sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग०८ 🏹🎻🪔📝🦚🌺🦚📝🪔🎻🏹 धर्मी के घर डाका , अधर्मी के घर विवाह *कर्म का अटल सिद्धांत है कि जैसा बोओगे वैसा ही पाओगे, जैसा करोगे वैसा ही मिलेगा, जैसी करनी वैसी भरनी , "जो जस करहिं सो तस फल चाखा "* *किंतु हम सबका प्रत्यक्ष अनुभव ऐसा है और अपनी आंखों से ऐसा देख रहे हैं कि, जो आदमी न्याय नीति और धर्म से चलता है , वह इस जगत में दुखी ही देखा जाता है ।* *अधर्म अनीति करता है, काला बाजार , घूसखोरी, करता है ,, उसके पास महल मोटर आदि सुख समृद्धि होती है , ऐसा देखते हैं तब ईश्वर से अपनी श्रद्धा डिग जाती है। और कर्म के कायदे में कुछ धोखेबाजी है, ऐसा लगता है।* *इससे सुख प्राप्ति की आशा में हम लोग भी अनीति, अधर्म से धन प्राप्त करने को प्रेरित होते हैं । यह एक भयंकर नासमझी है ,, पुण्य का फल सदा सुखी होता है और पाप का फल सदा दुख ही होता है।* *जो आदमी पाप करते हुए भी सुख भोगते देखा जाता है, वह सुख उसके अभी के पाप कर्म का फल नहीं है। वे उसने पहले जो पुण्य कर्म किए थे, जो कर्म संचित में जमा पड़े थे, वह पक कर प्रारब्ध रूप से उसको सुख की प्राप्ति कराते हैं ।* *और अभी के पाप कर्मों को फलित होने में विलंब लगता है, जब उसके पूर्व शुभ कर्म से बना हुआ प्रारब्ध समाप्त हो जाएगा , कि तुरंत उसके पाप कर्म का पका हुआ फल प्रारब्ध रूप से सामने आकर उसको दुख देगा । जब तक पूर्व में किए हुए पुण्य तप रहे हैं, तब तक अभी के किए हुए पाप कर्म आक्रमण करते नहीं ,,, किंतु---* *कबीरा तेरा पुण्य का जब तक है भंडार ।* *तब तक अवगुण माफ है करो गुनाह हजार॥* *जबकि अभी न्याय नीति से चलने वाला आदमी दुख भोंगते हुए दिखाई पड़ रहा है,, उसका अभी का दुख उसके पूर्व के हुए पाप कर्म संचित कर्मों में जमा थे , जो परिपक्व होकर प्रारब्ध रूप से सामने आकर खड़े हो गए हैं । परिणामत: उसको दुख भोगना पड़ रहा है ।* *अभी किए हुए,,, न्याय नीति से किए हुए शुभ कर्म समय पाकर पक जाएंगे , तब वे सुख के स्वरूप में प्रारब्ध रूप से आकर उसको अवश्य मिलेंगे ही । इसलिए उसे कर्म के कायदे से श्रद्धा हटाकर न्याय नीति छोड़कर अनर्थ का अनीति का आचरण नहीं करना चाहिए।* *धर्मी के घर डाका , अधर्मी के घर विवाह* *देहातों में अन्न संग्रह के लिए मिट्टी से बनाई हुई ऊंची कोठियां होती है, उसमें ऊपर से दाने डाले जाते हैं और नीचे एक छेद होता है उसमें से आवश्यक अन्न उपयोग के लिए निकाला जाता है।* *आपकी कोठी में गेहूं भरे हुए हैं और मेरे कुठार में कोदा (एक साधारण कोटि का अन्न) भरा हुआ है । आप हाल में अपने कुठार में ऊपर से कोदा डालते हैं और मैं ,,, मेरे कोठार में हाल में ऊपर से गेहूं डालता हूं ,, जब तक मेरे कुठार से संपूर्ण रूप से कोधा समाप्त नहीं होता , तब तक कुठार के नीचे के छेद में से कोदा ही निकलेगा ,, किंतु मुझे घबराने की आवश्यकता नहीं है।* *जब आपके कुठार में से गेहूं खत्म हो जाएंगे तब आपको कोदा खाने का समय आएगा ही,,, यह निश्चित बात है और मेरे कोठार में से पहले के संचित रूप कोदा खत्म हो जाएगा तब मैं ने हाल में डाले हुए गेहूं (नीचे से बाहर) आना शुरू हो जाएंगे । आप जब कोदा खाते होंगे , उस समय मै गेहूं खाता होउगा । किंतु उसके लिए मुझे थोड़ी धीरज (धैर्य) और ईश्वर पर श्रद्धा और कर्म के कायदे में विश्वास रखना ही पड़ेगा।* *एक बैंक का मैनेजर मेरा निकटवर्ती रिश्तेदार है और उसकी मेरे साथ अत्यंत मैत्री है, मीठा संबंध है , फिर भी मैं केवल पाँच रुपये का चेक बैंक में भेजूंगा तो भी वह उसको स्वीकार नहीं करेगा।* *आपको उस बैंक मैनेजर के साथ सख्त दुश्मनी होने पर भी आपका हजार रुपे का चेक भी वह स्वीकार करेगा,,,* *क्योंकि मेरे पास बैंक में (मेरे) अकाउंट में संचित बैलेंस में कुछ भी नहीं ,,, जब आपकी बड़ी रकम संचित बैलेंस में पड़ी है ,, इसलिए मुझे बैंक के मैनेजर पर नाराज होने की आवश्यकता नहीं है,, किंतु मुझे सतर्क रहकर मेरे पुण्य कर्मों को संसद में जमा करने का सतत प्रयत्न करना चाहिए।* ✍🏽 क्रमशः भाग-09 #कर्म #कर्म ही पूजा है #धर्म कर्म #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙
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