पौराणिक कथा

sn vyas
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2 days ago
#पौराणिक कथा देवर्षि नारद को घुमक्कड़ ऋषि भी कहा जाता है क्यूँकि वे सदैव संसार का हाल जानने के लिए इधर-उधर घूमते रहते हैं। एक बार देवर्षि भगवान ब्रह्मा के दर्शनों को ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ उन्होंने प्रभु को नमस्कार किया और उनसे कहा - "पिताश्री! पृथ्वी पर लोग बड़े सरल है। मैं अनेकानेक स्थानों पर जाता रहता हूँ किन्तु मुझे कभी कोई जटिल समस्या नहीं दिखी। आपने वास्तव में बड़े सरल सृष्टि की रचना की है। किन्तु मुझे ये बात समझ में नहीं आती कि फिर भगवान विष्णु क्यों कहते हैं कि सृष्टि का पालन करना अत्यंत कठिन है? वे तो सर्वज्ञ हैं फिर जिस बात की जानकारी मुझे है वो उन्हें कैसे नहीं पता?" देवर्षि की बात सुनकर ब्रह्मदेव मुस्कुराये और उन्होंने उन्हें एक बार फिर पृथ्वी पर जाने की आज्ञा दी। देवर्षि को कुछ समझ में नहीं आया पर पिता की आज्ञा पाकर वे पृथ्वी पर पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही परमपिता ब्रह्मा की माया से उनकी भेंट एक अत्यंत दरिद्र व्यक्ति से हुई। जैसे ही उस व्यक्ति ने देवर्षि को देखा उसने तुरंत उन्हें पहचान लिया और दौड़ कर उनके पास आया। उसने रोते-रोते देवर्षि से अपना दुखड़ा रोया और कहा कि "हे देवर्षि! आपको तो सुख साधनों की कमी नहीं है लेकिन मेरे बारे में भी तो सोचिये। मुझे दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती और आप ऊपर देवताओं के साथ छप्पन भोग का मजा उठाते हैं। कृपा इस बार जब आप श्रीहरि से मिलें तो कह दें कि उनकी सृष्टि में कोई सुखी नहीं है। उनसे कहकर कृपया मेरे गुजारे का प्रबंध कर दें।" अपने आराध्य भगवान विष्णु के बारे में ऐसा सुनकर देवर्षि को बहुत बुरा लगा किन्तु उन्होंने कुछ कहा नहीं और आगे बढे। आगे एक अत्यंत धनी व्यक्ति उन्हें मिला। उसने भी देवर्षि को पहचाना और पास आकर कहा - "मुझे भगवान ने किस जंजाल में फसा दिया है? इतना धन देने की क्या आवश्यकता थी? मैं तो परेशान हो गया। आप स्वयं तो संयासी बन फिरते हैं और मुझे इस चक्कर में फसा दिया। इस बार परमपिता ब्रह्मा से भेंट हो तो उनसे कहें कि किस प्रकार की सृष्टि रची है? धन को बनाने की आवश्यकता ही क्या थी? उनसे कहें कि मुझे इस मुसीबत से निकालें।" नारदजी बड़े आश्चर्य में पड़ गए और आगे बढे। आगे उनकी मुलाकात साधुओं के एक झुण्ड से हुई। उन्हें देखते ही साधुओं ने उन्हें घेर लिया और कहा - "आप तो स्वर्ग में अकेले मौज करते हैं और हम यहाँ दर-दर भटक रहे हैं। भोलेनाथ भी अजीब हैं। उन्हें लगता है कि सब उन्ही की तरह बिना सुख-साधन के रह सकते हैं। अगले बार जब महादेव से मिलें तो उनसे कहें कि उनके भक्त बड़े दुखी हैं और आप जैसे ठाठ-बाठ की इच्छा रखते हैं।" घबराये नारदजी ने जैसे-तैसे उनसे पीछा छुड़ाया और सीधे ब्रह्मलोक भागे। अब पृथ्वी पर कुछ और देखने की उनकी इच्छा ना रही। ब्रह्मलोक पहुँचकर उन्होंने परमपिता को सारी घटनाएं बताई। उन्होंने कहा - "हे पिताश्री! पृथ्वी का हाल तो बहुत बुरा है। एक व्यक्ति जिस चीज के आभाव में दुखी है, दूसरा उसी चीज की अधिकता से। और तो और सब लोग अपनी-अपनी समस्या के लिए आपको, नारायण एवं महादेव को दोष दे रहे हैं।" तब ब्रह्मदेव ने हँसते हुए कहा - "पुत्र! यही कर्म का विधान है। मैं कर्म के अनुसार ही किसी को कुछ दे सकने के लिए विवश हूँ। जिसकी कर्मठता ही समाप्त हो चुकी हो उसे मैं धनी कैसे बनाऊं? अगली बार जब उस निर्धन से मिलना तो कहना कि परिश्रम करे और दरिद्रता से लड़े। उसकी दरिद्रता समाप्त हो जाएगी। उस धनी व्यक्ति से कहना कि धन संचय के लिए नहीं है। उसकी आवश्यकता के बाद जो कुछ भी बचता है उससे निर्धनों की सहायता करे जिससे उसे वास्तविक सुख प्राप्त होगा। और उन दुष्ट साधुओं से कहना कि साधुओं का ऊपरी दिखावा कर महादेव को दोष देने का कोई अर्थ नहीं। महादेव के जीवन से शिक्षा लें। उनके लिए क्या असंभव है किन्तु वे फिर भी याचक के रूप में रहते है। उसी प्रकार अगर बनना है तो वे वास्तविक संन्यासी बनें अन्यथा उन्हें नर्क के निकृष्टतम स्थान पर अनंतकाल तक रहना होगा। और अंत में ये शिक्षा तुम्हारे लिए है कि संसार में इतना कुछ है जिसे जानना किसी के लिए भी संभव नहीं है। अतः बिना पूर्ण जानकारी के किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहिए। अब तुम्हे ज्ञात हो गया होगा कि नारायण किस प्रकार सृष्टि का पालन करते हैं।" ब्रह्मदेव से इस ज्ञान को पाकर देवर्षि का भ्रम दूर हो गया। उन्होंने परमपिता का धन्यवाद किया और उनके सन्देश को सुनाने वापस पृथ्वी पर चले।
