sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣6️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(बकवधपर्व)
त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
बकासुर के वध से राक्षसों का भयभीत होकर पलायन और नगर निवासियों की प्रसन्नता...(दिन 468)
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वैशम्पायन उवाच
ततः स भग्नपाश्र्श्वङ्गो नदित्वा भैरवं रवम् । शैलराजप्रतीकाशो गतासुरभवद् बकः ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! पसलीकी हड्डियोंके टूट जानेपर पर्वतके समान विशालकाय बकासुर भयंकर चीत्कार करके प्राणरहित हो गया ।। १ ।।
तेन शब्देन वित्रस्तो जनस्तस्याथ रक्षसः । निष्पपात गृहाद् राजन् सहैव परिचारिभिः ।। २ ।।
तान् भीतान् विगतज्ञानान् भीमः प्रहरतां वरः । सान्त्वयामास बलवान् समये च न्यवेशयत् ।। ३ ।।
न हिंस्या मानुषा भूयो युष्माभिरिति कर्हिचित् । हिंसतां हि वधः शीघ्रमेवमेव भवेदिति ।। ४ ।।
जनमेजय ! उस चीत्कारसे भयभीत हो उस राक्षसके परिवारके लोग अपने सेवकोंके साथ घरसे बाहर निकल आये। योद्धाओंमें श्रेष्ठ बलवान् भीमसेनने उन्हें भयसे अचेत देखकर ढाढ़स बंधाया और उनसे यह शर्त करा ली कि 'अबसे कभी तुमलोग मनुष्योंकी हिंसा न करना। जो हिंसा करेंगे, उनका शीघ्र ही इसी प्रकार वध कर दिया जायगा' ।। २-४ ।।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा तानि रक्षांसि भारत । एवमस्त्विति तं प्राहुर्जगृहुः समयं च तम् ।। ५ ।।
भारत ! भीमकी यह बात सुनकर उन राक्षसोंने 'एवमस्तु' कहकर वह शर्त स्वीकार कर ली ।। ५ ।।
ततः प्रभृति रक्षांसि तत्र सौम्यानि भारत ।
नगरे प्रत्यदृश्यन्त नरैर्नगरवासिभिः ।। ६ ।।
भारत! तबसे नगरनिवासी मनुष्योंने अपने नगरमें राक्षसोंको बड़े सौम्य स्वभावका देखा ।। ६ ।।
ततो भीमस्तमादाय गतासुं पुरुषादकम् । द्वारदेशे विनिक्षिप्य जगामानुपलक्षितः ।। ७ ।।
तदनन्तर भीमसेनने उस राक्षसकी लाश उठाकर नगर के दरवाजे पर गिरा दी और स्वयं दूसरों की दृष्टिसे अपनेको बचाते हुए चले गये ।। ७ ।।
दृष्ट्वा भीमबलोद्भूतं बकं विनिहतं तदा ।
ज्ञातयोऽस्य भयोद्विग्नाः प्रतिजग्मुस्ततस्ततः ।। ८ ।।
भीमसेनके बलसे बकासुरको पछाड़ा एवं मारा गया देख उस राक्षसके कुटुम्बीजन भयसे व्याकुल हो इधर-उधर भाग गये ।। ८ ।।
ततः स भीमस्तं हत्वा गत्वा ब्राह्मणवेश्म तत् ।
आचचक्षे यथावृत्तं राज्ञः सर्वमशेषतः ।। ९ ।।
उस राक्षसको मारनेके पश्चात् भीमसेन ब्राह्मणके उसी घरमें गये तथा वहाँ उन्होंने राजा युधिष्ठिरसे सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया ।। ९ ।।
ततो नरा विनिष्क्रान्ता नगरात् कल्यमेव तु । ददृशुर्निहतं भूमौ राक्षसं रुधिरोक्षितम् ।। १० ।।
तत्पश्चात् जब सबेरा हुआ और लोग नगरसे बाहर निकले, तब उन्होंने देखा बकासुर
खून से लथपथ हो पृथ्वी पर मरा पड़ा है ।। १० ।।
तमद्रिकूटसदृशं विनिकीर्णं भयानकम् ।
दृष्ट्वा संहृष्टरोमाणो बभूवुस्तत्र नागराः ।। ११ ।।
पर्वत शिखर के समान भयानक उस राक्षस को नगर के दरवाजे पर फेंका हुआ देखकर नगर निवासी मनुष्यों के शरीर में रोमांच हो आया ।। ११ ।।
एकचक्रां ततो गत्वा प्रवृत्तिं प्रददुः पुरे । तत्राजग्मुर्बकं द्रष्टुं सस्त्रीवृद्धकुमारकाः ।
