sn vyas
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#भक्ति भावना #नैवेद्य 🌷 नैवेद्य’ एक संस्कृत शब्द है। इसका शाब्दिक और धार्मिक अर्थ भगवान या देवता को अर्पित (समर्पित) किया जाने वाला भोज्य पदार्थ या भोग जिसे प्रसाद भी कहते है। पूजा-पाठ के दौरान देवी-देवताओं को प्रेम एवं श्रद्धा भाव से जो खाद्य वस्तु, फल या मिठाई भेंट की जाती है, उसे नैवेद्य कहते हैं । इसके वितरण का उद्देश्य प्रसाद को ग्रहण करने वालों की दिव्य ऊर्जा को बढ़ाना एवं उनकी रचनात्मक एवं सकारात्मक देविक प्रवृत्तियों का निर्माण कर पुण्य कमाना है* l 🙏🌷 *नैवेद्य, भोग और प्रसाद में अंतर* 🌷🙏 ⚘️ *नैवेद्य*: *भगवान को अर्पण की जाने वाली वह पहली खाद्य सामग्री या थाली है जिसे अभी भगवान के सामने रखा गया है और जिसे भक्तों ने ग्रहण नहीं किया है*। ⚘️ *भोग*: *यह भी देवता को समर्पित किया जाने वाला भोजन है, जिसे आम बोलचाल में नैवेद्य का पर्यायवाची माना जाता है*। ⚘️ *प्रसाद*: *जब नैवेद्य या भोग भगवान को समर्पित कर दिया जाता है और उसे स्वीकार किया हुआ मानकर वापस भक्तों में बांटा जाता है, तब वह प्रसाद कहलाता है* । ⚘️ *धार्मिक महत्व* :: *यह शब्द ‘निवेदयति’ (समर्पित करना) धातु से बना है । यह मनुष्य की कृतज्ञता (धन्यवाद भाव), समर्पण और शुद्ध सात्विक भावना का प्रतीक है* l 🌷 *प्रसाद भगवान की कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक है और पुण्य प्राप्ति का साधन है। पूजा या अनुष्ठान के बाद इसे इसलिए भी बांटा जाता है ताकि ईश्वर का आशीर्वाद सब तक पहुँचे, लोगों में प्रेम और समानता की भावना बढ़े, तथा मन का अहंकार कम होकर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता जागे* । ⚘️ *दिव्य आशीर्वाद*: *भगवान को भोग लगाने के बाद भोजन पवित्र और ऊर्जावान हो जाता है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करना परम कल्याणकारी माना जाता है* । ⚘️ *प्रसाद बांटने से अमीर-गरीब का भेद मिटता है और सभी को समान रूप से ईश्वर की कृपा मिलती है*। ⚘️ *कृतज्ञता और समर्पण:* *यह सिखाता है कि हमें जो कुछ भी मिला है, वह ईश्वर की देन है और उसे बांटकर खाना चाहिए* l 🙏🌷 *नैवेद्य से संबंधित श्लोक* 🌷🙏 *पूजा के समय भगवान को भोग या प्रसाद (नैवेद्य) अर्पित करते समय यह प्रसिद्ध श्लोक और प्राणहुति मंत्र बोले जाते हैं* । 🙏🌷 *नैवेद्य अर्पण श्लोक* 🌷🙏 *नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलं कुरु* । *ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम्* ॥ *शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च* । *आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्* ॥ अर्थ: * हे देव! मेरे द्वारा अर्पित यह नैवेद्य (भोग) स्वीकार कीजिए। मेरी भक्ति को अटल बना दीजिए, मुझे मनवांछित वर दीजिए और परलोक में उत्तम गति (मोक्ष) प्रदान कीजिए। शक्कर, खंड, अन्य खाद्य पदार्थ, दही, दूध, घी तथा विभिन्न प्रकार के भक्ष्य और भोज्य पदार्थों से युक्त इस नैवेद्य को ग्रहण कीजिए* । 🌷 *नैवेद्य निवेदन एवं प्राणहुति मंत्र* :: *भोग लगाते समय दाएं हाथ से जल का आचमन कराते हुए इन पांच मंत्रों का उच्चारण किया जाता है* l *ॐ प्राणाय स्वाहा*, *ॐ अपानाय स्वाहा*, *ॐ व्यानाय स्वाहा*, *ॐ उदानाय स्वाहा*, *ॐ समानाय स्वाहा* , एवं *ॐ ब्रह्मणे स्वाहा* 🌷लाभ :: *मंत्र हमारे शरीर के दिव्य चक्रों को सक्रिय करते हैं l उपरोक्त वायु तत्व के पांचों रूप जो हमारे शरीर में स्थित है सक्रियता को बढ़ा देते हैं l मंत्र ऊर्जा के शक्ति पुंज है अतः मंत्रोच्चारण ऊर्जावान बनाते हैं और शुद्ध प्रसाद रचनात्मक एवं सकारात्मक मनोवृत्तियौ का निर्माण करता है l शरीर के चारों ओर सकारात्मक ऊर्जा का घेरा बनता है। मन शांत होता है और तनाव कम होता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है* l 🌷विशेष:: *नैवेद्य शुद्ध एवं सात्विक अर्थात स्निग्धता पूर्ण देसी गायों के घृत, दूध, शक्कर, ऋतु फल, सूखे मेवे