mahabharat katha

sn vyas
535 views
1 days ago
#महाभारत की कथा महाभारत की सबसे बड़ी दुश्मनी शायद कौरवों और पांडवों के बीच नहीं थी, न ही कर्ण और अर्जुन के बीच। असली कहानी दो ऐसे मित्रों की थी, जिनकी दोस्ती कभी इतनी गहरी थी कि वे एक-दूसरे के बिना भोजन तक नहीं करते थे, लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि वही मित्र एक-दूसरे के सबसे बड़े शत्रु बन गए। यह कहानी है गुरु द्रोणाचार्य और पांचाल नरेश द्रुपद की। दोनों की कहानी केवल मित्रता और दुश्मनी की कहानी नहीं थी, बल्कि इसी रिश्ते ने आगे चलकर द्रौपदी के जन्म, धृष्टद्युम्न के जन्म और महाभारत के महासंग्राम की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कथा उस समय से शुरू होती है जब महान आचार्य भारद्वाज के पुत्र द्रोण ज्ञान और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। द्रोण बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे, लेकिन उनका जीवन राजमहलों की सुख-सुविधाओं में नहीं बीता। दूसरी ओर पांचाल के युवराज द्रुपद राजसी वैभव में पले-बढ़े थे। दोनों की मुलाकात महर्षि भरद्वाज और बाद में अग्निवेश के आश्रम में हुई बताई जाती है। आश्रम का जीवन राजकुमार और ब्राह्मण पुत्र के बीच कोई भेद नहीं करता था। वहां सभी विद्यार्थी एक समान रहते, साथ भोजन करते, साथ शिक्षा लेते और कठिन तप तथा अभ्यास से अपने ज्ञान को बढ़ाते थे। इसी वातावरण में द्रोण और द्रुपद की मित्रता इतनी गहरी हो गई कि द्रुपद ने द्रोण से एक वचन तक कह दिया कि जब वह पांचाल का राजा बनेगा, तब उसका राज्य और उसकी संपत्ति उसके मित्र द्रोण के लिए भी उतनी ही होगी। उस समय दोनों युवा थे और भविष्य की राजनीति, राजसत्ता और परिस्थितियों का उन्हें कोई अंदाजा नहीं था। द्रोण ने इस वचन को अपने हृदय में संभालकर रखा, लेकिन समय किसी के लिए एक जैसा नहीं रहता। शिक्षा पूरी होने के बाद दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए। द्रुपद अपने पिता के बाद पांचाल की गद्दी पर बैठा और धीरे-धीरे एक शक्तिशाली राजा बन गया, जबकि द्रोण का जीवन संघर्षों से भर गया। विवाह के बाद द्रोण के घर पुत्र अश्वत्थामा का जन्म हुआ, लेकिन गरीबी इतनी अधिक थी कि अपने बच्चे के लिए दूध जुटाना भी कठिन हो गया। कहा जाता है कि एक दिन अश्वत्थामा ने दूसरे बच्चों को दूध पीते देखा और स्वयं भी दूध मांगने लगा, लेकिन द्रोण के पास उसे देने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे। इस घटना ने द्रोण के मन में अपने जीवन को बदलने की तीव्र इच्छा पैदा कर दी। उन्हें याद आया कि उनके पुराने मित्र द्रुपद अब एक विशाल राज्य के राजा हैं और कभी उन्होंने स्वयं कहा था कि उनका राज्य उनके मित्र के लिए भी खुला रहेगा। इसी आशा के साथ द्रोण पांचाल पहुंचे। वे राजमहल में गए और राजा द्रुपद से मिलने की इच्छा जताई। द्रोण को विश्वास था कि वर्षों बाद उनका मित्र उन्हें देखकर उसी तरह गले लगा लेगा जैसे गुरुकुल के दिनों में लगाया करता था। लेकिन राजदरबार में पहुंचते ही परिस्थितियां बदल चुकी थीं। द्रुपद अब राजा था और द्रोण एक निर्धन ब्राह्मण। द्रोण