महाभारत🏹

sn vyas
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16 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣4️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 449) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच अर्जुनेनैवमुक्तस्तु भीमो रोषाज्ज्वलन्निव । बलमाहारयामास यद् वायोर्जगतः क्षये ।। २४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- अर्जुनके यों कहनेपर भीम रोषसे जल उठे और प्रलयकालमें वायुका जो बल प्रकट होता है, उसे उन्होंने अपने भीतर धारण कर लिया ।। २४ ।। ततस्तस्याम्बुदाभस्य भीमो रोषात् तु रक्षसः । उत्क्षिप्याभ्रामयद् देहं तूर्ण शतगुणं तदा ।। २५ ।। तत्पश्चात् काले मेघके समान उस राक्षसके शरीरको भीमने क्रोधपूर्वक तुरंत ऊपर उठा लिया और उसे सौ बार घुमाया ।। २५ ।। भीम उवाच वृथामांसैर्वृथापुष्टो वृथावृद्धो वृथामतिः । वृथामरणमर्हस्त्वं वृथाद्य न भविष्यसि ।। २६ ।। इसके बाद भीम उस राक्षससे बोले- अरे निशाचर ! तू व्यर्थ मांससे व्यर्थ ही पुष्ट होकर व्यर्थ ही बड़ा हुआ है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है। इसीसे तू व्यर्थ मृत्युके योग्य है। इसलिये आज तू व्यर्थ ही अपनी इहलीला समाप्त करेगा (बाहुयुद्धमें मृत्यु होनेके कारण तू स्वर्ग और कीर्तिसे वंचित हो जायगा) ।। २६ ।। क्षेममद्य करिष्यामि यथा वनमकण्टकम् । न पुनर्मानुषान् हत्वा भक्षयिष्यसि राक्षस ।। २७ ।। राक्षस ! आज तुझे मारकर मैं इस वनको निष्कण्टक एवं मंगलमय बना दूँगा, जिससे फिर तू मनुष्योंको मारकर नहीं खा सकेगा ।। २७ ।। अर्जुन उवाच यदि वा मन्यसे भारं त्वमिमं राक्षसं युधि । करोमि तव साहाय्यं शीघ्रमेष निपात्यताम् ।। २८ ।। अर्जुन बोले- भैया ! यदि तुम युद्धमें इस राक्षसको अपने लिये भार समझ रहे हो तो मैं तुम्हारी सहायता करता हूँ। तुम इसे शीघ्र मार गिराओ ।। २८ ।। अथवाप्यहमेवैनं हनिष्यामि वृकोदर । कृतकर्मा परिश्रान्तः साधु तावदुपारम ।। २९ ।। वृकोदर ! अथवा मैं ही इसे मार डालूँगा। तुम अधिक युद्ध करके थक गये हो। अतः कुछ देर अच्छी तरह विश्राम कर लो ।। २९ ।। वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षणः । निष्पिष्यैनं बलाद् भूमौ पशुमारममारयत् ।। ३० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! अर्जुनकी यह बात सुनकर भीमसेन अत्यन्त क्रोधमें भर गये। उन्होंने बलपूर्वक राक्षसको पृथ्वीपर दे मारा और उसे रगड़ते हुए पशुकी तरह मारना आरम्भ किया ।। ३० ।। स मार्यमाणो भीमेन ननाद विपुलं स्वनम् । पूरयंस्तद् वनं सर्वं जलार्द्र इव दुन्दुभिः ।। ३१ ।। इस प्रकार भीमसेनकी मार पड़नेपर वह राक्षस जलसे भीगे हुए नगारेकी-सी ध्वनिसे सम्पूर्ण वनको गुँजाता हुआ जोर-जोरसे चीखने लगा ।। ३१ ।। बाहुभ्यां योक्त्रयित्वा तं बलवान् पाण्डुनन्दनः । मध्ये भङ्क्त्वा महाबाहुर्हर्षयामास