इत्यादि से शुद्ध एवं परोपकार की भावनाओं के साथ नेक कमाई से तैयार किया जाना चाहिये l अशुद्ध सामग्री और पाप की कमाई से तैयार किया हुआ भोग पुण्य नहीं पाप अर्जित कराता है l यहां यह भी विचारणीय है कि देवी देवता प्रकृति के स्वरुप है और जिस प्रसाद को हम खाते हैं वह हमारी मनोवृत्ति के रूप में परिलक्षित होता है l जिस देवता को प्रसन्न करना है उसी देवता के शास्त्रों में वर्णित खाद्य सामग्री का नैवेद्य तैयार किया जाना चाहिये जैसे गणेशजी के लिये मोदक, हनुमानजी को फल कैला इत्यादि l प्रसाद पाने से मन निर्मल ( मैल रहित) होता है जिसमें ईश्वर का प्रकाश फैलता है और अन्तःकरण में ज्ञान का प्रसार होता है l दुराचारी के घर का अन्न अथवा खाद्य पदार्थ ग्रहण करने से मन में नकारात्मक विचार ही जन्म लेते हैं* l 🙏🌷 *विदुर के घर शांतिदूत श्री कृष्ण की कथा* 🌷🙏 *महाभारत में जब श्री कृष्ण हस्तिनापुर पांडवों की तरफ से शांतिदूत बनकर गए थे , दुशासन का भवन जो राजभवन से भी ज्यादा सुन्दर था धृतराष्ट्र के कहने से श्रीकृष्ण के ठहरने के लिये खाली कर दिया गया था l श्रीकृष्ण ने अधर्मी दुर्योधन के राजसी भोजन और आतिथ्य को ठुकराकर महात्मा विदुर के घर साधारण भोजन (साग) करना पसंद किया* । 🙏🌷 *कारण और प्रसंग* 🌷🙏 🌷*धर्म का साथ* : *दुर्योधन और कौरव अधर्म के मार्ग पर थे, जबकि विदुर जी हस्तिनापुर में एकमात्र नीतिवान और धर्म के पक्ष में खड़े रहने वाले व्यक्ति थे* । 🌷*नियम*: *श्री कृष्ण के अनुसार भोजन या तो मित्र के घर किया जाता है या अपने अतिथि-सत्कार वाले प्रियजन के यहाँ l कौरव न उनके मित्र थे और न ही वे उनका सत्कारधर्म जानते थे* । 🌷*प्रेम की भक्ति* : *विदुर और उनकी पत्नी (विदुरानी) के मन में भगवान के प्रति निष्कपट प्रेम था। कथा में आता है कि भक्ति में विभोर विदुरानी ने प्रेम की अधिकता में केले के गूदे की जगह छिलके ही श्रीकृष्ण को खिला दिए थे और निष्काम दिव्य प्रेम भाव के कारण श्रीकृष्ण ने उसे भी चाव से स्वीकार किया* l 🙏🌷 *भक्तिमती शबरी की मार्मिक कथा* :🌷🙏 🌷 *शबरी और भगवान श्रीराम के मिलन की कथा निश्छल भक्ति का प्रतीक है। वनवास के दौरान श्रीराम अपनी पत्नी सीता की खोज करते हुए मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचे, जहां वृद्ध शबरी वर्षों से उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। शबरी ने प्रेमवश मीठे बेर चुनकर रखे और भगवान को चखकर मीठे बेर ही अर्पित किए, जिन्हें राम ने बड़े प्रेम से खाया* । 🌷 *शबरी को उनके गुरु मतंग ऋषि ने प्राण त्यागने से पहले कहा था कि श्रीराम एक दिन उनके आश्रम आएंगे। शबरी हर रोज जंगल से बेर लाती थीं। बेर खट्टा न हो, इसलिए वह उन्हें चखकर केवल मीठे बेर ही संभालकर रखती थीं। जब श्रीराम वहां पहुंचे, तो शबरी ने अत्यंत भावुक होकर वे बेर उन्हें दिए। लक्ष्मण ने झिझक दिखाई, पर राम ने भक्त के प्रेम को देखते हुए उन बेरों को बड़े चाव से खाया*। *मोक्ष प्राप्ति*: *श्रीराम ने शबरी की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें नवधा भक्ति का उपदेश दिया और परमधाम का मार्ग दिखाया* । *संदेश* *यह कथा सिखाती है कि ईश्वर को उच्च कुल या आडंबर नहीं, भक्त का प्रेम पूर्वक दिया हुआ आहार ही भोग बन जाता है क्योंकि भक्त का सच्चा प्रेम और शुद्ध वस्तु का भोग ही संतुष्टि कर देता है* l 🙏🌷 *आपको सुविचारित करना मेरा पहला ध्येय है, आपमें धार्मिक रुचि उत्पन्न करना मेरा दूसरा ध्येय है, आपको कर्मयोगी बनाना मेरा तीसरा ध्येय है और आपका आत्मोत्थान करना मेरा अंतिम ध्येय है* l 🎄🌷🙏 🌷*आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धक लेख पढ़ने के लिये आध्यात्मिक ज्ञान को फालो करें l चिरंजीवी महर्षि वेदव्यास जी को आध्यात्मिक ज्ञान देने के लिये एवं श्रीगणेशजी को शब्द ज्ञान ( ब्रह्मज्ञान) देने के लिये कोटि कोटि नमन एवं हार्दिक आभार* l 🕉🕉🙏🌷 🌷🙏 🍀 आध्यात्मिक ज्ञान 🍀
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