sn vyas
8 hours ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣7️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवों की पंचाल यात्रा और अर्जुन के द्वारा चित्ररथ गन्धर्व की पराजय एवं उन दोनों की मित्रता...(दिन 479) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच गते भगवति व्यासे पाण्डवा हृष्टमानसाः । ते प्रतस्थुः पुरस्कृत्य मातरं पुरुषर्षभाः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! भगवान् व्यासके चले जानेपर पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव प्रसन्नचित्त हो अपनी माताको आगे करके वहाँसे पंचालदेशकी ओर चल दिये ।। १ ।। आमन्त्र्य ब्राह्मणं पूर्वमभिवाद्यानुमान्य च । समैरुदङ्‌मुखैर्मार्गेर्यथोद्दिष्टं परंतपाः ।। २ ।। परंतप ! कुन्तीकुमारोंने पहले ही अपने आश्रयदाता ब्राह्मणसे पूछकर जानेकी आज्ञा ले ली थी और चलते समय बड़े आदरके साथ उन्हें प्रणाम किया। वे सब लोग उत्तर दिशाकी ओर जानेवाले सीधे मार्गोंद्वारा उत्तराभिमुख हो अपने अभीष्ट स्थान पंचालदेशकी ओर बढ़ने लगे ।। २ ।। ते त्वगच्छन्नहोरात्रात् तीर्थं सोमाश्रयायणम् । आसेदुः पुरुषव्याघ्रा गङ्गायां पाण्डुनन्दनाः ।। ३ ।। एक दिन और एक रात चलकर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव गंगाजीके तटपर सोमाश्रयायण नामक तीर्थमें जा पहुँचे ।। ३ ।। उल्मुकं तु समुद्यम्य तेषामग्रे धनंजयः । प्रकाशार्थं ययौ तत्र रक्षार्थं च महारथः ।। ४ ।। उस समय उनके आगे-आगे महारथी अर्जुन उजाला तथा रक्षा करनेके लिये जलती हुई मशाल उठाये चल रहे थे ।। ४ ।। तत्र गङ्गाजले रम्ये विविक्ते क्रीडयन् स्त्रियः । ईष्र्युर्गन्धर्वराजो वै जलक्रीडामुपागतः ।। ५ ।। उस तीर्थकी गंगाके रमणीय तथा एकान्त जलमें गन्धर्वराज अंगारपर्ण (चित्ररथ) अपनी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा कर रहा था। वह बड़ा ही ईर्ष्यालु था और जलक्रीड़ा करनेके लिये ही वहाँ आया था ।। ५ ।। शब्दं तेषां स शुश्राव नदीं समुपसर्पताम् । तेन शब्देन चाविष्टश्चक्रोध बलवद् बली ।। ६ ।। उसने गंगाजीकी ओर बढ़ते हुए पाण्डवोंके पैरोंकी धमक सुनी। उस शब्दको सुनते ही वह बलवान् गन्धर्व क्रोधके आवेशमें आकर बड़े जोरसे कुपित हो उठा ।। ६ ।। स दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सह मात्रा परंतपान् । विस्फारयन् धनुर्घोरमिदं वचनमब्रवीत् ।। ७ ।। परंतप पाण्डवोंको अपनी माताके साथ वहाँ देख वह अपने भयानक धनुषको टंकारता हुआ इस प्रकार बोला- ।। ७ ।। संध्या संरज्यते घोरा पूर्वरात्रागमेषु या । अशीतिभिर्लवैर्तीनं तन्मुहुर्त प्रचक्षते ।। ८ ।। विहितं कामचाराणां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । शेषमन्यन्मनुष्याणां कर्मचारेषु वै स्मृतम् ।। ९ ।। 'रात्रि प्रारम्भ होनेके पहले जो पश्चिम दिशामें भयंकर संध्याकी लाली छा जाती है, उस समय अस्सी लवको छोड़कर सारा मुहूर्त इच्छानुसार विचरनेवाले यक्षों, गन्धों तथा राक्षसोंके लिये निश्चित बताया जाता है। शेष दिनका सब समय मनुष्योंके कार्यवश विचरनेके लिये माना गया है ।। ८-९ ।। लोभात् प्रचारं चरतस्तासु वेलासु वै नरान् । उपक्रान्तानि गृह्णीमो राक्षसैः सह बालिशान् ।। १० ।। 'जो मनुष्य लोभवश हमलोगोंकी वेलामें इधर घूमते हुए आ जाते हैं, उन मूखौँको हम गन्धर्व और राक्षस कैद कर लेते हैं ।। १० ।। अतो रात्रौ प्राप्नुवन्तो जलं ब्रह्मविदो जनाः । गर्हयन्ति नरान् सर्वान् बलस्थान् नृपतीनपि ।। ११ ।। 'इसीलिये वेदवेत्ता पुरुष रातके समय जलमें प्रवेश करनेवाले सम्पूर्ण मनुष्यों और बलवान् राजाओंकी भी निन्दा करते हैं ।। ११ ।। आरात् तिष्ठत मा मह्यं समीपमुपसर्पत । कस्मान्मां नाभिजानीत प्राप्तं भागीरथीजलम् ।। १२ ।। अङ्गारपर्ण गन्धर्वं वित्त मां स्वबलाश्रयम् । अहं हि मानी चेर्युश्च कुबेरस्य प्रियः सखा ।। १३ ।। 'अरे, ओ मनुष्यो ! दूर ही खड़े रहो। मेरे समीप न आना। तुम्हें ज्ञात कैसे नहीं हुआ कि मैं गन्धर्वराज अंगारपर्ण गंगाजीके जलमें उतरा हुआ हूँ। तुमलोग मुझे (अच्छी तरह) जान लो, मैं अपने ही बलका भरोसा करनेवाला स्वाभिमानी, ईर्ष्यालु तथा कुबेरका प्रिय मित्र हूँ ।। १२-१३ ।। अङ्गारपर्णमित्येवं ख्यातं चेदं वनं मम । अनुगङ्गं चरन् कामांश्चित्रं यत्र रमाम्यहम् ।। १४ ।। मेरा यह वन भी अंगारपर्ण नामसे विख्यात है। मैं गंगाजीके तटपर विचरता हुआ इस वनमें इच्छानुसार विचित्र क्रीड़ाएँ करता रहता हूँ ।। १४ ।। न कौणपाः शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषाः । इदं समुपसर्पन्ति तत् किं समनुसर्पथ ।। १५ ।। 