयं जीवित रहकर क्रूर मनुष्यकी भाँति दूसरे किसी भाई-बंधुका त्याग नहीं कर सकूँगा ।। ३० ।। सहधर्मचरीं दान्तां नित्यं मातृसमां मम । सखायं विहितां देवैर्नित्यं परमिकां गतिम् ।। ३१ ।। प्रिये ! तुम मेरी सहधर्मिणी और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाली हो। सदा सावधान रहकर माताके समान मेरा पालन-पोषण करती हो। देवताओंने तुम्हें मेरी सखी (सहायिका) बनाया है। तुम सदा मेरी परम गति (सबसे बड़ा सहारा) हो ।। ३१ ।। पित्रा मात्रा च विहितां सदा गार्हस्थ्यभागिनीम् । वरयित्वा यथान्यायं मन्त्रवत् परिणीय च ।। ३२ ।। तुम्हारे पिता-माताने तुम्हें सदाके लिये मेरे गृहस्थाश्रमकी अधिकारिणी बनाया है। मैंने विधिपूर्वक तुम्हारा वरण करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक तुम्हारे साथ विवाह किया है ।। ३२ ।। कुलीनां शीलसम्पन्नामपत्यजननीमपि । त्वामहं जीवितस्यार्थे साध्वीमनपकारिणीम् ।। ३३ ।। परित्यक्तुं न शक्ष्यामि भार्या नित्यमनुव्रताम् । कुत एव परित्यक्तुं सुतं शक्ष्याम्यहं स्वयम् ।। ३४ ।। बालमप्राप्तवयसमजातव्यञ्जनाकृतिम् । भर्तुरर्थाय निक्षिप्तां न्यासं धात्रा महात्मना ।। ३५ ।। यया दौहित्रजॉल्लोकानाशंसे पितृभिः सह । स्वयमुत्पाद्य तां बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ।। ३६ ।। तुम कुलीन, सुशीला और संतानवती हो, सती-साध्वी हो। तुमने कभी मेरा अपकार नहीं किया है। तुम नित्य मेरे अनुकूल चलनेवाली धर्मपत्नी हो। अतः मैं अपने जीवनकी रक्षाके लिये तुम्हें नहीं त्याग सकूँगा। फिर स्वयं ही अपने उस पुत्रका त्याग तो कैसे कर सकूँगा, जो अभी निरा बच्चा है, जिसने युवावस्थामें प्रवेश नहीं किया है तथा जिसके शरीरमें अभी जवानीके लक्षणतक नहीं प्रकट हुए हैं। साथ ही अपनी इस कन्याको कैसे त्याग दूँ, जिसे महात्मा ब्रह्माजीने उसके भावी पतिके लिये धरोहरके रूपमें मेरे यहाँ रख छोड़ा है? जिसके होनेसे में पितरों के साथ दौहित्रजनित पुण्यलोकों को पाने की आशा रखता हूँ, उसी अपनी बालिकाको स्वयं ही जन्म देकर मैं मौतके मुखमें कैसे छोड़ सकता हूँ? ।। ३३-३६ ।। मन्यन्ते केचिदधिकं स्नेहं पुत्रे पितुर्नराः । कन्यायां केचिदपरे मम तुल्यावुभौ स्मृतौ ।। ३७ ।। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि पिताका अधिक स्नेह पुत्रपर होता है तथा कुछ दूसरे लोग पुत्रीपर ही अधिक स्नेह बताते हैं; किंतु मेरे लिये तो दोनों ही समान हैं ।। ३७ ।। यस्यां लोकाः प्रसूतिश्च स्थिता नित्यमथो सुखम् । अपापां तामहं बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ।। ३८ ।। जिसपर पुण्यलोक, वंशपरम्परा और नित्य सुख- सब कुछ सदा निर्भर रहते हैं, उस निष्पाप बालिका का परित्याग में कैसे कर सकता हूँ ।। ३८ ।। आत्मानमपि चोत्सृज्य तप्स्यामि परलोकगः । त्यक्ता होते मया व्यक्तं नेह शक्ष्यन्ति जीवितुम् ।। ३९ ।। अपनेको भी त्यागकर परलोकमें जानेपर मैं सदा इस बातके लिये संतप्त होता रहूँगा कि मेरे द्वारा त्यागे हुए ये बच्चे अवश्य ही यहाँ जीवित नहीं रह सकेंगे ।। ३९ ।। एषां चान्यतमत्यागो नृशंसो गर्हितो बुधैः । आत्मत्यागे कृते चेमे मरिष्यन्ति मया विना ।। ४० ।। इनमेंसे किसीका भी त्याग विद्वानोंने निर्दयतापूर्ण तथा निन्दनीय बताया है और मेरे मर जानेपर ये सभी मेरे बिना मर जायेंगे ।। ४० ।। स कृच्छ्रामहमापन्नो न शक्तस्तर्तुमापदम् । अहो धिक् कां गतिं त्वद्य गमिष्यामि सबान्धवः । सर्वैः सह मृतं श्रेयो न च मे जीवितं क्षमम् ।। ४१ ।। अहो ! मैं बड़ी कठिन विपत्तिमें फँस गया हूँ। इससे