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- sn vyas#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣8️⃣2️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः सूर्यकन्या तपती को देखकर राजा संवरण का मोहित होना...(दिन 482) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अर्जुन उवाच तापत्य इति यद् वाक्यमुक्तवानसि मामिह । तदहं ज्ञातुमिच्छामि तापत्यार्थ विनिश्चितम् ।। १ ।। अर्जुनने कहा- गन्धर्व! तुमने 'तपतीनन्दन' कहकर जो बात यहाँ मुझसे कही है, उसके सम्बन्धमें मैं यह जानना चाहता हूँ कि तापत्यका निश्चित अर्थ क्या है? ।। १ ।। तपती नाम का चैषा तापत्या यत्कृते वयम् । कौन्तेया हि वयं साधो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।। २ ।। साधुस्वभाव गन्धर्वराज! यह तपती कौन है, जिसके कारण हमलोग तापत्य कहलाते हैं? हम तो अपनेको कुन्तीका पुत्र समझते हैं। अतः 'तापत्य' का यथार्थ रहस्य क्या है, यह जाननेकी मुझे बड़ी इच्छा हो रही है ।। २ ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तः स गन्धर्वः कुन्तीपुत्रं धनंजयम् । विश्रुतां त्रिषु लोकेषु श्रावयामास वै कथाम् ।। ३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! उनके यों कहनेपर गन्धर्वने कुन्तीनन्दन धनंजयको वह कथा सुनानी प्रारम्भ की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ।। ३ ।। गन्धर्व उवाच हन्त ते कथयिष्यामि कथामेतां मनोरमाम् । यथावदखिलां पार्थ सर्वबुद्धिमतां वर ।। ४ ।। गन्धर्व बोला- समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार ! इस विषयमें एक बहुत मनोरम कथा है, जिसे मैं यथार्थ एवं पूर्णरूपसे आपको सुनाऊँगा ।। ४ ।। उक्तवानस्मि येन त्वां तापत्य इति यद् वचः । तत् तेऽहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना भव ।। ५ ।। मैंने जिस कारण अपने वक्तव्यमें तुम्हें 'तापत्य' कहा है, वह बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। ५ ।। य एष दिवि धिष्ण्येन नाकं व्याप्नोति तेजसा । एतस्य तपती नाम बभूव सदृशी सुता ।। ६ ।। विवस्वतो वै देवस्य सावित्र्यवरजा विभो । विश्रुता त्रिषु लोकेषु तपती तपसा युता ।। ७ ।। ये जो आकाशमें उदित हो अपने तेजोमण्डलके द्वारा यहाँसे स्वर्गलोकतक व्याप्त हो रहे हैं, इन्हीं भगवान् सूर्यदेवके तपती नामकी एक पुत्री हुई, जो पिताके अनुरूप ही थी। प्रभो! वह सावित्रीदेवीकी छोटी बहिन थी। वह तपस्यामें संलग्न रहनेके कारण तीनों लोकोंमें तपती नामसे विख्यात हुई ।। ६-७ ।। न देवी नासुरी चैव न यक्षी न च राक्षसी । नाप्सरा न च गन्धर्वी तथा रूपेण काचन ।। ८ ।। उस समय देवता, असुर, यक्ष एवं राक्षस जातिकी स्त्री, कोई अप्सरा तथा गधर्वपत्नी भी उसके समान रूपवती न थी ।। ८ ।। सुविभक्तानवद्याङ्गी स्वसितायतलोचना । स्वाचारा चैव साध्वी च सुवेषा चैव भामिनी ।। ९ ।। न तस्याः सदृशं कंचित् त्रिषु लोकेषु भारत । भर्तारं सविता मेने रूपशीलगुणश्रुतैः ।। १० ।। उसके शरीरका एक-एक अवयव बहुत सुन्दर, सुविभक्त और निर्दोष था। