श्रीमद्भागवत - महापुराण

sn vyas
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9 days ago
🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३१/२ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 ज्ञानाग्नि कैसे प्रकट होती है ? 🦚 गतांक से आगे गोस्वामी जी इस बात को रामायण में लिखते हैं कि--- *ईश्वर अंस जीव अविनासी।* *चेतन अमल सहज सुखरासी॥* *सो मायाबस भयउ गोसाई।* *बंध्यो कीर मरकट की नाई ॥* *अरे ! तू शेर का बच्चा है । तू भेड़ नहीं है । तू सत्- चित- आनंद स्वरूप है । यह देह तेरा स्वरूप नहीं है । जब कोई समर्थ गुरु यह ज्ञान देगे, तब ही जीव का बेड़ा पार होगा। स्वरूप का ज्ञान होते ही संचित कर्म तत्काल भस्म हो जाते हैं। यह बात हम सब के अनुभवों में से भी सिद्ध होती है।* *एक संत का भाव है---* *ईश्वर का अंश जीव तो शुद्ध स्वरूप है , जिसको भूलकर यह अपने को किसी का पुत्र,, किसी का पिता ,, किसी की प्रजा ,, किसी का राजा ,, किसी कुल का ,, किसी वर्ण का ,, किसी आश्रम का ,,, मान रहा था ।उस भ्रम की निवृत्ति इतने साधनों के बाद हो जाने पर जीव यह निश्चित करता है,, कि मैं तो शुद्ध स्वरूप ,, ईश्वर का अंश ,, चेतन अमल हूं ।* *यह माया कृत संसारी नाते झूठे थे , और उसने अपने को ईश्वर का अंश मान लिया , तब वह संसार संबंध को मिथ्या मांग कर उससे अलग हो जाता है ,, यही ग्रन्थि का निरुआना या छोड़ना है । जब निश्चित रूप से संसारी नाते छूट जाते हैं , और केवल प्रभु की ही प्रसन्नता जीव स्वीकार कर लेता है ,, तब वह कृतार्थ हो जाता है।* अस्तु: (लेकिन भैया यह बड़ा मुश्किल है) *एक व्यक्ति रात को बारह बजे तक अपनी पत्नी से बात कर रहा था और इसके बाद उसकी आंखें बंद हो गई, (उसे नींद आ गई ) । निद्रा में वह एक स्वप्न देखने लगा । सपने में उसने एक व्यक्ति की हत्या कर दी ।उस पर तीन साल का मुकदमा चला । (रात को बारह और साढे बारह के बीच ) फिर इस व्यक्ति को दस साल की कैद की सजा हो गई और उसे कैद में डाल दिया गया ।* *(वास्तव में वह अपने बिस्तर पर पड़ा सो रहा था ) जेलर उसे पीठ पर चाबुक मारता था। इससे उसकी पीठ प्रतिदिन खून से लथपथ हो जाती थी। इस तरह उसने तीन साल की सजा तो भोग ली।* *(रात को बारह और साढे बारह के बीच)* *>>>>> एक दिन जेलर ने गुस्से में उसकी पीठ पर जोर से चाबुक मारा और वह व्यक्ति "बाप रे बाप " करके चिल्ला उठा और निंद्रा से जाग गया। उसकी पत्नी ने घबराकर उससे पूछा कि क्या हुआ ? तो उसने बताया कि " मेरी पीठ देखो ,, खून से कैसी लथपथ हो गई है "।* *उसकी पत्नी ने कहा-- आप तो बिस्तर पर सो रहे हैं और आपकी पीठ भी बिल्कुल चिकनी और कोमल है ,, आपकी पीठ पर कुछ भी नहीं हुआ है ।* *तब वह व्यक्ति सपना अवस्था से जागृत अवस्था में आया और उसे अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हुआ, कि वह हत्यारा नहीं है ,, बल्कि वास्तव में वह निर्दोष है । फिर उसने अपनी पत्नी को सपने की बात बताई और कैसे उसके विरूद्ध तीन साल तक हत्या का मुकदमा चला । और उसे दस साल की सख्त कैद की सजा हुई । उसमें से उसने तीन साल की सजा भोग ली।* *तब उसकी पत्नी ने कहा कि "रात को बारह बजे तक तो हम दोनों बातें कर रहे थे , और इस समय घड़ी में साढे बारह बजे हैं ,, इस आधे घंटे में आप छह साल के लिए कहां जा और आए ? ।* *उसे दस साल की सजा हुई थी , उसमें से तीन साल की सजा भोग चुका था ,, अब बाकी सात साल की सजा कौन भोगेगा । सपना अवस्था से जागृत अवस्था में आते ही उसकी सात साल की जेल की सजा का संचित कर्म भस्म सात् हो गया । क्योंकि उसे अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान हो गया था ।* *ज्ञानाग्नि सर्व कर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।* *जैसे सपना अवस्था के सुख दुख सपना अवस्था में सत्य आभासित होते हैं , किंतु जागृत अवस्था में मिथ्या हो जाते हैं, वैसे ही जागृत अवस्था में सुख-दुख आदि जागृत अवस्था में सत्य है , किंतु ज्ञान अवस्था में मिथ्या हो जाते हैं।* ( इस पर ध्यान दीजिए प्रभु जी) क्रमश इसके बाद अब कल आगे पढ़ेंगे ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ
