पौराणिक आधार

sn vyas
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13 घंटे पहले
#पौराणिक कथा ' बालक ध्रुव ' राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव की है। अपमान और संकल्प: राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं—सुनीति (बड़ी) और सुरुचि (छोटी)। राजा सुरुचि को अधिक प्रेम करते थे। एक दिन जब 5 वर्षीय बालक ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठने की कोशिश कर रहे थे, तब सुरुचि ने उन्हें खींचकर उतार दिया और अपमानित करते हुए कहा कि यदि उन्हें पिता की गोद और सिंहासन चाहिए, तो उन्हें भगवान की तपस्या कर उनके (सुरुचि के) गर्भ से जन्म लेना होगा। कठोर तपस्या: अपनी माँ सुनीति से प्रेरित होकर, ध्रुव भगवान विष्णु की खोज में वन चले गए। नारद मुनि ने उन्हें "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र की दीक्षा दी। ध्रुव ने केवल छ महीनों तक अत्यंत कठोर तपस्या की, जिससे विचलित होकर भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। वरदान और ध्रुव तारा: जब विष्णु प्रकट हुए, तो ध्रुव इतने अभिभूत थे कि कुछ बोल नहीं पा रहे थे। भगवान ने अपने दिव्य शंख (पंचजन्य) से ध्रुव के गाल को छुआ, जिससे उन्हें दिव्य ज्ञान और वाणी प्राप्त हुई। ध्रुव की निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर, विष्णु ने उन्हें ब्रह्मांड में सर्वोच्च स्थान दिया, जिसे आज हम ध्रुव तारा के रूप में जानते हैं, जो अपनी जगह पर अडिग रहता है। ।। हरि ॐ नमो नारायणा ।। .
sn vyas
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1 दिन पहले
#पौराणिक कथा यक्ष और तिनके का रहस्य: एक बार देवताओं और असुरों के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ। वह युद्ध सदियों तक चला, लेकिन अंत में भगवान नारायण की गुप्त कृपा से देवताओं की जीत हुई और असुर हारकर पाताल लोक भाग गए। जब युद्ध समाप्त हुआ, तो स्वर्ग लोक में एक भव्य विजय उत्सव रखा गया। उस उत्सव में सभी देवता अपनी-अपनी तारीफों के पुल बांध रहे थे। अग्निदेव गर्व से कह रहे थे, "इस युद्ध में यदि मेरी लपटें असुरों को न जलातीं, तो हम कभी नहीं जीत सकते थे। मेरी शक्ति ही इस विजय का मूल कारण है। वायुदेव ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा, "अगर मैं अपनी आंधी से असुरों के रथों को न उखाड़ता, तो अग्नि भी क्या कर लेती? असली विजेता तो मैं हूँ। देवराज इंद्र अपने सिंहासन पर बैठकर मुस्कुराए, "तुम दोनों भूल रहे हो, मेरे वज्र के प्रहार के बिना शुम्भ-निशुम्भ और अन्य राक्षस कभी नहीं मरते। मैं देवताओं का राजा हूँ, इसलिए यह जीत केवल मेरे पराक्रम की है।इस प्रकार, सभी देवता यह भूल गए कि उन्हें यह शक्ति साक्षात परमब्रह्म (ईश्वर) से मिली थी। वे अपनी ही महिमा के गुणगान में चूर हो गए। देवताओं के इस गहरे अहंकार को दूर करने के लिए, साक्षात परमब्रह्म ने एक कौतुक (लीला) रचा। उत्सव के बीचों-बीच अचानक एक अत्यंत विशाल, रहस्यमयी और दिव्य 'यक्ष' प्रकट हुआ। वह यक्ष इतना ऊंचा था कि उसका सिर बादलों को छू रहा था और उसके शरीर से ऐसा तेज निकल रहा था जिसके सामने सूर्य की रोशनी भी फीकी पड़ गई। उसे देखकर सभी देवता सहम गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह अद्भुत जीव कौन है और कहाँ से आया है। इंद्र ने अग्निदेव से कहा, हे जातवेदा (अग्नि)! तुम देवताओं में सबसे आगे रहते हो। जाओ और पता लगाओ कि यह रहस्यमयी पुरुष कौन है और यहाँ क्यों आया है?अग्निदेव अपने पूरे तेज और धधकती लपटों के साथ उस यक्ष के सामने पहुंचे। उन्होंने गर्व से अपना सीना फुलाया। यक्ष ने शांत और गंभीर आवाज़ में पूछा, "तुम कौन हो हे राहगीर? और तुम्हारी शक्ति क्या है? अग्निदेव अट्टहास करते हुए बोले, "मुझे नहीं जानते? मैं साक्षात अग्निदेव हूँ। इस ब्रह्मांड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे मैं पल भर में जलाकर भस्म न कर सकूं। मेरी शक्ति असीम है। यक्ष मंद-मंद मुस्कुराया। उसने जमीन से एक छोटा सा, सूखा हुआ तिनका (घास का टुकड़ा) उठाया और अग्निदेव के सामने रख दिया। यक्ष ने कहा, "यदि तुम इतने ही शक्तिशाली हो, तो जरा इस छोटे से तिनके को जलाकर दिखाओ। अग्निदेव को लगा कि यह उनका अपमान है। उन्होंने खेल-खेल में उस तिनके पर अपनी थोड़ी सी आग फेंकी, पर तिनके को कुछ नहीं हुआ। अग्निदेव हैरान रह गए। उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगाई, उनके मुंह से भयंकर ज्वालामुखी जैसी लपटें निकलने लगीं, पूरा स्वर्ग तपने लगा, लेकिन वह छोटा सा तिनका वैसा का वैसा ही हरा-सूखा रहा, उस पर एक काली लकीर तक नहीं आई। अग्निदेव का सारा घमंड पानी-पानी हो गया। वे लज्जित होकर सिर झुकाए वापस इंद्र के पास लौट आए। "महाराज, मैं नहीं जान सका कि वह कौन है। मेरी आग उस तिनके को छू भी नहीं सकी। अब इंद्र ने वायुदेव को भेजा। "हे पवनदेव! आपकी गति को कोई नहीं रोक सकता। आप जाकर इसका रहस्य जानें। वायुदेव बड़े वेग से, कड़कती आंधी और बवंडर बनाते हुए यक्ष के सम्मुख पहुंचे। यक्ष ने फिर वही प्रश्न किया, "तुम्हारा क्या नाम है? और तुम क्या कर सकते हो? वायुदेव ने गर्व से कहा, "मैं वायुदेव हूँ। मैं चाहूं तो पर्वतों को उखाड़ फेंकूं, समुद्र को सुखा दूं और इस पूरे ब्रह्मांड को अपनी फूंक से उड़ा दूं। यक्ष ने फिर वही छोटा सा तिनका आगे बढ़ा दिया। "जरा इस तिनके को अपनी जगह से हिलाकर दिखाओ। वायुदेव हँसे और उन्होंने एक हल्की सी हवा चलाई, पर तिनका अपनी जगह से एक मिलीमीटर भी नहीं हिला। वायुदेव अचंभित हुए। उन्होंने प्रलयंकारी चक्रवात का रूप धारण किया, इतनी तेज हवा चलाई कि स्वर्ग के महल