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी और कजरारी थीं। वह सुन्दरी सदाचार, साधु-स्वभाव और मनोहर वेशसे सुशोभित थी। भारत ! भगवान् सूर्यने तीनों लोकोंमें किसी भी पुरुषको ऐसा नहीं पाया, जो रूप, शील, गुण और शास्त्रज्ञानकी दृष्टिसे उसका पति होनेयोग्य हो ।। ९-१० ।। सम्प्राप्तयौवनां पश्यन् देयां दुहितरं तु ताम् । नोपलेभे ततः शान्तिं सम्प्रदानं विचिन्तयन् ।। ११ ।। वह युवावस्थाको प्राप्त हो गयी। अब उसका किसीके साथ विवाह कर देना आवश्यक था। उसे उस अवस्थामें देखकर भगवान् सूर्य इस चिन्तामें पड़े कि इसका विवाह किसके साथ किया जाय। यही सोचकर उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ।। ११ ।। अथर्क्षपुत्रः कौन्तेय कुरूणामृषभो बली । सूर्यमाराधयामास नृपः संवरणस्तदा ।। १२ ।। कुन्तीनन्दन ! उन्हीं दिनों महाराज ऋक्षके पुत्र राजा संवरण कुरुकुलके श्रेष्ठ एवं बलवान् पुरुष थे। उन्होंने भगवान् सूर्यकी आराधना प्रारम्भ की ।। १२ ।। अर्घ्यमाल्योपहाराद्यैर्गन्धैश्च नियतः शुचिः । नियमैरुपवासैश्च तपोभिर्विविधैरपि ।। १३ ।। शुश्रूषुरनहंवादी शुचिः पौरवनन्दन । अंशुमन्तं समुद्यन्तं पूजयामास भक्तिमान् ।। १४ ।। पौरवनन्दन ! वे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर पवित्र हो अर्घ्य, पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य आदि सामग्रियोंसे तथा भाँति-भाँतिके नियम, व्रत एवं तपस्याओंद्वारा बड़े भक्तिभावसे उदय होते हुए सूर्यकी पूजा करते थे। उनके हृदयमें सेवाका भाव था। वे शुद्ध तथा अहंकारशून्य थे ।। १३-१४ ।। ततः कृतज्ञं धर्मज्ञं रूपेणासदृशं भुवि । तपत्याः सदृशं मेने सूर्यः संवरणं पतिम् ।। १५ ।। रूप में इस पृथ्वी पर उनके समान दूसरा कोई पुरुष नहीं था। वे कृतज्ञ और धर्मज्ञ थे। अतः सूर्यदेव ने राजा संवरण को ही तपती के योग्य पति माना ।। १५ ।। दातुमैच्छत् ततः कन्यां तस्मै संवरणाय ताम् । नृपोत्तमाय कौख्य विश्रुताभिजनाय च ।। १६ ।। कुरुनन्दन ! उन्होंने नृपश्रेष्ठ संवरणको, जिनका उत्तम कुल सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात था, अपनी कन्या देनेकी इच्छा की ।। १६ ।। यथा हि दिवि दीप्तांशुः प्रभासयति तेजसा । तथा भुवि महीपालो दीप्त्या संवरणोऽभवत् ।। १७ ।। जैसे आकाशमें उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार पृथ्वीपर राजा संवरण अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित थे ।। १७ ।। यथार्चयन्ति चादित्यमुद्यन्तं ब्रह्मवादिनः । तथा संवरणं पार्थ ब्राह्मणावरजाः प्रजाः ।। १८ ।। पार्थ! जैसे ब्रह्मवादी महर्षि उगते हुए सूर्यकी आराधना करते हैं, उसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य आदि प्रजाएँ महाराज संवरणकी उपासना करती थीं ।। १८ ।। स सोममति कान्तत्वादादित्यमति तेजसा । बभूव नृपतिः श्रीमान् सुहृदां दुर्हदामपि ।। १९ ।। वे अपनी कमनीय कान्तिसे चन्द्रमाको और तेजसे सूर्यदेवको भी तिरस्कृत करते थे। राजा संवरण मित्रों तथा शत्रुओंकी मण्डलीमें भी अपनी दिव्य शोभासे प्रकाशित होते थे ।। १९ ।। एवंगुणस्य नृपतेस्तथावृत्तस्य कौरव । तस्मै दातुं मनश्चक्रे तपतीं तपनः स्वयम् ।। २० ।। कुरुनन्दन! ऐसे उत्तम गुणों से विभूषित तथा श्रेष्ठ आचार-व्यवहार से युक्त राजा संवरण को भगवान् सूर्य ने स्वयं ही अपनी पुत्री तपती को देने का निश्चय कर लिया ।। २० ।। स कदाचिदथो राजा श्रीमानमितविक्रमः । चचार मृगयां पार्थ पर्वतोपवने किल ।। २१ ।। कुन्तीनन्दन ! एक दिन अमितपराक्रमी श्रीमान् राजा संवरण पर्वतके समीपवर्ती उपवनमें हिंसक पशुओंका शिकार कर रहे थे ।। २१ ।। चरतो मृगयां तस्य