#सुंदरकांड पाठ चौपाई📙🚩

sn vyas
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10 days ago
##सुंदरकांड पाठ चौपाई📙🚩 #🙏🌹सुंदरकांड पाठ🐵 #सुंदरकांड पाठ एक प्रसिद्ध संत कथा कह रहे थे। जब वे अशोक वाटिका के दृश्य का वर्णन करने लगे, तो उन्होंने कहा कि वहाँ खिले हुए अशोक के पुष्प श्वेत (सफेद) रंग के थे। तभी हनुमान जी एक ब्राह्मण का रूप धरकर वहां प्रकट हुए और बोले, "महाराज! आप गलत कह रहे हैं। मैं स्वयं वहां था, मैंने देखा था कि फूल लाल थे।" कथावाचक अपनी बात पर अडिग रहे और हनुमान जी अपनी। अंत में तय हुआ कि प्रत्यक्षदर्शी माता सीता से ही पूछा जाए। हनुमान जी माता सीता के पास पहुँचे और प्रणाम करके बोले, "माता! क्या अशोक वाटिका के फूल लाल नहीं थे?" माता सीता ने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं पुत्र, फूल तो सफेद ही थे।" हनुमान जी बड़े असमंजस में पड़ गए। उन्हें लगा कि शायद उनकी याददाश्त कमजोर हो गई है। हनुमान जी को व्याकुल देख माता सीता ने समझाया, "पुत्र! सत्य तो यही है कि फूल सफेद थे। लेकिन उस समय जब तुम मुझे रावण के कष्टों के बीच देख रहे थे, तो तुम्हारा क्रोध चरम पर था। तुम्हारे नेत्र क्रोध से लाल (रक्तवर्ण) हो गए थे। इसलिए तुम्हें उन सफेद फूलों में भी अपनी आंखों की लाली नजर आ रही थी।" यह कहानी हमें जीवन के कुछ गहरे सत्य सिखाती है: हम संसार को वैसा नहीं देखते जैसा वह 'है', बल्कि वैसा देखते हैं जैसे हम 'स्वयं' हैं। यदि मन में क्रोध है, तो शांति भी अशांति दिखेगी। यदि मन में प्रेम है, तो कण-कण में ईश्वर दिखेगा। हनुमान जी की दृष्टि में जो लालिमा थी, वह माता के प्रति उनके अगाध प्रेम और रावण के प्रति न्यायपूर्ण क्रोध का मिश्रण थी। सत्य की बहुआयामी परतें: कथावाचक 'तथ्य' कह रहे थे, लेकिन हनुमान जी अपना 'अनुभव' कह रहे थे। दोनों ही अपनी जगह सही थे। यह प्रसंग सिखाता है कि सत्य केवल वह नहीं जो आँखों से दिखे, बल्कि वह है जो पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर देखा जाए।
sn vyas
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18 days ago
## सुंदरकांड #जय सियाराम सुंदरकांड 🚩 यह सुंदर चौपाई गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड से ली गई है। जब हनुमान जी लंका से लौटकर भगवान श्री राम को माता सीता का संदेश देते हैं, तब श्री राम भावुक होकर हनुमान जी से कहते हैं कि वे उनके इस उपकार के बदले कुछ नहीं दे पा रहे हैं और संकट की बात करते हैं। तब हनुमान जी यह बात कहते हैं। 📖🌸"कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥"🌸📖 💡 विस्तृत भावार्थ 📜 ✍️सच्ची विपत्ति की परिभाषा: 🌸हनुमान जी कहते हैं कि हे प्रभु! दुनिया जिसे धन की कमी, बीमारी या कष्ट मानती है, वह वास्तविक विपत्ति नहीं है, सच्ची विपत्ति केवल वही समय है, जब मनुष्य आपका स्मरण (याद) और भजन करना छोड़ देता है। ✍️परमात्मा से दूरी ही संकट है: 🌸जब तक इंसान भगवान के सुमिरन में लगा रहता है, तब तक वह हर परिस्थिति में सुरक्षित और शांत रहता है। जैसे ही मन भगवान को भूलकर संसार के सांसारिक मोह-माया में फंस जाता है, वहीं से दुखों और चिंताओं की शुरुआत होती है। ✍️भक्त का दृष्टिकोण: 🌸एक सच्चे भक्त के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं का छिन जाना कोई दुख नहीं है। उसके लिए सबसे बड़ा दुख यह है कि वह एक पल के लिए भी अपने प्रभु को भूल जाए। 👉इस प्रसंग की मुख्य सीख (Moral) 🌸यह प्रसंग हमें सिखाता है कि एक सच्चे सेवक या भक्त में अहंकार का लेशमात्र भी नहीं होना चाहिए। हनुमान जी ने लंका में इतना बड़ा काम किया (सीता जी का पता लगाया, लंका जलाई, राक्षसों को मारा), लेकिन जब प्रभु राम ने उनकी तारीफ की, तो उन्होंने सारा श्रेय प्रभु की कृपा को दे दिया और खुद को सिर्फ एक निमित्त मात्र माना। 🌹जय श्रीराम🌹जय सीता राम🌹जय हनुमान।🌹 🌸श्रीरामचरितमानस🌸