#महाभारत🏹🏹🏹

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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣5️⃣3️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 453) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तथेति तत् प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा । भीमसेनमुपादाय सोर्ध्वमाचक्रमे ततः ।। २१ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तब 'ऐसा ही होगा' यह प्रतिज्ञा करके हिडिम्बा राक्षसी भीमसेन को साथ ले वहाँ से ऊपर आकाश में उड़ गयी ।। २१ ।। शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च । मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा ।। २२ ।। कृत्वा च परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता । संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम् ।। २३ ।। तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्द्रुमवल्लिषु । सरस्सु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु च ।। २४ ।। नदीद्वीपप्रदेशेषु वैदूर्यसिकतासु च । सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च ।। २५ ।। काननेषु विचित्रेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । हिमवगिरिकुञ्जषु गुहासु विविधासु च ।। २६ ।। प्रफुल्लशतपत्रेषु सरस्स्वमलवारिषु । सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च ।। २७ ।। पल्वलेषु च रम्येषु महाशालवनेषु च । देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु ।। २८ ।। गुह्यकानां निवासेषु तापसायतनेषु च । सर्वर्तुफलरम्येषु मानसेषु सरस्सु च ।। २९ ।। बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम् । रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा ।। ३० ।। उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु-पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्दन भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य-मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननों में, हिमवान् पर्वत के कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्यकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयों में घूम-फिरकर हिडिम्बा ने परम सुन्दर रूप धारण करके पाण्डुनन्दन भीमसेन के साथ रमण किया। वह मनके समान वेग से चलने वाली थी, अतः उन-उन स्थानों में भीमसेन को आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी ।। २२-३० ।। प्रजज्ञे राक्षसी पुत्रं भीमसेनान्महाबलम् । विरूपाक्षं महावक्त्रं शङ्कुकर्णं बिभीषणम् ।। ३१ ।। कुछ काल के पश्चात् उस राक्षसी ने भीमसेन से एक महान् बलवान् पुत्र उत्पन्न किया, जिसकी आँखें विकराल, मुख विशाल और कान शंकु के समान थे। वह देखने में बड़ा भयंकर जान पड़ता था ।। ३१ ।। भीमनादं सुताम्रोष्ठं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाबलम् । महेष्वासं महावीर्य महासत्त्वं महाभुजम् ।। ३२ ।। महाजवं महाकायं महामायमरिंदमम् । दीर्घघोणं महोरस्कं विकटोद्बद्धपिण्डिकम् ।। ३३ ।। उसकी आवाज बड़ी भयानक थी। सुन्दर लाल-लाल ओठ, तीखी दाढ़ें, महान् बल, बहुत बड़ा धनुष, महान् पराक्रम, अत्यन्त धैर्य और साहस, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, महान् वेग और विशाल शरीर-ये उसकी विशेषताएँ थीं। वह महामायावी राक्षस अपने शत्रुओंका दमन करनेवाला था। उसकी नाक बहुत बड़ी, छाती चौड़ी तथा पैरोंकी दोनों पिंडलियाँ टेढ़ी और ऊँची थीं ।। ३२-३३ ।। अमानुषं मानुषजं भीमवेगं महाबलम् । यः पिशाचानतीत्यान्यान् बभूवातीव राक्षसान् ।। ३४ ।। यद्यपि उसका जन्म मनुष्यसे हुआ था तथापि उसकी आकृति और शक्ति अमानुषिक थी। उसका वेग भयंकर और बल महान् था। वह दूसरे पिशाचों तथा राक्षसोंसे बहुत अधिक शक्तिशाली था ।। ३४ ।। बालोऽपि यौवनं प्राप्तो मानुषेषु विशाम्पते । सर्वास्त्रेषु परं वीरः प्रकर्षमगमद् बली ।। ३५ ।। राजन् ! अवस्थामें बालक होनेपर भी वह मनुष्योंमें युवक-सा प्रतीत होता था। उस बलवान् वीरने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंमें बड़ी निपुणता प्राप्त की थी ।। ३५ ।। सद्यो हि गर्भान् राक्षस्यो लभन्ते प्रसवन्ति च । कामरूपधराश्चैव भवन्ति बहुरूपिकाः ।। ३६ ।। राक्षसियाँ जब गर्भ धारण करती हैं, तब तत्काल ही उसको जन्म दे देती हैं। वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली और नाना प्रकारके रूप बदलनेवाली होती हैं ।। ३६ ।। प्रणम्य विकचः पादावगृह्णात् स पितुस्तदा । मातुश्च परमेष्वासस्तौ च नामास्य चक्रतुः ।। ३७ ।। उस महान् धनुर्धर बालक ने पैदा होते ही पिता और माता के चरणों में प्रणाम किया। उसके सिर में बाल नहीं उगे थे। उस समय पिता और माता ने उसका इस प्रकार नामकरण किया ।। ३७ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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sn vyas
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भगवान श्री गणेश द्वारा महाभारत का लेखन और 'एकदंत' स्वरूप का #महाभारत #महाभारत की कथा प्रसंग महाभारत के आदि पर्व के अनुसार, जब महर्षि वेदव्यास ने संपूर्ण ज्ञान, धर्म, नीति और इतिहास से युक्त महाकाव्य 'महाभारत' की मानसिक रचना पूर्ण कर ली, तब उन्हें इस वृहद ग्रंथ को लिपिबद्ध (लिखने) के लिए एक अत्यंत तीव्र बुद्धि और निरंतर लिखने वाले लेखक की आवश्यकता हुई। ब्रह्मा जी का परामर्श: महर्षि वेदव्यास के निवेदन पर ब्रह्मा जी ने उन्हें बुद्धि और विद्या के अधिपति भगवान श्री गणेश से प्रार्थना करने को कहा। गणेश जी की कठिन शर्त: जब व्यास जी ने गणेश जी से लेखक बनने का अनुरोध किया, तो गणेश जी ने एक शर्त रखी: "मेरी लेखनी एक क्षण के लिए भी रुकनी नहीं चाहिए। यदि आप बोलते समय तनिक भी रुके, तो मैं लिखना छोड़ दूंगा।" महर्षि वेदव्यास की चतुर युक्ति: व्यास जी ने शर्त स्वीकार की, परंतु साथ में अपनी एक शर्त जोड़ी: "हे गणाध्यक्ष! मैं जो भी श्लोक बोलूंगा, उसे आप पूरी तरह समझे बिना लिपिबद्ध नहीं करेंगे।" गूढ़ कूट श्लोकों की रचना: जब भी महर्षि व्यास को विश्राम की आवश्यकता होती, वे अत्यंत कठिन और दार्शनिक 'कूट श्लोक' बोलते। उन श्लोकों के गूढ़ अर्थ पर विचार करने में गणेश जी को कुछ क्षण का समय लगता था, और उसी अंतराल में व्यास जी अपने अगले श्लोकों की रचना कर लेते थे। 'एकदंत' स्वरूप और अटूट संकल्प लेखन के दौरान एक समय गणेश जी की लेखनी (कलम) अचानक टूट गई। अपनी शर्त टूटने न पाए और महाकाव्य का लेखन निर्बाध रूप से चलता रहे, इसलिए गणेश जी ने बिना एक क्षण गंवाए अपने दाएँ दाँत को स्वयं तोड़ लिया और उसकी नोंक से स्याही में डुबोकर लिखना जारी रखा। अपने इसी महान त्याग, बुद्धि और समर्पण के कारण भगवान श्री गणेश संसार में 'एकदंत' के नाम से विख्यात हुए।
