Vijay Dass
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3 days ago
#GodNightMonday #रोटीकपड़ा_चिकित्सा_शिक्षामकान . #अरदास - हे मेरे सतगुरू जी! सतगुरु की सिजदा करू, जिन कर्म छुड़ाये कोट। ऐसे सतगुरु की निंदा करें, उसके हम तोड़ेंगे होट।। सुखी होने के लिये मैंने कौनसा काम नहीं किया? विवाह किया, संतानें पैदा कीं, धन कमाया, यश-कीर्ति के लिये प्रयास किया, लोगों से प्रेम बढ़ाना चाहा और न मालूम क्या-क्या किया। परन्तु सच कहता हूँ मेरे मालिक ! ज्यों ज्यों सुख के लिये प्रयत्न किया, त्यों-ही-त्यों परिणाम में दुःख और कष्ट ही मिलते गये। जहाँ मन टिकाया वहीं धोखा खाया ! कहीं भी आशा फलवती नहीं हुई। चिन्ता, भय, निराशा और विषाद बढ़ते ही गये। कहीं रास्ता दिखायी नहीं दिया। मार्ग बंद हो गया। आपकी कृपा की हुई, आपकी कृपा से यह बात समझ में आने लगी कि आपके अभय चरणों के आश्रय को छोड़कर कहीं भी सच्चा और स्थायी सुख नहीं है। आपका चरणाश्रय प्राप्त करने के लिये कुछ खर्च भी नही किया गया। प्रयत्न भी नही किया। आपकी कृपा से मुझ नीच को सरलता से शरण मे ले लिया। जैसे घोबी मैले कुचले कपडो को उजवल करने के लिये लेता है।आपकी शरण मे आने के बाद मुझे सुख-शान्ति और वव्यभवता और सम्पनता मिली। परन्तु मेरे मालिक हे मेरे सतगुरू ! पूर्वाभ्यासवश बार बार यह मन विषयों की ओर चला जाता है। रोकने की चेष्टा भी करता हूँ, कभी-कभी रूकता भी है, परन्तु जाने की आदत छोड़ता नहीं ! आपके चरणों के सिवा इस दुनिया मे सर्वत्र भय-ही-भय छाया रहता है। दुःखों का सागर ही लहराता रहता है। यह जानते, समझते और देखते हुए भी मेरा मन विषय भोगो की तरफ बे लगाम घोडो की तरह दौडता है। इससे अधिक मेरे मन की नीचता और क्या होगी। हे दयामय मेरे मालिक! आप दयालु हो, मेरी ओर न देखकर अपनी कृपा से ही मेरे इस दुष्ट मन को अपनी ओर खींच लो। इसे ऐसा जकड़कर बाँध लो कि यह कभी दूसरी ओर जा ही न सके। श्वासो श्वास मे आपका दिया नाम रहे। तीन वक्त नितनियम, असुरनिकंदन रैमणी और संध्या आरती मे भी ध्यान रहे। मेरे सतगुरू ! ऐसा कब होगा ? कब मेरा यह मन आपके चरणों के दर्शनों में ही तल्लीन हो रहेगा। कब यह आपकी मनोहर सुरती आँखो मे बस जाये। हे मेरे मालिक मेरे सतगुरु आप अपने इस नीच दास कर कृपा करे। हे मेरे मालिक! सुना है कि दुर्वासा श्रृषी के क्रोध बहुत था। बात बात पर क्रोध आता था। मगर मेरे मालिक मै तो क्रोध अग्नि मे हरवक्त जलता रहता हू। इसे आप ही शातं कर सकते है मैने तो बार बार कोशिश की मगर क्रोधअग्नि बढती ही जाती है। इसके शातं करना मेरे वश की बात नही है। हे मेरे मालिक इस राक्षस पृवति को आप ही दास भाव देकर इंसान बना सकते है अब देर न करो बन्दिछोड! मेरी आखे केवल आपको निहारती रहे और चाहे कुछ भी दिखाई ना दे। मेरे सांसो मे आपके दिया मंत्र रहे व्यर्थ स्वास ना जाये। और आपके सतलोक का स्थाई निवासी बना लेना , चाहे वहा कुछ भी सेवा दे। मेरे मालिक हे बन्दीछोड जीवन-संध्या समीप है। इससे पहले-पहले ही आप अपनी दिव्य ज्योति से जीवन में नित्य प्रकाश फैला दो । इससे समुज्ज्वल बनाकर अपने सतलोक धाम में ले चलो और सदा के लिये वहीं रहने का स्थान देकर निहाल कर दो । AnnapurnaMuhim SantRampalJi #sant ram pal ji maharaj #me follow