सनातन संस्कृति कट्टर हिन्दू जुड़े

sn vyas
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1 months ago
#सनातन संस्कृति #सनातन संस्कृति कट्टर हिन्दू जुड़े #🕉️सनातन धर्म🚩 लेख सार : जीव का प्रभु से ही एकमात्र सनातन संबंध है । जीव को प्रभु पूरी आजादी देकर संसार में भेजते हैं । पर जो जीव संसार और माया में न उलझकर भक्ति द्वारा प्रभु प्राप्ति का ही लक्ष्‍य जीवन में रखता है वह प्रभु को अति प्रिय होता है । पूरा लेख नीचे पढ़ें - एक चिड़िया जो कि पिंजरे में कैद है और उस पिंजरे का द्वार खोल दिया जाए तो वह बाहर उड़ जाएगी । पर वह चिड़िया हमारे पास बहुत समय से रहती थी और हम उसे प्यार करते, खाना देते थे । इस प्यार के कारण उड़ जाने के बाद भी कुछ समय के बाद वह वापस पिंजरे में स्वतः ही आ जाए तो हमें कितना अच्छा लगेगा । हम सोचेंगे कि चिड़िया हमसे कितना प्यार करती है जिस कारण आजाद होने के बाद भी वह वापस पिंजरे में अपनी इच्छा से स्वतः आ गई । आजाद होने के बाद भी वह हमारे प्रेम बंधन में रहना चाहती है । ऐसे ही प्रभु ने हमें संसार में भेजकर आजाद कर दिया और अगर हम माया में न उलझकर प्रभु के प्रेम पिंजरे में स्वतः वापस आ जाते हैं तो प्रभु को कितना अच्छा लगेगा । प्रभु ने हमें सच्ची आजादी देकर संसार में भेजा है । हम संसार में, माया में अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं । अधिकतर लोग ऐसा करते भी हैं । पर कुछ बिरले जो कि प्रभु के सच्चे प्रेमी भक्त होते हैं वे इस संसार और माया को त्यागकर भक्ति के द्वारा प्रभु के सानिध्य में वापस आ जाते हैं । सच्चे भक्‍तों को कभी संसार और माया प्रभावित नहीं कर पाती । वे संसार और माया को लाँघकर प्रभु सानिध्य में वापस आ जाते हैं । भगवती मीराबाई की जीवनी में इसका जीवंत उदाहरण देखने को मिलता है । एक राजघराने में विवाह होने के बाद भी महल, दास, दासी, वस्त्र, आभूषण का सुख उन्‍हें बांध नहीं सका । वे प्रभु प्रेम में अपना जीवन व्यतीत करना चाहती थी और सब कुछ त्यागकर वे श्री वृंदावनजी आ गई । उन्होंने संसार और माया को त्यागकर प्रभु प्रेम में अपना जीवन व्यतीत किया । रानियों का और महल का सुख छोड़ना बड़ी परीक्षा थी पर वे भक्ति के कारण इसमें उत्तीर्ण हुई । उनकी भक्ति परिपक्व थी और अंत समय प्रभु दर्शन देकर सशरीर उन्हें अपने धाम ले गए । हम भी संसार में उड़ने के लिए स्वतंत्र हैं पर फिर भी माया से प्रभावित न होकर अगर हम प्रभु सानिध्य में रहने का मानस बनाते हैं तो प्रभु हमसे अति प्रसन्न होते हैं । जीवात्मा परमात्मा का अंश है । प्रभु चाहते हैं कि अंशी और अंश का साथ रहे पर माया बीच में आकर अंश को अंशी से दूर कर देती है । माया का यही कार्य है जो वह बड़ी निपुणता से करती है । पर जीव अगर अपने विवेक और बुद्धि से संभल जाए और माया के प्रभाव से बचकर प्रभु सानिध्य में आ जाए तो उसका निश्चित कल्याण हो जाता है । जैसे पिंजरे से मुक्त हुई चिड़िया के पिंजरे में वापस आने से हमें अच्छा लगता है क्योंकि हमें समझते देर न लगती है कि उसका हमसे सच्‍चा प्रेम है । इसी प्रकार संसार और माया को त्यागकर जो प्रभु सानिध्य में वापस आ जाता है प्रभु को वह जीव अत्‍यन्‍त प्रिय लगता है क्योंकि प्रभु जान लेते हैं कि वह जीव प्रभु से सच्चा प्रेम करता है । इसलिए जीव को चाहिए कि वह संसार और माया से प्रभावित न हो अपना रुझान सदैव प्रभु की तरफ रखे । ऐसे जीवों की प्रभु प्रतीक्षा करते हैं, उनकी बाट जोहते हैं । प्रभु हर जीव से प्रेम करते हैं पर जब वह जीव भी प्रभु से प्रेम करे तो प्रभु को सबसे ज्यादा प्रसन्नता होती है ।
sn vyas
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3 months ago
