sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣7️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(चैत्ररथपर्व)
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
द्रुपद के यज्ञ से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी की उत्पत्ति...(दिन 476)
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द्रुपद उवाच
अहो रूपमहो धैर्यमहो वीर्यं च शिक्षितम् ।
चिन्तयामि दिवारात्रमर्जुनं प्रति बान्धवाः ।।
भ्रातृभिः सहितो मात्रा सोऽदह्यत हुताशने । किमाश्चर्यमिदं लोके कालो हि दुरतिक्रमः ।। मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यामि साम्प्रतम् । अन्तर्गतेन दुःखेन दह्यमानो दिवानिशम् । याजोपयाजी सत्कृत्य याचिती ती मयानघी ।। भारद्वाजस्य हन्तारं देवीं चाप्यर्जुनस्य वै । लोकस्तद् वेद यच्चैव तथा याजेन वै श्रुतम् ।। याजेन पुत्रकामीयं हुत्वा चोत्पादितावुभौ ।
धृष्टद्युम्नश्च कृष्णा च मम तुष्टिकरावुभौ ।। किं करिष्यामि ते नष्टाः पाण्डवाः पृथया सह ।
द्रुपद बोले- बन्धुओ! अर्जुन का रूप अद्भुत था। उनका धैर्य आश्चर्यजनक था। उनका पराक्रम और उनकी अस्त्र-शिक्षा भी अलौकिक थी। मैं दिन-रात अर्जुनकी ही चिन्तामें डूबा रहता हूँ। हाय! वे अपने भाइयों और माताके साथ आगमें जल गये। संसारमें इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है? सच है, कालका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है। मेरी तो प्रतिज्ञा झूठी हो गयी। अब मैं लोगोंसे क्या कहूँगा। आन्तरिक दुःखसे दिन-रात दग्ध होता रहता हूँ। मैंने निष्पाप याज और उपयाज का सत्कार करके उनसे दो संतानों की याचना की थी। एक तो ऐसा पुत्र माँगा, जो द्रोणाचार्यका वध कर सके और दूसरी ऐसी कन्याके लिये प्रार्थना की, जो वीर अर्जुनकी पटरानी बन सके। मेरे इस उद्देश्यको सब लोग जानते हैं और महर्षि याजने भी यही घोषित किया था। उन्होंने पुत्रेष्टियज्ञ करके धृष्टद्युम्न और कृष्णा को उत्पन्न किया था। इन दोनों संतानों को पाकर मुझे बड़ा संतोष हुआ। अब क्या करूँ? कुन्ती सहित पाण्डव तो नष्ट हो गये।
ब्राह्मण उवाच
इत्येवमुक्त्वा पाञ्चालः शुशोच परमातुरः ।। दृष्ट्वा शोचन्तमत्यर्थं पाञ्चालगुरुरब्रवीत् ।
पुरोधाः सत्त्वसम्पन्नः सम्यग्विद्याशेषवान् ।।
आगन्तुक ब्राह्मण कहता है-ऐसा कहकर पांचालराज द्रुपद अत्यन्त दुःखी एवं शोकातुर हो गये। पांचालराज के गुरु बड़े सात्त्विक और विशिष्ट विद्वान् थे। उन्होंने राजा को भारी शोक में डूबा देखकर कहा।
गुरुरुवाच
वृद्धानुशासने सक्ताः पाण्डवा धर्मचारिणः । तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ।।
मया दृष्टमिदं सत्यं शृणुष्व मनुजाधिप ।
ब्राह्मणैः कथितं सत्यं वेदेषु च मया श्रुतम् ।।
बृहस्पतिमुखेनाथ पौलोम्या च पुरा श्रुतम् ।
नष्ट इन्द्रो बिसग्रन्थ्यामुपश्रुत्या तु दर्शितः ।।
उपश्रुतिर्महाराज पाण्डवार्थे मया श्रुता ।
यत्र वा तत्र जीवन्ति पाण्डवास्ते न संशयः ।।
गुरु बोले- महाराज! पाण्डवलोग बड़े-बूढ़ोंके आज्ञापालनमें तत्पर रहनेवाले तथा धर्मात्मा हैं। ऐसे लोग न तो नष्ट होते हैं और न पराजित ही होते हैं। नरेश्वर! मैंने जिस सत्यका साक्षात्कार किया है, वह सुनिये। ब्राह्मणोंने तो इस सत्यका प्रतिपादन किया ही है, वेदके मन्त्रोंमें भी मैंने इसका श्रवण किया है। पूर्वकालमें इन्द्राणीने बृहस्पतिजीके मुखसे उपश्रुतिकी महिमा सुनी थी। उत्तरायणकी अधिष्ठात्री देवी उपश्रुतिने ही अदृष्ट हुए इन्द्रका कमलनालकी ग्रन्थिमें दर्शन कराया था। महाराज! इसी प्रकार मैंने भी पाण्डवोंके विषयमें उपश्रुति सुन रखी है। वे पाण्डव कहीं-न-कहीं अवश्य जीवित हैं, इसमें संशय नहीं है।