sn vyas
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2 days ago
#पौराणिक कथा क्या आप जानते हैं कि एक चींटी 72 बार स्वर्ग की राजा (इंद्र) बन चुकी है? पुराणों की यह अद्भुत कथा बड़े से बड़े अहंकार को पल भर में चकनाचूर कर देती है। बात उस समय की है जब देवराज इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया था। तीनों लोकों में उनकी जय-जयकार हो रही थी। इस जीत के अहंकार में इंद्र ने विश्वकर्मा जी को बुलाकर कहा, "मेरे लिए एक ऐसा भव्य महल बनाओ, जैसा आज तक किसी ने न बनवाया हो!" महल बन गया—सोने के कंगूरे, हीरों के झरोखे। लेकिन इंद्र का मन नहीं भरा, वे बार-बार उसे और बड़ा करने का आदेश देते रहे। थक हारकर विश्वकर्मा जी भगवान विष्णु की शरण में गए। विष्णु जी मुस्कुराए और बोले— "अहंकार का इलाज हथौड़े से नहीं, आईने से होता है।" अगले दिन इंद्र के दरबार में एक 10 वर्षीय बालक (स्वयं भगवान विष्णु) नंगे पाँव पहुँचा। जब इंद्र ने पूछा कि तुम कौन हो, तो बालक ने उत्तर दिया: "मैं वही हूँ जो तब आता है, जब कोई राजा स्वयं को भगवान समझने लगता है।" इंद्र को क्रोध आया, पर तभी बालक ने फर्श पर चलती काली-भूरी चींटियों की एक लंबी कतार की ओर इशारा करते हुए पूछा, "क्या तुम गिन सकते हो कि इनमें से कितनी चींटियाँ पहले इंद्र बन चुकी हैं?" उसी समय रोम-रोम वाले लोमश ऋषि सभा में पधारे। उन्होंने एक चींटी को उंगली पर उठाया और इंद्र से कहा: "इसे देखो। यह आज एक चींटी है, पर यह 72 बार स्वर्ग के सिंहासन पर बैठकर 'इंद्र' रह चुकी है!" इंद्र हैरान रह गए। तब विष्णु जी ने उन्हें ब्रह्मांड के समय का चक्र समझाया— ब्रह्मा जी के एक दिन में 14 इंद्र बदल जाते हैं। लोमश ऋषि ने अपनी छाती दिखाते हुए कहा, "मेरा एक बाल एक इंद्र के कार्यकाल (आयु) पूरा होने पर झड़ता है। सोचो, मैं ऐसे कितने इंद्र देख चुका हूँ।" उस चींटी की कहानी और भी हैरान करने वाली थी। पहले कल्प में वह 'सत्यव्रत' नाम का एक राजा था। उसने तप किया और इंद्र का पद पाया। लेकिन सत्ता मिलते ही उसे अमर होने का भ्रम हो गया। उसने यज्ञ बंद करा दिए और ऋषियों का अपमान किया। पुण्य खत्म होते ही वह पद से गिरा। पहले हाथी, फिर शेर, कुत्ता और अंततः अपने घमंड के कारण चींटी बना! फिर कुछ बचे हुए पुण्यों के कारण वह वापस उठा और फिर इंद्र बना। गिरो, 84 लाख योनियों में भटको, फिर पुण्य से उठो... यही संसार का चक्र है। यह सुनकर इंद्र का घमंड टूट गया। चींटियों की वह कतार अब उन्हें अपना 'अतीत' नजर आने लगी। उन्होंने तुरंत विश्वकर्मा जी को बुलाया और कहा: "यह महल तोड़ दो। यह मेरा नहीं है, मैं यहाँ केवल एक किरायेदार हूँ... और किरायेदार घर पर अपना नाम नहीं लिखवाते।" बालक रूपी भगवान विष्णु ने अपना चतुर्भुज रूप दिखाते हुए इंद्र को अंतिम उपदेश दिया: "जब तक तुम 'मैं इंद्र हूँ' कहोगे, तब तक गिरोगे। जिस दिन तुम 'मैं दास हूँ' कहोगे, उसी दिन उठोगे।" सत्ता और पद अस्थायी हैं मित्र कोई भी पद (चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो) हमेशा के लिए नहीं होता। अहंकार पतन का कारण है। इंसान अपने पुण्यों और मेहनत से ऊपर उठता है, लेकिन उसका अहंकार उसे वापस ज़मीन पर (या उससे भी नीचे) गिरा देता है। महानता सेवा में है: पद मिलने से आत्मा बड़ी नहीं होती, आत्मा बड़ी होती है सेवाभाव से। जब भी लगे कि आप सबसे ऊपर हैं, ज़मीन पर चलती चींटियों को देख लें। और जब खुद को छोटा समझें, तब भी उन्हें देखें— कर्म और सेवा से एक चींटी भी इंद्र बन सकती है!