sn vyas
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10 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_३१/१ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 ज्ञानाग्नि कैसे प्रकट होती है ? 🦚* जीव अपने असली स्वरूप को भूल गया है , जीव ब्रह्म का ही अंश है । ब्रह्म- सत , चित्त, आनंद स्वरूप है , इसलिए जीव भी सत , चित्त , आनंद स्वरूप ही है । किंतु जीव को इसका ज्ञान नहीं है , इसलिए जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। *भगवान गीता में कहते हैं कि--* *ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।* *जीव ब्रह्म का अंश होने के बावजूद, मुक्त होने के बावजूद, माया के वशीभूत होकर बद्ध हो गया है , अर्थात बंधनों में पड़ गया है।* *जीव को अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो जाए, इसी का नाम "ज्ञान" है । ज्ञान होते ही उसके सभी संचित कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं। जीव को स्वरूप का ज्ञान होना बहुत कठिन है । कोई बहुत ही समर्थ गुरु मिले , तो ही यह ज्ञान प्राप्त होता है।* *एक शेर का बच्चा जन्म लेते ही उसकी मां से अलग हो गया, और भेड़ों के मालिक ने इस नवजात शिशु को भेड़ों के साथ पाल - पोस कर बड़ा किया । यह शेर का बच्चा हमेशा भेड़ों के झुंड में ही रहता था , घूमता फिरता था, और अज्ञानता बस स्वयं को भी भेड़ ही समझता था।* *"मैं भी भेड़ ही हूं " ऐसी उसकी दृढ मान्यता हो गई थी। एक बार एक शेर घूमता -फिरता भेड़ों के झुंड के पास आया , जिसमें यह शेर का बच्चा भी था । शेर को देखकर भेड़ों का झुंड भाग खड़ा हुआ। साथ में वह शेर का बच्चा भी भाग खड़ा हुआ । यह देखकर उस शेर को आश्चर्य हुआ कि भेडो के साथ यह शेर का बच्चा क्यों भयभीत होकर भाग रहा है । शेर ने उन भेड़ों को जाने दिया और शेर के बच्चे को ही पकड़ा , तो वह बच्चा ,,, शेर के हाथ जोड़ने लगा कि " मुझे छोड़ दीजिए, मुझे मारना नहीं "।* *तब शेर ने उससे कहा : अरे भाई ,, तू भेड़ नहीं है । तू तो मेरी ही जाति का शेर है । तुझे मुझसे नहीं डरना चाहिए, मैं तुझे मार कर नहीं खाऊंगा।* *लेकिन ,,, शेर के बच्चे को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ ,, वह तो यही कहता रहा कि "मैं भेड ही हूं और मुझे मारना नहीं"।* 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 *(वह तो यही कहता रहा कि "मैं भेड ही हूं मुझे मारना नहीं"।)* *फिर वह शेर उसे एक तालाब के किनारे ले गया और कहा कि इस तालाब के पानी में अपना मुख देखो , तेरा और मेरा मुख समान ही है या नहीं ? मैं गर्जना करूंगा, वैसे ही तू भी गर्जना करना ।* *उस शेर के बच्चे ने उस शेर की तरह ही गर्जना की । तो उसे अपने स्वरूप का ज्ञान हुआ और उसी समय वह भयमुक्त होकर शेर के साथ चला गया। मानव जीवन की भी ठीक ऐसी ही स्थिति है।* *जैसे सूर्य से किरण अलग होकर पूरे जगत में फैल जाती है, वैसे ही जीव भी अनादि काल से ब्रह्म से अलग हो गया है । बादल का पानी बिल्कुल साफ होता है ,, बादलों में क्षोभ होने से बूंद अलग होकर पृथ्वी पर गिरती है । आकाश से पृथ्वी पर आने तक उसमें (बीच में) ऑक्सीजन - नाइट्रोजन आदि तत्त्व मिल जाते हैं । पृथ्वी को छूते ही यह बूदे मिट्टी में मिलकर मलीन हो जाती है।