पाण्डवान् ।। ३२ ।। तब महाबाहु बलवान् पाण्डुनन्दन भीमसेनने उसे दोनों भुजाओंसे बाँधकर उलटा मोड़ दिया और उसकी कमर तोड़कर पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाया ।। ३२ ।। हिडिम्बं निहतं दृष्ट्वा संहृष्टास्ते तरस्विनः । अपूजयन् नरव्याघ्रं भीमसेनमरिंदमम् ।। ३३ ।। हिडिम्बको मारा गया देख वे महान् वेगशाली पाण्डव अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उठे और उन्होंने शत्रुओंका दमन करनेवाले नरश्रेष्ठ भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ३३ ।। अभिपूज्य महात्मानं भीमं भीमपराक्रमम् । पुनरेवार्जुनो वाक्यमुवाचेदं वृकोदरम् ।। ३४ ।। इस प्रकार भयंकर पराक्रमी महात्मा भीमकी प्रशंसा करके अर्जुनने पुनः उनसे यह बात कही- ।। ३४ ।। न दूरं नगरं मन्ये वनादस्मादहं विभो । शीघ्रं गच्छाम भद्रं ते न नो विद्यात् सुयोधनः ।। ३५ ।। 'प्रभो! मैं समझता हूँ, इस वनसे नगर अब दूर नहीं है। तुम्हारा कल्याण हो। अब हमलोग शीघ्र चलें, जिससे दुर्योधनको हमारा पता न लग सके' ।। ३५ ।। ततः सर्वे तथेत्युक्त्वा सह मात्रा महारथाः । प्रययुः पुरुषव्याघ्रा हिडिम्बा चैव राक्षसी ।। ३६ ।। तब सभी पुरुषसिंह महारथी पाण्डव (ठीक है,) ऐसा ही करें' यों कहकर माताके साथ वहाँसे चल दिये। हिडिम्बा राक्षसी भी उनके साथ हो ली ।। ३६ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि हिडिम्बवधे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें हिडिम्बासुरके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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17 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣4️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (हिडिम्बवधपर्व) त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 448) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच प्रबुद्धास्ते हिडिम्बाया रूपं दृष्ट्वातिमानुषम् । विस्मिताः पुरुषव्याघ्रा बभूवुः पृथया सह ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! जागनेपर हिडिम्बाका अलौकिक रूप देख वे पुरुषसिंह पाण्डव माता कुन्ती के साथ बड़े विस्मयमें पड़े ।। १ ।। ततः कुन्ती समीक्ष्यैनां विस्मिता रूपसम्पदा । उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वपूर्वमिदं शनैः ।। २ ।। कस्य त्वं सुरगर्भाभे का वासि वरवर्णिनी । केन कार्येण सम्प्राप्ता कुतश्चागमनं तव ।। ३ ।। तदनन्तर कुन्ती ने उसकी रूप-सम्पत्ति से चकित हो उसकी ओर देखकर उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें इस प्रकार धीरे-धीरे पूछा- 'देवकन्याओंकी-सी कान्तिवाली सुन्दरी ! तुम कौन हो और किसकी कन्या हो? तुम किस कामसे यहाँ आयी हो और कहाँसे तुम्हारा शुभागमन हुआ है? ।। २-३ ।। यदि वास्य वनस्य त्वं देवता यदि वाप्सराः । आचक्ष्व मम तत् सर्व किमर्थं चेह तिष्ठसि ।। ४ ।। 