sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣4️⃣5️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्ब का आना, हिडिम्बा का उससे भयभीत होना और भीम तथा हिडिम्बासुर का युद्ध...(दिन 445) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तां विदित्वा चिरगतां हिडिम्बो राक्षसेश्वरः । अवतीर्य द्रुमात् तस्मादाजगामाशु पाण्डवान् ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तब यह सोचकर कि मेरी बहिनको गये बहुत देर हो गयी, राक्षसराज हिडिम्ब उस वृक्षसे उतरा और शीघ्र ही पाण्डवोंके पास आ गया ।। १ ।। लोहिताक्षो महाबाहुरूर्ध्वकेशो महाननः । मेघसंघातवर्मा च तीक्ष्णदंष्ट्रो भयानकः ।। २ ।। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं, भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं, केश ऊपरको उठे हुए थे और विशाल मुख था। उसके शरीरका रंग ऐसा काला था, मानो मेघोंकी काली घटा छा रही हो। तीखे दाढ़ोंवाला वह राक्षस बड़ा भयंकर जान पड़ता था ।। २ ।। तमापतन्तं दृष्ट्वैव तथा विकृतदर्शनम् । हिडिम्बोवाच वित्रस्ता भीमसेनमिदं वचः ।। ३ ।। देखने में विकराल उस राक्षस हिडिम्बको आते देखकर ही हिडिम्बा भयसे थर्रा उठी और भीमसेन से इस प्रकार बोली- ।। ३ ।। आपतत्येष दुष्टात्मा संक्रुद्धः पुरुषादकः । साहं त्वां भ्रातृभिः सार्धं यद् ब्रवीमि तथा कुरु ।। ४ ।। '(देखिये,) यह दुष्टात्मा नरभक्षी राक्षस क्रोधमें भरा हुआ इधर ही आ रहा है, अतः मैं भाइयोंसहित आपसे जो कहती हूँ, वैसा कीजिये ।। ४ ।। अहं कामगमा वीर रक्षोबलसमन्विता । आरुहेमां मम श्रोणिं नेष्यामि त्वां विहायसा ।। ५ ।। 'वीर! मैं इच्छानुसार चल सकती हूँ, मुझमें राक्षसोंका सम्पूर्ण बल है। आप मेरे इस कटिप्रदेश या पीठपर बैठ जाइये। मैं आपको आकाशमार्गसे ले चलूँगी ।। ५ ।। प्रबोधयैतान् संसुप्तान् मातरं च परंतप । सर्वानेव गमिष्यामि गृहीत्वा वो विहायसा ।। ६ ।। 'परंतप ! आप इन सोये हुए भाइयों और माताजीको भी जगा दीजिये। मैं आप सब लोगोंको लेकर आकाशमार्गसे उड़ चलूँगी' ।। ६ ।। भीम उवाच मा भैस्त्वं पृथुसुश्रोणि नैष कश्चिन्मयि स्थिते । अहमेनं हनिष्यामि प्रेक्षन्त्यास्ते सुमध्यमे ।। ७ ।। भीमसेन बोले-सुन्दरी ! तुम डरो मत, मेरे सामने यह राक्षस कुछ भी नहीं है। सुमध्यमे ! मैं तुम्हारे देखते-देखते इसे मार डालूँगा ।। ७ ।। नायं प्रतिबलो भीरु राक्षसापसदो मम । सोढुं युधि परिस्पन्दमथवा सर्वराक्षसाः ।। ८ ।। भीरु ! यह नीच राक्षस युद्धमें मेरे आक्रमणका वेग सह सके, ऐसा बलवान् नहीं है। ये अथवा सम्पूर्ण राक्षस भी मेरा सामना नहीं कर सकते ।। ८ ।। पश्य बाहू सुवृत्तौ मे हस्तिहस्तनिभाविमौ । ऊरू परिघसंकाशौ संहतं चाप्युरो महत् ।। ९ ।। हाथीकी सूँड़-जैसी मोटी और सुन्दर गोलाकार मेरी इन दोनों भुजाओंकी ओर देखो। मेरी ये जाँचें परिघके समान हैं और मेरा विशाल वक्षःस्थल भी सुदृढ़ एवं सुगठित है ।। ९ ।। विक्रमं मे यथेन्द्रस्य साद्य द्रक्ष्यसि शोभने । मावमंस्थाः पृथुश्रोणि मत्वा मामिह मानुषम् ।। १० ।। शोभने ! मेरा पराक्रम (भी) इन्द्रके समान है, जिसे तुम अभी देखोगी। विशाल नितम्बोंवाली राक्षसी ! तुम मुझे मनुष्य समझकर यहाँ मेरा तिरस्कार न करो ।। १० ।। हिडिम्बोवाच नावमन्ये नरव्याघ्र त्वामहं देवरूपिणम् । दृष्टप्रभावस्तु मया मानुषेष्वेव राक्षसः ।। ११ ।। हिडिम्बाने कहा- नरश्रेष्ठ ! आपका स्वरूप तो देवताओंके समान है ही। मैं आपका तिरस्कार नहीं करती। मैं तो इसलिये कहती थी कि मनुष्योंपर ही इस राक्षसका प्रभाव मैं (कई बार) देख चुकी हूँ ।। ११ ।। वैशम्पायन उवाच तथा संजल्पतस्तस्य भीमसेनस्य भारत । वाचः शुश्राव ताः क्रुद्धो राक्षसः पुरुषादकः ।। १२ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उस नरभक्षी राक्षस हिडिम्बने क्रोधमें भरकर भीमसेनकी कही हुई उपर्युक्त बातें सुनीं ।। १२ ।। अवेक्षमाणस्तस्याश्च हिडिम्बो मानुषं वपुः । स्रग्दामपूरितशिखं समग्रेन्दुनिभाननम् ।। १३ ।। सुभ्रूनासाक्षिकेशान्तं सुकुमारनखत्वचम् । सर्वाभरणसंयुक्तं सुसूक्ष्माम्बरवाससम् ।। १४ ।। (तत्पश्चात्) उसने अपनी बहिनके मनुष्योचित रूपकी ओर दृष्टिपात किया। उसने अपनी चोटीमें फूलोंके गजरे लगा रखे थे। उसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर जान पड़ता था। उसकी भौंहें, नासिका, नेत्र और केशान्तभाग- सभी सुन्दर थे। नख और त्वचा बहुत ही सुकुमार थी। उसने अपने अंगोंको समस्त आभूषणोंसे विभूषित कर रखा था तथा शरीरपर अत्यन्त सुन्दर महीन साड़ी शोभा पा रही थी ।। १३-१४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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