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sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣7️⃣6️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः द्रुपद के यज्ञ से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी की उत्पत्ति...(दिन 476) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ द्रुपद उवाच अहो रूपमहो धैर्यमहो वीर्यं च शिक्षितम् । चिन्तयामि दिवारात्रमर्जुनं प्रति बान्धवाः ।। भ्रातृभिः सहितो मात्रा सोऽदह्यत हुताशने । किमाश्चर्यमिदं लोके कालो हि दुरतिक्रमः ।। मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यामि साम्प्रतम् । अन्तर्गतेन दुःखेन दह्यमानो दिवानिशम् । याजोपयाजी सत्कृत्य याचिती ती मयानघी ।। भारद्वाजस्य हन्तारं देवीं चाप्यर्जुनस्य वै । लोकस्तद् वेद यच्चैव तथा याजेन वै श्रुतम् ।। याजेन पुत्रकामीयं हुत्वा चोत्पादितावुभौ । धृष्टद्युम्नश्च कृष्णा च मम तुष्टिकरावुभौ ।। किं करिष्यामि ते नष्टाः पाण्डवाः पृथया सह । द्रुपद बोले- बन्धुओ! अर्जुन का रूप अद्भुत था। उनका धैर्य आश्चर्यजनक था। उनका पराक्रम और उनकी अस्त्र-शिक्षा भी अलौकिक थी। मैं दिन-रात अर्जुनकी ही चिन्तामें डूबा रहता हूँ। हाय! वे अपने भाइयों और माताके साथ आगमें जल गये। संसारमें इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है? सच है, कालका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है। मेरी तो प्रतिज्ञा झूठी हो गयी। अब मैं लोगोंसे क्या कहूँगा। आन्तरिक दुःखसे दिन-रात दग्ध होता रहता हूँ। मैंने निष्पाप याज और उपयाज का सत्कार करके उनसे दो संतानों की याचना की थी। एक तो ऐसा पुत्र माँगा, जो द्रोणाचार्यका वध कर सके और दूसरी ऐसी कन्याके लिये प्रार्थना की, जो वीर अर्जुनकी पटरानी बन सके। मेरे इस उद्देश्यको सब लोग जानते हैं और महर्षि याजने भी यही घोषित किया था। उन्होंने पुत्रेष्टियज्ञ करके धृष्टद्युम्न और कृष्णा को उत्पन्न किया था। इन दोनों संतानों को पाकर मुझे बड़ा संतोष हुआ। अब क्या करूँ? कुन्ती सहित पाण्डव तो नष्ट हो गये। ब्राह्मण उवाच इत्येवमुक्त्वा पाञ्चालः शुशोच परमातुरः ।। दृष्ट्वा शोचन्तमत्यर्थं पाञ्चालगुरुरब्रवीत् । पुरोधाः सत्त्वसम्पन्नः सम्य‌ग्विद्याशेषवान् ।। आगन्तुक ब्राह्मण कहता है-ऐसा कहकर पांचालराज द्रुपद अत्यन्त दुःखी एवं शोकातुर हो गये। पांचालराज के गुरु बड़े सात्त्विक और विशिष्ट विद्वान् थे। उन्होंने राजा को भारी शोक में डूबा देखकर कहा। गुरुरुवाच वृद्धानुशासने सक्ताः पाण्डवा धर्मचारिणः । तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ।। मया दृष्टमिदं सत्यं शृणुष्व मनुजाधिप । ब्राह्मणैः कथितं सत्यं वेदेषु च मया श्रुतम् ।। बृहस्पतिमुखेनाथ पौलोम्या च पुरा श्रुतम् । नष्ट इन्द्रो बिसग्रन्थ्यामुपश्रुत्या तु दर्शितः ।। उपश्रुतिर्महाराज पाण्डवार्थे मया श्रुता । यत्र वा तत्र जीवन्ति पाण्डवास्ते न संशयः ।। गुरु बोले- महाराज! पाण्डवलोग बड़े-बूढ़ोंके आज्ञापालनमें तत्पर रहनेवाले तथा धर्मात्मा हैं। ऐसे लोग न तो नष्ट होते हैं और न पराजित ही होते हैं। नरेश्वर! मैंने जिस सत्यका साक्षात्कार किया है, वह सुनिये। ब्राह्मणोंने तो इस सत्यका प्रतिपादन किया ही है, वेदके मन्त्रोंमें भी मैंने इसका श्रवण किया है। पूर्वकालमें इन्द्राणीने बृहस्पतिजीके मुखसे उपश्रुतिकी महिमा सुनी थी। उत्तरायणकी अधिष्ठात्री देवी उपश्रुतिने ही अदृष्ट हुए इन्द्रका कमलनालकी ग्रन्थिमें दर्शन कराया था। महाराज! इसी प्रकार मैंने भी पाण्डवोंके विषयमें उपश्रुति सुन रखी है। वे पाण्डव कहीं-न-कहीं अवश्य जीवित हैं, इसमें संशय नहीं है। मया दृष्टानि लिङ्गानि ध्रुवमेष्यन्ति पाण्डवाः । यन्निमित्तमिहायान्ति तच्छृणुष्व नराधिप ।। स्वयंवरः