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2122 1212 22/112 दिल में मूरत कोई बसा दोगे इश्क को मेरे तुम हवा दोगे पहलू में तेरे रात भर जी लूँ रस्म एसी कोई निभा दोगे क्या तकल्लुफ करूँ ये कहने में खुश हुआ तो हमें रुला दोगे खो रहा किस कदर तबाही में ज़िन्दगी की मुझे दुआ दोगे हो गई है खता मुहब्बत की अब बता क्या हमें सजा दोगे आये शिद्दत से बज्म में तेरी बज्म से प्यासे ही उठा दोगे करते हो दिल पे जो सितम मेरे दर्दे दिल की मेरे दवा दोगे ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 4/3/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - खुश हुआ तो हमें रुला दोगे दिल में अपनी मूरत बसा दोगे इश्क को मेरे तुम हवा दोगे पहलू में तेरे =# रात भर निभा ி रस्म इक क्या तकल्लुफ करूँ ये कहने में हमें रुला दोगे खुश हुआ ग खो रहा किस कदर तबाही में கி 351 33 47 ज़िन्दगी ज़ दकी ೯ T5 ೯ :T मुहब्बत अब बता क्या हमें सजा লে बज्म में तेरी शिद्दत 3|74 से प्यासे ही उठा दोगे बज्म ল ঐ তী মিনম মং करते की॰ मेरे दवा दोगे दर्दे মাণানী खुश हुआ तो हमें रुला दोगे दिल में अपनी मूरत बसा दोगे इश्क को मेरे तुम हवा दोगे पहलू में तेरे =# रात भर निभा ி रस्म इक क्या तकल्लुफ करूँ ये कहने में हमें रुला दोगे खुश हुआ ग खो रहा किस कदर तबाही में கி 351 33 47 ज़िन्दगी ज़ दकी ೯ T5 ೯ :T मुहब्बत अब बता क्या हमें सजा লে बज्म में तेरी शिद्दत 3|74 से प्यासे ही उठा दोगे बज्म ল ঐ তী মিনম মং करते की॰ मेरे दवा दोगे दर्दे মাণানী - ShareChat
122 122 122 122 नज़र उनसे हमको मिलानी नही थी उसे बात दिल की बतानी नहीं थी कली बन के आई मेरी ज़िन्दगी में देखी हमने ऐसी जवानी नहीं थी चमक चहरे पे चाँदनी की तरह थी मगर वो मेरी रात रानी नहीं थी चली हम सफ़र बन के वो साथ मेरे मगर रस्मे उल्फत निभानी नहीं थी जला डाले वो सारे ख़त हमने उसके मोहब्बत की जिसमे कहानी नहीं थी चढ़ा इश्क का था नशा उन पर मेरे मगर इश्क में वो रवानी नहीं थी ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 5/3/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - মযংনী ময়ী হান रानी नहीं थी नज़र उनसे हमको मिलानी नही थी उसे बात दिल की बतानी नहीं थी बन के आई मेरी ज़िन्दगी में कली देखी हमने ऐसी जिवानी नहीं थी चहरे पे चाँदनी की तरह थी चमक मगर वो मेरी रात रानी नहीं थी बन के वो साथ मेरे चली हम सफ़र ग चलर रस्मेर उल्फत निभानी नहीं थी जला डाले वो सारे ख़त हमने उसके ज़ जहाँ मोहब्बत की बयानी नहीं थी ব্রুস্রাৎ সং का उन्हें ल इश्क doll मगर इश्क में वो खवानी नहीं थी লঃসতা নানানী মযংনী ময়ী হান रानी नहीं थी नज़र उनसे हमको मिलानी नही थी उसे बात दिल की बतानी नहीं थी बन के आई मेरी ज़िन्दगी में कली देखी हमने ऐसी जिवानी नहीं थी चहरे पे चाँदनी की तरह थी चमक मगर वो मेरी रात रानी नहीं थी बन के वो साथ मेरे चली हम सफ़र ग चलर रस्मेर उल्फत निभानी नहीं थी जला डाले वो सारे ख़त हमने उसके ज़ जहाँ मोहब्बत की बयानी नहीं थी ব্রুস্রাৎ সং का उन्हें ल इश्क doll मगर इश्क में वो खवानी नहीं थी লঃসতা নানানী - ShareChat