ने पुराने दिनों की मित्रता याद दिलाते हुए कहा कि हम दोनों ने साथ शिक्षा प्राप्त की थी और तुमने वचन दिया था कि तुम्हारा राज्य और तुम्हारी संपत्ति मेरे लिए भी होगी। लेकिन द्रुपद ने उस समय द्रोण की स्थिति देखकर उस मित्रता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि मित्रता समान लोगों के बीच होती है, राजा और निर्धन ब्राह्मण के बीच नहीं। यह बात द्रोण के हृदय में तीर की तरह लगी। जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने बचपन में अपना भोजन बांटा था, उसी ने आज उनकी गरीबी का मजाक बना दिया था। द्रोण ने उसी क्षण प्रतिशोध की प्रतिज्ञा कर ली। लेकिन उन्होंने स्वयं राजा द्रुपद पर हमला नहीं किया। उन्होंने तय किया कि वह ऐसे शिष्यों को तैयार करेंगे जो उनकी ओर से इस अपमान का उत्तर देंगे। यही वह मोड़ था जिसने आगे चलकर हस्तिनापुर के इतिहास को बदल दिया। कुछ समय बाद द्रोण हस्तिनापुर पहुंचे और वहां कौरवों तथा पांडवों के गुरु बने। उन्होंने राजकुमारों को धनुर्विद्या, युद्धकला और दिव्यास्त्रों का ज्ञान देना शुरू किया। अर्जुन उनकी विशेष प्रतिभा वाले शिष्य बने और द्रोण ने उसे ऐसा धनुर्धर बनाने का संकल्प लिया जो संसार में अद्वितीय हो। द्रोण ने अपने शिष्यों से गुरु दक्षिणा में राजा द्रुपद को बंदी बनाकर लाने की मांग की। पहले कौरवों ने प्रयास किया, लेकिन वे असफल रहे। इसके बाद अर्जुन और उसके भाइयों ने द्रुपद की सेना को पराजित किया और द्रुपद को बंदी बनाकर द्रोण के सामने ला खड़ा किया। अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी थीं। जिस द्रोण को कभी द्रुपद ने अपने बराबर का मित्र मानने से इनकार किया था, वही द्रोण अब उसके सामने विजेता के रूप में खड़ा था। द्रोण ने द्रुपद से कहा कि तुमने कहा था मित्रता केवल समान लोगों में होती है, इसलिए अब मैं तुम्हारा आधा राज्य ले रहा हूं और शेष आधा तुम्हें वापस देता हूं, ताकि हम दोनों फिर समान होकर मित्र कहलाने योग्य हों। यह केवल बदला नहीं था, बल्कि द्रोण के मन में वर्षों से जमा अपमान का उत्तर था। लेकिन द्रुपद के मन में भी आग जल उठी। वह इस अपमान को भूल नहीं सका। उसके मन में एक ही इच्छा पैदा हुई कि ऐसा पुत्र जन्म ले जो गुरु द्रोण का वध कर सके। इसी इच्छा ने एक ऐसी घटना को जन्म दिया जिसने महाभारत के युद्ध की दिशा बदल दी। द्रुपद ने महान ऋषियों की सहायता से एक यज्ञ कराया। मान्यता के अनुसार उस यज्ञ की अग्नि से एक दिव्य योद्धा प्रकट हुआ, जिसका नाम धृष्टद्युम्न रखा गया। उसके जन्म का उद्देश्य ही द्रोणाचार्य का वध करना बताया गया। उसी अग्नि से एक दिव्य कन्या भी प्रकट हुई, जो आगे चलकर द्रौपदी के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार एक पुराने मित्र के अपमान और प्रतिशोध ने अग्नि से दो ऐसे पात्रों को जन्म दिया जिनकी भूमिका महाभारत के सबसे बड़े घटनाक्रमों में रही। सबसे विचित्र बात यह थी कि धृष्टद्युम्न, जिसका जन्म ही द्रोणाचार्य के वध के लिए हुआ था, आगे चलकर उसी द्रोणाचार्य से युद्ध की शिक्षा लेने पहुंचा। द्रोणाचार्य जानते थे कि यह युवक भविष्य में उनकी मृत्यु