महाभारत🏹

sn vyas
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5 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोण का द्रुपद से तिरस्कृत हो हस्तिनापुर में आना, राजकुमारों से उनकी भेंट, उनकी बीटा और अँगूठी को कुएँ में से निकालना एवं भीष्म का उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना...(दिन 388) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ द्रोण उवाच एषा मुष्टिरिषीकाणां मयास्त्रेणाभिमन्त्रिता ।। २७ ।। द्रोण बोले-ये मुट्ठीभर सींकें हैं, जिन्हें मैंने अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित किया है ।। २७ ।। अस्या वीर्य निरीक्षध्वं यदन्यस्य न विद्यते। भेत्स्यामीषीकया वीटां तामिषीकां तथान्यया ।। २८ ।। तुमलोग इसका बल देखो, जो दूसरेमें नहीं है। मैं पहले एक सींकसे उस गुल्लीको बींध दूंगा; फिर दूसरी सींकसे उस पहली सींक को बींधूंगा ।। २८ ।। तामन्यया समायोगे वीटाया ग्रहणं मम । इसी प्रकार दूसरी को तीसरी से बींधते हुए अनेक सींकों का संयोग होने पर मुझे गुल्ली मिल जायगी ।। २८ ।। वैशम्पायन उवाच ततो यथोक्तं द्रोणेन तत् सर्वं कृतमञ्जसा ।। २९ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर द्रोणने जैसा कहा था, वह सब कुछ अनायास ही कर दिखाया ।। २९ ।। तदवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचोऽब्रुवन् ।। ३० ।। यह अद्भुत कार्य देखकर उन कुमारोंके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे इस प्रकार बोले ।। ३० ।। कुमारा ऊचुः मुद्रिकामपि विप्रर्षे शीघ्रमेतां समुद्धर । कुमारों ने कहा- ब्रह्मर्षे! अब आप शीघ्र ही इस अँगूठीको भी निकाल दीजिये ।। ३० वैशम्पायन उवाच ततः शरं समादाय धनुर्द्राणो महायशाः ।। ३१ ।। शरेण विद्ध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत् प्रभुः । सशरं समुपादाय कूपादङ्गुलिवेष्टनम् ।। ३२ ।। ददौ ततः कुमाराणां विस्मितानामविस्मितः । मुद्रिकामुद्धृतां दृष्ट्वा तमाहुस्ते कुमारकाः ।। ३३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- तब महायशस्वी द्रोणने धनुष-बाण लेकर बाणसे उस अँगूठीको बींध दिया और उसे ऊपर निकाल लिया। शक्तिशाली द्रोणने इस प्रकार कुएँ से बाण सहित अँगूठी निकालकर उन आश्चर्यचकित कुमारोंके हाथमें दे दी; किंतु वे स्वयं तनिक भी विस्मित नहीं हुए। उस अँगूठीको कुएँसे निकाली हुई देखकर उन कुमारोंने द्रोणसे कहा ।। ३१-३३ ।। कुमारा ऊचुः अभिवादयामहे ब्रह्मन् नैतदन्येषु विद्यते । कोऽसि कस्यासि जानीमो वयं किं करवामहे ।। ३४ ।। कुमार बोले- ब्रह्मन् ! हम आपको प्रणाम करते हैं। यह अद्भुत अस्त्र-कौशल दूसरे किसीमें नहीं है। आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं- यह हम जानना चाहते हैं। बताइये, हमलोग आपकी क्या सेवा करें? ।। ३४ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो द्रोणः प्रत्युवाच कुमारकान्। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कुमारोंके इस प्रकार पूछनेपर द्रोणने उनसे कहा ।। ३४ ।। द्रोण उवाच आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्च माम् ।। ३५ ।। स एव सुमहातेजाः साम्प्रतं प्रतिपत्स्यते । द्रोण बोले-तुम सब लोग भीष्मजीके पास जाकर मेरे रूप और गुणोंका परिचय दो। वे महातेजस्वी भीष्मजी ही मुझे इस समय पहचान सकते हैं ।। ३५३ ।। वैशम्पायन उवाच तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचुः कुमारकाः ।। ३६ ।। ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तच्च कर्म तथाविधम् । भीष्मः श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत ।। ३७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- 'बहुत अच्छा' कहकर वे कुमार भीष्मजीके पास गये और ब्राह्मणकी सच्ची बातों तथा उनके उस अद्भुत पराक्रमको भी उन्होंने भीष्मजीसे कह सुनाया। कुमारोंकी बातें सुनकर भीष्मजी समझ गये कि वे आचार्य द्रोण हैं ।। ३६-३७ ।। युक्तरूपः स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च । अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम् ।। ३८ ।। परिपप्रच्छ निपुणं भीष्मः शस्त्रभृतां वरः । हेतुमागमने तच्च द्रोणः सर्वं न्यवेदयत् ।। ३९ ।। फिर यह सोचकर कि द्रोणाचार्य ही इन कुमारोंके उपयुक्त गुरु हो सकते हैं, भीष्मजी स्वयं ही आकर उन्हें सत्कारपूर्वक घर ले गये। वहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने बड़ी बुद्धिमत्ताके साथ द्रोणाचार्यसे उनके आगमनका कारण पूछा और द्रोणने वह सब कारण इस प्रकार निवेदन किया ।। ३८-३९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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7 days ago
#महाभारत महाभारत की कथा में कुंती का जीवन अत्यंत रहस्यमयी, त्यागमय और दुःखों से भरा हुआ था। वे केवल पांडवों की माता ही नहीं थीं, बल्कि धर्म, धैर्य और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं। उनके जीवन की सबसे रहस्यमयी और भावुक घटना थी — सूर्यदेव के आह्वान से कर्ण का जन्म। कुंती का वास्तविक नाम और बचपन कुंती का वास्तविक नाम पृथा था। वे यादव वंश के राजा शूरसेन की पुत्री थीं और भगवान श्रीकृष्ण की बुआ लगती थीं। बाद में उन्हें उनके पिता ने अपने मित्र राजा कुंतिभोज को गोद दे दिया। तभी से उनका नाम “कुंती” पड़ गया। राजा कुंतिभोज के महल में कुंती का पालन-पोषण राजकुमारी की तरह हुआ। वे अत्यंत विनम्र, सेवा-भावी और बुद्धिमान थीं। ऋषि दुर्वासा का आगमन एक बार महान तपस्वी ऋषि दुर्वासा राजा कुंतिभोज के महल में पधारे। उनका स्वभाव अत्यंत क्रोधी माना जाता था। छोटी-सी गलती पर भी वे श्राप दे देते थे। इसलिए सभी उनसे भयभीत रहते थे। राजा ने उनकी सेवा का दायित्व कुंती को सौंपा। कुंती ने पूरे मन, श्रद्धा और धैर्य से ऋषि की सेवा की। वे समय पर भोजन देतीं, उनके विश्राम का ध्यान रखतीं और कभी शिकायत नहीं