ततः सहस्रशो राजन् नरा नगरवासिनः ।। १२ ।।
ततस्ते विस्मिताः सर्वे कर्म दृष्ट्वातिमानुषम् । दैवतान्यर्चयांचक्रुः सर्व एव विशाम्पते ।। १३ ।।
राजन् ! उन्होंने एकचक्रा नगरी में जाकर नगरभरमें यह समाचार फैला दिया; फिर तो हजारों नगरनिवासी मनुष्य स्त्री, बच्चों और बूढ़ोंके साथ बकासुरको देखनेके लिये वहाँ आये। उस समय वह अमानुषिक कर्म देखकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। जनमेजय ! उन सभी लोगों ने देवताओं की पूजा की ।। १२-१३ ।।
ततः प्रगणयामासुः कस्य वारोऽद्य भोजने ।
ज्ञात्वा चागम्य तं विप्रं पप्रच्छुः सर्व एव ते ।। १४ ।।
इसके बाद उन्होंने यह जानने के लिये कि आज भोजन पहुँचाने की किसकी बारी थी, दिन आदि की गणना की। फिर उस ब्राह्मण की बारी का पता लगनेपर सब लोग उसके पास आकर पूछने लगे ।। १४ ।।
एवं पृष्टः स बहुशो रक्षमाणश्च पाण्डवान् ।
उवाच नागरान् सर्वानिदं विप्रर्षभस्तदा ।। १५ ।।
इस प्रकार उनके बार-बार पूछनेपर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने पाण्डवोंको गुप्त रखते हुए समस्त नागरिकोंसे इस प्रकार कहा- ।। १५ ।।
आज्ञापितं मामशने रुदन्तं सह बन्धुभिः ।
ददर्श ब्राह्मणः कश्चिन्मन्त्रसिद्धो महामनाः ।। १६ ।।
'कल जब मुझे भोजन पहुँचानेकी आज्ञा मिली, उस समय मैं अपने बन्धुजनोंके साथ रो रहा था। इस दशामें मुझे एक विशाल हृदयवाले मन्त्रसिद्ध ब्राह्मणने देखा ।। १६ ।।
परिपृच्छ्य स मां पूर्व परिक्लेशं पुरस्य च । अब्रवीद् ब्राह्मणश्रेष्ठो विश्वास्य प्रहसन्निव ।। १७ ।।
'देखकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणदेवताने पहले मुझसे सम्पूर्ण नगरके कष्टका कारण पूछा। इसके बाद अपनी अलौकिक शक्तिका विश्वास दिलाकर हँसते हुए-से कहा- ।। १७ ।।
प्रापयिष्याम्यहं तस्मा अन्नमेतद् दुरात्मने । मन्निमित्तं भयं चापि न कार्यमिति चाब्रवीत् ।। १८ ।।
'ब्रह्मन् ! आज मैं स्वयं ही उस दुरात्मा राक्षसके लिये भोजन ले जाऊँगा।' उन्होंने यह भी बताया कि 'आपको मेरे लिये भय नहीं करना चाहिये' ।। १८ ।।
स तदन्नमुपादाय गतो बकवनं प्रति ।
तेन नूनं भवेदेतत् कर्म लोकहितं कृतम् ।। १९ ।।
'वे वह भोजन-सामग्री लेकर बकासुरके वनकी ओर गये। अवश्य उन्होंने ही यह लोक-हितकारी कर्म किया होगा' ।। १९ ।।
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च सुविस्मिताः।
वैश्याः शूद्राश्च मुदिताश्चक्रुर्ब्रह्ममहं तदा ।। २० ।।
तब तो वे सब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आश्चर्यचकित हो आनन्दमें निमग्न हो गये। उस समय उन्होंने ब्राह्मणोंके उपलक्ष्यमें महान् उत्सव मनाया ।। २० ।।
ततो जानपदाः सर्वे आजग्मुर्नगरं प्रति ।
तदद्भुततमं द्रष्टुं पार्थास्तत्रैव चावसन् ।। २१ ।।
इसके बाद उस अद्भुत घटनाको देखनेके लिये जनपदमें रहनेवाले सब लोग नगरमें आये और पाण्डवलोग भी (पूर्ववत्) वहीं निवास करने लगे ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकवधे त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः।। १६३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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