थरथराने लगे, लेकिन वह तिनका पत्थर की तरह अपनी जगह पर जमा रहा। वायुदेव की सांस फूल गई। वे अपनी हार स्वीकार करके वापस लौट आए। "देवराज, मेरी शक्ति वहां काम नहीं कर रही है। अब देवताओं के राजा इंद्र स्वयं आगे बढ़े। वे अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर पूरे वैभव के साथ उस यक्ष की ओर चले। जैसे ही इंद्र वहां पहुंचे, उनका अहंकार तोड़ने के लिए वह यक्ष अचानक अंतर्ध्यान (गायब) हो गया। जहाँ यक्ष खड़ा था, अब वहाँ केवल शून्य था। इंद्र को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने सोचा, "अग्नि और वायु के सामने तो वह यक्ष बात कर रहा था, पर मेरे आते ही वह गायब हो गया। इसका अर्थ है कि मैं सबसे बड़ा अभिमानी हूँ। इंद्र अहंकार छोड़कर वहीं ज़मीन पर बैठ गए और सच्चे मन से उस अदृश्य शक्ति की आराधना करने लगे। तभी उस आकाश में साक्षात माता उमा (भगवती पार्वती) प्रकट हुईं। वे ज्ञान की देवी हैं। इंद्र ने उनके सामने हाथ जोड़े, "हे माता! कृपा करके मुझे बताइए कि वह अद्भुत यक्ष कौन था, जिसने हमारी सारी शक्तियां छीन ली थीं? माता उमा ने मुस्कुराकर कहा: "हे इंद्र! वह कोई यक्ष नहीं था, वे साक्षात परमब्रह्म (ईश्वर) थे। तुम सब जो अपनी जीत पर घमंड कर रहे थे, वह शक्ति तुम्हारी नहीं थी। अग्नि केवल उतनी ही आग जला सकती है जितनी शक्ति ब्रह्म उसे देते हैं। वायु केवल उतना ही उड़ सकती है जितनी अनुमति उन्हें परमात्मा से मिलती है। वे तुम्हें यह सिखाने आए थे कि इस संसार में 'मैं' कुछ नहीं हूँ, जो कुछ भी है, वह केवल उस एक परमेश्वर की इच्छा है।" यह सुनते ही इंद्र का विवेक जाग उठा। उन्होंने अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। उसी दिन से इंद्र, अग्नि और वायु का घमंड हमेशा के लिए समाप्त हो गया और वे समझ गए कि देवताओं का वैभव भी वास्तव में ईश्वर की ही देन है। !! जय श्री कृष्णा!!
sn vyas
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2 दिन पहले
#पौराणिक कथा महाभारत से जुड़ी अनेक कहानियां आपने सुनी होगी लेकिन हम आपको एक ऐसी विचित्र कथा बताएँगे जिसमे भगवान कृष्ण ने स्त्री बनकर एक राजकुमार से विवाह किया. फिर कुछ ऐसा हुआ कि आज तक दक्षिण पूर्व क्षेत्र में किन्नर उस देवता से विवाह करके उनके नाम का मंगलसूत्र पहनते है. कथानुसार, अर्जुन को शर्त उल्लंघन की सजा में इंद्रप्रस्थ से बहार निष्कासित कर दिया गया. उसे एक वर्ष के लिए तीर्थयात्रा करनी पड़ी. उस दौरान अर्जुन ने उत्तर-पूर्व भारत का भ्रमण किया, जहां उनकी मुलाकात उलूपी नामक नागकन्या से हुई और उसके बाद अर्जुन ने उससे विवाह कर लिया. उलूपी ने एक बालक को जन्म दिया. उस बालक का नाम अरावन था.जिनको छोड़कर अर्जुन आगे यात्रा के लिए चला गया और अरावन अपनी माँ के साथ नागलोक में ही रहने लगा. जब अरावन युवावस्था में पहुंचा तो नागलोक छोड़ अपने पिता अर्जुन के पास चला आया. उस दौरान कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध हो रहा था अतः अर्जुन ने अरावन को भी युद्ध हेतु रणभूमि में भेज दिया. युद्ध के दौरान पांडवो द्वारा जीत के लिए काली माता के चरणो में बलि देने के लिए एक राजकुमार की आवश्यकता हुई. तो कोई राजकुमार बलि के लिए तैयार नहीं हुआ. तब अरावन ने स्वयं की नर बलि के लिए सामने आया परन्तु उसने एक शर्त रखी कि वह अविवाहित नहीं मरना चाहता. इसलिए उसको बलि से पहले विवाह करना है. उसकी इस शर्त को मान लिया गया परन्तु कोई राजा अपनी पुत्री का विवाह अरावन से नहीं करना चाहते थे, क्योकि विवाह के तुरंत बाद अरावन की नर बलि चढ़नी थी. ऐसे में कन्या विवाह के कुछ समय बाद ही विधवा हो जाती. इसलिए सारे राजा ने अरावन से अपनी कन्या का विवाह करना माना कर दिया. तब भगवान कृष्ण ने इस समस्या के समाधान के लिए स्वयं मोहिनी रूप धारण कर अरावन के साथ विवाह किया. उसके बाद अरावन ने स्वयं अपना सर काली माता को भेट चढ़ा दिया. अरावन की मौत के बाद भगवान कृष्ण मोहिनी रूप धारण किये हुए पत्नी रूप में अरावन के मौत पर रोते हुए विलाप करते रहे और फिर अरावन की अंतिम विदाई कर दी गई. अरावन की आखरी इच्छा पूर्ति के लिए भगवान कृष्ण ने यानि विष्णु ने मोहनी रूप धारण कर स्त्री बने और अरावन से विवाह किया था. तब से किन्नर अरावन की पूजा करते है. अरावन को इरावन के नाम से भी बुलाते है और उनको अपना देवता मानते हैं. दक्षिण-पूर्व भारत में अरावन के नाम की कई मंदिर बनवाये गए है, जिसमे अरावन का विवाह किन्नरों से किया जाता है और किन्नरों को मंगलसूत्र बंधकर अरावन की पत्नी बनाई जाती है. तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले के अंतर्गत कूवगम गांव में अरावन का सबसे पुराना और मुख्य मंदिर स्थापित है. इसलिए इस गाँव में तमिल नव वर्ष पर पहली पूर्णिमा में 18 दिनों तक उत्सव मनाया जाता है. इस दौरान भारत के हर कोने से देश-विदेश के किन्नर यहाँ इकठ्ठा होते हैं और शुरू 16 दिन तक नाच गान विवाह की तैयारी करते है. फिर 17वें दिन पंडित यहाँ एक विशेष पूजा कर अरावन के नाम का मंगलसूत्र किन्नरों को पहनाते है. जिसको यहाँ के लोग थाली कहते है. इन किन्नरों का विवाह अरावन की मूर्ति के साथ होता है और 18वें दिन अरावन की मूर्ति को पूरे कूवगम गांव में घूमाते है. प्रतिमा को घुमाने के बाद तोड़ देते है. और प्रतिमा तोड़ते ही दुल्हन बनी किन्नर के मंगलसूत्र भी तोड़ कर उसका श्रृंगार हटा दिया जाता है फिर सारे किन्नर सफ़ेद कपडे पहन कर पति मृत्यु पर विलाप कर बहुत रोते हैं और इसके साथ यह उत्सव खत्म हो जात है . यह उत्सव हर साल मनाया जाता है. अरावन किन्नरों के देवता है अतः दक्षिण भारत के किन्नरों को अरावनी नाम से भी पुकारते है.