पार होनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। धिक्कार है इस जीवनको। हाय! मैं बन्धु-बान्धवोंके साथ आज किस गतिको प्राप्त होऊँगा? सबके साथ मर जाना ही अच्छा है। मेरा जीवित रहना कदापि उचित नहीं है ।। ४१ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणचिन्तायां षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणकी चिन्ताविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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20 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 450) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच सा तानेवापतत् तूर्ण भगिनी तस्य रक्षसः । अब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान् प्रति ।। अभिवाद्य ततः कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम् । अभिपूज्य च तान् सर्वान् भीमसेनमभाषत ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! हिडिम्बा सुरकी बहिन राक्षसी हिडिम्बा बिना कुछ कहे-सुने तुरंत पाण्डवोंके ही पास आयी और फिर माता कुन्ती तथा पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम करके उन सबके प्रति समादरका भाव प्रकट करती हुई भीमसेन से बोली। हिडिम्बोवाच अहं ते दर्शनादेव मन्मथस्य वशं गता । क्रूरं भ्रातृवचो हित्वा सा त्वामेवानुरुन्धती ।। राक्षसे रौद्रसंकाशे तवापश्यं विचेष्टितम् । अहं शुश्रूषुरिच्छेयं तव गात्रं निषेवितुम् ।।) हिडिम्बाने कहा- (आर्यपुत्र!) आपके दर्शनमात्रसे मैं कामदेवके अधीन हो गयी और अपने भाईके क्रूरतापूर्ण वचनोंकी अवहेलना करके आपका ही अनुसरण करने लगी। उस भयंकर आकृतिवाले राक्षसपर आपने जो पराक्रम प्रकट किया है, उसे मैंने अपनी आँखों देखा है; अतः मैं सेविका आपके शरीरकी सेवा करना चाहती हूँ। भीमसेन उवाच स्मरन्ति वैरं रक्षांसि मायामाश्रित्य मोहिनीम् । हिडिम्बे व्रज पन्थानं त्वमिमं भ्रातृसेवितम् ।। १ ।। भीमसेन बोले-हिडिम्बे ! राक्षस मोहिनी मायाका आश्रय लेकर बहुत दिनोंतक वैरका स्मरण रखते हैं, अतः तू भी अपने भाईके ही मार्गपर चली जा ।। १ ।। युधिष्ठिर उवाच क्रुद्धोऽपि पुरुषव्याघ्र भीम मा स्म स्त्रियं वधीः । शरीरगुप्त्यभ्यधिकं धर्म गोपाय पाण्डव ।। २ ।। यह सुनकर युधिष्ठिरने कहा- पुरुषसिंह भीम ! यद्यपि तुम क्रोधसे भरे हुए हो, तो भी स्त्रीका वध न करो। पाण्डुनन्दन ! शरीरकी रक्षाकी अपेक्षा भी अधिक तत्परतासे धर्मकी रक्षा करो ।। २ ।। वधाभिप्रायमायान्तमवधीस्त्वं महाबलम् । रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्धा करिष्यति ।। ३ ।। महाबली हिडिम्ब हमलोगोंको मारनेके अभिप्रायसे आ रहा था। अतः तुमने जो उसका वध किया, वह उचित ही है। उस राक्षसकी बहिन हिडिम्बा यदि क्रोध भी करे तो हमारा क्या कर लेगी? ।। ३ वैशम्पायन उवाच हिडिम्बा तु ततः कुन्तीमभिवाद्य कृताञ्जलिः । युधिष्ठिरं तु कौन्तेयमिदं वचनमब्रवीत् ।। ४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर हिडिम्बाने हाथ जोड़कर कुन्तीदेवी तथा उनके पुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम करके इस प्रकार कहा- ।। ४ ।। आयें जानासि यद् दुःखमिह स्त्रीणामनङ्गजम् । तदिदं मामनुप्राप्तं भीमसेनकृतं शुभे ।। ५ ।। 'आयें! स्त्रियोंको इस जगत्‌में जो कामजनित पीड़ा होती है, उसे आप जानती ही हैं। शुभे ! आपके पुत्र भीमसेनकी ओरसे मुझे वही कामदेवजनित कष्ट प्राप्त हुआ है ।। ५ ।। सोढं तत् परमं दुःखं मया कालप्रतीक्षया । सोऽयमभ्यागतः कालो भविता मे सुखोदयः ।। ६ ।। 