'यदि तुम इस वनकी देवी अथवा अप्सरा हो तो वह सब मुझे ठीक-ठीक बता दो; साथ ही यह भी कहो कि किस कामके लिये यहाँ खड़ी हो?' ।। ४ ।। हिडिम्बोवाच यदेतत् पश्यसि वनं नीलमेघनिभं महत् । निवासो राक्षसस्यैष हिडिम्बस्य ममैव च ।। ५ ।। हिडिम्बा बोली- देवि! यह जो नील मेघके समान विशाल वन आप देख रही हैं, यह राक्षस हिडिम्बका और मेरा निवासस्थान है ।। ५ ।। तस्य मां राक्षसेन्द्रस्य भगिनीं विद्धि भाविनि । भ्रात्रा सम्प्रेषितामार्ये त्वां सपुत्रां जिघांसता ।। ६ ।। महाभागे! आप मुझे उस राक्षसराज हिडिम्बकी बहिन समझें। आर्ये! मेरे भाईने मुझे आपकी और आपके पुत्रोंकी हत्या करनेकी इच्छासे भेजा था ।। ६ ।। क्रूरबुद्धेरहं तस्य वचनादागता त्विह । अद्राक्षं नवहेमाभं तव पुत्रं महाबलम् ।। ७ ।। उसकी बुद्धि बड़ी क्रूरतापूर्ण है। उसके कहनेसे में यहाँ आयी और नूतन सुवर्णकी-सी आभावाले आपके महाबली पुत्रपर मेरी दृष्टि पड़ी ।। ७ ।। ततोऽहं सर्वभूतानां भावे विचरता शुभे । चोदिता तव पुत्रस्य मन्मथेन वशानुगा ।। ८ ।। शुभे ! उन्हें देखते ही समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विचरनेवाले कामदेवसे प्रेरित होकर मैं आपके पुत्रकी वशवर्तिनी हो गयी ।। ८ ।। ततो वृतो मया भर्ता तव पुत्रो महाबलः । अपनेतुं च यतितो न चैव शकितो मया ।। ९ ।। तदनन्तर मैंने आपके महाबली पुत्रको पतिरूपमें वरण कर लिया और इस बातके लिये प्रयत्न किया कि उन्हें (तथा आप सब लोगोंको) लेकर यहाँसे अन्यत्र भाग चलूँ, परंतु आपके पुत्रकी स्वीकृति न मिलनेसे मैं इस कार्यमें सफल न हो सकी ।। ९ ।। चिरायमाणां मां ज्ञात्वा ततः स पुरुषादकः । स्वयमेवागतो हन्तुमिमान् सर्वास्तवात्मजान् ।। १० ।। मेरे लौटनेमें देर होती जान वह मनुष्यभक्षी राक्षस स्वयं ही आपके इन सब पुत्रोंको मार डालनेके लिये आया ।। १० ।। स तेन मम कान्तेन तव पुत्रेण धीमता । बलादितो विनिष्पिष्य व्यपनीतो महात्मना ।। ११ ।। परंतु मेरे प्राणवल्लभ तथा आपके बुद्धिमान् पुत्र महात्मा भीम उसे बलपूर्वक यहाँसे रगड़ते हुए दूर हटा ले गये हैं ।। ११ ।। विकर्षन्तौ महावेगौ गर्जमानौ परस्परम् । पश्यैवं युधि विक्रान्तावेतौ च नरराक्षसौ ।। १२ ।। देखिये, युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले वे दोनों मनुष्य और राक्षस जोर-जोरसे गर्ज रहे हैं और बड़े वेगसे गुत्थम-गुत्थ होकर एक-दूसरेको अपनी ओर खींच रहे हैं ।। १२ ।। वैशम्पायन उवाच तस्याः श्रुत्वैव वचनमुत्पपात युधिष्ठिरः । अर्जुनो नकुलश्चैव सहदेवश्च वीर्यवान् ।। १३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! हिडिम्बाकी यह बात सुनते ही युधिष्ठिर उछलकर खड़े हो गये। अर्जुन, नकुल और पराक्रमी सहदेवने भी ऐसा ही किया ।। १३ ।। तौ ते ददृशुरासक्ती विकर्षन्ती परस्परम् । काङ्क्षमाणौ जयं चैव सिंहाविव बलोत्कटौ ।। १४ ।। तदनन्तर उन्होंने देखा कि वे दोनों प्रचण्ड बलशाली सिंहोंकी भाँति आपसमें गुथ गये हैं और अपनी-अपनी विजय चाहते हुए एक-दूसरेको घसीट रहे हैं ।। १४ ।। अथान्योन्यं समाश्लिष्य विकर्षन्तौ पुनः पुनः । दावाग्निधूमसदृशं चक्रतुः पार्थिवं रजः ।। १५ ।। एक-दूसरेको भुजाओंमें भरकर बार-बार खींचते हुए उन दोनों योद्धाओं ने धरतीकी धूल को दावानल के धूएँ के समान बना दिया ।। १५ ।। वसुधारेणुसंवीतौ वसुधाधरसंनिभौ । बभ्राजतुर्यथा शैलौ नीहारेणाभिसंवृतौ ।। १६ ।। दोनोंका शरीर पृथ्वीकी धूलमें सना हुआ था। दोनों ही पर्वतोंके समान विशालकाय थे। उस समय वे दोनों कुहरेसे ढके हुए दो पहाड़ोंके समान सुशोभित हो रहे थे ।। १६ ।। राक्षसेन तदा भीमं क्लिश्यमानं निरीक्ष्य च । उवाचेदं वचः पार्थः प्रहसञ्छनकैरिव ।। १७ ।। भीमसेनको राक्षसद्वारा पीड़ित देख अर्जुन धीरे-धीरे हँसते हुए-से बोले- ।। १७ ।। भीम मा भैर्महाबाहो न त्वां बुध्यामहे वयम् । समेतं भीमरूपेण रक्षसा श्रमकर्शितम् ।। १८ ।। 'महाबाहु भैया भीमसेन! डरना मत; अबतक हमलोग नहीं जानते थे कि तुम भयंकर राक्षससे भिड़कर अत्यन्त परिश्रमके कारण कष्ट पा रहे हो ।। १८ ।। साहाय्येऽस्मि स्थितः पार्थ पातयिष्यामि राक्षसम् । नकुलः सहदेवश्च मातरं गोपयिष्यतः ।। १९ ।। 'कुन्तीनन्दन ! अब मैं तुम्हारी सहायताके लिये उपस्थित हूँ। इस राक्षसको अवश्य मार गिराऊँगा। नकुल और सहदेव माताजीकी रक्षा करेंगे' ।। १९ ।। भीम उवाच उदासीनो निरीक्षस्व न कार्यः सम्भ्रमस्त्वया । न जात्वयं पुनर्जीवेन्मद्वाह्वन्तरमागतः ।। २० ।। भीमसेनने कहा-अर्जुन ! तटस्थ होकर चुपचाप देखते रहो। तुम्हें घबरानेकी आवश्यकता नहीं। मेरी दोनों भुजाओंके बीचमें आकर अब यह राक्षस कदापि जीवित नहीं रह सकता ।। २० ।। अर्जुन उवाच किमनेन चिरं भीम जीवता पापरक्षसा । गन्तव्ये न चिरं स्थातुमिह शक्यमरिंदम ।। २१ ।। अर्जुनने कहा- शत्रुओंका दमन करनेवाले भीम! इस पापी राक्षसको देरतक जीवित रखनेसे क्या लाभ? हमलोगोंको आगे चलना है, अतः यहाँ अधिक समयतक ठहरना सम्भव नहीं है ।। २१ ।। पुरा संरज्यते प्राची पुरा संध्या प्रवर्तते । रौद्रे मुहूर्ते रक्षांसि प्रबलानि भवन्त्युत ।। २२ ।। उधर सामने पूर्वदिशामें अरुणोदयकी लालिमा फैल रही है। प्रातः संध्याका समय होनेवाला है। इस रौद्र मुहूर्तमें राक्षस प्रबल हो जाते हैं ।। २२ ।। त्वरस्व भीम मा क्रीड जहि रक्षो बिभीषणम् । पुरा विकुरुते मायां भुजयोः सारमर्पय ।। २३ ।। अतः भीमसेन ! जल्दी करो। इसके साथ खिलवाड़ न करो। इस भयानक राक्षसको मार डालो। यह अपनी माया फैलाये, इसके पहले ही इसपर अपनी भुजाओंकी शक्तिका प्रयोग करो ।। २३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
JEKH11
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25 days ago
महाभारत का एक अनसुना तथ्य पार्ट 1 #महाभारत #श्रीकृष्ण #sharchat