sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_३५/१
तीनों मार्ग पर चलने वाले जीवो का भगवान के साथ व्यवहार अलग अलग होता है
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*कर्म मार्ग पर चलने वाला जीव कहता है कि "मैं भगवान का हूं " भक्ति मार्ग पर चलने वाला जीव कहता है कि "भगवान मेरे हैं " ज्ञान मार्ग पर चलने वाला जीव कहता है कि " मैं और भगवान एक ही है "*
*एक स्त्री जौवन काल में शादी करके जब ससुराल जाती है, तब वह कहती है कि "मैं अपने पति की हूं " वह पति के कहे अनुसार ही काम करती है । पति कहता है कि आलू की सब्जी बनाओ तो वह आलू की सब्जी बनाती है । पति उसे जिस रंग की साड़ी पहनने के लिए कहता है वह वैसी ही रंग की साड़ी पहनती है । पति किसी व्यक्ति के यहां जाने से रोकता है , तो वह नहीं जाती। पति जितना कहता है वह उतना ही करती है।*
*किंतु वही स्त्री जब अधेड़ उम्र की हो जाती है , और दो तीन बच्चों की मां बन जाती है , तब वह कहती है कि " पति मेरा है" वह पति से जो करने को कहती है वह काम पति को करना पड़ता है । वह स्त्री कहती है वह वस्तु लानी है तो पति को वह वस्तु लानी पड़ती है । और वही कहती है यह वस्तु नहीं लानी है तो पति वस्तु नहीं लाता है । वह कहती है कि इस जगह पर जाना है तो पति को उस जगह पर जाना ही पड़ता है । और यदि वह किसी जगह पर जाने से मना करती है तो पति उस जगह पर नहीं जाता है ।*
*जब शादी हुई थी तब वह स्त्री कहती थी "मैं अपने पति की हूं" वही स्त्री कुछ उम्र बीत जाने के बाद कहती है कि "पति मेरा है " जो वही स्त्री वृद्ध हो जाती है और उसका पति भी वृद्ध हो जाता है । तब बूढा और बूढ़ी दोनों एक हो जाते हैं तब वह कहती है कि "मैं और मेरा पति एक ही है"*
क्रमश: अब कल पड़ेंगे ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
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