मया दृष्टानि लिङ्गानि ध्रुवमेष्यन्ति पाण्डवाः । यन्निमित्तमिहायान्ति तच्छृणुष्व नराधिप ।। स्वयंवरः क्षत्रियाणां कन्यादाने प्रदर्शितः । स्वयंवरस्तु नगरे घुष्यतां राजसत्तम ।। यत्र वा निवसन्तस्ते पाण्डवाः पृथया सह । दूरस्था वा समीपस्थाः स्वर्गस्था वापि पाण्डवाः ।। श्रुत्वा स्वयंवरं राजन् समेष्यन्ति न संशयः । तस्मात् स्वयंवरो राजन् घुष्यतां मा चिरं कृथाः ।।
मैंने ऐसे (शुभ) चिह्न देखे हैं, जिनसे सूचित होता है कि पाण्डव यहाँ अवश्य पधारेंगे। नरेश्वर! वे जिस निमित्तसे यहाँ आ सकते हैं, वह सुनिये - क्षत्रियोंके लिये कन्यादानका श्रेष्ठ मार्ग स्वयंवर बताया गया है। नृपश्रेष्ठ ! आप सम्पूर्ण नगरमें स्वयंवरकी घोषणा करा दें। फिर पाण्डव अपनी माता कुन्तीके साथ दूर हों, निकट हों अथवा स्वर्गमें ही क्यों न हों-जहाँ कहीं भी होंगे, स्वयंवरका समाचार सुनकर यहाँ अवश्य आयेंगे, इसमें संशय नहीं है। अतः राजन् ! आप (सर्वत्र) स्वयंवरकी सूवना करा दें, इसमें विलम्ब न करें।
ब्राह्मण उवाच
श्रुत्वा पुरोहितेनोक्तं पाञ्चालः प्रीतिमांस्तदा ।
घोषयामास नगरे द्रौपद्यास्तु स्वयंवरम् ।। पुष्यमासे तु रोहिण्यां शुक्लपक्षे शुभे तिथौ । दिवसैः पञ्चसप्तत्या भविष्यति स्वयंवरः ।। देवगन्धर्वयक्षाश्च ऋषयश्च तपोधनाः । स्वयंवरं द्रष्टुकामा गच्छन्त्येव न संशयः ।। तव पुत्रा महात्मानो दर्शनीया विशेषतः । अहं च तत्र गच्छामि ममैभिः सह शिष्यकैः ।
यदृच्छया तु पाञ्चाली गच्छेद् वा मध्यमं पतिम् ।।
को हि जानाति लोकेषु प्रजापतिविधिं परम् ।
तस्मात् सपुत्रा गच्छेथा ब्राह्मण्यै यदि रोचते ।।
नित्यकालं सुभिक्षास्ते पञ्चालास्तु तपोधने ।।
यज्ञसेनस्तु राजासौ ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः ।
ब्रह्मण्या नागराश्चाथ ब्राह्मणाश्चातिथिप्रियाः ।।
नित्यकालं प्रदास्यन्ति आमन्त्रणमयाचितम् ।।
एकसार्थाः प्रयाताः स्मो ब्राह्मण्यै यदि रोचते ।।
आगन्तुक ब्राह्मण कहता है- पुरोहितकी बात सुनकर पंचालराजको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने नगरमें द्रौपदीका स्वयंवर घोषित करा दिया। पौषमासके शुक्लपक्षमें शुभ तिथि (एकादशी) को रोहिणी नक्षत्रमें वह स्वयंवर होगा, जिसके लिये आजसे पचहत्तर दिन शेष हैं। ब्राह्मणी (कुन्ती)! देवता, गन्धर्व, यक्ष और तपस्वी ऋषि भी स्वयंवर देखनेके लिये अवश्य जाते हैं। तुम्हारे सभी महात्मा पुत्र देखनेमें परम सुन्दर हैं। पंचालराजपुत्री कृष्णा इनमेंसे किसीको अपनी इच्छासे पति चुन सकती है अथवा तुम्हारे मँझले पुत्रको अपना पति बना सकती है। संसारमें विधाताके उत्तम विधानको कौन जान सकता है? अतः यदि मेरी बात तुम्हें अच्छी लगे, तो तुम अपने पुत्रोंके साथ पंचालदेशमें अवश्य जाओ। तपोधने ! पंचालदेशमें सदा सुभिक्ष रहता है। राजा यज्ञसेन सत्यप्रतिज्ञ होनेके साथ ही ब्राह्मणोंके भक्त हैं। वहाँके नागरिक भी ब्राह्मणोंके प्रति श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले हैं। उस नगरके ब्राह्मण भी अतिथियोंके बड़े प्रेमी हैं। वे प्रतिदिन बिना माँगे ही न्यौता देंगे। मैं भी अपने इन शिष्योंके साथ वहीं जाता हूँ। ब्राह्मणी! यदि ठीक जान पड़े तो चलो। हम सब लोग एक साथ ही वहाँ चले चलेंगे।
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा वचनं ब्राह्मणो विरराम ह ।)
वैशम्पायनजी कहते हैं- इतना कहकर वे ब्राह्मण चुप हो गये।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसम्भवे षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें द्रौपदीप्रादुर्भावविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६६ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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