क्षुत्पिपासासमन्वितः । ममार राज्ञः कौन्तेय गिरावप्रतिमो हयः ।। २२ ।। स मृताश्वश्चरन् पार्थ पद्भ्यामेव गिरौ नृपः । ददर्शासदृशीं लोके कन्यामायतलोचनाम् ।। २३ ।। कुन्तीपुत्र ! शिकार खेलते समय ही राजाका अनुपम अश्व पर्वतपर भूख-प्याससे पीड़ित हो मर गया। पार्थ! घोड़ेकी मृत्यु हो जानेसे राजा संवरण पैदल ही उस पर्वत-शिखरपर विचरने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने एक विशाललोचना कन्या देखी, जिसकी समता करनेवाली स्त्री कहीं नहीं थी ।। २२-२३ ।। स एक एकामासाद्य कन्यां परबलार्दनः । तस्थौ नृपतिशार्दूलः पश्यन्नविचलेक्षणः ।। २४ ।। शत्रुओंकी सेनाका संहार करनेवाले नृपश्रेष्ठ संवरण अकेले थे और वह कन्या भी अकेली ही थी। उसके पास पहुँचकर राजा एकटक नेत्रोंसे उसकी ओर देखते हुए खड़े रह गये ।। २४ ।। स हि तां तर्कयामास रूपतो नृपतिः श्रियम् । पुनः संतर्कयामास रवेभ्रष्टामिव प्रभाम् ।। २५ ।। पहले तो उसका रूप देखकर नरेशने अनुमान किया कि हो-न-हो ये साक्षात् लक्ष्मी हैं; फिर उनके ध्यानमें यह बात आयी कि सम्भव है, भगवान् सूर्यकी प्रभा ही सूर्यमण्डलसे च्युत होकर इस कन्याके रूपमें आकाशसे पृथ्वीपर आ गयी हो ।। २५ ।। वपुषा वर्चसा चैव शिखामिव विभावसोः । प्रसन्नत्वेन कान्त्या च चन्द्ररेखामिवामलाम् ।। २६ ।। शरीर और तेजसे वह आगकी ज्वाला-सी जान पड़ती थी। उसकी प्रसन्नता और कमनीय कान्तिसे ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह निर्मल चन्द्रकला हो ।। २६ ।। गिरिपृष्ठे तु सा यस्मिन् स्थिता स्वसितलोचना । विभ्राजमाना शुशुभे प्रतिमेव हिरण्मयी ।। २७ ।। सुन्दर कजरारे नेत्रोंवाली वह दिव्य कन्या जिस पर्वत-शिखरपर खड़ी थी, वहाँ वह सोनेकी दमकती हुई प्रतिमा-सी सुशोभित हो रही थी ।। २७ ।। तस्या रूपेण स गिरिर्वेषेण च विशेषतः । स सवृक्षक्षुपलतो हिरण्मय इवाभवत् ।। २८ ।। विशेषतः उसके रूप और वेशसे विभूषित हो वृक्ष, गुल्म और लताओंसहित वह पर्वत सुवर्णमय-सा जान पड़ता था ।। २८ ।। अवमेने च तां दृष्ट्वा सर्वलोकेषु योषितः । अवाप्तं चात्मनो मेने स राजा चक्षुषः फलम् ।। २९ ।। उसे देखकर राजा संवरणकी समस्त लोकोंकी सुन्दरी युवतियोंमें अनादर-बुद्धि हो गयी। राजा यह मानने लगे कि आज मुझे अपने नेत्रोंका फल मिल गया ।। २९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️1420
- 213590Mahabharat mein . #mahabharat822
- sn vyas🔥 कुरुक्षेत्र की महासमर का सबसे बड़ा और खौफनाक सच—मरने से पहले दुर्योधन ने द्रौपदी के सामने कबूला अपने यू महाविनाश का असली कारण! जिस प्रसंग को पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाएं! ⚔️🩸 कुरुक्षेत्र की अंतिम संध्या और एक भीषण सत्य कुरुक्षेत्र का विनाशकारी युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरवों की सेना का सर्वनाश हो चुका था। अहंकार के पर्वत पर बैठने वाला चक्रवर्ती सम्राट दुर्योधन आज पराजित, रक्त से लथपथ और मृत्यु की प्रतीक्षा में द्वैत सरोवर के ठंडे पानी में छिपा बैठा था। यह केवल एक साम्राज्य का पतन नहीं था, बल्कि अधर्म के अहंकार के चूर-चूर होने की अंतिम गाथा थी। इसी क्षण, पांचों पांडव अपनी महारानी द्रौपदी के साथ उस स्थान पर पहुँचे। द्रौपदी, जिनके केश वर्षों से खुले हुए थे और जिनका अपमान ही इस भीषण युद्ध की मुख्य अग्नि बना था, आज अपने सबसे बड़े शत्रु