करतीं। कई महीनों तक सेवा करने के बाद दुर्वासा ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा— “हे पुत्री, मैं तुम्हारी सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें एक दिव्य मंत्र देता हूँ। इस मंत्र से तुम जिस देवता का स्मरण करोगी, वह तुरंत प्रकट होकर तुम्हें अपने समान तेजस्वी पुत्र प्रदान करेगा।” कुंती ने विनम्रता से वह मंत्र स्वीकार कर लिया। जिज्ञासा जिसने इतिहास बदल दिया उस समय कुंती अभी बहुत छोटी और अविवाहित थीं। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि कोई मंत्र इतना शक्तिशाली भी हो सकता है। एक सुबह उन्होंने पूर्व दिशा में उगते हुए सूर्य को देखा। पूरा आकाश सुनहरी रोशनी से चमक रहा था। उनके मन में विचार आया— “क्या सचमुच यह मंत्र काम करता है?” बस जिज्ञासावश उन्होंने मंत्र का जाप करते हुए सूर्यदेव का आह्वान कर दिया। सूर्यदेव का प्रकट होना मंत्र पूरा होते ही अचानक तेज प्रकाश फैल गया। पूरा कक्ष दिव्य आभा से भर गया। उसी प्रकाश के बीच सूर्यदेव प्रकट हुए। उनके शरीर से अग्नि जैसा तेज निकल रहा था। कुंती भयभीत हो गईं। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा— “हे देव! मैंने तो केवल मंत्र की शक्ति परखने के लिए आपका आह्वान किया था। कृपया वापस लौट जाइए।” लेकिन सूर्यदेव बोले— “ऋषि का मंत्र व्यर्थ नहीं हो सकता। मुझे तुम्हें वरदान देना ही होगा।” कुंती रोने लगीं। वे लोक-लाज और समाज के भय से काँप रही थीं। तब सूर्यदेव ने उन्हें आश्वासन दिया— तुम्हारा कौमार्य नष्ट नहीं होगा। तुम्हारी पवित्रता बनी रहेगी। तुम्हें एक दिव्य पुत्र प्राप्त होगा। कर्ण का दिव्य जन्म कुछ समय बाद कुंती ने एक अद्भुत बालक को जन्म दिया। वह बालक साधारण नहीं था— उसके शरीर पर जन्मजात दिव्य कवच था। कानों में स्वर्णिम कुंडल चमक रहे थे। उसके चेहरे पर सूर्य जैसा तेज था। यह बालक आगे चलकर महान धनुर्धर कर्ण कहलाया। कुंती का सबसे बड़ा दुःख कुंती अविवाहित थीं। उस युग में बिना विवाह संतान होना बहुत बड़ा कलंक माना जाता था। वे जानती थीं कि यदि यह बात लोगों को पता चली तो— उनका अपमान होगा, उनके पिता की प्रतिष्ठा नष्ट होगी, समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने भारी मन से एक कठिन निर्णय लिया। उन्होंने नवजात शिशु को एक सुंदर टोकरी में रखा, उसके साथ कुछ वस्त्र और आभूषण रखे, और गंगा नदी में बहा दिया। वह क्षण कुंती के जीवन का सबसे बड़ा दुःख था। कहा जाता है कि जब टोकरी नदी में दूर जा रही थी, तब कुंती फूट-फूटकर रो रही थीं। अधिरथ और राधा द्वारा पालन वह टोकरी हस्तिनापुर के सारथी अधिरथ को मिली। उनकी पत्नी राधा निःसंतान थीं। उन्होंने उस बालक को भगवान का उपहार मानकर अपना पुत्र बना लिया। इसी कारण कर्ण को “राधेय” भी कहा गया। कर्ण और कुंती का रहस्य कुंती ने वर्षों तक यह रहस्य छिपाए रखा। जब महाभारत युद्ध होने वाला था, तब उन्होंने कर्ण