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छपरा में मां की अर्थी को बेटियों ने दिया कंधा, समाज की चुप्पी पर उठे सवाल
छपरा के सवर्ण समाज की बेटियां माँ की अर्थी को ख़ुद कन्धा देने को क्यों हुईं मजबूर?
छपरा के सवर्ण समाज की ये बेटियां है इनकी मां चली गई, गांव ने भी मुंह मोड़ा, बेटियों ने दी मुखाग्नि, श्राद्ध के लिए समाज से मदद की पुकार
मां के निधन के बाद न रिश्तेदार पहुंचे, न ही गांव के लोग आगे आए। आख़िरकार दो बेटियों ने ही हिम्मत जुटाकर मां की अर्थी को कंधा दिया और मुखाग्नि देकर बेटियों का फ़र्ज़ निभाया।
दोनों बेटियां गांव की गलियों में दर-दर हाथ जोड़ती रहीं, लोगों से विनती करती रहीं, लेकिन संवेदनाएं जैसे पत्थर बन चुकी थीं। काफ़ी देर बाद दो-तीन लोग किसी तरह पहुंचे, तब जाकर चार कंधों पर अर्थी उठ सकी और अंतिम संस्कार हो पाया।
उनका समाज और रिश्तेदारों से सिर्फ़ इतना ही आग्रह है कि कोई आगे आकर मां के श्राद्ध संस्कार में सहयोग कर दे, ताकि उसकी आत्मा को शांति मिल सके।