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तत्वदर्शी सन्त के उपदेश
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508 views 3 days ago
#तत्वदर्शी सन्त के उपदेश #भजन_करने_का_सहीं_ढंग... भजन अर्थात् भक्ति करने का सहीं तरीका,सहीं विधि क्या हैं ? पवित्र पांचवे वेद अर्थात् पवित्र #सुक्ष्मवेद में बताया गया हैं कि काशी करौंत काहे लेही,बिना भजन नहीं ढंग रे। कोटी ग्रंथ का योही अर्थ है,करो साध सत्संग रे।। मोक्ष प्राप्ति के लिए पूर्ण और सच्चे संत की शरण में जाना अनिवार्य है। इसी का समर्थन श्रीमद्भगवद्गीता भी करती है :- तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। इस संबंध में और अधिक जानकारी हेतु सपरिवार देखिए साधना टीवी चैनल अभी।
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700 views 8 days ago
#तत्वदर्शी सन्त के उपदेश #क्या_आप_जानते_हैं_? पांचवे वेद अर्थात् पवित्र #सुक्ष्मवेद में निर्णायक ज्ञान बताया गया हैं, सुक्ष्मवेद की वाणी हैं... गरीब,राम सरीखे राम हैं,सन्त सरीखे सन्त * नाम सरीखा नाम हैं,नहीं आदि नहीं अन्त ** अर्थात् काल लोक में हम अज्ञानवश अनेक शक्तियों को भगवान मान बैठे हैं और सभी भेषधारी,चमत्कारी,हठयोगी और बड़े मनमोहक कथा कहने वाले सन्त को हम सच्चा सन्त समझ बैठे हैं और उसी प्रकार से उनके द्वारा जो भी नाम अथवा मंत्र दिए जा रहे हैं उन्हें हम तारक मंत्र जानकर साधना कर रहे हैं जबकि ऐसा नहीं हैं। सतगुरू देव जी बताते हैं कि ✓ जिस परमेश्वर की शक्ति की ना कोई आदि हैं ना कोई अन्त हैं केवल उस परमेश्वर (#Allmighty_GOD_KABIR) की भक्ति ही हमारे लिए कल्याणकारी हैं। ✓ समस्त सन्तों में शिरोमणि केवल तत्वदर्शी सन्त ही होता हैं, वही जगत उद्धारक सन्त होता हैं। अतएव हमें केवल तत्वदर्शी सन्त से ही नाम उपदेश लेना चाहिए। ✓ शास्त्र अनुकूल भक्ति साधना के यथार्थ मंत्र/मूल मंत्र केवल #सत्यनाम और #सारनाम हैं और इससे ही जीव का मोक्ष हो सकता हैं,अन्य मंत्र शास्त्र सम्मत नहीं होने से जीवन नाशक हैं। ✓✓✓ आतमज्ञान और परमातम् ज्ञान के विषय में अपने सारे सवालों के जवाब पाने के लिए अवश्य पढ़ें पुस्तक ज्ञानगंगा इस पुस्तक को निःशुल्क प्राप्त करने के लिए अपना पुरा नाम,पुरा पता,मोबाइल नम्बर आदि की जानकारी हमें इस मोबाइल नम्बर पर अभी वाट्सएप करें 9992600893
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483 views 16 days ago
#तत्वदर्शी सन्त के उपदेश ⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️ #वो_ईश्वरीय_संविधान... जिनका ये दुनियां वाले पालन ही नहीं कर रहे हैं और अपने मंगल की कामना करते हैं तो फिर यह कैसे संभव हैं ? पांचवे वेद अर्थात् पवित्र #सुक्ष्मवेद में बताया गया हैं कि गुरू को तजै भजै जो आना। ता पशुवा को फोकट ज्ञाना।। जो गुरूमुखी नहीं हैं उनकी तो बात ही छोड़ दीजिए कि उनके सांथ क्या बनेगी, लेकिन जो ब्यक्ति किसी सन्त को गुरू बना लिया हैं और वह अपने गुरू को छोड़कर अन्य (देवी देवताओं की,माई मशानी सेढ़ शीतला भैरो भूत हनुमंत आदि की,पत्थर पानी की) पूजा करता हैं वह ब्यक्ति पशु समान हैं और उसे फोकट ज्ञान हैं अर्थात् कहने सुनने के लिए तो वह ज्ञानी हैं लेकिन दरअसल वह पशु के समान टोटल अज्ञानी ही हैं,ऐसे मनुष्य को कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं मिल सकता हैं। क्योंकि वह परमात्मा ने स्पष्ट रूप से यह संकेत किया हैं कि गुरू के मिले कटे दुःख पापा। जन्म जन्म के मिटें संतापा।। गुरू के चरण सदा चित्त दीजै। जीवन जन्म सुफल कर लीजै।। गुरू भगता मम आतम सोई। वाके हृदय रहूँ समोई।। अड़सठ तीर्थ भ्रम भ्रम आवे। सो फल गुरू के चरनों पावे।। और अधिक जानकारी हेतु सपरिवार देखिए साधना टीवी चैनल सायं 07:30 pm.
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