को सच्चाई बताई कि— “तुम मेरे ज्येष्ठ पुत्र हो। तुम पांडवों के बड़े भाई हो।” लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कर्ण ने कहा— “माता, आपने मुझे जन्म तो दिया, परंतु माँ का प्रेम नहीं दिया। जिन्होंने मुझे पाला-पोसा, मैं उन्हें नहीं छोड़ सकता।” फिर भी उसने वचन दिया कि वह अर्जुन के अलावा किसी पांडव को नहीं मारेगा। कुंती ने श्रीकृष्ण से दुःख क्यों माँगा? महाभारत के बाद एक बार कुंती ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की— “हे कृष्ण! हमारे जीवन में दुःख आते रहें।” सभी यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गए। तब कुंती ने कहा— “जब-जब दुःख आया, तब-तब आपने हमारा साथ दिया। दुःख में मनुष्य भगवान को सबसे अधिक याद करता है। यदि सुख ही सुख मिल जाए, तो मनुष्य आपको भूल जाता है।” यह महाभारत की सबसे गहरी आध्यात्मिक शिक्षाओं में से एक मानी जाती है। कुंती के जीवन से मिलने वाली सीख 1. जिज्ञासा भी जीवन बदल सकती है कुंती की एक छोटी जिज्ञासा ने महाभारत के पूरे इतिहास की दिशा बदल दी। 2. समाज का भय कितना भारी हो सकता है कर्ण का त्याग केवल एक माँ का दुःख नहीं था, बल्कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था का कठोर सत्य भी था। 3. दुःख मनुष्य को भगवान के निकट लाता है कुंती का जीवन सिखाता है कि कठिनाइयाँ कभी-कभी आत्मा को मजबूत बनाती हैं। 4. त्याग और धैर्य उन्होंने जीवनभर अनेक दुःख सहे, लेकिन कभी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। कुंती की कथा केवल एक रानी की कहानी नहीं, बल्कि एक माँ के दर्द, त्याग, भय, धर्म और भक्ति की अमर गाथा है।
sn vyas
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13 days ago
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन के न आने से कुन्ती आदि की चिन्ता, नागलोक से भीमसेन का आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधन की कुचेष्टा...(दिन 380) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ न च प्रीणयते चक्षुः सदा दुर्योधनस्य सः । क्रूरोऽसौ दुर्मतिः क्षुद्रो राज्यलुब्धोऽनपत्रपः ।। १५ ।। 'वह सदा दुर्योधनकी आँखोंमें खटकता रहता है। दुर्योधन क्रूर, दुर्बुद्धि, क्षुद्र, राज्यका लोभी तथा निर्लज्ज है ।। १५ ।। निहन्यादपि तं वीरं जातमन्युः सुयोधनः । तेन मे व्याकुलं चित्तं हृदयं दह्यतीव च ।। १६ ।। 'अतः सम्भव है, वह क्रोधमें वीर भीमसेनको धोखा देकर मार भी डाले। इसी चिन्तासे मेरा चित्त व्याकुल हो उठा है, हृदय दग्ध-सा हो रहा है' ।। १६ ।। विदुर उवाच मैवं वदस्व कल्याणि शेषसंरक्षणं कुरु । प्रत्यादिष्टो हि दुष्टात्मा शेषेऽपि प्रहरेत् तव ।। १७ ।। विदुरजीने कहा-कल्याणी! ऐसी बात मुँहसे न निकालो, शेष पुत्रोंकी रक्षा करो। यदि दुर्योधनको उलाहना देकर इस विषयमें पूछ-ताछ की जायगी तो वह दुष्टात्मा तुम्हारे शेष पुत्रोंपर भी प्रहार कर सकता है ।। १७ ।। दीर्घायुषस्तव सुता यथोवाच महामुनिः । आगमिष्यति ते पुत्रः प्रीतिं चोत्पादयिष्यति ।। १८ ।। महामुनि व्यासने पहले जैसा कहा है, उसके अनुसार तुम्हारे ये सभी पुत्र दीर्घजीवी हैं, अतः तुम्हारा पुत्र भीमसेन कहीं भी क्यों न गया हो, अवश्य लौटेगा और तुम्हें आनन्द प्रदान करेगा ।। १८ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा ययौ विद्वान् विदुरः स्वं निवेशनम् । कुन्ती चिन्तापरा भूत्वा सहासीना सुतैगृहे ।। १९ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! विद्वान् विदुर यों कहकर अपने घरमें चले गये। इधर कुन्ती चिन्तामग्न होकर अपने चारों पुत्रोंके साथ चुपचाप घरमें बैठ रही ।। १९ ।। ततोऽष्टमे तु दिवसे प्रत्यबुध्यत पाण्डवः । तस्मिंस्तदा रसे जीर्णे सोऽप्रमेयबलो बली ।। २० ।। उधर, नागलोकमें सोये हुए बलवान् भीमसेन आठवें दिन, जब वह रस पच गया, जगे। उस समय उनके बलकी कोई सीमा नहीं रही ।। २० ।। तं दृष्ट्‌वा प्रतिबुध्यन्तं पाण्डवं ते भुजङ्गमाः । सान्त्वयामासुव्यग्रा वचनं चेदमब्रुवन् ।। २१ ।। पाण्डुनन्दन भीमको जगा हुआ देख सब नागोंने शान्त-चित्तसे उन्हें आश्वासन दिया और यह बात कही- ।। २१ ।। यत् ते पीतो महाबाहो रसोऽयं वीर्यसम्भृतः । तस्मान्नागायुतबलो रणेऽधृष्यो भविष्यसि ।। २२ ।। 'महाबाहो ! तुमने जो यह शक्तिपूर्ण रस पीया है, इसके कारण तुम्हारा बल दस हजार हाथियोंके समान होगा और तुम युद्धमें अजेय हो जाओगे ।। २२ ।। गच्छाद्य त्वं च स्वगृहं स्नातो दिव्यैरिमैर्जलैः । भ्रातरस्तेऽनुतप्यन्ति त्वां विना कुरुपुङ्गव ।। २३ ।। 'आज तुम इस दिव्य जलसे स्नान करो और अपने घर लौट जाओ। कुरुश्रेष्ठ ! तुम्हारे बिना तुम्हारे सब भाई निरन्तर दुःख और चिन्तामें डूबे रहते हैं' ।। २३ ।। ततः स्नातो महाबाहुः शुचिः शुक्लाम्बरस्रजः । ततो नागस्य भवने कृतकौतुकमङ्गलः ।। २४ ।। ओषधीभिर्विषघ्नीभिः सुरभीभिर्विशेषतः। भुक्तवान् परमान्नं च नागैर्दत्तं महाबलः ।। २५ ।। तब महाबाहु भीमसेन स्नान करके शुद्ध हो गये। उन्होंने श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण की। तत्पश्चात् नागराजके भवनमें उनके लिये कौतुक एवं मंगलाचार सम्पन्न किये गये। फिर उन महाबली भीमने विष-नाशक सुगन्धित ओषधियोंके साथ नागोंकी दी हुई खीर खायी ।। २४-२५ ।। पूजितो भुजगैर्वीर आशीर्भिश्चाभिनन्दितः । दिव्याभरणसंछन्नो नागानामन्त्र्य पाण्डवः ।। २६ ।। उदतिष्ठत् प्रहृष्टात्मा नागलोकादरिंदमः । उत्क्षिप्तः स तु नागेन जलाज्जलरुहेक्षणः ।। २७ ।। तस्मिन्नेव वनोद्देशे स्थापितः कुरुनन्दनः । ते चान्तर्दधिरे नागाः पाण्डवस्यैव पश्यतः ।। २८ ।। इसके बाद नागोंने वीर भीमसेनका आदर-सत्कार करके उन्हें शुभाशीर्वादोंसे प्रसन्न किया। दिव्य आभूषणोंसे विभूषित शत्रुदमन भीमसेन नागोंकी आज्ञा ले प्रसन्नचित्त हो नागलोकसे जानेको उद्यत हुए। तब किसी नागने कमलनयन कुरुनन्दन भीमको जलसे ऊपर उठाकर उसी वनमें (गंगातटवर्ती प्रमाणकोटिमें) रख दिया। फिर