का कारण बन सकता है, फिर भी उन्होंने उसे शस्त्रविद्या सिखाई। यही महाभारत की सबसे गहरी विडंबनाओं में से एक है कि कभी-कभी मनुष्य अपने ही भविष्य को अपने हाथों से तैयार करता है। समय बीतता गया और अंततः वह दिन आया जब कौरवों और पांडवों के बीच कुरुक्षेत्र का महासंग्राम शुरू हुआ। गुरु द्रोण कौरवों की ओर से सेनापति बने, जबकि धृष्टद्युम्न पांडवों की सेना के प्रमुख सेनापतियों में शामिल हुआ। अब वह पुरानी दुश्मनी एक बार फिर युद्धभूमि में आमने-सामने खड़ी थी। द्रोणाचार्य ने युद्ध में ऐसी भयंकर शक्ति दिखाई कि पांडवों की सेना के लिए उन्हें रोकना लगभग असंभव हो गया। वे अकेले ही हजारों योद्धाओं पर भारी पड़ रहे थे। तब उन्हें रोकने के लिए एक ऐसी योजना बनाई गई जिसने धर्म और युद्धनीति दोनों के बीच कठिन प्रश्न खड़ा कर दिया। द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा से अत्यंत प्रेम करते थे। श्रीकृष्ण जानते थे कि जब तक द्रोण को विश्वास रहेगा कि अश्वत्थामा जीवित है, तब तक वे शस्त्र नहीं छोड़ेंगे। इसलिए एक हाथी का नाम भी अश्वत्थामा रखा गया था। युद्ध में उस हाथी का वध हुआ और युधिष्ठिर ने द्रोण से कहा कि अश्वत्थामा मारा गया है। इसके बाद उन्होंने धीमी आवाज में स्पष्ट किया कि वह हाथी था। लेकिन युद्ध के शोर में द्रोणाचार्य तक केवल इतना पहुंचा कि अश्वत्थामा मारा गया। अपने पुत्र की मृत्यु की खबर सुनकर उनका मन टूट गया। उन्होंने अपने अस्त्र नीचे रख दिए और युद्धभूमि में ध्यान की अवस्था में बैठ गए। यही वह क्षण था जिसका वर्षों से इंतजार किया जा रहा था। धृष्टद्युम्न उनके सामने पहुंचा और उसने द्रोणाचार्य का वध कर दिया। इस प्रकार जिस योद्धा का जन्म ही द्रोण के अंत के लिए हुआ था, उसी ने अंततः अपने उद्देश्य को पूरा किया। लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसकी शुरुआत किसी युद्ध से नहीं हुई थी। शुरुआत हुई थी दो बच्चों की मासूम दोस्ती से, जिन्होंने गुरुकुल में साथ बैठकर भोजन किया था, साथ शिक्षा पाई थी और एक-दूसरे को अपना सबसे प्रिय मित्र माना था। फिर एक वचन, एक अपमान और एक प्रतिशोध ने उस दोस्ती को ऐसी दुश्मनी में बदल दिया जिसका प्रभाव कई पीढ़ियों तक चला। द्रोणाचार्य के जीवन में भी विरोधाभास कम नहीं थे। वे महान गुरु थे, उन्होंने अर्जुन जैसे अद्वितीय धनुर्धर को तैयार किया, कौरवों और पांडवों को युद्धकला सिखाई, लेकिन उनका अपना जीवन भी मोह, अपमान और प्रतिशोध से प्रभावित रहा। दूसरी ओर द्रुपद एक शक्तिशाली राजा थे, लेकिन उनके भीतर भी पुराने अपमान की आग शांत नहीं हुई। इसी आग से धृष्टद्युम्न और द्रौपदी का जन्म हुआ, और आगे चलकर द्रौपदी का जीवन स्वयं महाभारत के सबसे बड़े संघर्ष का केंद्र बन गया। इसलिए महाभारत को केवल कौरवों और पांडवों की लड़ाई समझना अधूरा है। इसके पीछे असंख्य रिश्तों, वचनों, अपमानों, प्रतिज्ञाओं और कर्मों की एक लंबी श्रृंखला थी। द्रोण और द्रुपद की कहानी हमें यह बताती है कि कभी-कभी एक छोटी-सी घटना भी भविष्य में बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकती है। एक समय के दो मित्र इतने दूर हो गए कि