sn vyas
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5 दिन पहले
#पौराणिक कथा रंभा - श्री शुकदेव मुनि का संवाद ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ रंभा नामक एक अतीव सुंदरी (अप्सरा) श्री शुकदेव जी के रूपलावणय को देख मुग्ध हो गयी और श्रीशुकदेव जी को लुभाने पहुंची। श्री शुकदेव जी सहज विरागी थे। बचपन में ही वह वन चले गए थे। उन्होंने ही राजा परीक्षित को भागवत पुराण सुनाया था। वे महर्षि वेदव्यास के अयोनिज पुत्र थे और बारह वर्षों तक माता के गर्भ में रहे। श्रीकृष्ण के यह आश्वासन देने पर कि उन पर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, उन्होंने जन्म लिया। उन्हें गर्भ में ही उन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का ज्ञान हो गया था। कम अवस्था में ही वह ब्रह्मलीन हो गए थे। रंभा ने उन्हें देखा, तो वह मुग्ध हो गई और उनसे प्रणय निवेदन किया। शुकदेव ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। रंभा उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में जुट गई। जब वह बहुत कोशिश कर चुकी, तो शुकदेव ने पूछा, देवी, आप मेरा ध्यान क्यों आकर्षित कर रही हैं। रंभा ने कहा, ताकि हम जीवन का छक कर भोग कर सकें। शुकदेव बोले, देवी, मैं तो उस सार्थक रस को पा चुका हूं, जिससे क्षण भर हटने से जीवन निरर्थक होने लगता है। मैं उस रस को छोड़कर जीवन को निरर्थक बनाना नहीं चाहता। कुछ और रस हो, तो भी मुझे क्या? रंभा ने अपने रंग-रूप और सौंदर्य की विशेषताएं बताईं। उसने कहा कि उसके शरीर से सौंदर्य की अजस्र धारा तो बहती ही रहती है, भीनी-भीनी सुवास की लहरियां भी फूटती रहती हैं। देवलोक में, जहां वह रहती है, कोई कभी वृद्ध नहीं होता। शुकदेव ने यह सुना तो बोले, देवी, आज हमें पहली बार यह पता लगा कि नारी शरीर इतना सुंदर होता है। यह आपकी कृपा से संभव हुआ। अब यदि भगवत प्रेरणा से पुनः जन्म लेना पड़ा, तो मैं नौ माह आप जैसी ही माता के गर्भ में रहकर इसका सुख लूंगा। अभी तो प्रभु कार्य ही प्रधान है। यहाँ हमें ध्यान देना है कि हम इसे श्रृंगार और अध्यात्म का संवाद कह सकते हैं।भोग और मोक्ष का संवाद कह सकते हैं। यहाँ हमें अपनी दृष्टि सांसारिक स्थूलता से हटा कर पारमार्थिक सूक्ष्मता की ओर बड़ी सावधानी से ले जानी चाहिए। यहाँ रंभा को भोग और श्री शुकदेव जी को मोक्ष का प्रतीक मानना चाहिए। रम्भा-शुक संवाद ~~~~~~~~~~~ रंभा रुपसुंदरी है और शुकदेवजी मुनि शिरोमणि ! रंभा यौवन और शृंगार का वर्णन करते नहीं थकती, तो शुकदेवजी ईश्वरानुसंधान का । दोनों के बीच हुआ संवाद अति सुंदर है। रंभा : - हे मुनि ! हर मार्ग में नयी मंजरी शोभायमान हैं, हर मंजरी पर कोयल सुमधुर टेहुक रही हैं । टेहका सुनकर मानिनी स्त्रीयों का गर्व दूर होता है, और गर्व नष्ट होते हि पाँच बाणों को धारण करनेवाले कामदेव मन को बेचेन बनाते हैं । श्री शुक : - हे रंभा ! हर मार्ग में साधुजनों का संग होता है, उन हर एक सत्संग में भगवान कृष्णचंद्र के गुणगान सुनने मिलते हैं । हर गुणगाण सुनते वक्त हमारी चित्तवृत्ति भगवान के ध्यान में लीन होती है, और हर वक्त सच्चिदानंद का आभास होता है । हर तीर्थ में पवित्र ब्राह्मणों का समुदाय विराजमान है । उस समुदाय में तत्त्व का विचार हुआ करता है । उन विचारों में तत्त्व का ज्ञान होता है, और उस ज्ञान में भगवान चंद्रशेखर शिवजी का भास होता है । रम्भा : - हे मुनिवर ! हर घर में घूमती फिरती सोने की लता जैसी ललनाओं के मुख पूर्णिमा के चंद्र जैसे सुंदर हैं । उन मुखचंद्रो में नयनरुप दो मछलीयाँ दिख रही है, और उन मीनरुप नयनों में कामदेव स्वतंत्र घूम रहा है । शुक : - हे रंभा ! हर स्थान में रत्न की वेदी दिख रही है, हर वेदी पर सिद्ध और गंधर्वों की सभा होती है । उन सभाओं में किन्नर गण किन्नरीयों के साथ गाना गा रहे हैं । हर गाने में भगवान रामचंद्र की कीर्ति गायी जा रही है। रम्भा : - हे मुनिवर ! सुंदर स्तनवाली, शरीर पर चंदन का लेप की हुई, चंचल आँखोंवाली सुंदर युवती का, प्रेम से जिस पुरुष ने आलिंगन किया नहीं, उसका जन्म व्यर्थ गया । शुक : - जिसके रुप का चिंतन नहीं हो सकता, जो निरंजन, विश्व का पालक है, जो ज्ञान से परिपूर्ण है, ऐसे चित्स्वरुप परब्रह्म का ध्यान जिसने स्वयं के हृदय में किया नहीं है, उसका जन्म व्यर्थ गया । रम्भा : - हे मुनि ! भोग की ईच्छा से व्याकुल, परिपूर्ण चंद्र जैसे मुखवाली, बिंबाधरा, कोमल कमल के नाल जैसी, गौर वर्णी कामिनी जिसने छाती से नहीं लगायी, उसका जीवन व्यर्थ गया । शुक : - हे रंभा ! चक्र और गदा जिसने हाथ में लिये हैं, ऐसे चार हाथवाले, पीतांबर पहेने हुए, कौस्तुभमणि की माला से विभूषित भगवान का ध्यान, जिसने जाग्रत अवस्था में किया नहीं, उसका जन्म व्यर्थ गया । रम्भा : - हे मुनिराज ! अनेक प्रकार के वस्त्र और आभूषणों से सज्ज, लवंग कर्पूर इत्यादि सुगंध से सुवासित शरीरवाली नवयुवती को, जिसने अपने दो हाथों से आलिंगन कीया नहीं, उसका जन्म व्यर्थ गया । शुक : - कमल जैसे नेत्रवाले, केयूर पर सवार, कुंडल से सुशोभित मुखवाले, संसार के स्वामी भगवान नारायण की स्तुति जिसने एकाग्रचित्त होकर, भक्तिपूर्वक की नहीं, उसका जीवन व्यर्थ गया । रम्भा : - हे मुनिवर ! प्रिय बोलनेवाली, चंपक और सुवर्ण के रंगवाली, हार का झुमका नाभि पर लटक रहा हो ऐसी, स्वभाव से रमणशील ऐसी स्त्री