वे नाग पाण्डुपुत्र भीमके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये ।। २६-२८ ।। तत उत्थाय कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । आजगाम महाबाहुर्मातुरन्तिकमञ्जसा ।। २९ ।। तब महाबली कुन्तीकुमार महाबाहु भीमसेन वहाँसे उठकर शीघ्र ही अपनी माताके समीप आ गये ।। २९ ।। ततोऽभिवाद्य जननीं ज्येष्ठं भ्रातरमेव च । कनीयसः समाघ्राय शिरः स्वरिविमर्दनः ।। ३० ।। तदनन्तर शत्रुमर्दन भीमने माता और बड़े भाईको प्रणाम करके स्नेहपूर्वक छोटे भाइयों का सिर सूँघा ।। ३० ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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17 days ago
#महाभारत विराट पर्व महाभारत का वह महत्वपूर्ण चरण है जहाँ पांडवों के जीवन की सबसे कठिन परीक्षा होती है—अज्ञातवास। यह केवल छिपकर रहने की कथा नहीं, बल्कि धैर्य, बुद्धिमत्ता और सही समय का इंतज़ार करने की गाथा है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं: 🌿 अज्ञातवास की शुरुआत जुए में हारने के बाद पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास मिला। शर्त थी कि यदि अज्ञातवास के दौरान उनकी पहचान हो गई, तो फिर से 12 वर्ष का वनवास भुगतना पड़ेगा। धौम्य ऋषि के मार्गदर्शन में पांडवों ने योजना बनाई और अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र एक शमी वृक्ष में छिपा दिए। फिर वे पहुँचे 👉 मत्स्य देश के राजा विराट के महल में। 🎭 पांडवों के भेष और भूमिकाएँ हर पांडव ने अपनी पहचान छिपाने के लिए अलग रूप धारण किया: युधिष्ठिर → कंक (राजा का सलाहकार और जुआ साथी) भीम → वल्लभ (रसोइया और पहलवान) अर्जुन → बृहन्नला (नृत्य-संगीत शिक्षक) नकुल → ग्रंथिक (घोड़ों की देखभाल) सहदेव → तंतिपाल (गायों की देखभाल) द्रौपदी → सैरंध्री (रानी की दासी) द्रौपदी रानी सुदेष्णा की सेवा में रहने लगीं। ⚔️ कीचक वध – अन्याय के विरुद्ध संघर्ष राजा विराट का सेनापति 👉 कीचक बहुत शक्तिशाली लेकिन अत्यंत अहंकारी था। वह द्रौपदी (सैरंध्री) पर मोहित हो गया और उसे परेशान करने लगा। द्रौपदी ने यह अपमान सहन नहीं किया और भीम से सहायता मांगी। 🔥 योजना और अंत द्रौपदी ने कीचक को रात में मिलने के लिए बुलाया वहाँ पहले से छिपे भीम ने उसका सामना किया भीम और कीचक के बीच भयंकर युद्ध हुआ अंत में भीम ने उसे मार डाला कीचक के 105 भाइयों ने बदला लेने की कोशिश की, लेकिन भीम ने उन्हें भी समाप्त कर दिया। 👉 यह घटना दिखाती है कि अन्याय के खिलाफ खड़ा होना जरूरी है, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों। 🐄 गो-हरण और महान युद्ध कीचक की मृत्यु के बाद मत्स्य राज्य कमजोर लगने लगा। इस अवसर का लाभ उठाकर कौरवों ने हमला किया। 👉 दुर्योधन के नेतृत्व में सेना ने राज्य की गायों को चुरा लिया। राजा विराट के पुत्र सेना लेकर युद्ध के लिए निकले, लेकिन कौरवों की विशाल सेना देखकर डर गए। 