उनके बीच की दुश्मनी ने अग्नि से जन्मे योद्धा को जन्म दिया, उस योद्धा ने उसी गुरु से शिक्षा ली जिसके वध के लिए वह पैदा हुआ था, और अंततः कुरुक्षेत्र की धरती पर वही शिष्य अपने गुरु की मृत्यु का कारण बना। यही महाभारत की सबसे बड़ी विडंबना है—जहां रिश्ते सीधे नहीं होते, कर्म कभी अकेले नहीं आते और एक व्यक्ति का निर्णय आने वाली कई पीढ़ियों की कहानी बदल सकता है। द्रोण और द्रुपद की मित्रता ने जो बीज बोया था, वह प्रतिशोध बनकर अंकुरित हुआ, धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के रूप में सामने आया और अंततः कुरुक्षेत्र के महासंग्राम में अपनी परिणति तक पहुंचा। इसीलिए महाभारत की असली शक्ति केवल उसके युद्ध में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में छिपी है जो युद्ध से बहुत पहले बन चुके थे और जिनके परिणाम युद्ध समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक दिखाई देते रहे। जय श्री कृष्णा 🙏🏻
sn vyas
755 views
7 days ago
#महाभारत की कथा महाभारत का महान युद्ध समाप्त हो चुका था। धर्म की स्थापना हो गई थी और अधर्म का अंत हो चुका था। कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र अब शांत था, लेकिन उस युद्ध की स्मृतियाँ अभी भी अर्जुन के मन में जीवित थीं। उन्होंने अपने जीवन में अनेक चमत्कार देखे थे। भगवान श्रीकृष्ण का सखा होने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त था। उन्होंने युद्ध के मध्य भगवान का विराट विश्वरूप भी देखा था, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ था। फिर भी उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठता था। क्या वास्तव में भगवान के सभी स्वरूपों को कोई जान सकता है? क्या उनकी लीलाएँ और रूप केवल उतने ही हैं, जितने मनुष्य देख पाता है? अर्जुन जितना भगवान के निकट आते गए, उतना ही उन्हें यह अनुभव होने लगा कि श्रीकृष्ण का वास्तविक स्वरूप अनंत, असीम और मानव बुद्धि से परे है। एक दिन अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के साथ एक शांत वन में बैठे थे। वातावरण अत्यंत पवित्र था। मंद-मंद वायु बह रही थी, पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई दे रहा था और चारों ओर प्रकृति की अद्भुत छटा फैली हुई थी। अर्जुन भगवान के चरणों में बैठे थे। कुछ देर मौन रहने के बाद उन्होंने विनम्र भाव से कहा, "हे माधव! मैंने आपका विराट स्वरूप देखा, आपकी अनगिनत लीलाएँ देखीं, फिर भी मेरे मन में ऐसा लगता है कि मैं आपको पूर्ण रूप से कभी जान ही नहीं पाया। आपकी महिमा अनंत है। यदि आपकी इच्छा हो तो मुझे अपने किसी ऐसे दिव्य रहस्य का दर्शन कराइए, जिसे आज तक किसी ने न देखा हो।" भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने अर्जुन की ओर प्रेम से देखा। वे जानते थे कि यह प्रश्न अहंकार से नहीं, बल्कि सच्ची जिज्ञासा और भक्ति से उत्पन्न हुआ है। उन्होंने कहा, "पार्थ, परमात्मा को किसी एक रूप में बाँधा नहीं जा सकता। मैं केवल मनुष्य नहीं हूँ, केवल देवता नहीं हूँ, केवल विराट ब्रह्मांड भी नहीं हूँ। मैं समस्त सृष्टि में विद्यमान हूँ। यदि