sn vyas
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2 days ago
#पौराणिक कथा ये तो हम सभी जानते हैं कि ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारद श्रीहरि के सबसे बड़े भक्तों में से एक हैं। किन्तु श्री रामचरितमानस के बालकाण्ड में हमें एक ऐसा प्रसंग मिलता है जब देवर्षि नारद ने श्रीहरि को श्राप दे दिया। मानस में ये कथा भगवान शंकर ने माता पार्वती को सुनाई थी और तब माता ने बड़े आश्चर्य से पूछा कि नारायण के सबसे बड़े भक्त नारद जी ने अपने ही स्वामी को किस प्रकार श्राप दे दिया। तब महादेव ने कहा कि हिमालय में एक बड़ी पवित्र और मनोहर गुफा थी जिसके समीप ही गंगा का प्रवाह होता था। एक बार नारद जी वहां आये तो ऐसी मनोहारी छटा देख कर वे वही ठहर गए और भगवान की भक्ति करने लगे। इतने अद्भुत और पवित्र स्थान पर भक्ति करते करते नारद जी की गति रुक गयी और वे समाधि में लीन हो गए। प्राचीन काल में जब नारद जी ने प्रजापति दक्ष के पुत्रों को संन्यास के लिए प्रेरित कर दिया था तो दक्ष ने उन्हें कहीं भी एक स्थान पर ना रुकने का श्राप दिया था। तब से नारद जी कही पर भी अधिक समय के लिए नहीं रुकते थे। किन्तु उस स्थान पर समाधि में चले जाने के कारण प्रजापति दक्ष के श्राप के भंग हो जाने का संकट उत्पन्न हो गया। इससे देवराज इंद्र भी चिंतित हो गए। देवराज ने फिर कामदेव को बुलाया और उनसे कहा कि वे जाएँ और किसी भी प्रकार देवर्षि की समाधि भंग करें। देवर्षि की समाधि भंग करने के पीछे इंद्रदेव का एक उद्देश्य ये भी था कि उन्हें शंका थी कि कदाचित देवर्षि अपने तपोबल से अमरावती के स्वामी ना बन बैठे। इंद्रदेव की इच्छा पर कामदेव उस स्थान पर पहुंचे और उन्होंने देवर्षि को समाधि से उठाने का उपक्रम आरम्भ किया। कामदेव के प्रभाव से वहां वसंत ऋतु छा गयी, सर्वोत्तम अप्सराएं गीत और संगीत पर नृत्य करने लगी, कोयल, मयूर इत्यादि अपनी गुंजों से उस स्थान को और कामुक बनाने लगे। किन्तु कामदेव के हर प्रयास के बाद भी श्रीहरि की भक्ति में रमे देवर्षि की समाधि भंग ना हुई। अब तो कामदेव बड़े चिंतित हुए, यदि वे इंद्रदेव के कार्य को किये बिना वहां से जाते तो उनके कोप का भाजन बनना पड़ता। कोई और उपाय ना देख कर कामदेव ने स्वयं देवर्षि के चरण पकड़ लिए। तब देवर्षि की तन्द्रा टूटी और उन्होंने कामदेव को अपने समक्ष देखा और सारी बातें समझ गए। किन्तु उन्होंने कामदेव पर कोई क्रोध नहीं किया और उन्हें सम्मान सहित वहां से विदा किया। जब इंद्रदेव ने देवर्षि की ऐसी भक्ति के बारे में सुना तो उन्होंने और अन्य देवताओं ने नारद जी की बड़ी प्रशंसा की। उधर इस बात से नारद जी के मन में अहंकार का जन्म हो गया। उन्हें लगा कि महादेव की भांति उन्होंने भी काम को जीत लिया है। तब वे महादेव के दर्शनों को कैलाश पहुंचे और उन्हें स्वयं द्वारा काम को जीत लेने का समाचार सुनाया। प्रभु समझ गए कि नारद अहंकार के वश में हैं फिर भी उन्होंने देवर्षि की बड़ी प्रशंसा की और उनसे कहा - "हे देवर्षि! नःसंदेह ही आपने काम पर विजय प्राप्त कर लिया है किन्तु जिस प्रकार आपने ये बात मुझे बताई है उस प्रकार भूल कर भी नारायण को मत बताइयेगा।" जिस प्रकार रोगी को औषधि अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार देवर्षि नारद को भी महादेव का ये सुझाव अच्छा नहीं लगा और वे कैलाश से सीधे क्षीरसागर पहुंचे। वहां पर श्रीहरि और माता लक्ष्मी ने उनका बड़ा स्वागत किया और तब देवर्षि ने उन्हें भी बड़े गर्व से स्वयं के काम को जीत लेने के विषय में बताया। नारायण समझ गए कि देवर्षि नारद को अहंकार हो गया है और अपने भक्त को उससे निकालने के लिए उन्होंने एक लीला रची। जिस मार्ग से देवर्षि वापस लौट रहे थे उसी मार्ग पर श्रीहरि ने १०० योजन में फैले एक ऐसे भव्य नगर का निर्माण किया जिसे देख कर इन्द्रलोक भी फीका पड़ जाये। उस नगर का राजा उन्होंने शीलनिधि नामक एक मनुष्य को बनाया। शीलनिधि की एक कन्या थी जिसका नाम विश्वमोहिनी था। उसका सौंदर्य स्वयं नारायण के मोहिनी स्वरुप जैसा था। राजा शीलनिधि ने अपनी कन्या का स्वयंवर आयोजित करवाया जिसमें देश-विदेश के राजा और राजकुमार आये हुए थे। हरि इच्छा से देवर्षि उसी नगर में आ पहुंचे। राजा शीलनिधि ने उनका बड़ा स्वागत किया और अपनी पुत्री विश्वमोहिनी को बुलाकर उसके भविष्य के विषय में बताने को कहा। जब देवर्षि ने उस अद्वितीय कन्या को देखा तो अपना तप, शील, संयम, वैराग्य सब भूल बैठे। वे किसी भी परिस्थिति में उसे