sn vyas
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#महाभारत #महाभारत की कथा 😱 जब कुंती के महल में हुई स्वर्ग के ऐरावत हाथी की पूजा! 🙏🐘 महाभारतकाल से जुड़ी एक रोचक धार्मिक कथा के अनुसार, एक समय महर्षि वेदव्यास जी हस्तिनापुर पधारे। उनके आगमन का समाचार सुनकर महाराज धृतराष्ट्र उन्हें आदरपूर्वक राजमहल में ले गए और स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान कर विधिपूर्वक उनका पूजन किया। उस समय माता कुंती और गांधारी ने हाथ जोड़कर महर्षि वेदव्यास से कहा— “हे महामुने! आप त्रिकालदर्शी हैं। कृपया हमें ऐसा सरल व्रत और पूजन बताइए, जिससे हमारे राज्य में लक्ष्मी का वास रहे, सुख-समृद्धि बढ़े तथा पुत्र-पौत्र और पूरा परिवार सुखी रहे।” महर्षि वेदव्यास जी बोले— “ऐसा एक व्रत है, जिसके विधिपूर्वक पालन से महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसे गजलक्ष्मी व्रत कहा जाता है।” उन्होंने बताया कि यह व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ किया जाता है और आश्विन कृष्ण अष्टमी को इसका विशेष पूजन किया जाता है। व्रत की विधि बताते हुए वे बोले— “स्नान करके सोलह सूत के धागे का डोरा बनाना चाहिए और उसमें सोलह गांठ लगानी चाहिए। उसे हल्दी से पीला करके प्रतिदिन सोलह दूब और सोलह गेहूँ अर्पित करें। आश्विन कृष्ण अष्टमी को उपवास रखकर मिट्टी के हाथी पर श्री महालक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करके विधिपूर्वक पूजन करें।” यह व्रत बताकर महर्षि वेदव्यास अपने आश्रम लौट गए। 🌺 कुंती और गांधारी ने शुरू किया व्रत समय आने पर भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से माता कुंती और गांधारी ने अपने-अपने महलों में नगर की महिलाओं के साथ व्रत प्रारंभ किया। देखते ही देखते पंद्रह दिन बीत गए। सोलहवें दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी को गांधारी ने नगर की सभी प्रतिष्ठित महिलाओं को अपने महल में पूजन के लिए बुला लिया। माता कुंती को न तो बुलाया गया और न ही उनके महल में कोई महिला पूजन के लिए आई। कुंती को यह बात बहुत दुखद लगी। उन्हें लगा कि उनका जानबूझकर अपमान किया गया है। उन्होंने पूजन की कोई विशेष तैयारी नहीं की और उदास होकर बैठ गईं। 🌿 पांडवों ने माता को उदास देखा कुछ समय बाद पाँचों पांडव—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव—महल में आए। उन्होंने अपनी माता को उदास देखा तो पूछा— “माता! आप इतनी चिंतित क्यों हैं? आपने आज पूजन की तैयारी भी नहीं की?” कुंती ने सारी बात अपने पुत्रों को बता दी। उन्होंने कहा— “आज गांधारी के महल में महालक्ष्मी व्रत का उत्सव हो रहा है। नगर की सभी महिलाओं को वहाँ बुलाया गया है। गांधारी के सौ पुत्रों ने मिट्टी का एक विशाल हाथी बनाया है, इसलिए सभी महिलाएँ उसी हाथी का पूजन करने वहाँ चली गई हैं। मेरे यहाँ कोई नहीं आया।” यह सुनकर अर्जुन ने अपनी माता से कहा— “माता! आप भी पूजन की तैयारी कीजिए और नगर में घोषणा करवा दीजिए कि हमारे महल में मिट्टी का हाथी नहीं, बल्कि स्वर्ग के राजा इन्द्र का ऐरावत हाथी आएगा और उसी पर महालक्ष्मी जी का पूजन होगा।” कुंती ने अर्जुन की बात मान ली। 