के इस दयनीय और अंतिम रूप को देखने के लिए खड़ी थीं। यहीं से शुरू होता है इतिहास का वह रहस्यमयी और मर्मस्पर्शी संवाद, जिसने पतन के हर भ्रम को हमेशा के लिए साफ कर दिया। द्रौपदी और दुर्योधन का अंतिम संवाद सरोवर के तट पर जब द्रौपदी की दृष्टि मृत्युशै्या पर पड़े दुर्योधन पर पड़ी, तो उनके भीतर का वर्षों पुराना क्षोभ एक बार फिर जाग उठा। उस स्त्री की पीड़ा, जिसने भरी सभा में चीरहरण का अपमान झेला था, उसकी आँखों में स्पष्ट झलक रही थी। द्रौपदी के शब्द: द्रौपदी ने तीखे और विह्वल स्वरों में दुर्योधन से पूछा— "हे दुर्योधन! आज तुम्हारी यह क्या गति हो गई? उस दिन भरी हस्तिनापुर की सभा में जब तुमने मेरा अपमान किया था और अपनी जंघा दिखाई थी, तब तुम्हारे भीतर का अहंकार सातवें आसमान पर था। आज वही अहंकार कहाँ गया? क्या तुम्हें अपनी उस भूल का कोई पश्चाताप है?" दुर्योधन का शांत और गंभीर उत्तर: मौत के मुँह में खड़ा वह योद्धा अब बदल चुका था। उसके स्वर में क्रोध नहीं, बल्कि जीवन भर के अनुभवों का कड़वा सच था। दुर्योधन ने मंद मुस्कान के साथ द्रौपदी की ओर देखा और कहा— "हे पांचाली! आज मैं उस स्थान पर हूँ जहाँ झूठ टिक नहीं सकता। मैं दुर्योधन... हस्तिनापुर का सम्राट, किसी साधारण मनुष्य या पांडवों के पराक्रम से नहीं, बल्कि अपने ही कर्मों और कुछ ऐसे अदृश्य कारणों से हारा हूँ, जो साधारण बुद्धि की पकड़ से बाहर हैं।" दुर्योधन द्वारा बताया गया पतन का असली कारण अपने अंतिम क्षणों में दुर्योधन ने स्वीकार किया कि उसका और उसके पूरे वंश का विनाश किसी एक दिन की भूल का परिणाम नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरे कारण छिपे थे: अहंकार और शक्ति का नशा: दुर्योधन ने माना कि उसने ताकत के नशे में धर्म, नीति और अपनों की सलाह को हमेशा पैरों तले कुचला। उसे यह भ्रम हो गया था कि समय और भाग्य हमेशा उसी के पक्ष में रहेंगे। नारी का अपमान (सबसे बड़ा अभिशाप): उसने स्वीकार किया कि द्रौपदी का वह अपमान—भरी सभा में खींची गई साड़ियाँ—उसके साम्राज्य के विनाश का सबसे मुख्य और मूल कारण था। एक कुलवधू के आँसू और उसकी आह ने उसके पूरे साम्राज्य की नींव को अंदर से खोखला कर दिया था। अधर्म का साथ और संगति: दुर्योधन ने अपने भाई दुःशासन, मामा शकुनि और कर्ण जैसी महान सत्ताओं के बीच रहकर भी स्वार्थ की ऐसी आंधी बुनी, जिसने अपनों के बीच ही शत्रुता की दीवार खड़ी कर दी। उसने अंत में कहा— "मैंने धर्म को जाना, लेकिन उसे कभी अपनाया नहीं; और अधर्म को पहचानते हुए भी मैं उससे बंधा रहा।" जीवन का अंतिम संदेश वह संवाद केवल दो शत्रुओं के बीच का नहीं था, बल्कि वह कर्म के अटल सिद्धांत का जीवंत प्रमाण था। दुर्योधन ने अपने प्राण त्यागने से पहले यह मान लिया कि इस संसार में कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों के चक्र से बच नहीं सकता—चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो। 🌟 कथा का संदेश: यह ऐतिहासिक प्रसंग हमें यह सिखाता है कि अहंकार, अन्याय और किसी भी स्त्री या असहाय का अपमान मनुष्य के बड़े से बड़े साम्राज्य और वैभव को मिट्टी में मिलाने की शक्ति रखता है। कर्म का हिसाब प्रकृति की सबसे अचूक व्यवस्था है। 🙏 ॥ सत्यमेव जयते ॥ "दुर्योधन के इस अंतिम सत्य के बारे में आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर साझा करें। 👇" "इस विचारणीय और पौराणिक प्रसंग को अपने मित्रों और परिवार तक Share अवश्य करें। 🔄" #महाभारत #महाभारत दोहा #महाभारत की कथा917