तुम्हारा मन वास्तव में इस सत्य को समझने के लिए तैयार है, तो आज मैं तुम्हें अपना एक अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमय स्वरूप दिखाऊँगा।" इतना कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया प्रकट की। अचानक वातावरण बदलने लगा। चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। वृक्ष स्थिर हो गए, वायु रुक गई और समय मानो थम गया। अर्जुन ने देखा कि भगवान का सामान्य मानवीय स्वरूप धीरे-धीरे परिवर्तित होने लगा। उनके सामने जो दिव्य रूप प्रकट हुआ, उसे देखकर अर्जुन आश्चर्य से स्तब्ध रह गए। उन्होंने ऐसा स्वरूप पहले कभी नहीं देखा था। भगवान का यह अद्भुत स्वरूप नवगुंजर कहलाया। यह किसी एक प्राणी का शरीर नहीं था, बल्कि नौ विभिन्न जीवों के दिव्य अंगों से निर्मित था। उनके मुख पर मुर्गे का सिर था, जो जागरूकता और सतर्कता का प्रतीक था। उनकी गर्दन मोर की थी, जो सौंदर्य, दिव्यता और आनंद का प्रतीक मानी जाती है। उनके शरीर पर बैल का कूबड़ था, जो धैर्य, परिश्रम और धर्म का प्रतिनिधित्व करता था। उनकी कमर सिंह की थी, जो वीरता और निर्भीकता का प्रतीक थी। उनके तीन पैर हाथी के थे, जो स्थिरता, बुद्धिमत्ता और अपार शक्ति को दर्शाते थे। चौथा पैर बाघ का था, जो साहस, गति और संकल्प का प्रतीक था। उनकी पूँछ सर्प की भाँति लहराती थी, जो समय, ऊर्जा और अनंत शक्ति का संकेत देती थी। उनके शरीर में अन्य पशु-पक्षियों के दिव्य अंग भी समाहित थे, जो समस्त जीवों की एकता का प्रतीक थे। उनके एक हाथ में पूर्ण विकसित कमल का पुष्प सुशोभित था, जो पवित्रता, ज्ञान और परम चेतना का प्रतीक था। अर्जुन कुछ क्षणों तक समझ ही नहीं पाए कि उनके सामने कौन खड़ा है। यह कोई देवता था, कोई दिव्य प्राणी था या स्वयं प्रकृति का अद्भुत रूप? उनके हाथ अनायास ही गांडीव पर चले गए, किंतु अगले ही क्षण उनकी दृष्टि भगवान के हाथ में धारण किए हुए कमल पर पड़ी। उसी क्षण उनके हृदय में दिव्य प्रकाश का अनुभव हुआ। उन्होंने उस रूप से वही करुणा, वही प्रेम और वही अनंत तेज अनुभव किया, जो सदैव भगवान श्रीकृष्ण से अनुभव होता था। अर्जुन तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण रूप नहीं, बल्कि स्वयं उनके प्रिय सखा श्रीकृष्ण का एक अत्यंत रहस्यमय दिव्य स्वरूप है। अर्जुन ने तुरंत अपना गांडीव नीचे रख दिया। वे दोनों हाथ जोड़कर भगवान के चरणों में झुक गए। उनकी आँखों से भक्ति के आँसू बहने लगे। उन्होंने कहा, "हे प्रभु! मैं वास्तव में आपको कभी जान ही नहीं पाया। आप किसी एक रूप में सीमित नहीं हैं। आपकी महिमा तो अनंत है।" भगवान श्रीकृष्ण ने मधुर स्वर में कहा, "पार्थ, यही इस रूप का रहस्य है। मनुष्य प्रायः यह सोचता है कि ईश्वर केवल किसी एक मूर्ति, एक शरीर, एक जाति या एक रूप में विद्यमान हैं। परंतु सत्य इससे कहीं अधिक व्यापक है। इस सृष्टि का प्रत्येक जीव, प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक नदी और प्रत्येक जीवन मेरे ही अस्तित्व का अंश है। जो सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा को देखता है, वही वास्तविक ज्ञान प्राप्त करता है। नवगुंजर