से जिसने भोग विलास नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया । शुक : - जिस प्राणी ने मनुष्य शरीर पाकर भी, भृगुलता से विभूषित ह्रदयवाले, धजा में गरुड वाले, और शाङ्ग नामके धनुष्य को धारण करनेवाले, परमात्मा की सेवा न की, उसका जन्म व्यर्थ गया । रंभा : - हे मुनिश्रेष्ठ ! चंचल कमरवाली, नूपुर से मधुर शब्द करनेवाली, नाक में मोती पहनी हुई, सुंदर नयनों से सुशोभित, सर्प के जैसा अंबोडा जिसने धारण किया है, ऐसी सुंदरी का जिसने सेवन नहीं किया, उसका जन्म व्यर्थ गया । शुक : - हे रंभा ! संसार का पालन करनेवाले, ज्ञान से परिपूर्ण, संसार स्वरुप, अनंत गुणों को प्रकट करनेवाले भगवान की आराधना जिसने नहीं की, और योग में उनका ध्यान जिसने नहीं किया, उसका जन्म व्यर्थ गया । रम्भा : - हे मुनि ! सुगंधी पान, उत्तम फूल, सुगंधी तेल, और अन्य पदार्थों से सुवासित कायावाली कामिनी के कुच का मर्दन, रात को जिसने नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया । शुक : - ब्रह्मादि देवों के भी देव, संपूर्ण संसार के स्वामी, मोक्षदाता, निर्गुण, अत्यंत शांत ऐसे भगबान का ध्यान जिसने योग द्वारा हृदय में नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया । रम्भा : - कस्तूरी और केसर से युक्त चंदन का लेप जिसने किया है, अगरु के गंध से सुवासित वस्त्र धारण की हुई तरुणी, रात को जिस पुरुष की छाती पर लेटी नहीं, उसका जन्म व्यर्थ गया । शुक : - हे रंभा ! आनंद से परिपूर्ण रुपवाले, दिव्य शरीर को धारण करनेवाले, जिनके अनेक नाम और रुप हैं ऐसे भगवान के दर्शन जिसने समाधि में नहीं किये, उसका जीवन व्यर्थ गया । रम्भा : - जिस पुरुष ने हेमंत ऋतु में, कठोर और भरे हुए स्तन के भार से झुकी हुई, पतली कमरवाली, चंचल और खंजर से नैनोंवाली स्त्री का संभोग नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया । शुक : - हे रंभा ! तपोमय, ज्ञानमय, जन्मरहित, विद्यामय, योगमय परमात्मा को, तपस्या में लीन होकर जिसने चित्त में धारण नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया। रम्भा : - हे मुनिवर ! सद्लक्षण और गुणों से युक्त, प्रसन्न मुखवाली, मधुर बोलनेवाली, मानिनी सुंदरी के नाभि का जिसने चुंबन नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया । शुक : - हे रंभा ! जिस इन्सान ने, नारी के सेवन से उत्पन्न सब सुख नाशवंत, और दुःखदायक है ऐसा जानने के बावजुद जिसने योगाभ्यास नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ गया । रम्भा : - जिस पुरुष ने वसंत ऋतु में लंबे बालवाली, सुंदर नेत्रों से सुशोभित कामदेव के समस्त भंडाररुप ऐसी कामिनी के साथ विहार न किया हो, उसका जीवन व्यर्थ गया शुक : - हे रंभा ! नारी माया की पटारी, नर्क की हंडी, तपस्या का विनाश करनेवाली, पुण्य का नाश करनेवाली, पुरुष की घातक है; इस लिए जिस पुरुष ने अधिक समय तक उसका सेवन किया है, उसका जीवन व्यर्थ गया रम्भा : - हे मुनि ! जिस पुरुष ने अपनी युवानी में, समस्त शृंगार और मनोविवाद करने में चतुर और अनेक लीलाओं में कुशल और कोकिलकंठी कामिनी के साथ विलास नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है । शुक : - समाधि का नाश करनेवाली, लोगों को मोहित करनेवाली, धर्म विनाशिनी, कपट की वीणा, सत्कर्मो का नाश करनेवाली नारी का जिसने सेवन किया, उसका जीवन व्यर्थ गया । रम्भा : - हे मुनिराज ! बिल्वफल जैसे कठिन स्तन है, अत्यंत कोमल जिसका शरीर है, जिसका स्वभाव प्रिय है, ऐसी सुवासित केशवाली, ललचानेवाली गौर युवती को जिसने आलिंगन नहीं दिया, उसका जीवन व्यर्थ हैं। शुक : - चिंता, पीडा, और अनेक प्रकार के दुःख से परिपूर्ण, दोष से भरी हुई, संसार में बंधनरुप, और संताप का खजाना, ऐसी नारी का जिसने सेवन किया उसका जन्म व्यर्थ गया । रम्भा : - हे मुनिवर ! आनंद और कामदेव के खजाने समान, खनकते कंगन और नूपुर पहेनी हुई कामिनी के होठ पर जिसने चुंबन किया नहीं, उस पुरुष का जीवन व्यर्थ है । शुक : - छल-कपट करनेवाली, लोगों को बनानेवाली, विष्टा-मूत्र और दुर्गंध की गुफारुप, दुराशाओं से परिपूर्ण, अनेक प्रकार से मल से भरी हुई, ऐसी स्त्री का सेवन जिसने किया, उसका जीवन व्यर्थ है । रम्भा : - हे मुनिवर ! चंद्र जैसे मुखवाली, सुंदर और गौर वर्णवाली, जिसकी छाती पर स्तन व्यक्त हुए हैं ऐसी, संभोग और विलास में चतुर, ऐसी स्त्री को बिस्तर में जिसने आलिंगन नहीं दिया, उसका जीवन व्यर्थ है । शुक : - हे रंभा ! पागल जैसा विचित्र वेष धारण की हुई, मदिरा पीकर मस्त बनी हुई, पाप देनेवाली, लोगों को बनानेवाली, और योगीयों के साथ कपट करनेवाली स्त्री का सेवन जिसने किया है, उसका जीवन व्यर्थ है । रम्भा : - हे मुनि ! आनंदरुप, नतांगी युवती, उत्तम धर्म के पालन में और पुत्रादि पैदा करने में सहायक, इंद्रियों को संतोष देनेवाली नारी जिस पुरुष के घर में न हो, उसका जीवन व्यर्थ है । शुक : - अशुद्ध शरीरवाली, पतित स्वभाववाली, प्रगल्भ देहवाली, साहस और लोभ करानेवाली, झूठ बोलनेवाली, ऐसी नारी का विश्वास जिसने किया, उसका जीवन व्यर्थ है । रंभा : - हे मुनिवर ! पतली कमरवाली, हंस की तरह चलनेवाली, प्रमत्त सुंदर, सौभाग्यवती , चंचल स्वभाववाली स्त्री को रतिक्रीडा के वक्त अनुकुलतया पीडित की नहीं है, उसका जीवन व्यर्थ है । शुक : - हे रंभा ! संसार की उत्तम भावनाओं को प्रकट करनेवाले प्रेम से रहित पुरुषों के चित्त को चोरनेवाली, ह्रदय में दया न रखनेवाली, ऐसी स्त्री का आलिंगन, योगाभ्यास छोडकर जिस पुरुष ने किया, उसका जीवन व्यर्थ है रम्भा : - हे मुनिवर ! सुंदर, सुगंधित पुष्पों से सुशोभित शय्या हो, मनोनुकूल सुंदर स्त्री हो, वसंत ऋतु हो, पूर्णिमा के चंद्र की चांदनी खीली हो, पर यदि पुरुष में परिपूर्ण पुरुषत्त्व न हो तो उसका जीवन व्यर्थ है । शुक : - हे रंभा ! सुंदर शरीर हो, युवा पत्नी हो, मेरु पर्वत समान धन हो, मन को लुभानेवाली मधुर वाणी हो, पर यदि भगवान शिवजी के चरणकमल में मन न लगे, तो जीवन व्यर्थ है । ।। जय श्री राम ।।
