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#श्रीरामचरितमानस चोपाई #श्रीरामचरितमानस 🪷 श्री रामचरितमानस में भक्त तुलसी की शंकर-स्तुति श्रीरामचरितमानस में भक्त तुलसीदासजी भगवान श्री राम के साथ-साथ आदि देव भगवान शंकर की भी स्तुति करते हुए चलते हैं। रामचरितमानस के सप्त सोपानों में से छः सोपानों के प्रारंभ में मंगलाचरण के अंतर्गत भगवान शंकर की स्तुति तुलसीदास जी करते हैं। प्रथम सोपान - बालकांड (श्लोक) इस के मंगलाचरण के अंतर्गत तुलसीदास जी लिखते हैं - भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना ना पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम्।। वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्र: सर्वत्र वन्द्यते।। द्वितीय सोपान - अयोध्या कांड (श्लोक) यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापदा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि ब्यालराट्। सोऽयं भूतिविभूषण: सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा शर्व: सर्वगत: शिव: शशिनिभ: श्रीशंकर: पातु माम्।। तृतीय सोपान - अरण्यकांड (श्लोक) मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे: पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्व:सम्भवं शंकरं वन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्।। चतुर्थ सोपान - किष्किंधाकांड (सोरठा) मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर। जहं बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न।। जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय। तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस।। षष्ठ सोपान - लंकाकांड (श्लोक) शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दुलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशांकप्रियम्। काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शंकरम्।। सप्तम सोपान - उत्तरकांड (श्लोक) कुन्दइन्दुदरगौरसुंदरं अंबिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्। कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनङ्गमोचनम्।। पंचम सोपान - सुंदरकांड रामचरितमानस का एकमात्र यही सोपान - सुंदरकांड है , जिसमें शंकर जी की स्तुति नहीं की गई है। इस में तुलसीदासजी शंकर जी की स्तुति तो नहीं करते हैं , लेकिन शंकर जी के ही अवतार हनुमान जी की स्तुति करते हैं। एक तरह से हनुमान जी की स्तुति कर तुलसीदास जी भगवान शंकर की ही स्तुति कर रहे हैं। पूरा सुंदरकांड ही तुलसीदास जी ने शंकर जी के अवतार हनुमान जी को ही समर्पित किया है। यही नहीं बल्कि तुलसीदास जी लंकाकांड में मंगलाचरण के अंतिम श्लोक में शंकर जी की स्तुति करते हैं , ठीक इसके बाद के दोहे में प्रभु श्री राम की स्तुति करते हैं। यो ददाति सतां शम्भु: कैवल्यमपि दुर्लभम्। खलानां दण्डकृद्योऽसौ शंकर: शं तनोतु मे।। लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड। भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड।। इस प्रकार हम देखते हैं कि तुलसीदास जी प्रभु शिव एवं प्रभु श्री राम में अभेद-दृष्टि रखते थे। ।। श्री राम जय राम जय जय राम ।
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