- sn vyas#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣8️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवों की पंचाल यात्रा और अर्जुन के द्वारा चित्ररथ गन्धर्व की पराजय एवं उन दोनों की मित्रता...(दिन 481) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ पुरा कृतं महेन्द्रस्य वज्र वृत्रनिबर्हणम् । दशधा शतधा चैव तच्छीर्ण वृत्रमूर्धनि ।। ५० ।। पूर्वकाल में वृत्रासुर का संहार करने के निमित्त इन्द्र के लिये जिस वज्र का निर्माण किया गया था, वृत्रासुर के मस्तक पर पड़ते ही उसके दस बड़े और सौ छोटे टुकड़े हो गये ।। ५० ।। ततो भागीकृतो देवैर्वज्रभाग उपास्यते । लोके यशो धनं किंचित् सैव वज्रतनुः स्मृता ।। ५१ ।। तबसे अनेक भागों में बँटे हुए उस वज्रके प्रत्येक भाग की देवतालोग उपासना करते हैं। लोक में उत्कृष्ट धन और यश आदि जो कुछ भी वस्तु है, उसे वज्र का स्वरूप माना गया है ।। ५१ ।। वज्रपाणिर्ब्रह्मणः स्यात् क्षत्रं वज्ररथं स्मृतम् । वैश्या वै दानवज्राश्च कर्मवज्रा यवीयसः ।। ५२ ।। (अग्नि में आहुति देने के कारण) ब्राह्मणका दाहिना हाथ वज्र है। क्षत्रियका रथ वज्र है। वैश्यलोग जो दान करते हैं, वह भी वज्र है और शूद्रलोग जो सेवाकार्य करते हैं, उसे भी वज्र ही समझना चाहिये ।। ५२ ।। क्षत्रवज्रस्य भागेन अवध्या वाजिनः स्मृताः । रथाङ्ग वडवा सूते शूराश्चाश्वेषु ये मताः ।। ५३ ।। क्षत्रिय के रथरूपी वज्रका एक विशिष्ट अंग होनेसे घोड़ों को अवध्य बताया गया है। गन्धर्वदेश की घोड़ी रथ को वहन करने वाले रथांगस्वरूप (वज्रस्वरूप) घोड़े को जन्म देती है। वे घोड़े सब अश्वोंमें शूरवीर माने जाते हैं ।। ५३ ।। कामवर्णाः कामजवाः कामतः समुपस्थिताः । इति गन्धर्वजाः कामं पूरयिष्यन्ति मे हयाः ।। ५४ ।। गन्धर्व-देश के घोड़ों की यह विशेषता है कि वे इच्छानुसार अपना रंग बदल लेते हैं। सवार की इच्छा के अनुसार अपने वेगको घटा-बढ़ा सकते हैं। जब आवश्यकता या इच्छा हो, तभी वे उपस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार मेरे गन्धर्वदेशीय घोड़े आपकी इच्छापूर्ण करते रहेंगे ।। ५४ ।। अर्जुन उवाच यदि प्रीतेन मे दत्तं संशये जीवितस्य वा । विद्याधनं श्रुतं वापि न तद् गन्धर्व रोचये ।। ५५ ।। अर्जुनने कहा- गन्धर्व! यदि तुमने प्रसन्न होकर अथवा प्राणसंकटसे बचानेके कारण मुझे विद्या, धन अथवा शास्त्र प्रदान किया है तो मैं इस तरहका दान लेना पसंद नहीं करता ।। ५५ ।। गन्धर्व उवाच संयोगो वै प्रीतिकरो महत्सु प्रतिदृश्यते । जीवितस्य प्रदानेन प्रीतो विद्यां ददामि ते ।। ५६ ।। गन्धर्व बोला- महापुरुषोंके साथ जो समागम होता है, वह प्रीतिको बढ़ानेवाला होता है-ऐसा देखनेमें आता है। आपने मुझे जीवनदान दिया है, इससे प्रसन्न होकर मैं आपको चाक्षुषी विद्या भेंट करता हूँ ।। ५६ ।। त्वत्तोऽप्यहं ग्रहीष्यामि अस्त्रमाग्नेयमुत्तमम् । तथैव योग्यं बीभत्सो चिराय भरतर्षभ ।। ५७ ।। साथ ही आपसे भी मैं उत्तम आग्नेयास्त्र ग्रहण करूँगा। भरतकुलभूषण अर्जुन! ऐसा करनेसे ही हम दोनोंमें दीर्घकालतक समुचित सौहार्द बना रहेगा ।। ५७ ।। अर्जुन उवाच त्वत्तोऽस्त्रेण वृणोम्यश्वान् संयोगः