sn vyas
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11 दिन पहले
#पौराणिक कथा #महाभारत की कथा #महाभारत सञ्जय को किसने दिव्य-दृष्टि दी और क्यों ? हम सभी जानते हैं कि ' महाभारत ' ग्रंथ के भीष्म पर्व का महत्त्वपूर्ण अनुपर्व है - जम्बूखंड विनिर्माण पर्व। जम्बूखंड विनिर्माण अनुपर्व के अंतर्गत राजा जनमेजय को ऋषि वैशम्पायनजी कहते हैं - हे जनमेजय ! युद्ध के लिए उद्यत दोनों ओर की सेनाओं को देखकर वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ , सत्यवती के पुत्र , संग्राम में होनेवाले युद्ध को प्रत्यक्ष देखने वाले और भूत , भविष्य तथा वर्तमान के ज्ञाता भगवान व्यास मुनि एक दिन विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र के पास आये। और आकर धृतराष्ट्र से कहा - यदि चेच्छसि संग्रामे द्रष्टमेतान् विशाम्पते। चक्षुर्ददानि ते पुत्र युद्धं तत्र निशामय।। अर्थ - हे राजन ! यदि तुम इनको संग्राम में लड़ते हुए देखना चाहते हो , तो हे पुत्र ! मैं तुम्हें इनका युद्ध देखने के लिए नेत्र दूं ! तब तुम सुख से संग्राम को देखो। धृतराष्ट्र उवाच न रोचये ज्ञातिवधं द्रष्टुं ब्रह्मर्षिसत्तम। युद्धमेतत्त्वशेषेन श्रृणुयां तव तेजसा।। अर्थ - धृतराष्ट्र ने कहा - हे ब्रह्मर्षियों में श्रेष्ठ ! अपने सम्बन्धियों के वध के दृश्य को देखना मुझे अच्छा नहीं लगता। परंतु आपके तेज: प्रभाव से मैं युद्ध का सब समाचार सुनना चाहता हूं। वैशम्पायन जी बोले - धृतराष्ट्र की संग्राम देखने की अनिच्छा , लेकिन उसका हाल सुनने की इच्छा प्रकट करने पर वर प्रदान करने में समर्थ व्यास जी ने तब धृतराष्ट्र को वर न देकर संजय को ही वर दे दिया। संजय को वर देने के पश्चात् व्यासजी ने धृतराष्ट्र को कहा - एष ते संजयो राजन्युद्धमेतद्वादिष्यति। एतस्य सर्वसंग्रामे न परोक्षं भविष्यति।। चक्षुषा संजयो राजन्दिव्येनैव समन्वित:। कथयिष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति।। प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि। मनसा चिंतितमपि सर्व वेत्स्यति संजय:।। अर्थ - इस युद्ध का सारा वृत्तांत यह संजय तुमसे कहेंगे। युद्ध की कोई बात इनसे छिपी नहीं रहेगी। इनके दिव्य नेत्र हो जाएंगे , उसी से सब बातें जान सकेंगे और युद्ध के सब वृतांत तुमसे कहेंगे। प्रकट हो या गुप्त हो , दिन की हो या रात की हो , और जो कोई मन में भी विचार की हुई है , वह सब बात संजय जानेंगे। भगवत् गीता में संजय कहां से आ गए ? अब आप समझ गए होंगे। महाभारत ग्रंथ के श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं , ताकि किसी प्रकार की कोई शंका किसी के मन में न रहे। ।। योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण की जय ।।
sn vyas
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13 दिन पहले
#पौराणिक कथा कल्पना कीजिए एक ऐसे असुर की जिसके एक-दो नहीं बल्कि पूरे हजार हाथ थे। जिसकी शक्ति के सामने बड़े-बड़े देवता भी कांप उठते थे। जिसकी राजधानी के द्वार पर स्वयं भगवान शिव पहरा देते थे। और जिसकी पुत्री की एक प्रेम कहानी ने ऐसा तूफान खड़ा कर दिया कि भगवान श्री कृष्ण और महादेव को युद्धभूमि में आमने-सामने खड़ा होना पड़ा। यह कथा है महान असुरराज बाणासुर की, जो केवल अपनी शक्ति के लिए ही नहीं बल्कि अपनी भक्ति और अपने अहंकार दोनों के लिए प्रसिद्ध था। प्राचीन काल में असुरों के महान राजा महाबली का एक पराक्रमी पुत्र था—बाणासुर। वह भक्त प्रह्लाद के वंश का गौरव था। बचपन से ही उसका मन भगवान शिव की भक्ति में रमा रहता था। उसने वर्षों तक कठोर तपस्या की। बर्फीले पर्वतों में खड़े होकर, अग्नि के बीच बैठकर और भोजन त्यागकर उसने महादेव को प्रसन्न किया। अंततः उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए। बाणासुर ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि संसार की कोई शक्ति मेरे राज्य को पराजित न कर सके।" महादेव मुस्कुराए और बोले, "वत्स, मैं स्वयं तुम्हारे राज्य की रक्षा करूंगा। जब तक मेरी कृपा तुम्हारे ऊपर है, कोई तुम्हें पराजित नहीं कर पाएगा।" यह वरदान प्राप्त होते ही बाणासुर का प्रभाव चारों दिशाओं में फैल गया। उसके हजार हाथ थे। वह एक साथ हजार धनुष चला सकता था। उसकी गर्जना सुनकर पर्वत कांप उठते थे। उसकी सेना इतनी विशाल थी कि उसकी छाया से धरती अंधकारमय हो जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे शक्ति ने उसके भीतर अहंकार को जन्म दे दिया। अब उसे लगता था कि संसार में कोई भी योद्धा उसके बराबर नहीं है। एक दिन वह कैलाश पहुंचा और महादेव से बोला, "प्रभु, आपने मुझे इतनी शक्ति दी है, लेकिन अब मेरे हजार हाथ व्यर्थ लगते हैं। कोई ऐसा योद्धा ही नहीं जो मेरा सामना कर