का यह स्वरूप इसी सत्य का प्रतीक है कि संपूर्ण सृष्टि अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही दिव्य चेतना की अभिव्यक्ति है।" भगवान आगे बोले, "मुर्गे की जागरूकता, मोर की सुंदरता, सिंह का साहस, हाथी की बुद्धि, बैल का धैर्य, बाघ की शक्ति, सर्प की ऊर्जा और अन्य सभी जीवों के गुण एक ही परम सत्य में समाहित हैं। जब तक मनुष्य भेदभाव देखता है, तब तक वह मुझे पूर्ण रूप से नहीं जान सकता। जब वह प्रत्येक जीव में उसी दिव्य चेतना का दर्शन करता है, तभी वह मेरे वास्तविक स्वरूप को समझ पाता है।" अर्जुन का हृदय आनंद और विनम्रता से भर गया। उन्होंने अनुभव किया कि भगवान वास्तव में समस्त सृष्टि में व्याप्त हैं। उन्होंने भगवान के उस दिव्य नवगुंजर स्वरूप की स्तुति की और पूर्ण समर्पण के साथ कहा, "हे प्रभु! अब मैं समझ गया हूँ कि आपका स्वरूप किसी सीमा में बँधा हुआ नहीं है। आप ही समस्त प्राणियों में, समस्त जगत में और प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं।" कुछ ही क्षणों बाद वह रहस्यमय स्वरूप धीरे-धीरे विलीन होने लगा। भगवान पुनः अपने मधुर मानवीय स्वरूप में प्रकट हुए। वन का वातावरण फिर सामान्य हो गया, पक्षियों का कलरव लौट आया और समय अपनी गति से चलने लगा। किंतु अर्जुन का जीवन अब पहले जैसा नहीं रहा। उन्हें वह ज्ञान प्राप्त हो चुका था, जो केवल भगवान की विशेष कृपा से ही संभव था। समय बीतता गया। युग बदल गए। किंतु इस अद्भुत नवगुंजर स्वरूप की स्मृति विशेष रूप से ओडिशा की धार्मिक परंपराओं में जीवित रही। ओड़िया साहित्य के महान कवि सरला दास द्वारा रचित सरला महाभारत में इस दिव्य प्रसंग का विस्तार से वर्णन मिलता है। वहाँ नवगुंजर को भगवान श्रीकृष्ण की अनंत शक्ति, समस्त जीवों की एकता और परम चेतना के प्रतीक के रूप में बताया गया है। ओडिशा की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ भी उसी अनंत और सर्वव्यापक परम तत्व के प्रतीक हैं। इसी कारण अनेक विद्वान और भक्त भगवान जगन्नाथ की परंपरा में नवगुंजर की भावना को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। विशेष रूप से श्रीजगन्नाथ मंदिर के शिखर पर स्थित पवित्र नीलचक्र को भगवान की अनंत, रहस्यमयी और सर्वव्यापक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। अनेक श्रद्धालु विश्वास करते हैं कि जैसे नवगुंजर रूप समस्त सृष्टि की एकता का संदेश देता है, वैसे ही भगवान जगन्नाथ भी किसी एक जाति, धर्म, वर्ग या समुदाय के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता और समस्त जीव-जगत के भगवान हैं। नवगुंजर की यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि परमात्मा को केवल मंदिरों या मूर्तियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक जीवन और संपूर्ण सृष्टि में समान रूप से विद्यमान हैं। जो व्यक्ति हर जीव में ईश्वर का दर्शन करता है, सभी के प्रति करुणा, प्रेम और सम्मान रखता है, वही वास्तविक भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त करता है। यही भगवान श्रीकृष्ण के रहस्यमय नवगुंजर स्वरूप का सबसे गहरा और सनातन संदेश है।