शाश्वतोऽस्तु नौ । सखे तद् ब्रूहि गन्धर्व युष्मभ्यो यद् भयं भवेत् ।। ५८ ।। अर्जुन ने कहा-ठीक है, मैं यह अस्त्र-विद्या देकर तुमसे घोड़े ले लूँगा। हम दोनोंकी मैत्री सदा बनी रहे। सखे गन्धर्वराज ! बताओ तो सही, तुम लोगों से हम मनुष्यों को क्यों भय प्राप्त होता है? ।। ५८ ।। कारणं ब्रूहि गन्धर्व किं तद् येन स्म धर्षिताः । यान्तो वेदविदः सर्वे सन्तो रात्रावरिंदमाः ।। ५९ ।। गन्धर्व ! हम सब लोग वेदवेत्ता हैं और शत्रुओंका दमन करनेकी शक्ति रखते हैं; फिर भी रातमें यात्रा करते समय जो तुमने हमलोगोंपर आक्रमण किया है, इसका क्या कारण है? इसपर भी प्रकाश डालो ।। ५९ ।। गन्धर्व उवाच अनग्नयोऽनाहुतयो न च विप्रपुरस्कृताः । यूयं ततो धर्षिताः स्थ मया वै पाण्डुनन्दनाः ।। ६० ।। गन्धर्व बोला-पाण्डुकुमारो ! आपलोग (विवाहित न होनेके कारण) त्रिविध अग्नियोंकी सेवा नहीं करते। (अध्ययन पूरा करके समावर्तन संस्कारसे सम्पन्न हो गये हैं, अतः) प्रतिदिन अग्निको आहुति भी नहीं देते। आपके आगे कोई ब्राह्मण पुरोहित भी नहीं है। इन्हीं कारणोंसे मैंने आपपर आक्रमण किया है ।। ६० ।। (जानता च मया तस्मात् तेजश्चाभिजनं च वः । इयं मतिमतां श्रेष्ठ धर्षितुं वै कृता मतिः ।। को हि वस्त्रिषु लोकेषु न वेद भरतर्षभ । स्वैर्गुणैर्विस्तृतं श्रीमद् यशोऽग्र्यं भूरिवर्चसाम् ।।) यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचोरगदानवाः । विस्तरं कुरुवंशस्य धीमन्तः कथयन्ति ते ।। ६१ ।। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! इसीलिये मैंने आपलोगोंके तेज और कुलोचित प्रभावको जानते हुए भी आपपर आक्रमण करनेका विचार किया। भरतश्रेष्ठ ! आपलोग महान् तेजस्वी हैं। आपने अपने गुणोंसे जिस शोभाशाली श्रेष्ठ यशका विस्तार किया है, उसे तीनों लोकोंमें कौन नहीं जानता। बुद्धिमान् यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पिशाच, नाग और दानव कुरुकुलकी यशोगाथाका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं ।। ६१ ।। नारदप्रभृतीनां तु देवर्षीणां मया श्रुतम् । गुणान् कथयतां वीर पूर्वेषां तव धीमताम् ।। ६२ ।। वीर! नारद आदि देवर्षियों के मुख से भी मैंने आपके बुद्धिमान् पूर्वजों का गुणगान सुना है ।। ६२ ।। स्वयं चापि मया दृष्टश्चरता सागराम्बराम् । इमां वसुमतीं कृत्स्नां प्रभावः सुकुलस्य ते ।। ६३ ।। तथा समुद्र से घिरी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरते हुए मैंने स्वयं भी आपके उत्तमकुल का प्रभाव प्रत्यक्ष देखा है ।। ६३ ।। वेदे धनुषि चाचार्यमभिजानामि तेऽर्जुन । विश्रुतं त्रिषु लोकेषु भारद्वाजं यशस्विनम् ।। ६४ ।। अर्जुन ! तीनों लोकों में विख्यात यशस्वी भरद्वाजनन्दन द्रोणको भी, जो आपके वेद और धनुर्वेदके आचार्य रहे हैं, मैं अच्छी तरह जानता हूँ ।। ६४ ।। धर्म वायुं च शक्रं च विजानाम्यश्विनौ तथा । पाण्डुं च कुरुशार्दूल षडेतान् कुरुवर्धनान् । पितृनेतानहं पार्थ देवमानुषसत्तमान् ।। ६५ ।। कुरुश्रेष्ठ ! धर्म, वायु, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार तथा महाराज पाण्डु-ये छः महापुरुष कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले हैं। पार्थ! ये देवताओं तथा मनुष्योंके सिरमौर छहों व्यक्ति आपलोगोंके पिता हैं। मैं इन सबको जानता हूँ ।। ६५ ।। दिव्यात्मानो महात्मानः सर्वशस्त्रभृतां वराः । भवन्तो