सके। मैं युद्ध चाहता हूं।" महादेव उसकी बात सुनकर मुस्कुराए, लेकिन उनके मुख पर एक गहरी गंभीरता भी थी। उन्होंने कहा, "बाण, धैर्य रखो। जिस दिन तुम्हारे महल की ध्वजा स्वयं गिर जाएगी, उसी दिन तुम्हारा योग्य प्रतिद्वंद्वी तुम्हारे सामने आएगा।" उधर बाणासुर की पुत्री उषा युवावस्था में प्रवेश कर चुकी थी। वह अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और तेजस्वी थी। एक रात उसने एक अद्भुत स्वप्न देखा। उसने एक दिव्य राजकुमार को देखा जिसका चेहरा चंद्रमा की तरह उज्ज्वल था। उसकी आंखों में वीरता और करुणा दोनों झलक रही थीं। स्वप्न में ही उषा का हृदय उस राजकुमार पर मोहित हो गया। जब उसकी नींद खुली तो वह बेचैन हो उठी। वह दिन-रात उसी चेहरे के बारे में सोचने लगी। उषा की सबसे प्रिय सखी चित्रलेखा केवल चित्रकार ही नहीं बल्कि महान योगिनी भी थी। उसने उषा की व्याकुलता देखकर पूछा, "राजकुमारी, कौन है वह जिसने तुम्हारा मन चुरा लिया?" उषा ने अपने स्वप्न की पूरी कथा सुनाई। तब चित्रलेखा ने अपनी कला और योग शक्ति का प्रयोग किया। उसने एक-एक करके देवताओं, राजाओं और वीरों के चित्र बनाए। जब उसने द्वारका के राजकुमारों के चित्र बनाए, तभी उषा अचानक चौंक उठी। उसने एक चित्र की ओर इशारा करते हुए कहा, "यही है! यही वही राजकुमार है जिसे मैंने स्वप्न में देखा था।" चित्रलेखा ने ध्यान लगाया और अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया कि वह युवक कोई और नहीं बल्कि भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध हैं, जो प्रद्युम्न के पुत्र थे। अपनी योग शक्ति से चित्रलेखा उसी रात द्वारका पहुंची। वहां उसने अनिरुद्ध को निद्रा में पाया और योगबल से उन्हें उठा कर सीधे शोणितपुर ले आई। जब अनिरुद्ध की आंखें खुलीं तो उन्होंने अपने सामने उषा को खड़ा पाया। प्रारंभिक आश्चर्य के बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। धीरे-धीरे वह बातचीत प्रेम में बदल गई। दोनों एक-दूसरे के बिना रह नहीं सकते थे। कई दिनों तक यह रहस्य महल की दीवारों के भीतर छिपा रहा। लेकिन एक दिन महल के सैनिकों को उषा के कक्ष में एक अज्ञात युवक दिखाई दिया। बात तुरंत बाणासुर तक पहुंची। जब उसने जाना कि वह युवक स्वयं श्री कृष्ण का पौत्र है, तो उसका क्रोध आकाश छूने लगा। उसने गर्जना करते हुए अनिरुद्ध को बंदी बना लिया और उन्हें नागपाश से बांधकर कारागार में डाल दिया। द्वारका में जब अनिरुद्ध अचानक लापता हुए तो पूरे यादव वंश में चिंता फैल गई। तभी देवर्षि नारद वहां पहुंचे और उन्होंने सारी घटना श्री कृष्ण को बता दी। यह सुनते ही भगवान श्री कृष्ण, बलराम और विशाल यादव सेना लेकर शोणितपुर की ओर चल पड़े। उधर बाणासुर ने भी युद्ध की तैयारी कर ली। उसकी सेना और यादव सेना के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। बलराम का हल और मुसल जहां चलता, वहां पूरी की पूरी सेना धराशायी हो जाती। यादव वीरों ने बाणासुर की सेना को चारों ओर से घेर लिया। देखते ही देखते शोणितपुर की धरती युद्ध की ज्वाला से भर उठी। जब बाणासुर को लगा कि उसकी सेना पराजित होने वाली है, तब उसे महादेव का वरदान याद आया। उसने पूरे मन से भगवान शिव का स्मरण किया। अपने भक्त की पुकार सुनकर महादेव स्वयं युद्धभूमि में प्रकट हो गए। उनके साथ कार्तिकेय, गण और भूत-प्रेतों की विशाल सेना भी थी। और तब वह दृश्य उपस्थित हुआ जिसे देखकर देवता भी स्तब्ध रह गए। एक ओर स्वयं भगवान श्री कृष्ण थे और दूसरी ओर महादेव। दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। पूरा ब्रह्मांड जैसे अपनी सांसें रोककर यह दृश्य देख रहा था। महादेव ने अपने अस्त्र छोड़े और श्री कृष्ण ने उनका प्रतिकार किया। आकाश अस्त्रों की चमक से भर गया। पृथ्वी कांपने लगी। समुद्र उफान मारने लगे। देवता भयभीत हो उठे कि यदि यह युद्ध बढ़ गया तो सृष्टि संकट में पड़ जाएगी। अंततः भगवान श्री कृष्ण ने नारायण अस्त्र का प्रयोग किया। उसकी दिव्य शक्ति के सामने युद्धभूमि कुछ क्षणों के लिए शांत हो गई। लेकिन श्री कृष्ण जानते थे कि उनका उद्देश्य महादेव को हराना नहीं बल्कि अपने पौत्र को मुक्त कराना और अहंकार का अंत करना है। इसके बाद श्री कृष्ण सीधे बाणासुर के सामने पहुंचे। बाणासुर अपने हजार हाथों से एक साथ आक्रमण करने लगा। तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। दिव्य चक्र बिजली की गति से घूमता हुआ बाणासुर की ओर बढ़ा और एक-एक करके उसके हाथ काटने लगा। देखते ही देखते उसके हजार हाथों में से केवल चार हाथ शेष रह गए। अब बाणासुर का सारा अहंकार समाप्त हो चुका था। वह समझ गया कि शक्ति का गर्व ही उसके पतन का कारण बना। उसी समय भगवान शिव आगे आए और उन्होंने श्री कृष्ण से कहा, "हे नारायण, यह मेरा भक्त है। इसे जीवनदान दीजिए।" भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराए और बोले, "महादेव, जो आपका भक्त है वह मेरा भी भक्त है। मैं इसे जीवनदान देता हूं।" यह सुनकर बाणासुर की आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। उसने श्री कृष्ण और महादेव दोनों के चरणों में प्रणाम किया। इसके बाद अनिरुद्ध को कारागार से मुक्त किया गया। पूरे विधि-विधान से उषा और अनिरुद्ध का विवाह संपन्न हुआ। शोणितपुर और द्वारका दोनों में उत्सव मनाया गया। देवताओं ने पुष्पवर्षा की और चारों दिशाएं मंगल ध्वनियों से गूंज उठीं। महादेव ने बाणासुर को आशीर्वाद दिया कि वह कैलाश का रक्षक बनकर सदैव उनकी सेवा करेगा। वहीं श्री कृष्ण ने उसे धर्म और विनम्रता का मार्ग अपनाने का उपदेश दिया। यह कथा केवल एक युद्ध की नहीं है। यह उस सनातन सत्य का प्रमाण है कि शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। एक भक्त की रक्षा के लिए दोनों अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं, लेकिन अंततः दोनों का उद्देश्य धर्म की स्थापना और भक्तों का कल्याण ही होता है। जो सच्चे मन से शिव की शरण में जाता है, उस पर श्री कृष्ण की भी कृपा होती है। और जो श्री कृष्ण को अपना मानता है, उसकी रक्षा के लिए महादेव भी सदैव तैयार रहते हैं। हर हर महादेव। जय श्री कृष्ण। 🙏🏻
