sn vyas
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भगवान श्री गणेश द्वारा महाभारत का लेखन और 'एकदंत' स्वरूप का #महाभारत #महाभारत की कथा प्रसंग महाभारत के आदि पर्व के अनुसार, जब महर्षि वेदव्यास ने संपूर्ण ज्ञान, धर्म, नीति और इतिहास से युक्त महाकाव्य 'महाभारत' की मानसिक रचना पूर्ण कर ली, तब उन्हें इस वृहद ग्रंथ को लिपिबद्ध (लिखने) के लिए एक अत्यंत तीव्र बुद्धि और निरंतर लिखने वाले लेखक की आवश्यकता हुई। ब्रह्मा जी का परामर्श: महर्षि वेदव्यास के निवेदन पर ब्रह्मा जी ने उन्हें बुद्धि और विद्या के अधिपति भगवान श्री गणेश से प्रार्थना करने को कहा। गणेश जी की कठिन शर्त: जब व्यास जी ने गणेश जी से लेखक बनने का अनुरोध किया, तो गणेश जी ने एक शर्त रखी: "मेरी लेखनी एक क्षण के लिए भी रुकनी नहीं चाहिए। यदि आप बोलते समय तनिक भी रुके, तो मैं लिखना छोड़ दूंगा।" महर्षि वेदव्यास की चतुर युक्ति: व्यास जी ने शर्त स्वीकार की, परंतु साथ में अपनी एक शर्त जोड़ी: "हे गणाध्यक्ष! मैं जो भी श्लोक बोलूंगा, उसे आप पूरी तरह समझे बिना लिपिबद्ध नहीं करेंगे।" गूढ़ कूट श्लोकों की रचना: जब भी महर्षि व्यास को विश्राम की आवश्यकता होती, वे अत्यंत कठिन और दार्शनिक 'कूट श्लोक' बोलते। उन श्लोकों के गूढ़ अर्थ पर विचार करने में गणेश जी को कुछ क्षण का समय लगता था, और उसी अंतराल में व्यास जी अपने अगले श्लोकों की रचना कर लेते थे। 'एकदंत' स्वरूप और अटूट संकल्प लेखन के दौरान एक समय गणेश जी की लेखनी (कलम) अचानक टूट गई। अपनी शर्त टूटने न पाए और महाकाव्य का लेखन निर्बाध रूप से चलता रहे, इसलिए गणेश जी ने बिना एक क्षण गंवाए अपने दाएँ दाँत को स्वयं तोड़ लिया और उसकी नोंक से स्याही में डुबोकर लिखना जारी रखा। अपने इसी महान त्याग, बुद्धि और समर्पण के कारण भगवान श्री गणेश संसार में 'एकदंत' के नाम से विख्यात हुए।
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