2122 2122 दिल का कुछ उपचार कर ले चल जरा सा प्यार कर ले तरसूँ कब तक प्यार को मैं प्यार का इजहार कर ले हर कदम है अंधेरा ही आँखे अब दो चार कर ले हर्फ यादों में लिखे जो पढ़ के तू अशआर कर ले आरजू है बस यही अब सपने तू साकार कर ले गम लगा लूँगा गले से मुझे तू स्वीकार कर ले ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 10/10/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - 2122 2122 दिल का कुछरर कर ले फरले 4< जरा तरसूँ कब तक मोहब्बत को इजहार   करले प्यार का अंधेरा ही हर कदम आँखे 3 ೩ কংল चा 7 हर्फ   यादों # எ Kd ढ़ के तू अशआर करले आरजू बस   यही अब 444 & कर ले साकार ؟T गले 4 गम लगा मुझे तरस्वीकार कर ले लक्ष्मण दावानी ८ ) 10/10/2017 2122 2122 दिल का कुछरर कर ले फरले 4< जरा तरसूँ कब तक मोहब्बत को इजहार   करले प्यार का अंधेरा ही हर कदम आँखे 3 ೩ কংল चा 7 हर्फ   यादों # எ Kd ढ़ के तू अशआर करले आरजू बस   यही अब 444 & कर ले साकार ؟T गले 4 गम लगा मुझे तरस्वीकार कर ले लक्ष्मण दावानी ८ ) 10/10/2017 - ShareChat
2122 1212 22/112 जब नजर हम से वो चुराते है तब कयामत वो दिल पे ढाते है रूठ जाऊँ कभी में जो उनसे भर के बाहों में वो मनाते है खुशियाँ मोहब्बत में लुटाकर गम जहाँ भर के हम उठाते है जख्म दिल पर दिये हमे जिसने उनसे ही जख्म अब छुपाते है कुछ मुरव्वत दे साकिया हमको सजदे में सर तेरे झुकाते है जान कर नाम बेवफा का वो अब हमें बेवफा बताते है बज्मे दुश्मन बता के अब हमको गैर के नग्मे गुनगुनाते है ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 10/10/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - 2122 1212 22/112 जब नजर हम से॰वर चुराते ह तब कयामत वोबिलपे ढाते है जाऊँ कभी में जो उनसे के बाहों में वो मनाते में लुटाकर मोहब्बत खाश भर के हम उठाते है ल पर दिये हमे जिसने जख्म उनसे ही जिख्म है gப 3|q दे साकिया हमको तखव्वत तेरे   झुकाते है 5_L रसर बेवफा का वो जान कर नाम हमें   बेवफा ননান గే अब बज्मे दुश्मन बता के अब हमको R $ गुनगुनाते नग्मे है लक्ष्मण दावानी Z ) 10/10/2017 2122 1212 22/112 जब नजर हम से॰वर चुराते ह तब कयामत वोबिलपे ढाते है जाऊँ कभी में जो उनसे के बाहों में वो मनाते में लुटाकर मोहब्बत खाश भर के हम उठाते है ल पर दिये हमे जिसने जख्म उनसे ही जिख्म है gப 3|q दे साकिया हमको तखव्वत तेरे   झुकाते है 5_L रसर बेवफा का वो जान कर नाम हमें   बेवफा ননান अब बज्मे दुश्मन बता के अब हमको R $ गुनगुनाते नग्मे है लक्ष्मण दावानी Z ) 10/10/2017 - ShareChat
2122 1212 22/112 कहते हो क्या ये दिल्लगी क्या है क्यों समझते नहीं खुशी क्या है हमसे हो कर जुदा बता तुमको इस जहाँ से ख़ुशी मिली क्या है दर्द कभी तुम समझ कहाँ पाये चौट दिल पर तेरे लगी क्या है उम्र इक सजदे में तेरे गुजरी अब बड़ी इससे बन्दगी क्या है बिन तेरे पास कब ख़ुशी आई दर्द की हम से दोस्ती क्या है मय पिलाना हि छोड़ दी तुमने फिर लबो पर ये तिश्नगी क्या है हम खड़े हैं उसी किनारों पर कौन समझा है ज़िन्दगी क्या है ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 1/3/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - कौन समझा है ज़िन्दगी क्या है कहते हो क्या ये दिल्लगी क्या है क्यों   समझते नहीं खुशी हमसे हो कर जुदा बता तुमको इस जहाँ से मिली क्या है ख़ुशी दर्द कभी तुम समझ कहाँ पाये चौट दिल पर तेरे लगी क्या है सजदे में तेरे उम्र इक गुजरी अब बड़ी इससे बन्दगी क्या है तेरे पास कब आई ব্রংীী की हम से दोस्ती क्या है फिर लिनानार दैि तिश्गदीव त्यमने लबो परये तिश्नगी क्या है हम खडे हैं उसी किनारों पर कौन समझा है ज़िन्दगी क्या है ( লঃসঙ্নোনানী कौन समझा है ज़िन्दगी क्या है कहते हो क्या ये दिल्लगी क्या है क्यों   समझते नहीं खुशी हमसे हो कर जुदा बता तुमको इस जहाँ से मिली क्या है ख़ुशी दर्द कभी तुम समझ कहाँ पाये चौट दिल पर तेरे लगी क्या है सजदे में तेरे उम्र इक गुजरी अब बड़ी इससे बन्दगी क्या है तेरे पास कब आई ব্রংীী की हम से दोस्ती क्या है फिर लिनानार दैि तिश्गदीव त्यमने लबो परये तिश्नगी क्या है हम खडे हैं उसी किनारों पर कौन समझा है ज़िन्दगी क्या है ( লঃসঙ্নোনানী - ShareChat
221 2121 1221 212 बनफूल मोहब्बत का चमनमें खिला हूँ मैं माँ की दुआएँ लेके सफर पे चला हूँ मैं माना के गम बहुत है जमाने मे इश्क के जो सुकूँ दे दिल को महकती हवा हूँ मै हम मान लेते मोम नही है जिगर मेरा तेरी ही मोहब्बत में जफ़ा का सिला हूँ मै काँटो के बीच मे एक गुलाब बन रहा जो रह गई अधूरी खुदा की रज़ा हूँ मै गर्दिश-ए-दौर ने हमे उलझा के रख दिया पूरी न हो सकी जो कभी वो दुआ हूँ मै पाया था मन्नतों से जिसे मैंने जीस्त में उनके ही दर पे आज सजदे में पड़ा हूँ मै ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 7/10/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - 221 2121 1221 212 हूँ बनफूल मोहब्बत का चमनमें खिला मैं माँ की दुआएँ लेके सफर पे मैं লা माना केगम बहुत है जमाने मे इश्क के जो सुकूँ दे दिल को महकती हवा हूँ मै हम मान लेते मोम नही है जिगर नेरा तेरी ही मोहब्बत में जफ़ा का सिला हूँ म काँटो के बीच मे एक गुलाब बन रहा खुदा  की रज़ा हूँ मै जो रह गई अधूरी गर्दिश एन्दौर ने हमे उलझा के रख दिया पूरी न हो  सकी जो कभी वो दुआ हूँ मै पाया था मन्नतों से जिसे मैंने जीस्त में उनके ही दर पे आज सजदे में पड़ा हूँ मै लक्ष्मण दावानी 7/10/2017 221 2121 1221 212 हूँ बनफूल मोहब्बत का चमनमें खिला मैं माँ की दुआएँ लेके सफर पे मैं লা माना केगम बहुत है जमाने मे इश्क के जो सुकूँ दे दिल को महकती हवा हूँ मै हम मान लेते मोम नही है जिगर नेरा तेरी ही मोहब्बत में जफ़ा का सिला हूँ म काँटो के बीच मे एक गुलाब बन रहा खुदा  की रज़ा हूँ मै जो रह गई अधूरी गर्दिश एन्दौर ने हमे उलझा के रख दिया पूरी न हो  सकी जो कभी वो दुआ हूँ मै पाया था मन्नतों से जिसे मैंने जीस्त में उनके ही दर पे आज सजदे में पड़ा हूँ मै लक्ष्मण दावानी 7/10/2017 - ShareChat