sn vyas
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15 दिन पहले
#पौराणिक कथा अरे यह क्या हो गया? वैकुंठ के सिंहासन पर सन्नाटा पसरा हुआ है। जहां कभी शंख की मधुर ध्वनि गूंजती थी, वहां आज एक अजीब सी खामोशी है। माता लक्ष्मी बार-बार महल के द्वार तक जाती हैं, फिर लौट आती हैं। उनकी आंखों में चिंता है, हृदय में बेचैनी है। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि सृष्टि के पालनहार, देवताओं के स्वामी, स्वयं भगवान विष्णु अपने ही धाम में न हों? और सबसे बड़ा रहस्य तो यह है कि वह किसी युद्ध में नहीं गए, किसी दानव का वध करने नहीं गए, बल्कि एक असुर राजा के द्वार पर प्रहरी बनकर खड़े हैं। हां, वही भगवान विष्णु जिनके दर्शन के लिए देवता तरसते हैं, आज एक भक्त के वचन से बंधे हुए हैं। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि स्वयं भगवान को यह भूमिका निभानी पड़ी? यह कथा शुरू होती है एक ऐसे भक्त से, जिसकी भक्ति महान थी, लेकिन उसके भीतर अहंकार की एक छोटी सी चिंगारी भी छिपी हुई थी। वह भक्त था प्रह्लाद का पौत्र, असुर सम्राट बलि। बलि शक्तिशाली था, पराक्रमी था और दानवीर भी था। उसकी कीर्ति तीनों लोकों में फैली हुई थी। जो भी उसके द्वार पर आता, खाली हाथ नहीं लौटता था। धीरे-धीरे उसकी शक्ति इतनी बढ़ गई कि उसने स्वर्ग तक पर अधिकार कर लिया। देवता भयभीत हो गए। लेकिन बलि को अपनी शक्ति पर गर्व होने लगा। वह सोचने लगा कि अब उसे कोई नहीं रोक सकता। एक दिन उसने अपने गुरु शुक्राचार्य से कहा, "गुरुदेव, अब केवल एक अंतिम यज्ञ शेष है। उसके बाद तीनों लोकों पर मेरा अधिकार स्थायी हो जाएगा।" शुक्राचार्य ने चेतावनी दी, "राजन, शक्ति अच्छी है, लेकिन जब शक्ति के साथ अहंकार जुड़ जाता है तो विनाश का मार्ग खुल जाता है। मुझे आशंका है कि स्वयं भगवान तुम्हारी परीक्षा लेने आ सकते हैं।" लेकिन बलि मुस्कुरा दिया। उसे अपने दान और अपने वचन पर बहुत गर्व था। उसी समय भगवान विष्णु ने सोचा कि अब समय आ गया है। भक्त को दंड नहीं, बल्कि शिक्षा देने का समय। उन्होंने वामन नाम के एक छोटे ब्राह्मण बालक का रूप धारण किया। सिर पर जटा, हाथ में छाता और दूसरे हाथ में एक छोटा सा कमंडल। वह सीधे बलि के यज्ञ में पहुंचे। जैसे ही बलि ने उस तेजस्वी बालक को देखा, वह स्वयं उठकर उसके स्वागत के लिए आया। "ब्राह्मण कुमार, आज मेरे यज्ञ में आपका स्वागत है। मांगिए, क्या चाहिए? सोना, चांदी, भूमि, राज्य, जो चाहें मांग लीजिए।" वामन मुस्कुराए और बोले, "राजन, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस तीन पग भूमि दे दीजिए, जिसे मैं अपने छोटे-छोटे पैरों से नाप सकूं।" बलि हंस पड़ा। उसे लगा कि यह बालक बहुत भोला है। उसने कहा, "तीन पग भूमि? मैं तो तुम्हें पूरा राज्य दे सकता हूं।" लेकिन वामन ने शांत स्वर में कहा, "जिसे जितनी आवश्यकता हो, उसे उतना ही लेना चाहिए। मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए।" तभी शुक्राचार्य का चेहरा बदल गया। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से पहचान लिया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान विष्णु हैं। वे तुरंत बोले, "राजन, रुक जाओ। यह भगवान हैं। यह तुमसे सब कुछ ले लेंगे।" लेकिन बलि अपने वचन से पीछे हटने वाला नहीं था। उसने कहा, "यदि स्वयं भगवान मेरे द्वार पर याचक बनकर आए हैं, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा? मैं अपना वचन नहीं तोड़ूंगा।" अब संकल्प लेने का समय आया। जैसे ही बलि ने जल पात्र उठाया, शुक्राचार्य ने अपनी माया से सूक्ष्म रूप धारण किया और पात्र की नली में जाकर बैठ गए ताकि जल बाहर ही न निकल सके। बलि हैरान था कि जल क्यों नहीं निकल रहा। लेकिन वामन सब समझ चुके थे। उन्होंने पास पड़ी कुश घास का एक नुकीला तिनका उठाया और पात्र की नली में डाल दिया। तिनका सीधा शुक्राचार्य की आंख में जा लगा। वे पीड़ा से चिल्लाते हुए बाहर निकल आए और उनकी एक आंख हमेशा के लिए नष्ट हो गई। अब संकल्प पूरा हो गया। अगले ही क्षण वह छोटा सा ब्राह्मण विराट रूप धारण करने लगा। उसका शरीर आकाश से भी ऊंचा हो गया। वह अब वामन नहीं, त्रिविक्रम थे। पहला कदम उठा तो पूरी पृथ्वी नप गई। दूसरा कदम उठा तो स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक समा गए। फिर भगवान ने पूछा, "बलि, अब तीसरा कदम कहां रखूं?" उसी क्षण बलि का अहंकार टूट गया। वह समझ गया कि उसके सामने कौन खड़ा है। वह घुटनों के बल बैठ गया और बोला, "प्रभु, अब मेरे पास कुछ नहीं बचा। केवल मेरा सिर बचा है। तीसरा