पाने के विषय में सोचने लगे किन्तु लज्जावश उन्होंने राजा से कुछ कहा नहीं। उस समय उस कन्या की प्रसंशा कर देवर्षि वहां से चले गए। अब वे मार्ग में भी उसी कन्या के बारे में सोचने लगे। शीघ्र ही उसका स्वयंवर होने वाला था किन्तु किस उपाय से विश्वमोहिनी उनके गले में वरमाला डाल दे, नारद वही सोच रहे थे। उन्होंने सहायता हेतु श्रीहरि के पास जाने की सोची किन्तु नारायण वही प्रकट हो गए। अब तो नारद जी ने प्रसन्नता से उनसे प्रार्थना की कि "हे प्रभु! आप थोड़े समय के लिए अपना रूप मुझे दे दीजिये ताकि विश्वमोहिनी स्वयंवर में मेरा हो वरण करे।" तब श्रीहरि ने हँसते हुए कहा कि "देवर्षि! आप तो कामजयी हैं, फिर काम के वश में कैसे आ गए?" इससे देवर्षि को लज्जा तो बड़ी आयी किन्तु वासना वश उन्होंने फिर उनसे प्रार्थना की कि वे अपना रूप उन्हें दे दें। तब श्रीहरि ने उन्हें कहा कि ठीक है, तुम्हे "हरी मुख" प्राप्त हो। इसके बाद वे अंतर्धान हो गए। विश्वमोहिनी को पाने की उत्कंठा में देवर्षि नारायण की बातों का सही अर्थ समझे बिना ही स्वयंवर में पहुँच गए। अब वो निश्चिन्त थे कि राजकुमारी उनका वरण ही करेगी। उस स्वयंवर में महादेव के दो गण भी ब्राह्मण के वेश में आये थे। उन्होंने देवर्षि को पहचान लिया उनका मुख श्रीहरि के वरदान के कारण हरी रुपी, अर्थात वानर के रूप का हो चुका था। देवर्षि इस बार को नहीं जानते थे। परिहास करने के लिए दोनों देवर्षि के पास आये और उनसे कहा कि "अहा! आपके हरी मुख को देख कर तो राजकुमारी निश्चय ही आपका ही चयन करेगी।" ये कहकर दोनों हसने लगे। इससे देवर्षि और प्रसन्न और निश्चिंत हो गए। उधर जब विश्वमोहिनी देवर्षि के पास पहुंची तो उनका वानर मुख देख कर घृणा से अपना मुख फेर लिया। तभी नारायण भी एक राजा के रूप में आये और राजकुमारी ने उनका वरण कर लिया और दोनों विवाह के पश्चात वहां से चले गए। इससे नारद जी को घोर दुःख निराशा हुई। तब उन दोनों शिवगणों से नारद जी से कहा "प्रभु! जरा जाकर दर्पण में अपना मुख तो देखिये।" तब देवर्षि नारद ने जल में अपना मुख देखा तो आश्चर्यचकित हो गए। क्रोध के मारे उन्होंने दोनों शिवगणों को श्राप दे दिया कि वे राक्षस हो जाएँ। तभी नारायण की कृपा से उन्हें अपना पुराना रूप प्राप्त हो गया किन्तु फिर भी श्रीहरि के प्रति उनका क्रोध कम नहीं हुआ। वे अत्यंत क्रोध में वैकुण्ठ की ओर चले कि या तो मैं श्रीहरि को श्राप दूंगा अथवा अपने प्राण दे दूंगा। भला नारायण अपने भक्त के प्राण कैसे जाने देते। वे मार्ग में ही विश्वमोहिनी के साथ प्रकट हो गए। तब नारद जी ने बड़े क्रोध में कहा - "हे छलिया! आप दूसरे की प्रसन्नता नहीं देख सकते। समुद्र मंथन के समय आपने महादेव को भी छल लिया। उन्हें विष पिला कर स्वयं लक्ष्मी और कौस्तुभ मणि ले ली। आप निश्चय ही बड़े प्रपंची हैं। किन्तु इस बार आपने गलत व्यक्ति से बैर किया है। मैं आपको श्राप देता हूँ कि जिस प्रकार आज मैं स्त्री के लिए तड़प रहा हूँ, आप भी तड़पेंगे। मेरा जैसा (वानर) रूप बना कर आपने मुझे छला है, उन्ही से आपको सहायता लेनी होगी।" तब श्रीहरि ने अपनी माया समेटी। इससे ना विश्वमोहिनी रही और ना ही कोई नगर। तब सत्य को जान कर देवर्षि ने नारायण के चरण पकड़ लिए और उनसे बार बार क्षमा मांगने लगे और अपने श्राप के निवारण करने को कहने लगे। तब श्रीहरि ने नारद जी से कहा कि "मेरे भक्त का श्राप भी विफल नहीं हो सकता इसी कारण जो भी तुमने कहा वो निश्चय ही सत्य होगा। अगले अवतार में मैं स्त्री वियोग से व्यथित हूँगा और वानर ही मेरी सहायता करेंगे।" तब भी देवर्षि का मन अशांत ही रहा। इस पर श्रीहरि ने उन्हें महादेव के शतनाम पाठ को करने को कहा जिससे अंततः नारद जी के मन का वियोग मिटा। तभी शिवजी के वो दो गण भी नारद जी के पास आये और उनसे क्षमा मांगी। इसपर देवर्षि ने उन्हें कहा कि तुम दोनों राक्षस अवश्य बनोगे किन्तु श्रीहरि के ही अवतार द्वारा तुम्हारा वध होगा जिससे तुम्हे मुक्ति प्राप्त होगी। देवर्षि नारद के उसी श्राप के कारण नारायण ने श्रीराम के रूप में अपना सातवां अवतार लिया। बाद में उसी कल्प के रामावतार की कथा महादेव ने माता पार्वती को सुनाई।
sn vyas
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3 days ago