'मैंने समयकी प्रतीक्षामें उस महान् दुःखको सहन किया है। अब वह समय आ गया है। आशा है, मुझे अभीष्ट सुखकी प्राप्ति होगी ।। ६ ।। मया ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्म स्वजनं तथा । वृतोऽयं पुरुषव्याघ्रस्तव पुत्रः पतिः शुभे ।। ७ ।। 'शुभे! मैंने अपने हितैषी सुहृदों, स्वजनों तथा स्वधर्म का परित्याग करके आपके पुत्र पुरुष सिंह भीमसेन को अपना पति चुना है ।। ७ ।। वीरेणाहं तथानेन त्वया चापि यशस्विनि । प्रत्याख्याता न जीवामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ८ ।। 'यशस्विनि ! यदि ये वीरवर भीमसेन या आप मेरी इस प्रार्थना को ठुकरा देंगी तो मैं जीवित नहीं रह सकूँगी। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ ।। ८ ।। तदर्हसि कृपां कर्तुं मयि त्वं वरवर्णिनि । मत्वा मूढेति तन्मा त्वं भक्ता वानुगतेति वा ।। ९ ।। अतः वरवर्णिनि ! आपको मुझे एक मूढ़ स्वभावकी स्त्री मानकर या अपनी भक्ता जानकर अथवा अनुचरी (सेविका) समझकर मुझपर कृपा करनी चाहिये ।। ९ ।। भर्भानेन महाभागे संयोजय सुतेन ह । तमुपादाय गच्छेयं यथेष्टं देवरूपिणम् । पुनश्चैवानयिष्यामि विस्रम्भं कुरु मे शुभे ।। १० ।। 'महाभागे! मुझे अपने इस पुत्रसे, जो मेरे मनोनीत पति हैं, मिलनेका अवसर दीजिये। मैं इन देवस्वरूप स्वामीको लेकर अपने अभीष्ट स्थानपर जाऊँगी और पुनः निश्चित समयपर इन्हें आपके समीप ले आऊँगी। शुभे! आप मेरा विश्वास कीजिये ।। १० ।। अहं हि मनसा ध्याता सर्वान् नेष्यामि वः सदा । (न यातुधान्यहं त्वार्ये न चास्मि रजनीचरी । कन्या रक्षस्सु साध्यस्मि राज्ञि सालकटङ्कटी ।। पुत्रेण तव संयुक्ता युवतिर्देववर्णिनी । सर्वान् वोऽहमुपस्थास्ये पुरस्कृत्य वृकोदरम् ।। अप्रमत्ता प्रमत्तेषु शुश्रूषुरसकृत् त्वहम् ।) वृजिनात् तारयिष्यामि दुर्गेषु विषमेषु च ।। ११ ।। पृष्ठेन वो वहिष्यामि शीघ्रं गतिमभीप्सतः । यूयं प्रसादं कुरुत भीमसेनो भजेत माम् ।। १२ ।। 'आप अपने मनसे जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब सदा ही (सेवामें उपस्थित हो) मैं आपलोगोंको अभीष्ट स्थानोंमें पहुँचा दिया करूँगी। आर्ये! मैं न तो यातुधानी हूँ और न निशाचरी ही हूँ। महारानी! मैं राक्षस जातिकी सुशीला कन्या हूँ और मेरा नाम सालकटंकटी है। मैं देवोपम कान्तिसे युक्त और युवावस्थासे सम्पन्न हूँ। मेरे हृदयका संयोग आपके पुत्र भीमसेनके साथ हुआ है। मैं वृकोदरको सामने रखकर आप सब लोगोंकी सेवामें उपस्थित रहूँगी। आपलोग असावधान हों, तो भी मैं पूरी सावधानी रखकर निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहूँगी। आपको संकटोंसे बचाऊँगी। दुर्गम एवं विषम स्थानोंमें यदि आप शीघ्रतापूर्वक अभीष्ट लक्ष्यतक जाना चाहते हों तो मैं आप सब लोगोंको अपनी पीठपर बिठाकर वहाँ पहुँचाऊँगी। आपलोग मुझपर कृपा करें, जिससे भीमसेन मुझे स्वीकार कर लें ।। ११-१२ ।। आपदस्तरणे प्राणान् धारयेद् येन तेन वा । सर्वमावृत्य कर्तव्यं तं धर्ममनुवर्तता ।। १३ ।। 'जिस उपायसे भी आपत्तिसे छुटकारा मिले और प्राणोंकी रक्षा हो सके, धर्मका अनुसरण करनेवाले पुरुषको वह सब स्वीकार करके उस उपायको काममें लाना चाहिये ।। १३ ।। आपत्सु यो धारयति धर्म धर्मविदुत्तमः व्यसनं ह्येव धर्मस्य धर्मिणामापदुच्यते ।। १४ ।। 'जो आपत्तिकालमें धर्मको धारण करता है, वही धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ है। धर्मपालनमें संकट उपस्थित होना ही धर्मात्मा पुरुषोंके लिये आपत्ति कही जाती है ।। १४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️