कदम मेरे मस्तक पर रख दीजिए।" भगवान मुस्कुराए और अपना तीसरा चरण बलि के सिर पर रख दिया। उसी क्षण बलि का अहंकार समाप्त हो गया और उसकी भक्ति पूर्ण हो गई। भगवान विष्णु उससे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, "बलि, तुमने अपना सब कुछ मुझे समर्पित कर दिया। मांगो, क्या चाहते हो?" बलि की आंखों में आंसू थे। उसने कहा, "प्रभु, मुझे राज्य नहीं चाहिए, स्वर्ग नहीं चाहिए। बस इतना वर दीजिए कि मैं प्रतिदिन आपके दर्शन कर सकूं।" भगवान कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, "तथास्तु। मैं स्वयं सुतल लोक में तुम्हारे साथ रहूंगा।" और यही वह क्षण था जिसने इतिहास बदल दिया। स्वयं भगवान विष्णु सुतल लोक में जाकर बलि के द्वारपाल बन गए। उधर वैकुंठ में माता लक्ष्मी व्याकुल थीं। समय बीतता गया, लेकिन भगवान वापस नहीं आए। तभी देवर्षि नारद ने उन्हें उपाय बताया। उन्होंने कहा, "माते, भगवान को शक्ति से नहीं, प्रेम से वापस लाया जा सकता है। आपको बलि के पास देवी बनकर नहीं, बहन बनकर जाना होगा।" माता लक्ष्मी ने साधारण स्त्री का रूप धारण किया और सुतल लोक पहुंच गईं। उस दिन रक्षाबंधन का पवित्र पर्व था। उन्होंने बलि की कलाई पर राखी बांधी। बलि भावुक हो उठा। उसने कहा, "बहन, आज से मैं तुम्हारा भाई हूं। मांगो, क्या चाहती हो?" माता लक्ष्मी की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा, "भैया, मुझे मेरा पति वापस चाहिए।" यह सुनते ही बलि सब समझ गया। उसने भगवान की ओर देखा और फिर मुस्कुराया। उसके चेहरे पर त्याग और प्रेम दोनों थे। उसने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, एक भक्त आपको अपने पास रखना चाहता है, लेकिन एक भाई अपनी बहन को दुखी नहीं देख सकता। आप वैकुंठ लौट जाइए।" भगवान विष्णु ने प्रेम से बलि को गले लगा लिया। उस दिन उन्होंने कहा, "बलि, तुमने साबित कर दिया कि सच्ची भक्ति केवल पाने में नहीं, त्याग करने में भी होती है।" कहते हैं कि उसी दिन से रक्षाबंधन केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और वचन का प्रतीक बन गया। और यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान को शक्ति से नहीं जीता जा सकता, लेकिन सच्चे प्रेम और समर्पण से स्वयं भगवान भी बंध जाते हैं। क्योंकि जब भक्ति निष्काम हो जाती है, तब भगवान केवल पूजे नहीं जाते, बल्कि अपने भक्त के लिए द्वारपाल भी बन जाते हैं। जय श्रीहरि। 🙏✨
sn vyas
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20 दिन पहले
#पौराणिक कथा 🦅 एक पंख पर पूरी सृष्टि का भार: जानिए उस महाबली की कथा जिसने अकेले ही 33 कोटि देवताओं को हरा दिया था! ✨ भारतीय पौराणिक कथाओं में एक ऐसा नाम दर्ज है, जो अदम्य साहस, शक्ति और मातृ-भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक है— 'खगेश' गरुड़। महर्षि कश्यप और विनता के पुत्र तथा भगवान विष्णु के प्रिय वाहन गरुड़ की गाथा केवल एक कहानी नहीं, बल्कि संकल्प और पराक्रम का एक अद्भुत महाकाव्य है। जानिए उनके जीवन के कुछ सबसे अनसुने रहस्य! 👇 ⛓️ माता को दासता से बचाने की वह कठोर प्रतिज्ञा यह कहानी शुरू होती है कुद्रू (नागों की माता) और विनता (गरुड़ की माता) के बीच लगी एक शर्त से, जिसमें हारने पर विनता को दासी बनना पड़ा। अपनी माता को इस दासत्व से मुक्त कराने के लिए गरुड़ ने नागों के सामने नतमस्तक होने के बजाय एक बेहद कठिन मार्ग चुना— स्वर्ग से 'अमृत' लाना। ⚡ जब स्वर्ग में मचा हाहाकार: अकेले ही हराए 33 कोटि देवता! अमृत की खोज में जब गरुड़ ने उड़ान भरी, तो उनकी गति और पराक्रम से तीनों लोक थरथरा उठे। जब स्वयं देवराज इंद्र ने उन्हें रोकना चाहा, तो गरुड़ का रौद्र रूप देखकर देवता भी कांप गए। उन्होंने अकेले ही 33 कोटि देवताओं को परास्त कर दिया! जब इंद्र ने उनके बल का प्रमाण मांगा, तो गरुड़ का अदम्य उत्तर था— "देवराज! मैं इस पूरी पृथ्वी, समुद्रों और पर्वतों के साथ आप सभी देवताओं को भी अपने एक पंख पर उठाकर बिना किसी परिश्रम के उड़ सकता हूँ।" 🐍 नागों की जीभ बीच से क्यों फटी होती है? अमृत को कुशा (एक विशेष घास) पर रखकर गरुड़ ने नागों को सौंप दिया और अपनी माता को मुक्त करा लिया। जब नाग स्नान करने गए, तो इंद्र वह अमृत कलश उठाकर वापस ले गए। नागों ने लालच में उस खाली कुशा को ही चाट लिया, जिससे घास की तेज धार से उनकी जीभ कटकर दो हिस्सों में बंट गई। तभी से नागों को 'द्विजीभी' कहा जाता है। 🪷 बिना अमृत पिए बने अजर-अमर गरुड़ की इस निस्वार्थ मातृ-भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें बिना अमृत पिए ही अजर-अमर होने का वरदान दिया और अपना प्रधान सेवक व वाहन बना लिया। 🔹 रामायण काल: उन्होंने ही नागपाश में बंधे श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया था। 🔹 महाभारत काल: श्रीकृष्ण और सत्यभामा के साथ मिलकर नरकासुर का वध किया था। ✨ इस महाकाव्य का गूढ़ संदेश: गरुड़ जी केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि उस 'संकल्प शक्ति' का नाम हैं जिसके सामने देवराज इंद्र भी नतमस्तक हो गए थे। उनका जीवन हमें सिखाता है कि यदि उद्देश्य नेक हो और साहस अटूट हो, तो असंभव को भी संभव किया जा सकता है। गरुड़ महापुराण में इन्हीं की शिक्षाओं का सार है! 🙏 "जय श्री हरि" 🙏 "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" 🙏