221 2121 1221 212 दिल पर गमो के साए कई साल हो गए बद किस्मती लिखाए कई साल हो गए यूँ आँख से लहू बरसता ही रहा मेरी आँखों को मुस्कराए कई साल हो गए उम्मीद भी करूँ तो करूँ कैसे में तेरी अपना ये दिल लुटाए कई साल हो गए तुम चेहरे का दर्द न पढ़ पाओगे मेरे ये दर्दे दिल छुपाए कई साल हो गए हमने सुना है शौक मुहब्बत का तुम्हे है उल्फत में दिल जलाए कई साल हो गए कुछ जानते भी हो वफ़ा के बारे में यहाँ ठोकर वफ़ा में खाए कई साल हो गए ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 27/2/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - ठोकर वफ़ा में ভ্রাৎ বৎ মাল ক্ী गए दिल परगमो के साए कईसाल हो गए बद किस्मती लिखाए कईसाल हो गए ಶ್ಲೆ 3  ಭ बरसता>्ही रहा मेरीं 8 आँखों को मुस्कराए कई साल हो गए उम्मीद भी करूँ तो करूँ कैसे में तेरी अपना ये दिल लुटाए कई सोल हो गए ग <4 चेहरे का दर्द न पढ पाओगे मेरे दिल छुपाए कई साल हो गए जमने 8 सुना है शौक मुहब्बत का उल्फत में दिल जलाए कई साल हो गए लकुछ वफ़ा के बारे में यहाँ जानते भी हो ठोकर वफ़ा में खाए कई साल हो गए लक्ष्मण दावानी ठोकर वफ़ा में ভ্রাৎ বৎ মাল ক্ী गए दिल परगमो के साए कईसाल हो गए बद किस्मती लिखाए कईसाल हो गए ಶ್ಲೆ 3  ಭ बरसता>्ही रहा मेरीं 8 आँखों को मुस्कराए कई साल हो गए उम्मीद भी करूँ तो करूँ कैसे में तेरी अपना ये दिल लुटाए कई सोल हो गए ग <4 चेहरे का दर्द न पढ पाओगे मेरे दिल छुपाए कई साल हो गए जमने 8 सुना है शौक मुहब्बत का उल्फत में दिल जलाए कई साल हो गए लकुछ वफ़ा के बारे में यहाँ जानते भी हो ठोकर वफ़ा में खाए कई साल हो गए लक्ष्मण दावानी - ShareChat
2122 1212 22/112 रूह से तो कभी जुदा न हुआ पर मोहब्बत पे भी खरा न हुआ लुट गई दुनियां मुहब्बत में फिर भी उन से कोई शिफा न हुआ सजदे में सर झुका रहा हर दम इश्क का वो मगर खुदा न हुआ प्यास बुझी नही अभी दिल की हक अभी इश्क का अदा न हुआ कत्ल कर के भी कह दिया कातिल और ज्यादा कुछ भी बुरा न हुआ आ रही खुशबू इन हवाओं से उनके यादों से फासला न हुआ ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 6/10/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - 2122 22/112 1212 ক্ষ য নী कभ 3 53 पर मोहब्बत पेभी खर न हुआ गई दुनिया ? लुट सहब्बत फिर भी उन से कोई शिफा न हुआ सजदे में सर झुका रहा हर दम इश्क कावो मगर खूदा न हुआ नही अभी दिल की बुझी प्यास हक अभी इश्क का अदा न हुआ कत्ल कर के भी कह दिया कातिल और ज्यादा कुछ भी बुरा न हुआ इन हवाओं से 3 < खुशबू यादों से फासला न हुआ उनके ( लक्ष्मण दावानी ८ ) 6/10/2017 2122 22/112 1212 ক্ষ য নী कभ 3 53 पर मोहब्बत पेभी खर न हुआ गई दुनिया ? लुट सहब्बत फिर भी उन से कोई शिफा न हुआ सजदे में सर झुका रहा हर दम इश्क कावो मगर खूदा न हुआ नही अभी दिल की बुझी प्यास हक अभी इश्क का अदा न हुआ कत्ल कर के भी कह दिया कातिल और ज्यादा कुछ भी बुरा न हुआ इन हवाओं से 3 < खुशबू यादों से फासला न हुआ उनके ( लक्ष्मण दावानी ८ ) 6/10/2017 - ShareChat