क्षत्रियाणां कन्यादाने प्रदर्शितः । स्वयंवरस्तु नगरे घुष्यतां राजसत्तम ।। यत्र वा निवसन्तस्ते पाण्डवाः पृथया सह । दूरस्था वा समीपस्थाः स्वर्गस्था वापि पाण्डवाः ।। श्रुत्वा स्वयंवरं राजन् समेष्यन्ति न संशयः । तस्मात् स्वयंवरो राजन् घुष्यतां मा चिरं कृथाः ।। मैंने ऐसे (शुभ) चिह्न देखे हैं, जिनसे सूचित होता है कि पाण्डव यहाँ अवश्य पधारेंगे। नरेश्वर! वे जिस निमित्तसे यहाँ आ सकते हैं, वह सुनिये - क्षत्रियोंके लिये कन्यादानका श्रेष्ठ मार्ग स्वयंवर बताया गया है। नृपश्रेष्ठ ! आप सम्पूर्ण नगरमें स्वयंवरकी घोषणा करा दें। फिर पाण्डव अपनी माता कुन्तीके साथ दूर हों, निकट हों अथवा स्वर्गमें ही क्यों न हों-जहाँ कहीं भी होंगे, स्वयंवरका समाचार सुनकर यहाँ अवश्य आयेंगे, इसमें संशय नहीं है। अतः राजन् ! आप (सर्वत्र) स्वयंवरकी सूवना करा दें, इसमें विलम्ब न करें। ब्राह्मण उवाच श्रुत्वा पुरोहितेनोक्तं पाञ्चालः प्रीतिमांस्तदा । घोषयामास नगरे द्रौपद्यास्तु स्वयंवरम् ।। पुष्यमासे तु रोहिण्यां शुक्लपक्षे शुभे तिथौ । दिवसैः पञ्चसप्तत्या भविष्यति स्वयंवरः ।। देवगन्धर्वयक्षाश्च ऋषयश्च तपोधनाः । स्वयंवरं द्रष्टुकामा गच्छन्त्येव न संशयः ।। तव पुत्रा महात्मानो दर्शनीया विशेषतः । अहं च तत्र गच्छामि ममैभिः सह शिष्यकैः । यदृच्छया तु पाञ्चाली गच्छेद् वा मध्यमं पतिम् ।। को हि जानाति लोकेषु प्रजापतिविधिं परम् । तस्मात् सपुत्रा गच्छेथा ब्राह्मण्यै यदि रोचते ।। नित्यकालं सुभिक्षास्ते पञ्चालास्तु तपोधने ।। यज्ञसेनस्तु राजासौ ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः । ब्रह्मण्या नागराश्चाथ ब्राह्मणाश्चातिथिप्रियाः ।। नित्यकालं प्रदास्यन्ति आमन्त्रणमयाचितम् ।। एकसार्थाः प्रयाताः स्मो ब्राह्मण्यै यदि रोचते ।। आगन्तुक ब्राह्मण कहता है- पुरोहितकी बात सुनकर पंचालराजको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने नगरमें द्रौपदीका स्वयंवर घोषित करा दिया। पौषमासके शुक्लपक्षमें शुभ तिथि (एकादशी) को रोहिणी नक्षत्रमें वह स्वयंवर होगा, जिसके लिये आजसे पचहत्तर दिन शेष हैं। ब्राह्मणी (कुन्ती)! देवता, गन्धर्व, यक्ष और तपस्वी ऋषि भी स्वयंवर देखनेके लिये अवश्य जाते हैं। तुम्हारे सभी महात्मा पुत्र देखनेमें परम सुन्दर हैं। पंचालराजपुत्री कृष्णा इनमेंसे किसीको अपनी इच्छासे पति चुन सकती है अथवा तुम्हारे मँझले पुत्रको अपना पति बना सकती है। संसारमें विधाताके उत्तम विधानको कौन जान सकता है? अतः यदि मेरी बात तुम्हें अच्छी लगे, तो तुम अपने पुत्रोंके साथ पंचालदेशमें अवश्य जाओ। तपोधने ! पंचालदेशमें सदा सुभिक्ष रहता है। राजा यज्ञसेन सत्यप्रतिज्ञ होनेके साथ ही ब्राह्मणोंके भक्त हैं। वहाँके नागरिक भी ब्राह्मणोंके प्रति श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले हैं। उस नगरके ब्राह्मण भी अतिथियोंके बड़े प्रेमी हैं। वे प्रतिदिन बिना माँगे ही न्यौता देंगे। मैं भी अपने इन शिष्योंके साथ वहीं जाता हूँ। ब्राह्मणी! यदि ठीक जान पड़े तो चलो। हम सब लोग एक साथ ही वहाँ चले चलेंगे। वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा वचनं ब्राह्मणो विरराम ह ।) वैशम्पायनजी कहते हैं- इतना कहकर वे ब्राह्मण चुप हो गये। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसम्भवे षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें द्रौपदीप्रादुर्भावविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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