sn vyas
606 views 14 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣6️⃣7️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (बकवधपर्व) द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन का भोजन-सामग्री लेकर बकासुर के पास जाना और स्वयं भोजन करना तथा युद्ध करके उसे मार गिराना...(दिन 467) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ तथापि परिभूयैनं प्रेक्षमाणो वृकोदरः । राक्षसं भुङ्क्त एवान्नं पाण्डवः परवीरहा ।। १३ ।। अमर्षेण तु सम्पूर्णः कुन्तीपुत्रं वृकोदरम् । जघान पृष्ठे पाणिभ्यामुभाभ्यां पृष्ठतः स्थितः ।। १४ ।। तो भी शत्रुवीरों का संहार करने वाले पाण्डुनन्दन भीमसेन उस राक्षस की ओर देखते हुए उसका तिरस्कार करके उस अन्न को खाते ही रहे। तब उसने अत्यन्त अमर्षमें भरकर कुन्तीनन्दन भीमसेनके पीछे खड़े हो अपने दोनों हाथोंसे उनकी पीठपर प्रहार किया ।। १३-१४ ।। तथा बलवता भीमः पाणिभ्यां भृशमाहतः । नैवावलोकयामास राक्षसं भुङ्क्त एव सः ।। १५ ।। इस प्रकार बलवान् राक्षस के दोनों हाथों से भयानक चोट खाकर भी भीमसेन ने उसकी ओर देखा तक नहीं, वे भोजन करने में ही संलग्न रहे ।। १५ ।। ततः स भूयः संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षसः । ताडयिष्यंस्तदा भीमं पुनरभ्यद्रवद् बली ।। १६ ।। तब उस बलवान् राक्षसने पुनः अत्यन्त कुपित हो एक वृक्ष उखाड़कर भीमसेनको मारनेके लिये फिर उनपर धावा किया ।। १६ ।। ततो भीमः शनैर्भुक्त्वा तदन्नं पुरुषर्षभः । वार्युपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थौ युधि महाबलः ।। १७ ।। तदनन्तर नरश्रेष्ठ महाबली भीमसेनने धीरे-धीरे वह सब अन्न खाकर, आचमन करके मुँह-हाथ धो लिये, फिर वे अत्यन्त प्रसन्न हो युद्धके लिये डट गये ।। १७ ।। क्षिप्तं क्रुद्धेन तं वृक्षं प्रतिजग्राह वीर्यवान् । सव्येन पाणिना भीमः प्रहसन्निव भारत ।। १८ ।। जनमेजय ! कुपित राक्षस के द्वारा चलाये हुए उस वृक्ष को पराक्रमी भीमसेन ने बायें हाथ से हँसते हुए-से पकड़ लिया ।। १८ ।। ततः स पुनरुद्यम्य वृक्षान् बहुविधान् बली । प्राहिणोद् भीमसेनाय तस्मै भीमश्च पाण्डवः ।। १९ ।। तब उस बलवान् निशाचरने पुनः बहुत-से वृक्षोंको उखाड़ा और भीमसेनपर चला दिया। पाण्डुनन्दन भीमने भी उसपर अनेक वृक्षोंद्वारा प्रहार किया ।। १९ ।। तद् वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् । घोररूपं महाराज नरराक्षसराजयोः ।। २० ।। महाराज ! नरराज तथा राक्षसराज का वह भयंकर वृक्षयुद्ध उस वनके समस्त वृक्षोंके विनाशका कारण बन गया ।। २० ।। नाम विश्राव्य तु बकः समभिद्रुत्य पाण्डवम्। भुजाभ्यां परिजग्राह भीमसेनं महाबलम् ।। २१ ।। तदनन्तर बकासुर ने अपना नाम सुनाकर महाबली पाण्डुनन्दन भीमसेन की ओर दौड़कर दोनों बाँहों से उन्हें पकड़ लिया ।। २१ ।। भीमसेनोऽपि तद् रक्षः परिरभ्य महाभुजः । विस्फुरन्तं महाबाहुं विचकर्ष बलाद् बली ।। २२ ।। महाबाहु बलवान् भीमसेन ने भी उस विशाल भुजाओं वाले राक्षस को दोनों भुजाओं से कसकर छाती से लगा लिया और बलपूर्वक उसे इधर-उधर खींचने लगे। उस समय बकासुर उनके बाहुपाश से छूटने के लिये छटपटा रहा था ।। २२ ।। स कृष्यमाणो भीमेन कर्षमाणश्च पाण्डवम् । समयुज्यत तीव्रेण क्लमेन पुरुषादकः ।। २३ ।। भीमसेन उस राक्षसको खींचते थे तथा राक्षस भीमसेनको खींच रहा था। इस खींचा-खींचीमें वह नरभक्षी राक्षस बहुत थक गया ।। २३ ।। तयोर्वेगेन महता पृथिवी समकम्पत । पादपांश्च महाकायांश्रूर्णयामासतुस्तदा ।। २४ ।। उन दोनोंके महान् वेगसे धरती जोरसे काँपने लगी। उन दोनोंने उस समय बड़े-बड़े वृक्षोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ।। २४ ।। हीयमानं तु तद् रक्षः समीक्ष्य पुरुषादकम् । निष्पिष्य भूमौ जानुभ्यां समाजघ्ने वृकोदरः ।। २५ ।। उस नरभक्षी राक्षसको कमजोर पड़ते देख भीमसेन उसे पृथ्वीपर पटककर रगड़ने और दोनों घुटनोंसे मारने लगे ।। २५ ।। ततोऽस्य जानुना पृष्ठमवपीड्य बलादिव । बाहुना परिजग्राह दक्षिणेन शिरोधराम् ।। २६ ।। सव्येन च कटीदेशे गृह्य वाससि पाण्डवः । तद् रक्षो द्विगुणं चक्रे रुवन्तं भैरवं रवम् ।। २७ ।। तदनन्तर उन्होंने अपने एक घुटनेसे बल-पूर्वक राक्षसकी पीठ दबाकर दाहिने हाथसे उसकी गर्दन पकड़ ली और बायें हाथसे कमरका लँगोट पकड़कर उस राक्षसको दुहरा मोड़ दिया। उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में चीत्कार कर रहा था ।। २६-२७ ।। ततोऽस्य रुधिरं वक्त्रात् प्रादुरासीद् विशाम्पते । भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षसः ।। २८ ।। राजन् ! भीमसेनके द्वारा उस घोर राक्षसकी जब कमर तोड़ी जा रही थी, उस समय उसके मुखसे (बहुत-सा) खून गिरा ।। २८ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकभीमसेनयुद्धे द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें बकासुर और भीमसेनका युद्धविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
14 shares

More like this