🐘 स्वर्ग से पृथ्वी पर आया ऐरावत माता कुंती ने नगर में घोषणा करवा दी। पूरे हस्तिनापुर में यह समाचार फैल गया— “कुंती के महल में स्वर्ग से इन्द्र का ऐरावत हाथी आने वाला है!” समाचार सुनते ही नगर के नर-नारी, बालक और वृद्ध सभी कुंती के महल की ओर उमड़ पड़े। उधर अर्जुन ने अपने दिव्य सामर्थ्य से स्वर्ग से ऐरावत को पृथ्वी पर बुला लिया। देखते ही देखते कुंती का महल लोगों से भर गया। 🌸 ऐरावत का भव्य स्वागत माता कुंती ने ऐरावत के स्वागत के लिए महल के चौक में अनेक रंगों की सुंदर रंगोलियाँ बनवाईं और रेशमी वस्त्र बिछवाए। नगरवासी फूल-मालाएँ, अबीर, गुलाल और केसर लेकर स्वागत के लिए खड़े हो गए। संध्या के समय स्वर्ग से ऐरावत पृथ्वी पर उतरने लगा। उसके शरीर पर सजे दिव्य आभूषणों की मधुर ध्वनि चारों ओर गूंजने लगी। ऐरावत के दर्शन होते ही पूरा नगर जय-जयकार से गूंज उठा— “जय महालक्ष्मी माता!” “जय कुंती माता!” 🙏 ऐरावत पर हुआ महालक्ष्मी पूजन जब ऐरावत कुंती के महल के चौक में उतर आया, तब नगरवासियों ने फूल-मालाओं, अबीर, गुलाल और केसर से उसका स्वागत किया। राजपुरोहित ने विधिपूर्वक ऐरावत पर श्री महालक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित की। वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ महालक्ष्मी जी का पूजन आरंभ हुआ। नगर की महिलाओं ने भी श्रद्धा और भक्ति से माता लक्ष्मी की पूजा की। पूजन के बाद ऐरावत को अनेक प्रकार के पकवान अर्पित किए गए और यमुना का पवित्र जल पिलाया गया। राजपुरोहित ने स्वस्तिवाचन किया और महिलाओं ने विधिपूर्वक महालक्ष्मी व्रत का पूजन किया। सोलह गांठों वाला पवित्र डोरा माता लक्ष्मी को अर्पित करके महिलाओं ने उसे अपने-अपने हाथों में बाँध लिया। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया गया तथा उन्हें वस्त्र, स्वर्ण आभूषण और दक्षिणा प्रदान की गई। 🌙 पूरी रात हुआ जागरण रात्रि में महिलाओं ने मिलकर मधुर भजन-कीर्तन किया। महालक्ष्मी माता की महिमा का गुणगान करते हुए पूरी रात श्रद्धापूर्वक जागरण किया गया। पूरा महल भक्ति और उत्सव के वातावरण से भर गया। अगले दिन प्रातः राजपुरोहित ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ महालक्ष्मी जी की प्रतिमा का विधिपूर्वक जलाशय में विसर्जन कराया। इसके बाद ऐरावत को सम्मानपूर्वक विदा किया गया और वह वापस इन्द्रलोक चला गया। ✨ कथा की सीख यह कथा हमें बताती है कि भक्ति में दिखावा नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास का महत्व है। माता कुंती का अपमान भले ही हुआ, लेकिन उन्होंने निराश होने के बजाय अपने विश्वास को बनाए रखा। अर्जुन ने भी अपनी माता का सम्मान बनाए रखने के लिए अपनी सामर्थ्य का उपयोग किया। जहाँ सच्ची श्रद्धा, विश्वास और भक्ति होती है, वहाँ ईश्वर की कृपा किसी न किसी रूप में अवश्य प्रकट होती है। 🙏 जय श्री महालक्ष्मी माता। 🌺 जय माता कुंती। 🐘 जय श्री ऐरावत महाराज। 🙏
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