भ्रातरः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः ।। ६६ ।। आप सब भाई देवस्वरूप, महात्मा, समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ शूरवीर हैं तथा आपलोगोंने ब्रह्मचर्यव्रतका भलीभाँति पालन किया है ।। ६६ ।। उत्तमां च मनोबुद्धिं भवतां भावितात्मनाम् । जानन्नपि च वः पार्थ कृतवानिह धर्षणाम् ।। ६७ ।। आपलोगोंका अन्तःकरण शुद्ध है, मन और बुद्धि भी उत्तम है। पार्थ! आपके विषयमें यह सब कुछ जानते हुए भी मैंने यहाँ आक्रमण किया था ।। ६७ ।। स्त्रीसकाशे च कौरव्य न पुमान् क्षन्तुमर्हति । धर्षणामात्मनः पश्यन् बाहुद्रविणमाश्रितः ।। ६८ ।। कुरुनन्दन! इसका कारण यह है कि अपने बाहुबलका भरोसा रखनेवाला कोई भी पुरुष जब स्त्रीके समीप अपना तिरस्कार होता देखता है, तब उसे सहन नहीं कर पाता ।। ६८ ।। नक्तं च बलमस्माकं भूय एवाभिवर्धते । यतस्ततो मां कौन्तेय सदारं मन्युराविशत् ।। ६९ ।। कुन्तीनन्दन ! इसके सिवा एक बात यह भी है कि रातके समय हमलोगोंका बल बहुत बढ़ जाता है। इसीसे स्त्रीके साथ रहनेके कारण मुझमें क्रोधका आवेश हो गया था ।। ६९ ।। सोऽहं त्वयेह विजितः संख्ये तापत्यवर्धन । येन तेनेह विधिना कीर्त्यमानं निबोध मे ।। ७० ।। तपतीके कुल की वृद्धि करनेवाले अर्जुन ! आपने जिस कारण युद्धमें मुझे पराजित किया है, उसे (भी) बतलाता हूँ; सुनिये ।। ७० ।। ब्रह्मचर्य! सबसे बड़ा धर्म है और वह तुममें निश्चितरूपसे विद्यमान है। कुन्तीनन्दन ! इसीलिये युद्धमें मैं तुमसे हार गया हूँ ।। ७१ ।। तुमस यस्तु स्यात् क्षत्रियः कश्चित् कामवृत्तः परंतप । नक्तं च युधि युध्येत न स जीवेत् कथंचन ।। ७२ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! यदि दूसरा कोई कामासक्त क्षत्रिय रातमें मुझसे युद्ध करने आता तो किसी प्रकार जीवित नहीं बच सकता था ।। ७२ ।। यस्तु स्यात् कामवृत्तोऽपि पार्थ ब्रह्मपुरस्कृतः । जयेन्नक्तंचरान् सर्वान् स पुरोहितधूर्गतः ।। ७३ ।। किंतु कुन्तीकुमार ! कामासक्त होनेपर भी यदि कोई पुरुष किसी ब्राह्मणको आगे करके चले तो वह समस्त निशाचरोंपर विजय पा सकता है; क्योंकि उस दशामें उसका सारा भार पुरोहितपर होता है ।। ७३ ।। तस्मात् तापत्य यत्किंचिन्नृणां श्रेय इहेप्सितम् । तस्मिन् कर्मणि योक्तव्या दान्तात्मानः पुरोहिताः ।। ७४ ।। अतः तपतीनन्दन ! मनुष्योंको इस लोकमें जो भी कल्याणकारी कार्य करना अभीष्ट हो, उसमें वह मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पुरोहितोंको नियुक्त करे ।। ७४ ।। वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः । धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ।। ७५ ।। जो छहों अंगोंसहित वेदके स्वाध्यायमें तत्पर, ईमानदार, सत्यवादी, धर्मात्मा और मनको वशमें रखनेवाले हों, ऐसे ही ब्राह्मण राजाओंके पुरोहित होने चाहिये ।। ७५ ।। जयश्च नियतो राज्ञः स्वर्गश्च तदनन्तरम् । यस्य स्याद् धर्मविद् वाग्मी पुरोधाः शीलवान् शुचिः ।। ७६ ।। जिसके यहाँ धर्मज्ञ, वक्ता, शीलवान् और ईमानदार ब्राह्मण पुरोहित हो, उस राजाको इस लोकमें निश्चय ही विजय प्राप्त होती है और मरनेके बाद उसे स्वर्गलोक मिलता है ।। ७६ ।। लाभं लब्धुमलब्धं वा लब्धं वा परिरक्षितुम् । पुरोहितं प्रकुर्वीत राजा गुणसमन्वितम् ।। ७७ ।। राजाको किसी अप्राप्त वस्तु या धनको प्राप्त करने अथवा उपलब्ध धन आदिकी