#सनातन संस्कृति कट्टर हिन्दू जुड़े ध्यानमूलं गुरोमूर्ति: पूजामूलं गुरु: पदम् । मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरुः कृपा ॥४६॥ [ स्कन्दपुराण , गुरुगीता ३.४६ ] अर्थात 👉🏻 ध्यान का केंद्र ( मूल ) गुरु की मूर्ति है । पूजा का मूल गुरु के चरण हैं । वास्तविक मन्त्र गुरु का उपदेश है । तथा मुक्ति/मोक्ष का मूल गुरु की करुणा/कृपा है ॥४६॥ *☝🏻साधना रहस्य –* 👉🏻 1√ ध्यान – गुरु का स्वरूप हृदय में धरें ~ बाह्य मूर्ति से मन एकाग्र । 👉🏻 2√ पूजा – गुरु-चरणोदक , चरण-रज ही तीर्थ ~अहंकार गलता है । 👉🏻 3√ मन्त्र – गुरु-मुख से मिला एक अक्षर भी `ब्रह्मास्त्र है`~ स्वरचित मन्त्र निष्फल । 👉🏻 4√ मोक्ष/मुक्ति – शास्त्र , तप , योग सब व्यर्थ है यदि गुरु कृपा नहीं है । *😊 गुरु बिना ज्ञान नहीं , कृपा बिना मोक्ष/मुक्ति नहीं ।* ⚠️ निवेदन – यह श्लोक गुरुगीता स्कन्दपुराण से है । गुरु मात्र देह नहीं , `तत्त्व` हैं । देह की पूजा नहीं , `बोध की पूजा` है । मूल शास्त्र ही परम् प्रमाण हैं । त्रुटि हेतु क्षमा 🙏🏻💐 नारायण 🪷🌷🪷 ☀️☀️ गुरुवार वंदन ☀️☀️ “गुरु कृपा हि केवलम्” ~सर्वज्ञ शङ्कर🚩
sn vyas
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5 months ago
#सनातन संस्कृति कट्टर हिन्दू जुड़े #सनातन संस्कृति #🕉️सनातन धर्म🚩 हिन्दू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई। 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 कुछ अति बुद्धिमान (सेकुलर व मुस्लिम) लोग कहते हैं की हिन्दू शब्द फारसियों की देन है । क्यूंकि इसका उल्लेख वेद पुराणों में नहीं है। मेरे सनातनी भाईयों, इन जैसे लोगों का मुंह बंद करने के लिये दास आपके सन्मुख हजारों वर्ष पूर्व लिखे गये सनातन शास्त्रों में लिखित चंद श्लोक (अर्थ सहित) प्रमाणिकता सहित बता रहा हूँ । आप सब सेव करके रख लें, और मुझसे यह सवाल करने वाले महामूर्ख सेकुलर को मेरा जवाब भी देख लें। -ऋग्वेद के ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया है......! "हिमलयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं । तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।। (अर्थात हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं) सिर्फ वेद ही नहीं.... बल्कि.. मेरूतंत्र ( शैव ग्रन्थ ) में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया है..... "हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये ।" (अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं) और इससे मिलता जुलता लगभग यही यही श्लोक कल्पद्रुम में भी दोहराया गया है....! "हीनं दुष्यति इति हिन्दू ।" (अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते है ) पारिजात हरण में हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है....! "हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टं । हेतिभिः श्त्रुवर्गं च स हिन्दुर्भिधियते ।।" (अर्थात जो अपने तप से शत्रुओं का दुष्टों का और पाप का नाश कर देता है, वही हिन्दू है ) माधव दिग्विजय में भी हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है....! "ओंकारमन्त्रमूलाढ्य पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य: । गौभक्तो भारतगरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः ।। (अर्थात.... वो जो ओमकार को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करे, सदैव गौपालक रहे तथा बुराईयों को दूर रखे, वो हिन्दू है )। केवल इतना ही नहीं हमारे ऋगवेद ( ८:२:४१ ) में विव हिन्दू नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है । जिन्होंने 46000 गौमाता दान में दी थी.... और ऋग्वेद मंडल में भी उनका वर्णन मिलता है । ऋग वेद में एक ऋषि का उल्लेख मिलता है जिनका नाम सैन्धव था । जो मध्यकाल में आगे चलकर "हैन्दव/हिन्दव" नाम से प्रचलित हुए, जिसका बाद में अपभ्रंश होकर हिन्दू बन गया...!! इसके अतिरिक्त भी कई स्थानों में हिन्दू शब्द उल्लेखित है....।। साभार~ पं देव शर्मा🔥