#पौराणिक कथा #महाभारत की कथा #महाभारत सञ्जय को किसने दिव्य-दृष्टि दी और क्यों ? हम सभी जानते हैं कि ' महाभारत ' ग्रंथ के भीष्म पर्व का महत्त्वपूर्ण अनुपर्व है - जम्बूखंड विनिर्माण पर्व। जम्बूखंड विनिर्माण अनुपर्व के अंतर्गत राजा जनमेजय को ऋषि वैशम्पायनजी कहते हैं - हे जनमेजय ! युद्ध के लिए उद्यत दोनों ओर की सेनाओं को देखकर वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ , सत्यवती के पुत्र , संग्राम में होनेवाले युद्ध को प्रत्यक्ष देखने वाले और भूत , भविष्य तथा वर्तमान के ज्ञाता भगवान व्यास मुनि एक दिन विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र के पास आये। और आकर धृतराष्ट्र से कहा - यदि चेच्छसि संग्रामे द्रष्टमेतान् विशाम्पते। चक्षुर्ददानि ते पुत्र युद्धं तत्र निशामय।। अर्थ - हे राजन ! यदि तुम इनको संग्राम में लड़ते हुए देखना चाहते हो , तो हे पुत्र ! मैं तुम्हें इनका युद्ध देखने के लिए नेत्र दूं ! तब तुम सुख से संग्राम को देखो। धृतराष्ट्र उवाच न रोचये ज्ञातिवधं द्रष्टुं ब्रह्मर्षिसत्तम। युद्धमेतत्त्वशेषेन श्रृणुयां तव तेजसा।। अर्थ - धृतराष्ट्र ने कहा - हे ब्रह्मर्षियों में श्रेष्ठ ! अपने सम्बन्धियों के वध के दृश्य को देखना मुझे अच्छा नहीं लगता। परंतु आपके तेज: प्रभाव से मैं युद्ध का सब समाचार सुनना चाहता हूं। वैशम्पायन जी बोले - धृतराष्ट्र की संग्राम देखने की अनिच्छा , लेकिन उसका हाल सुनने की इच्छा प्रकट करने पर वर प्रदान करने में समर्थ व्यास जी ने तब धृतराष्ट्र को वर न देकर संजय को ही वर दे दिया। संजय को वर देने के पश्चात् व्यासजी ने धृतराष्ट्र को कहा - एष ते संजयो राजन्युद्धमेतद्वादिष्यति। एतस्य सर्वसंग्रामे न परोक्षं भविष्यति।। चक्षुषा संजयो राजन्दिव्येनैव समन्वित:। कथयिष्यति ते युद्धं सर्वज्ञश्च भविष्यति।। प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि। मनसा चिंतितमपि सर्व वेत्स्यति संजय:।। अर्थ - इस युद्ध का सारा वृत्तांत यह संजय तुमसे कहेंगे। युद्ध की कोई बात इनसे छिपी नहीं रहेगी। इनके दिव्य नेत्र हो जाएंगे , उसी से सब बातें जान सकेंगे और युद्ध के सब वृतांत तुमसे कहेंगे। प्रकट हो या गुप्त हो , दिन की हो या रात की हो , और जो कोई मन में भी विचार की हुई है , वह सब बात संजय जानेंगे। भगवत् गीता में संजय कहां से आ गए ? अब आप समझ गए होंगे। महाभारत ग्रंथ के श्लोकों को उद्धृत कर रहा हूं , ताकि किसी प्रकार की कोई शंका किसी के मन में न रहे। ।। योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण की जय ।।
sn vyas
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4 days ago
#पौराणिक कथा कल्पना कीजिए एक ऐसे असुर की जिसके एक-दो नहीं बल्कि पूरे हजार हाथ थे। जिसकी शक्ति के सामने बड़े-बड़े देवता भी कांप उठते थे। जिसकी राजधानी के द्वार पर स्वयं भगवान शिव पहरा देते थे। और जिसकी पुत्री की एक प्रेम कहानी ने ऐसा तूफान खड़ा कर दिया कि भगवान श्री कृष्ण और महादेव को युद्धभूमि में आमने-सामने खड़ा होना पड़ा। यह कथा है महान असुरराज बाणासुर की, जो केवल अपनी शक्ति के लिए ही नहीं बल्कि अपनी भक्ति और अपने अहंकार दोनों के लिए प्रसिद्ध था। प्राचीन काल में असुरों के महान राजा महाबली का एक पराक्रमी पुत्र था—बाणासुर। वह भक्त प्रह्लाद के वंश का गौरव था। बचपन से ही उसका मन भगवान शिव की भक्ति में रमा रहता था। उसने वर्षों तक कठोर तपस्या की। बर्फीले पर्वतों में खड़े होकर, अग्नि के बीच बैठकर और भोजन त्यागकर उसने महादेव को प्रसन्न किया। अंततः उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए। बाणासुर ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि संसार की कोई शक्ति मेरे राज्य को पराजित न कर सके।" महादेव मुस्कुराए और बोले, "वत्स, मैं स्वयं तुम्हारे राज्य की रक्षा करूंगा। जब तक मेरी कृपा तुम्हारे ऊपर है, कोई तुम्हें पराजित नहीं कर पाएगा।" यह वरदान प्राप्त होते ही बाणासुर का प्रभाव चारों दिशाओं में फैल गया। उसके हजार हाथ थे। वह एक साथ हजार धनुष चला सकता था। उसकी गर्जना सुनकर पर्वत कांप उठते थे। उसकी सेना इतनी विशाल थी कि उसकी छाया से धरती अंधकारमय हो जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे शक्ति ने उसके भीतर अहंकार को जन्म दे दिया। अब उसे लगता था कि संसार में कोई भी योद्धा उसके बराबर नहीं है। एक दिन वह कैलाश पहुंचा और महादेव से बोला, "प्रभु, आपने मुझे इतनी शक्ति दी है, लेकिन अब मेरे हजार हाथ व्यर्थ लगते हैं। कोई ऐसा योद्धा ही नहीं जो मेरा सामना कर सके। मैं युद्ध चाहता हूं।" महादेव उसकी बात सुनकर मुस्कुराए, लेकिन उनके मुख पर एक गहरी गंभीरता भी थी। उन्होंने कहा, "बाण, धैर्य