2122 2122 212 रुख पे वो पर्दा गिराया आज फिर चाँद आँचल में छुपाया आज फिर बज्म में अपनी बुला के फिर मुझे संग गैरो के बिठाया आज फिर वो बताते तो बताते क्या हमें बेवफा कह दिल जलाया आज फिर जो लिखे थे हर्फ नफरत में मेरी वो ग़ज़ल कह के सुनाया आज फिर जख्म दिल के ताजे थे पहले से ही तीर ओ दिल मे चुभाया आज फिर क्या सुनाते हाले दिल अपना उसे दोस्त बन दुश्मन बताया आज फिर रख लबो पे अपने जहरीली हँसी जश्न उसने युँ मनाया आज फिर ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 5/10/2017 #📚कविता-कहानी संग्रह #शायरी #💝 शायराना इश्क़ #✒ शायरी #📜मेरी कलम से✒️
📚कविता-कहानी संग्रह - 2122 2122 212 रुख पेवो पर्दा गिराया आज फिर चाँद आँचल में छुफया आज में॰अपनी बुला के िरा गैरो  के बिठाया 37 a बताते নী বনান बेवफा कह दिल जलाया अ नो लिखे थे हर्फ नफरत में ग़ज़ल कह के सुनाया आज িল ক নাতী থ 466 ओ दिल मे चुभाया आज हाले दिल अपना सुनाते 3 दास्त बन दुश्मन बताया आज फिर रख लबो पे अपने जहरीली हँसी जश्न उसने यु मर्नाया आज फिर ( लक्ष्मण दावानी Z 521.0/2017 Shot Vivo 2122 2122 212 रुख पेवो पर्दा गिराया आज फिर चाँद आँचल में छुफया आज में॰अपनी बुला के िरा गैरो  के बिठाया 37 a बताते নী বনান बेवफा कह दिल जलाया अ नो लिखे थे हर्फ नफरत में ग़ज़ल कह के सुनाया आज িল ক নাতী থ 466 ओ दिल मे चुभाया आज हाले दिल अपना सुनाते 3 दास्त बन दुश्मन बताया आज फिर रख लबो पे अपने जहरीली हँसी जश्न उसने यु मर्नाया आज फिर ( लक्ष्मण दावानी Z 521.0/2017 Shot Vivo - ShareChat
1212 1122 1212 112/22 जिसे चाहा था हमने उसे तो हम पा न सके तमाम उम्र पता जिनका हम लगा न सके छुपी रही सदा चाहत दिलो की दिल में मेरे करीब हो कर मुहब्बत उसे दिखा न सके सदा तरसते रहे ज़िन्दगी बनाने को जिसे उसे चाह कर भी अपना कभी बना न सके मेरी तन्हाई मुझे पागल बना रही है यहाँ फिसल गया रेत जैसे हाथो में समा न सके कियेथे वादे मुहब्बत के उसने भी हमने भी जहाँ के जुल्मो से दोनों ही वो निभा न सके कदम कदम पे मिली ठोकरे जहाँ की हमें फिर भी अश्क आँखों से हम बहा न सके ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 26/2/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - सके  নিমা ন ))) जिसे चाहा था हमने उसे तो हम पानःसके तमाम उम्र पता जिनका हम लगा न सके छुपी रही   सदा चाहत दिलो की दिल में मेरे करीब हो कर मुहब्बत उसे दिखा न सके सदा तरसते रहे ज़िन्दगी बनाने को जिसे चाह करभी अपना उसे बना न सके 34 मेरी तन्हाई मुझे बना रही है यहाँ पागल में समा न सके फिसल गया रेत जैसे हाथो कियेथे वादे मुहब्बत के उसने भी हमने भी चली ज़माने कीआँधियाँ ऐसी निभा न सके कदम पे मिली ठोकरे जहाँ की हमें कदम फिर भी अश्क आँखों से हम बहा न सके ( लक्ष्मण दावानी सके  নিমা ন ))) जिसे चाहा था हमने उसे तो हम पानःसके तमाम उम्र पता जिनका हम लगा न सके छुपी रही   सदा चाहत दिलो की दिल में मेरे करीब हो कर मुहब्बत उसे दिखा न सके सदा तरसते रहे ज़िन्दगी बनाने को जिसे चाह करभी अपना उसे बना न सके 34 मेरी तन्हाई मुझे बना रही है यहाँ पागल में समा न सके फिसल गया रेत जैसे हाथो कियेथे वादे मुहब्बत के उसने भी हमने भी चली ज़माने कीआँधियाँ ऐसी निभा न सके कदम पे मिली ठोकरे जहाँ की हमें कदम फिर भी अश्क आँखों से हम बहा न सके ( लक्ष्मण दावानी - ShareChat