🏹 अर्जुन का पराक्रम (बृहन्नला का रूप) तब बृहन्नला (अर्जुन) ने उत्तर का सारथी बनने का निर्णय लिया। अर्जुन उसे शमी वृक्ष के पास ले गए वहाँ से अपने गांडीव धनुष और दिव्य अस्त्र निकाले अपनी असली पहचान बताई अब शुरू हुआ एक ऐतिहासिक युद्ध: अर्जुन ने अकेले ही सामना किया— भीष्म द्रोण कर्ण ⚡ परिणाम अर्जुन ने अपनी अद्भुत धनुर्विद्या से पूरी कौरव सेना को पराजित कर दिया और गायों को वापस ले आए। 👉 यह घटना साबित करती है कि सही समय आने पर अपनी शक्ति दिखानी चाहिए। 👑 पहचान उजागर और सम्मान अज्ञातवास की अवधि पूरी होने के बाद पांडवों ने अपनी पहचान प्रकट की। राजा विराट आश्चर्यचकित और प्रसन्न हुए। उन्होंने पांडवों का सम्मान किया और मित्रता स्वीकार की। 💍 उत्तरा और अभिमन्यु का विवाह राजा विराट ने अपनी पुत्री 👉 उत्तरा का विवाह अर्जुन से करना चाहा। लेकिन अर्जुन ने कहा: 👉 “मैं उसका गुरु हूँ, इसलिए उसे पुत्री समान मानता हूँ।” फिर उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र 👉 अभिमन्यु से कराया गया। 🌟 विराट पर्व का गहरा संदेश यह पर्व हमें कई महत्वपूर्ण बातें सिखाता है: धैर्य और संयम: कठिन समय में शांत रहना रणनीति: सही समय का इंतजार करना सम्मान की रक्षा: अन्याय के खिलाफ खड़ा होना विनम्रता: शक्ति होने के बावजूद अहंकार न करना 👉 कुल मिलाकर, विराट पर्व बताता है कि “सच्ची ताकत वही है, जो सही समय पर सही तरीके से उपयोग हो।”
sn vyas
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23 days ago
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ऋषियों का कुन्ती और पाण्डवों को लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदि के हाथों सौंपना...(दिन 371) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ #महाभारत वैशम्पायन उवाच पाण्डोरुपरमं दृष्ट्वा देवकल्पा महर्षयः । ततो मन्त्रविदः सर्वे मन्त्रयांचक्रिरे मिथः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! राजा पाण्डुकी मृत्यु हुई देख वहाँ रहनेवाले, देवताओंके समान तेजस्वी सम्पूर्ण मन्त्रज्ञ महर्षियोंने आपसमें सलाह की ।। १ ।। तापसा ऊचुः हित्वा राज्यं च राष्ट्र च स महात्मा महायशाः । अस्मिन् स्थाने तपस्तप्त्वा तापसाञ्शरणं गतः ।। २ ।। तपस्वी बोले- महान् यशस्वी महात्मा राजा पाण्डु अपना राज्य तथा राष्ट्र छोड़कर इस स्थानपर तपस्या करते हुए तपस्वी मुनियोंकी शरणमें रहते थे ।। २ ।। स जातमात्रान् पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह । प्रादायोपनिधिं राजा पाण्डुः स्वर्गमितो गतः ।। ३ ।। वे राजा पाण्डु अपनी पत्नी और नवजात पुत्रोंको आपलोगोंके पास धरोहर रखकर यहाँसे स्वर्गलोक चले गये ।। ३ ।। तस्येमानात्मजान् देहं भार्या च सुमहात्मनः । स्वराष्ट्र गृह्य गच्छामो धर्म एष हि नः स्मृतः ।। ४ ।। उनके इन पुत्रोंको, पाण्डु और माद्रीके शरीरोंकी अस्थियोंको तथा उन महात्मा नरेशकी महारानी कुन्तीको लेकर हमलोग उनकी