रखो। जिस दिन तुम्हारे महल की ध्वजा स्वयं गिर जाएगी, उसी दिन तुम्हारा योग्य प्रतिद्वंद्वी तुम्हारे सामने आएगा।" उधर बाणासुर की पुत्री उषा युवावस्था में प्रवेश कर चुकी थी। वह अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और तेजस्वी थी। एक रात उसने एक अद्भुत स्वप्न देखा। उसने एक दिव्य राजकुमार को देखा जिसका चेहरा चंद्रमा की तरह उज्ज्वल था। उसकी आंखों में वीरता और करुणा दोनों झलक रही थीं। स्वप्न में ही उषा का हृदय उस राजकुमार पर मोहित हो गया। जब उसकी नींद खुली तो वह बेचैन हो उठी। वह दिन-रात उसी चेहरे के बारे में सोचने लगी। उषा की सबसे प्रिय सखी चित्रलेखा केवल चित्रकार ही नहीं बल्कि महान योगिनी भी थी। उसने उषा की व्याकुलता देखकर पूछा, "राजकुमारी, कौन है वह जिसने तुम्हारा मन चुरा लिया?" उषा ने अपने स्वप्न की पूरी कथा सुनाई। तब चित्रलेखा ने अपनी कला और योग शक्ति का प्रयोग किया। उसने एक-एक करके देवताओं, राजाओं और वीरों के चित्र बनाए। जब उसने द्वारका के राजकुमारों के चित्र बनाए, तभी उषा अचानक चौंक उठी। उसने एक चित्र की ओर इशारा करते हुए कहा, "यही है! यही वही राजकुमार है जिसे मैंने स्वप्न में देखा था।" चित्रलेखा ने ध्यान लगाया और अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया कि वह युवक कोई और नहीं बल्कि भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध हैं, जो प्रद्युम्न के पुत्र थे। अपनी योग शक्ति से चित्रलेखा उसी रात द्वारका पहुंची। वहां उसने अनिरुद्ध को निद्रा में पाया और योगबल से उन्हें उठा कर सीधे शोणितपुर ले आई। जब अनिरुद्ध की आंखें खुलीं तो उन्होंने अपने सामने उषा को खड़ा पाया। प्रारंभिक आश्चर्य के बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। धीरे-धीरे वह बातचीत प्रेम में बदल गई। दोनों एक-दूसरे के बिना रह नहीं सकते थे। कई दिनों तक यह रहस्य महल की दीवारों के भीतर छिपा रहा। लेकिन एक दिन महल के सैनिकों को उषा के कक्ष में एक अज्ञात युवक दिखाई दिया। बात तुरंत बाणासुर तक पहुंची। जब उसने जाना कि वह युवक स्वयं श्री कृष्ण का पौत्र है, तो उसका क्रोध आकाश छूने लगा। उसने गर्जना करते हुए अनिरुद्ध को बंदी बना लिया और उन्हें नागपाश से बांधकर कारागार में डाल दिया। द्वारका में जब अनिरुद्ध अचानक लापता हुए तो पूरे यादव वंश में चिंता फैल गई। तभी देवर्षि नारद वहां पहुंचे और उन्होंने सारी घटना श्री कृष्ण को बता दी। यह सुनते ही भगवान श्री कृष्ण, बलराम और विशाल यादव सेना लेकर शोणितपुर की ओर चल पड़े। उधर बाणासुर ने भी युद्ध की तैयारी कर ली। उसकी सेना और यादव सेना के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। बलराम का हल और मुसल जहां चलता, वहां पूरी की पूरी सेना धराशायी हो जाती। यादव वीरों ने बाणासुर की सेना को चारों ओर से घेर लिया। देखते ही देखते शोणितपुर की धरती युद्ध की ज्वाला से भर उठी। जब बाणासुर को लगा कि उसकी सेना पराजित होने वाली है, तब उसे महादेव का वरदान याद आया। उसने पूरे मन से भगवान शिव का स्मरण किया। अपने भक्त की पुकार सुनकर महादेव स्वयं युद्धभूमि में प्रकट हो गए। उनके साथ कार्तिकेय, गण और भूत-प्रेतों की विशाल सेना भी थी। और तब वह दृश्य उपस्थित हुआ जिसे देखकर देवता भी स्तब्ध रह गए। एक ओर स्वयं भगवान श्री कृष्ण थे और दूसरी ओर महादेव। दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। पूरा ब्रह्मांड जैसे अपनी सांसें रोककर यह दृश्य देख रहा था। महादेव ने अपने अस्त्र छोड़े और श्री कृष्ण ने उनका प्रतिकार किया। आकाश अस्त्रों की चमक से भर गया। पृथ्वी कांपने लगी। समुद्र उफान मारने लगे। देवता भयभीत हो उठे कि यदि यह युद्ध बढ़ गया तो सृष्टि संकट में पड़ जाएगी। अंततः भगवान श्री कृष्ण ने नारायण अस्त्र का प्रयोग किया। उसकी दिव्य शक्ति के सामने युद्धभूमि कुछ क्षणों के लिए शांत हो गई। लेकिन श्री कृष्ण जानते थे कि उनका उद्देश्य महादेव को हराना नहीं बल्कि अपने पौत्र को मुक्त कराना और अहंकार का अंत करना है। इसके बाद श्री कृष्ण सीधे बाणासुर के सामने पहुंचे। बाणासुर अपने हजार हाथों से एक साथ आक्रमण करने लगा। तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। दिव्य चक्र बिजली की गति से घूमता हुआ बाणासुर की ओर बढ़ा और एक-एक करके उसके हाथ काटने लगा। देखते ही देखते उसके हजार हाथों में से केवल चार हाथ शेष रह गए। अब बाणासुर का सारा अहंकार समाप्त हो चुका था। वह समझ गया कि शक्ति का गर्व ही