* *फिर दोबारा सूर्य की प्रखर किरणों के ताप से बाष्पी भवन होता है । तो उसकी उर्ध्व गति होती है और बादल के रूप में वह जल पुनः अपने असली स्थान पर पहुंचकर शुद्ध और पवित्र हो जाता है । इसी तरह जीव ब्रह्म से अलग हो गया है, वह जगत की माया के संपर्क में आकर अविद्या वस मलीन हो गया है ।* *गोस्वामी तुलसीदास जी रामायण में यह बात एक ही पंक्ति में समझाते हैं* *भूमि परत भा डाबर पानी।* *जिमि जीवहि माया लपटानी ॥* *पृथ्वी पर पडते ही पानी गदला हो गया , जैसे शुद्ध जीव को माया लिपट गई हो।* *शेर की तरह ही शेर के बच्चे रूपी जीव को यह समर्थ गुरु मिलता है, तब ही उसे सच्चे स्वरूप का ज्ञान होता है और वह कर्मों के भय से मुक्त हो जाता है।* *गोस्वामी जी इस बात को रामायण में लिखते हैं कि--* क्रमश: इसके बाद अब कल आगे पढेगे ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
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12 days ago
#🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏गीता ज्ञान🛕 🕉 श्रीमद्भगवद्गीता की 18 ज्ञान की बातें 🕉 श्रीमद्भगवद्गीता के 18 महत्वपूर्ण उपदेशों और जीवन दर्शन का एक सुंदर संग्रह है। यहाँ सभी 18 ज्ञान की बातों का सरल हिंदी अनुवाद और संक्षेप दिया गया है: श्रीमद्भगवद्गीता की 18 ज्ञान की बातें 1. आंतरिक सुख: सुख और आनंद मनुष्य के भीतर ही है, लेकिन वह इसे बाहरी चीजों या रिश्तों में ढूंढता है। 2. मन से उपासना: भगवान की पूजा केवल शरीर से नहीं, बल्कि सच्चे मन और प्रेम से करनी चाहिए। 3. पुनर्जन्म का कारण: मनुष्य की अधूरी वासनाएं (इच्छाएं) ही उसके अगले जन्म का कारण बनती हैं। 4. इंद्रियों पर नियंत्रण: इंद्रियों के अधीन होने के कारण ही मनुष्य के जीवन में विकार और परेशानियां आती हैं। 5. सत्संग का महत्व: धैर्य, सदाचार, प्रेम और सेवा जैसे गुण केवल अच्छी संगति (सत्संग) से ही आते हैं। 6. मन की स्वच्छता: जिस तरह शरीर के गंदे कपड़े बदले जाते हैं, उसी तरह मन में बैठे मैले विचारों को निकाल देना चाहिए। 7. कर्म का फल: जवानी में पाप करने वालों को बुढ़ापे में नींद नहीं आती और वे पछतावे में जीते हैं। 8. गोसेवा: भगवान ने जिसे धन-संपत्ति दी है, उसे गाय की सेवा करनी चाहिए; इससे ईश्वर प्रसन्न होते हैं। 9. कलियुग के वास: जुआ, शराब, परस्त्री गमन, हिंसा, झूठ, घमंड और निर्दयता में कलियुग का वास होता है। 10. योग्य गुरु की प्राप्ति: जो शिष्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए कड़ा परिश्रम करता है, उसे सच्चा गुरु अवश्य मिलता है। 11. ईश्वर ही एकमात्र सहारा: इस पूरे ब्रह्मांड में ईश्वर के सिवाय मनुष्य का कोई सच्चा साथी नहीं है। 12. त्याग में आनंद: सांसारिक भोगों में केवल क्षणिक (थोड़ी देर का) सुख है, जबकि त्याग में स्थायी आनंद मिलता है। 13. संगति का असर: सत्संग भगवान की कृपा से मिलता है, लेकिन कुसंगति (बुरी सोहबत) में पड़ना खुद के विचारों के कारण होता है। 14. लोभ और मोह: अत्यधिक मोह-माया पाप की जड़ है और लोभ (लालच) को पाप का बाप कहा गया है। 15. नारी धर्म: स्त्रियों को रोज तुलसी और माता पार्वती की पूजा करनी चाहिए; इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। 16. मन पर अविश्वास: अपने मन और बुद्धि पर हमेशा भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह मनुष्य को बार-बार धोखा देते हैं। 17. पवित्र वैवाहिक जीवन: पति-पत्नी द्वारा पवित्र रिश्ता बनाए रखने पर साक्षात भगवान उनके घर पुत्र रूप में आने की इच्छा रखते हैं। 18. ईश्वर की कसौटी: भगवान मनुष्य को हर कसौटी पर परखकर अपनाते हैं; इसलिए मन में गलत विचार न रखकर हमेशा सबके साथ प्रेम से रहें। निचला श्लोक: चित्र के सबसे नीचे गीता का प्रसिद्ध मंत्र लिखा है: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" अर्थात आपका अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं। 🕉🟨🕉🟨🕉🟨🕉🟨🕉🟨🕉🟨🕉
sn vyas
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1 months ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 🌺 भाग 1️⃣7️⃣ 🌺 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🥰 तो फिर मोक्ष कब ?🥰 *मानव मात्र मोक्ष का अधिकारी है , और मानव शरीर मोक्ष प्राप्त करने के लिए ही मिला है । मानव शरीर धारण करके मोक्ष प्राप्त नहीं करेंगे तो फिर चौरासी लाख़ योनियों में फिर से भटकने की दशा आएगी।* *मनुष्य मात्र देह के बंधनों से छूटकर परम ब्रह्म में लीन होने की इच्छा करें तो वह समर्थ है और स्वतंत्र भी है । क्योंकि वह परात्पर ब्रह्म का ही अंश है। और उसमें ही लीन होने के लिए , मोक्ष प्राप्त करने के लिए , उसका आखिरी सर्जन हुआ है।* *किंतु जब तक वह इस जन्म के संपूर्ण प्रारब्ध भोग नहीं लेगा और पिछले अनादिकाल के अनेक जन्म जन्मांतर के जमा हुए असंख्य हिमालय भर जाए , उतने संचित कर्म के ढेर, इस जीवनकाल दरमियान साफ नहीं करेगा, भस्म नहीं करेगा, तब तक उसको बार-बार अनंत काल तक अनेक जन्म , अनेक देह, धारण करना ही पड़ेगा , और तब तक उसको मोक्ष मिल ही नहीं सकता।* *उसको मोक्ष प्राप्त करने की तीव्र इच्छा हो जाए , उसको प्राप्त करना हो तो उसे तमाम संचित कर्मों का ध्वंस करना पड़ेगा । तमाम संचित कर्मों को ज्ञानाग्नि से भस्म करना पड़ेगा और वर्तमान जीवन के प्रारब्ध कर्मों को पूरी तरह से भोग लेना पड़ेगा।* *इस जीवनकाल दरमियान अभी से ही उसको नए क्रियमाण कर्म इस तरह से करने पड़ेंगे, कि करते ही तुरंत फल देकर शांत हो जाए। उसमें से एक भी क्रियमाण कर्म संचित कर्म में जमा होने नहीं पावे।* *किंतु कठिनाई यह है कि, जीव उसके जीवन काल दरमियान भोगने के पात्र हुए प्रारब्ध कर्मों को भोंगते भोंगते नए असंख्य क्रियमाण कर्म करता है जो भोगने के लिए दूसरे असंख्य जन्म धारण करने पड़ते हैं।* *इस विष -चक्र का अंत आता ही नहीं ,, इसलिए पहले तो, इस जीवनकाल दरमियान और उसके पश्चात जो जो क्रियमाण कर्म हम करें,, वह ऐसे कुशलतापूर्वक करें जिससे वह कर्म कदापि संचित में जमा न होने पावे। और वह भविष्य में नए देह के बंधन में डाले नहीं ,,, बस ऐसी कुशलतापूर्वक काम करते रहने का ही नाम योग है।* *इसलिए गीता में भगवान ने योग की व्याख्या की है कि---* *योग: कर्मसु कौशलम्* क्रमशः .... ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ
sn vyas
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1 months ago
स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि.. #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 हरि हैं हर के रूप में, हर हैं हरि के प्राण। जो दोनों में भेद करे, सोई मूढ़ अज्ञान।। भावार्थ: भगवान कृष्ण (हरि) और महादेव (हर) एक ही हैं। महादेव कृष्ण के प्राण हैं और कृष्ण महादेव के। जो अज्ञानी इनमें अंतर समझता है, वह जीवन के परम सत्य से दूर रहता है। भक्ति सार अद्वैत भाव: सच्ची भक्ति वही है जो ईश्वर को हर रूप में देख सके। शिव और विष्णु में अंतर देखना आध्यात्मिक मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है।समदृष्टि की सीख: जब तक मन में ऊंच-नीच या संप्रदायों का भेद रहेगा, तब तक वास्तविक ज्ञान (ईश्वर) की प्राप्ति नहीं हो सकती।मन की शुद्धि: यह दोहा भक्तों को कट्टरता छोड़कर शुद्ध, सरल और सर्वव्यापी प्रेम से भक्ति करने की प्रेरणा देता है। 🕉🙏जय श्रीकृष्ण हर हर महादेव!!!🙏🔱