राजधानीमें चलें। इस समय हमारे लिये यही धर्म प्रतीत होता है ।। ४ ।। वैशम्पायन उवाच ते परस्परमामन्त्र्य देवकल्पा महर्षयः । पाण्डोः पुत्रान् पुरस्कृत्य नगरं नागसाह्वयम् ।। ५ ।। उदारमनसः सिद्धा गमने चक्रिरे मनः । भीष्माय पाण्डवान् दातुं धृतराष्ट्राय चैव हि ।। ६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन् ! इस प्रकार परस्पर सलाह करके उन देवतुल्य उदारचेता सिद्ध महर्षियोंने पाण्डवोंको भीष्म एवं धृतराष्ट्रके हाथों सौंप देनेके लिये पाण्डुपुत्रोंको आगे करके हस्तिनापुर नगरमें जानेका विचार किया ।। ५-६ ।। तस्मिन्नेव क्षणे सर्वे तानादाय प्रतस्थिरे । पाण्डोर्दारांश्च पुत्रांश्च शरीरे ते च तापसाः ।। ७ ।। उन सब तपस्वी मुनियोंने पाण्डुपत्नी कुन्ती, पाँचों पाण्डवों तथा पाण्डु और माद्रीके शरीरकी अस्थियोंको साथ लेकर उसी क्षण वहाँसे प्रस्थान कर दिया ।। ७ ।। सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला। प्रपन्ना दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तदमन्यत ।। ८ ।। पुत्रोंपर सदा स्नेह रखनेवाली कुन्ती पहले बहुत सुख भोग चुकी थी, परंतु अब विपत्तिमें पड़कर बहुत लंबे मार्गपर चल पड़ी; तो भी उसने स्वदेश जानेकी उत्कण्ठा अथवा महर्षियोंके योगजनित प्रभावसे उस मार्गको अल्प ही माना ।। ८ ।। सा त्वदीर्घेण कालेन सम्प्राप्ता कुरुजाङ्गलम् । वर्धमानपुरद्वारमाससाद यशस्विनी ।। ९ ।। यशस्विनी कुन्ती थोड़े ही समयमें कुरुजांगल देशमें जा पहुँची और नगरके वर्धमान नामक द्वारपर गयी ।। ९ ।। द्वारिणं तापसा ऊचू राजानं च प्रकाशय । ते तु गत्वा क्षणेनैव सभायां विनिवेदिताः ।। १० ।। तब तपस्वी मुनियोंने द्वारपालसे कहा- 'राजाको हमारे आनेकी सूचना दो!' द्वारपालने सभामें जाकर क्षणभरमें समाचार दे दिया ।। १० ।। तं चारणसहस्राणां मुनीनामागमं तदा । श्रुत्वा नागपुरे नृणां विस्मयः समपद्यत ।। ११ ।। सहस्रों चारणोंसहित मुनियोंका हस्तिनापुरमें आगमन सुनकर उस समय वहाँके लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ।। ११ ।। मुहूर्तोदित आदित्ये सर्वे बालपुरस्कृताः । सदारास्तापसान् द्रष्टुं निर्ययुः पुरवासिनः ।। १२ ।। दो घड़ी दिन चढ़ते-चढ़ते समस्त पुरवासी स्त्रियों और बालकोंको साथ लिये तपस्वी मुनियोंका दर्शन करनेके लिये नगरसे बाहर निकल आये ।। १२ ।। स्त्रीसङ्घाः क्षत्रस‌ङ्घाश्च यानसङ्घसमास्थिताः । ब्राह्मणैः सह निर्जग्मुर्बाह्मणानां च योषितः ।। १३ ।। झुंड-की-झुंड स्त्रियाँ और क्षत्रियोंके समुदाय अनेक सवारियोंपर बैठकर बाहर निकले। ब्राह्मणोंके साथ उनकी स्त्रियाँ भी नगरसे बाहर निकलीं ।। १३ ।। तथा विट्शूद्रसङ्घानां महान् व्यतिकरोऽभवत् । न कश्चिदकरोदीर्ष्यामभवन् धर्मबुद्धयः ।। १४ ।। शूद्रों और वैश्योंके समुदायका बहुत बड़ा मेला जुट गया। किसीके मन में ईर्ष्या का भाव नहीं था। सबकी बुद्धि धर्म में लगी हुई थी ।। १४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️