'मेरी उपस्थितिमें यहाँ राक्षस, यक्ष, देवता अथवा मनुष्य- कोई भी नहीं आने पाते; फिर तुमलोग कैसे आ रहे हो?' ।। १५ ।। अर्जुन उवाच समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां च दुर्मते । रात्रावहनि संध्यायां कस्य गुप्तः परिग्रहः ।। १६ ।। अर्जुन बोले- दुर्मते ! समुद्र, हिमालयकी तराई और गंगानदीके तटपर रात, दिन अथवा संध्याके समय किसका अधिकार सुरक्षित है? ।। १६ ।। भुक्तो वाप्यथवाभुक्तो रात्रावहनि खेचर । न कालनियमो ह्यस्ति गङ्गां प्राप्य सरिद्वराम् ।। १७ ।। आकाशचारी गन्धर्व! सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजीके तटपर आनेके लिये यह नियम नहीं है कि यहाँ कोई खाकर आये या बिना खाये, रातमें आये या दिनमें। इसी प्रकार काल आदिका भी कोई नियम नहीं है ।। १७ ।। वयं च शक्तिसम्पन्ना अकाले त्वामधृष्णुम । अशक्ता हि रणे क्रूर युष्मानर्चन्ति मानवाः ।। १८ ।। अरे, ओ क्रूर ! हमलोग तो शक्तिसम्पन्न हैं। असमयमें भी आकर तुम्हें कुचल सकते हैं। जो युद्ध करनेमें असमर्थ हैं, वे दुर्बल मनुष्य ही तुमलोगोंकी पूजा करते हैं ।। १८ ।। पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद् विनिस्सृता । गङ्गा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा समपद्यत ।। १९ ।। गङ्गां च यमुनां चैव प्लक्षजातां सरस्वतीम् । रथस्थां सरयूं चैव गोमतीं गण्डकीं तथा ।। २० ।। अपर्युषितपापास्ते नदीः सप्त पिबन्ति ये । इयं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः ।। २१ ।। देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम् । तथा पितृन् वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः । गङ्गा भवति वै प्राप्य कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।। २२ ।। प्राचीन कालमें हिमालयके स्वर्णशिखरसे निकली हुई गंगा सात धाराओंमें विभक्त हो समुद्रमें जाकर मिल गयी हैं। जो पुरुष गंगा, यमुना, प्लक्षकी जड़से प्रकट हुई सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी- इन सात नदियोंका जल पीते हैं, उनके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। ये गंगा बड़ी पवित्र नदी हैं। एकमात्र आकाश ही इनका तट है। गन्धर्व! ये आकाशमार्गसे विचरती हुई गंगा देवलोकमें अलकनन्दा नाम धारण करती हैं। ये ही वैतरणी होकर पितृलोकमें बहती हैं। वहाँ पापियोंके लिये इनके पार जाना अत्यन्त कठिन होता है। इस लोकमें आकर इनका नाम गंगा होता है। यह श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीका कथन है ।। १९-२२ ।। असम्बाधा देवनदी स्वर्गसम्पादनी शुभा । कथमिच्छसि तां रोद्धं नैष धर्मः सनातनः ।। २३ ।। ये कल्याणमयी देवनदी सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंसे रहित एवं स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाली हैं। तुम उन्हीं गंगाजीपर किसलिये रोक लगाना चाहते हो? यह सनातन धर्म नहीं है ।। २३ ।। अनिवार्यमसम्बाधं तव वाचा कथं वयम् । न स्पृशेम यथाकामं पुण्यं भागीरथीजलम् ।। २४ ।। जिसे कोई रोक नहीं सकता, जहाँ पहुँचनेमें कोई बाधा नहीं है, भागीरथीके उस पावन जलका तुम्हारे कहनेसे हम अपने इच्छानुसार स्पर्श क्यों न करें? ।। २४ ।। वैशम्पायन उवाच अङ्गारपर्णस्तच्छ्रुत्वा क्रुद्ध आनम्य कार्मुकम् । मुमोच बाणान् निशितानहीनाशीविषानिव ।। २५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! अर्जुनकी वह बात सुनकर अंगारपर्ण क्रोधित हो गया और धनुष नवाकर विषैले साँपोंकी भाँति तीखे बाण छोड़ने लगा ।। २५ ।। उल्मुकं भ्रामयंस्तूर्णं पाण्डवश्चर्म चोत्तरम् । व्यपोहत शरांस्तस्य सर्वानेव धनंजयः ।। २६ ।। यह देख पाण्डुनन्दन धनंजयने तुरंत ही मशाल घुमाकर और उत्तम ढालसे रोककर उसके सभी बाण व्यर्थ कर दिये ।। २६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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