उसके पतन का कारण बना। उसी समय भगवान शिव आगे आए और उन्होंने श्री कृष्ण से कहा, "हे नारायण, यह मेरा भक्त है। इसे जीवनदान दीजिए।" भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराए और बोले, "महादेव, जो आपका भक्त है वह मेरा भी भक्त है। मैं इसे जीवनदान देता हूं।" यह सुनकर बाणासुर की आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे। उसने श्री कृष्ण और महादेव दोनों के चरणों में प्रणाम किया। इसके बाद अनिरुद्ध को कारागार से मुक्त किया गया। पूरे विधि-विधान से उषा और अनिरुद्ध का विवाह संपन्न हुआ। शोणितपुर और द्वारका दोनों में उत्सव मनाया गया। देवताओं ने पुष्पवर्षा की और चारों दिशाएं मंगल ध्वनियों से गूंज उठीं। महादेव ने बाणासुर को आशीर्वाद दिया कि वह कैलाश का रक्षक बनकर सदैव उनकी सेवा करेगा। वहीं श्री कृष्ण ने उसे धर्म और विनम्रता का मार्ग अपनाने का उपदेश दिया। यह कथा केवल एक युद्ध की नहीं है। यह उस सनातन सत्य का प्रमाण है कि शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। एक भक्त की रक्षा के लिए दोनों अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं, लेकिन अंततः दोनों का उद्देश्य धर्म की स्थापना और भक्तों का कल्याण ही होता है। जो सच्चे मन से शिव की शरण में जाता है, उस पर श्री कृष्ण की भी कृपा होती है। और जो श्री कृष्ण को अपना मानता है, उसकी रक्षा के लिए महादेव भी सदैव तैयार रहते हैं। हर हर महादेव। जय श्री कृष्ण। 🙏🏻
sn vyas
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11 days ago
#पौराणिक कथा गौभक्त राजा दिलीप की अद्भुत कथा ----- रघुवंश महाकाव्य में महाराजा दिलीप और नंदिनी गाय की एक बहुत ही मनोहर कथा आती है। जिसमें नंदिनी गाय दिलीप राजा की सेवा से प्रसन्न होकर, उन्हें उत्तम संतान तथा सौभाग्य का वरदान देती है। यह कथा गाय माता की महिमा को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करती है। महाराजा दिलीप को वृद्धा अवस्था आने पर भी कोई संतान प्राप्त नहीं हुई थी । संतान ना होने की चिंता में वे बहुत दुखी और चिंतित रहते थे। एक समय उन्होंने अपनी महारानी के साथ विचार विमर्श किया और अपने गुरु वशिष्ठ जी से इस संदर्भ में प्रश्न पूछने की सोची । अतः राजा दिलीप रानी के साथ गुरु वशिष्ठ जी के आश्रम में पहुंचे। आश्रम में पहुंचकर महाराजा दिलीप और महारानी ने गुरु वशिष्ठ को प्रणाम किया और उनसे संतान ना होने की व्यथा व्यक्त की l गुरु वशिष्ठ जी ने राजा दिलीप को याद दिलाया एक बार अनजाने में उनसे कामधेनु गाय का अनादर हो गया था । जिसके फलस्वरूप उन्हें संतान ना होने का दुख भोगना पड़ रहा है । साथ ही गुरु वशिष्ट जी ने उन्हें इस पूर्व कर्म के फल को काटने का उपाय भी बताया । उन्होंने बताया कि कामधेनु गाय की पुत्री नंदिनी गाय की सेवा करने से वे अपने कर्म का पश्चाताप कर सकते हैं। यदि नंदिनी गाय उनकी सेवा से प्रसन्न हो जाएं तो वह उन्हें शाप से मुक्त कर सकती हैं। गुरु वशिष्ट जी से यह सब सुनकर राजा दिलीप नंदिनी गाय की सेवा का व्रत ले लेते हैं और व्रत के अनुसार वे अपने दास दासीयों को छुट्टी दे कर, रानी के साथ स्वयं ही नंदिनी गाय की सेवा में लग जाते हैं । राजा दिलीप और उनकी पत्नी, गौ माता नंदनी को मीठी घास के कौर उसको अभय करते हुए खिलाते, उसके शरीर को सुहलाते, शरीर से मक्खियों और डांस वगैरह को दूर करते तथा वह जहाँ जाना चाहती वही जाने देते थे। साथ ही वे स्वयं भी उसकी गति का अनुसरण करते थे। इस प्रकार उसकी छाया के समान उसके पीछे-पीछे रहते हुए राजा दिलीप उसकी आराधना करने लगे। राजा दिलीप के तप का प्रभाव और दया-भाव के कारण वन के समस्त स्थावर-जंगम जीव मंत्रमुग्ध रहते थे। प्रजा की रक्षा करने वाले राजा के वन में पैर रखते ही बलवान् प्राणियों ने अपने से कम बल वालों को तंग करना छोड़ दिया था। राजा दिलीप प्रतिदिन प्रात: काल गाय को चराने के लिए निकलते थे। उस समय उनको रानी पहुंचाने जाती थी और सायंकाल जब राजा गाय को लेकर लौटते थे तब रानी दोनों को लेने जाती थी। महाराजा दिलीप संध्या काल में नंदिनी गाय की पूजा, अर्चना करके, उसे दुहकर, नंदनी जी के सोने के पश्चात सोते और उनके उठने से पहले उठ जाते थे। इस प्रकार राजा दिलीप को सेवा करते हुए 21 दिन बीत गए । तदनन्तर राजा की भक्ति भावना की परीक्षा करने के लिए, मुनि की होम धेनु, एक हिमालय की गुफा में, जिसमें कोमल घास उग रही थी; घुस गई। गाय हिरण पशुओं से सुरक्षित है ऐसा समझकर राजा