कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ १६ ॥
प्रणाम करने वालों के क्लेश नाश करने वाले श्रीकृष्ण, वासुदेव, हरि, परमात्मा एवं गोविन्द के प्रति हमारा बार-बार नमस्कार है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/७३/१६
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/73/16
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नमस्ते सर्वभावाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
कृष्णाय वासुदेवाय योगानां पतये नमः ॥ २९ ॥
आप समस्त कार्यों और कारणों के रूप में विद्यमान हैं। आपकी शक्ति अनन्त है और आप स्वयं ब्रह्म हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। सच्चिदानन्दस्वरूप सर्वान्तर्यामी वासुदेव श्रीकृष्ण! आप समस्त योगों के स्वामी, योगेश्वर हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ।।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/६४/२९
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/64/29
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जैसे दीपशिखा का अग्रभाग पतंगों को बड़ा मनोहर प्रतीत होता है, जैसे बंसी में गुँथा हुआ मांस मछलियों को आपाततः सुखद जान पड़ता है, उसी प्रकार विषयी पुरुषों को विषय मे सुख की प्रतीति होती है; परन्तु वास्तव में वह मृत्यु का कारण है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण/ब्रह्म-खण्ड/८/३७-३८
ब्रह्मवैवर्तपुराण/ब्रह्म-खण्ड/8/37-38
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सात द्वीप, सात स्वर्ग तथा सात पाताल - इन लोको सहित जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, वह ब्रह्माजी के अधिकार में है। ऐसे ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और महाविष्णु के रोमाञ्च-विवरों में उनकी स्थिति है। श्रीकृष्ण की माया से प्रत्येक ब्रह्माण्ड में दिक्पाल, ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं, देवता, मनुष्य और सभी प्राणी स्थित हैं। इन ब्रह्माण्डो की गणना करने में न तो लोकनाथ ब्रह्मा, न शंकर, न धर्म और न ही विष्णु समर्थ हैं; फिर और देवता किस गिनती में हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराण/ब्रह्मखण्ड/७/३०-३३
ब्रह्मवैवर्तपुराण/ब्रह्म-खण्ड/7/30-33
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श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा का हरण किया। दुर्योधन और बाकी कौरवों ने मिलकर साम्ब को पकड़ लिया। यह समाचार जब द्वारका में बलरामजी और बाकी यादवों को मिला तो, वे कौरवों से लड़ने के लिए तैयार हो गए। बलरामजी अकेले ही उनसे बात करने के लिए हस्तिनापुर चल पड़े। हस्तिनापुर के बाहर जाकर उन्होंने उद्धव के द्वारा हस्तिनापुर में संदेशा भिजवाया। कौरवों की और से दुर्योधन, भीष्म, द्रोणाचार्य और काफी लोग आये। यहां पर कौरव बलरामजी का अपमान करके वापस हस्तिनापुर आ जाते हैं। बलरामजी क्रुद्ध होकर अपने हल की नोक से हस्तिनापुर को ही गंगाजी में डुबाने के लिए लेकर चल पड़े। हल से खींचने पर हस्तिनापुर कांपने लगा। सभी कौरव घबराकर साम्ब और लक्ष्मणा को आगे करके बलरामजी से क्षमा मांगने लगे।
हस्तिनापुर आज भी दक्षिण की ओर ऊंचा और गंगाजी की ओर कुछ झुका हुआ है और इस प्रकार यह बलरामजी के पराक्रम की सूचना दे रहा है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/६८
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/68
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द्वारका जाने के बाद एक बाद बलरामजी व्रज में नन्द बाबा और दूसरे गोपों से मिलने के लिए आए। एक बार रात्रि के समय उन्होंने सभी गोपियों को बुलाया और उनके साथ विहार करने लगे। इसी दौरान जलक्रीड़ा के लिए उन्होंने यमुनाजी को पुकारा। यमुनाजी जब उनकी पुकार पर नहीं आई तो बलरामजी को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने उसे अपने हल की नोक से खींचना शुरू कर दिया। ये देखकर यमुनाजी जी उनसे प्रार्थना करी और क्षमा मांगी।
यमुनाजी आज भी बलरामजी के खींचे हुए मार्ग से बहती है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/६५
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/65
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जो मनुष्य 'शिव' शब्द का उच्चारण करके प्राणों का परित्याग करता है, वह कोटि जन्मों के उपार्जित पाप से मुक्त हो मोक्ष प्राप्त कर लेता है। 'शिव' शब्द कल्याण का वाचक है और कल्याण शब्द मुक्ति का। शिव के उच्चारण से मोक्ष या कल्याण की प्रप्ति होती है, इसीलिए महादेवजी को शिव कहा गया है।
'शि' पापनाशक अर्थ में है और 'व' मोक्षदायक अर्थ में। महादेवजी मनुष्यों के पापहन्ता और मोक्षदाता हैं इसीलिए उन्हें शिव कहा गया है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण।ब्रह्मखण्ड।६।४९-५२
ब्रह्मवैवर्तपुराण/ब्रह्म-खण्ड/6/49-52
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योगी जिन्हें पुरूष कहते हैं, मीमांसक लोग कर्म मानकर जिनकी उपासना करते हैं, वैशेषिक मतावलम्बी जिन्हें विभु और शक्ति का चिन्तन करने वाले जिन्हें चिन्मयी आद्यशक्ति कहते हैं, नाना प्रकार के रूप और क्रियाओं के चरम आश्रय उन अद्वितीय ब्रह्मा की मैं वन्दना करता हूँ।
नारदपुराण/उत्तर-भाग/७२/५६-५७
नारदपुराण/उत्तर-भाग/72/56-57
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रुक्मी और रुक्मिणी भाई-बहन थे।
रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ। इनका पुत्र हुआ प्रद्युम्न। प्रद्युम्न का विवाह हुआ रुक्मी की पुत्री रुक्मवती के साथ। प्रद्युम्न और रुक्मवती का पुत्र अनिरुद्ध हुआ। अनिरुद्ध का विवाह रुक्मी की पौत्री रोचना के साथ हुआ।
अनिरुद्ध और रोचना के विवाह में बलरामजी ने रुक्मी का वध कर दिया।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/६१/२०-४०
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/61/20-40
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श्रीकृष्णजी और रुक्मिणीजी के दस पुत्रों के अतिरिक्त एक परम सुन्दरी बड़े-बड़े नेत्रों वाली कन्या थी। उसका नाम थे चारुमती। कृतवर्मा के पुत्र बली ने उसके साथ विवाह किया था।
श्रीमद्भागवत-महापुराण/१०/६१/२४
श्रीमद्भागवत-महापुराण/10/61/24
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