sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣4️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(हिडिम्बवधपर्व)
त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 454)
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घटो हास्योत्कच इति माता तं प्रत्यभाषत । अब्रवीत् तेन नामास्य घटोत्कच इति स्म ह ।। ३८ ।।
बालककी माताने भीमसेनसे कहा- 'इसका घट (सिर) उत्कच अर्थात् केशरहित है।' उसके इस कथन से ही उसका नाम घटोत्कच हो गया ।। ३८ ।।
अनुरक्तश्च तानासीत् पाण्डवान् स घटोत्कचः । तेषां च दयितो नित्यमात्मनित्यो बभूव ह ।। ३९ ।।
घटोत्कचका पाण्डवोंके प्रति बड़ा अनुराग था और पाण्डवोंको भी वह बहुत प्रिय था। वह सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहता था ।। ३९ ।।
संवाससमयो जीर्ण इत्याभाष्य ततस्तु तान् । हिडिम्बा समयं कृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत ।। ४० ।।
तदनन्तर हिडिम्बा पाण्डवोंसे यह कहकर कि भीमसेनके साथ रहनेका मेरा समय समाप्त हो गया, आवश्यकताके समय पुनः मिलनेकी प्रतिज्ञा करके अपने अभीष्ट स्थानको चली गयी ।। ४० ।।
घटोत्कचो महाकायः पाण्डवान् पृथया सह । अभिवाद्य यथान्यायमब्रवीच्च प्रभाष्य तान् ।। ४१ ।।
किं करोम्यहमार्याणां निःशङ्क वदतानघाः ।
तं ब्रुवन्तं भैमसेनिं कुन्ती वचनमब्रवीत् ।। ४२ ।।
तत्पश्चात् विशालकाय घटोत्कच ने कुन्तीसहित पाण्डवोंको यथायोग्य प्रणाम करके उन्हें सम्बोधित करके कहा- 'निष्पाप गुरुजन ! आप निःशंक होकर बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?' इस प्रकार पूछने वाले भीमसेन कुमार से कुन्ती ने कहा- ।। ४१-४२ ।।
त्वं कुरूणां कुले जातः साक्षाद् भीमसमो ह्यसि । ज्येष्ठः पुत्रोऽसि पञ्चानां साहाय्यं कुरु पुत्रक ।। ४३ ।।
'बेटा! तुम्हारा जन्म कुरुकुलमें हुआ है। तुम मेरे लिये साक्षात् भीमसेनके समान हो। पाँचों पाण्डवोंके ज्येष्ठ पुत्र हो, अतः हमारी सहायता करो' ।। ४३ ।।
वैशम्पायन उवाच
पृथयाप्येवमुक्तस्तु प्रणम्यैव वचोऽब्रवीत् । यथा हि रावणो लोके इन्द्रजिच्च महाबलः । वर्मवीर्यसमो लोके विशिष्टश्चाभवं नृषु ।। ४४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कुन्तीके यों कहनेपर घटोत्कचने प्रणाम करके ही उनसे कहा- 'दादीजी ! लोकमें जैसे रावण और मेघनाद बहुत बड़े बलवान् थे, उसी प्रकार इस मानव-जगत् में मैं भी उन्हीं के समान विशालकाय और महापराक्रमी हूँ; बल्कि उनसे भी बढ़कर हूँ ।। ४४ ।।
कृत्यकाल उपस्थास्ये पितृनिति घटोत्कचः ।
आमन्त्र्य रक्षसां श्रेष्ठः प्रतस्थे चोत्तरां दिशम् ।। ४५ ।।
'जब मेरी आवश्यकता होगी, उस समय मैं स्वयं अपने पितृवर्गकी सेवामें उपस्थित हो जाऊँगा।' यों कहकर राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच पाण्डवोंसे आज्ञा लेकर उत्तर दिशाकी ओर चला गया ।। ४५ ।।
स हि सृष्टो मघवता शक्तिहेतोर्महात्मना । कर्णस्याप्रतिवीर्यस्य प्रतियोद्धा महारथः ।। ४६ ।।
महामना इन्द्रने अनुपम पराक्रमी कर्णकी शक्तिका आघात सहन करनेके लिये घटोत्कचकी सृष्टि की थी। वह कर्णके सम्मुख युद्ध करनेमें समर्थ महारथी वीर था ।। ४६ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि घटोत्कचोत्पत्तौ चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें घटोत्कचकी उत्पत्तिविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५४ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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