पर्वत की शोभा देखने में तल्लीन थे। इसी बीच एक सिहं आकर गाय के ऊपर झपट्टा, जिसका पता राजा को नहीं चल सका। जब राजा को गाय की आर्त्त ध्वनि सुनाई पड़ी, तब राजा की दृष्टि पीछे गई । तब राजा ने देखा कि लाल गाय के ऊपर पंजा रखे केसरी सिंह खड़ा है । राजा लज्जित हो गए और तरकस में से बाण निकालकर ज्यों ही सिंह पर छोड़ने लगे, तभी तभी उन्हें ऐसा जान पड़ा कि उनका दाहिना हाथ जहां-का-तहां रह गया है, मानो मन्त्रौषधि के द्वारा उनका सारा बाहुबल नष्ट कर दिया है। राजा की यह लाचारी देखकर सिंह ठहाका मारकर हंसा और बोला, ” राजा ! यह वृथा श्रम क्यों करते हो ? मैं सामान्य सिंह नहीं हूं, बल्कि महादेव का किंकर कुम्भोदर हूँ। शिव जी के चरण स्पर्श से पवित्र हुए मेरे शरीर पर तुम्हारे अस्त्र काम नहीं कर सकते। इसलिए यह व्यर्थ प्रयत्न छोड़ दो और घर लौट जाओ। तुम्हें जो काम सौंपा गया था, उसे तुम कर चुके हो। तुम्हारी गुरु भक्ति सिद्ध हो गई हो चुकी है। जिसकी रक्षा शस्त्र से नहीं हो सकती उसके बचाने में शस्त्र धारी क्षत्रिय निष्फल हो जाए तो इसमें लज्जा की कोई बात नहीं।” इस पर राजा दीनतापूर्वक जवाब देते हैं, ” हे मृगेन्द्र! मैं हिल-डुल भी नहीं सकता हूं। इसलिए मेरा कहना तुम्हें हँसने योग्य भले ही लगता हो, परंतु – यह नंदिनी गाय गुरु अग्निहोत्री जी की कामधेनु का धन है। अपनी आंखों के सामने मैं इन्हें नष्ट होते हुए नहीं देख सकता। इसलिए तुम मुझ पर कृपा करके मेरा शरीर ले लो और अपनी भूख मिटाओ। कृपया करके महर्षि की इस गाय को छोड़ दो। सांझ होने पर इसका छोटा बछड़ा इसकी रहा देखेगा।” सिंह राजा को अनेकों प्रकार से समझाता है ताकि राजा अपने निश्चय को बदल दे। सिहं कहता है- ” यदि तुम भूत दया के वशीभूत हो गए हो तो अपना शरीर प्रदान करके तुम इस एक ही गाय की रक्षा कर सकोगे। लेकिन यदि जीते रहोगे तो हे प्रजानाथ! तुम अपनी प्रजा को पिता के समान सदा संकटों से उबार सकोगे। और यदि तुम्हें अपने गुरु के क्रोध का डर लगता हो तो उनको तुम घड़े-जैसे थन वाली करोड़ों गायों को देकर शांत कर सकते हो।” इस तरह सिहं द्वारा बहुत प्रकार समझाने पर भी राजा पर कोई प्रभाव न पड़ा। वरन राजा दिलीप उस सिंह से कहते हैं कि, ” जिस प्रकार तुम देवदारू वृक्ष की रक्षा शिवजी जी की आज्ञा से करते हो। उसी प्रकार मैं अपने गुरु की आज्ञा से इस गाय की रक्षा करता हूँ। इस प्रकार सेवा कार्य करने- वाले तुम मेरी सेवा की भावना को क्यों नहीं समझते हो ? “ ” यदि तुम्हें मुझ पर दया आती हो, तो मेरे इस नश्वर शरीर पर क्यों करते हो ? मेरा जो अमर यश रूपी शरीर है। उसके ऊपर दया करो और इस नश्वर शरीर को तुम खा जाओ। इस नश्वर पिंड पर मेरे- जैसे मनुष्य को कोई आस्था नहीं होती।” राजा की यह बात सुनकर शेर मन ही मन प्रसन्न होता है और राजा की बात को मान लेता है इस प्रकार राजा सिंह की भूख मिटाने के लिए उसके चरणों पर अपने शरीर को ‘मास के पिंड के समान’ अर्पण करते देते हैं । तभी सिंह के आगे पड़े हुए राजा दिलीप के शरीर पर आकाश से पुष्प वृष्टि होती है और एक धीमी अमृत-जैसी मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है- ‘वत्स उठ।’ राजा दिलीप उठते हैं और सामने देखते हैं कि अपनी जननी के समान वह गोमाता दूध की धार छोड़ती हुई खड़ी है और सिंह अदृश्य हो गया है ! माता नन्दिनी उनसे कहती है, ” यह सिंह तो मेरी ही माया थी। इस माया के द्वारा मैंने तेरी परीक्षा ली। ऋषि के प्रभाव से स्वयं काल भी मेरे ऊपर प्रहार करने में असमर्थ है।” राजा की गुरुभक्ति से, सेवा से और दया से प्रसन्न हुई गाय संतान प्राप्ति के लिए उत्सुक राजा को उनका मांगा हुआ वर प्रदान करती है, और कहती है- ” तुम्हारी गुरु भक्ति और दया भाव से मैं प्रसन्न हो गई हूं। पुत्र ! तू वर माँग। मैं केवल दूध ही देती हूं, ऐसा न समझ। मैं कामधेनु हूं। प्रसन्न होने पर, जो चाहे सो दे सकती हूं।” गाय को बचाने में प्राण अर्पण किया जाए या करोड़ों गायों का दान पुण्य प्राप्त किया जाए, इस धर्म संकट में एक को चुनने में राजा को देर नहीं लगी। फल स्वरूप राजा दिलीप को गौ रक्षा और सेवा का सच्चा मार्ग प्राप्त हुआ जिस पर चलकर उन्हें समस्त रिद्धि सिद्धि प्राप्त हो गई। इस पुण्य के प्रभाव से रानी गर्भवती हुई और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई ॥जय जय श्री राधे॥ ---:: ॐ :: ---
Abhimanyu
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15 days ago
Rakshak jinse devta bhi darte the 💀💀💀. #mythology