रक्षा करनेके लिये गुणवान् ब्राह्मणको पुरोहित बनाना चाहिये ।। ७७ ।। पुरोहितमते तिष्ठेद् य इच्छेद् भूतिमात्मनः । प्राप्तुं वसुमतीं सर्वां सर्वशः सागराम्बराम् ।। ७८ ।। जो समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीपर अपना अधिकार चाहे या अपने लिये ऐश्वर्य पाना चाहे, उसे पुरोहितकी आज्ञाके अधीन रहना चाहिये ।। ७८ ।। न हि केवलशौर्येण तापत्याभिजनेन च । जयेदब्राह्मणः कश्चिद् भूमिं भूमिपतिः क्वचित् ।। ७९ ।। तपतीनन्दन ! कोई भी राजा कहीं भी पुरोहितकी सहायताके बिना केवल अपने बल अथवा कुलीनताके भरोसे भूमिपर विजय नहीं पाता ।। ७९ ।। तस्मादेवं विजानीहि कुरूणां वंशवर्धन । ब्राह्मणप्रमुखं राज्यं शक्यं पालयितुं चिरम् ।। ८० ।। अतः कौरवोंके कुलकी वृद्धि करनेवाले अर्जुन! आप यह जान लें कि जहाँ विद्वान् ब्राह्मणोंकी प्रधानता हो, उसी राज्यकी दीर्घकालतक रक्षा की जा सकती है ।। ८० ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि गन्धर्वपराभवे एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्व में गन्धर्वपराभवविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️1610
- sn vyas#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣8️⃣0️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवों की पंचाल यात्रा और अर्जुन के द्वारा चित्ररथ गन्धर्व की पराजय एवं उन दोनों की मित्रता...(दिन 480) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अर्जुन उवाच बिभीषिका वै गन्धर्व नास्त्रज्ञेषु प्रयुज्यते । अस्त्रज्ञेषु प्रयुक्तेयं फेनवत् प्रविलीयते ।। २७ ।। अर्जुनने कहा-गन्धर्व! जो अस्त्र-विद्याके विद्वान् हैं, उनपर तुम्हारी यह घुड़की नहीं चल सकती। अस्त्र-विद्याके मर्मज्ञोंपर फैलायी हुई तुम्हारी यह माया फेनकी तरह विलीन हो जायगी ।। २७ ।। मानुषानतिगन्धर्वान् सर्वान् गन्धर्व लक्षये । तस्मादस्त्रेण दिव्येन योत्स्येऽहं न तु मायया ।। २८ ।। गन्धर्व! मैं जानता हूँ कि सम्पूर्ण गन्धर्व मनुष्योंसे अधिक शक्तिशाली होते हैं, इसलिये मैं तुम्हारे साथ मायासे नहीं, दिव्यास्त्रसे युद्ध करूँगा ।। २८ ।। पुरास्त्रमिदमाग्नेयं प्रादात् किल बृहस्पतिः । भरद्वाजाय गन्धर्व गुरुर्मान्यः शतक्रतोः ।। २९ ।। गन्धर्व ! यह आग्नेय अस्त्र पूर्वकालमें इन्द्रके माननीय गुरु बृहस्पतिजीने भरद्वाज मुनिको दिया था ।। २९ ।। भरद्वाजादग्निवेश्य अग्निवेश्याद् गुरुर्मम । साध्विदं मह्यमददद् द्रोणो ब्राह्मणसत्तमः ।। ३० ।। भरद्वाजसे इसे अग्निवेश्यने और अग्निवेश्यसे मेरे गुरु द्रोणाचार्यने प्राप्त किया है। फिर विप्रवर द्रोणाचार्यने यह उत्तम अस्त्र मुझे प्रदान किया ।। ३० ।। वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा पाण्डवः क्रुद्धो गन्धर्वाय मुमोच ह । प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेयं ददाहास्य रथं तु तत् ।। ३१ ।। विरथं विप्लुतं तं तु स गन्धर्वं महाबलः । अस्त्रतेजः प्रमूढं च प्रपतन्तमवाङ्मुखम् ।। ३२ ।। शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनंजयः । भ्रातॄन् प्रति चकर्षाथ सोऽस्त्रपातादचेतसम् ।। ३३ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने कुपित हो गन्धर्वपर वह प्रज्वलित आग्नेय अस्त्र चला दिया। उस अस्त्रने गन्धर्वके रथको जलाकर भस्म कर दिया। वह रथहीन गन्धर्व व्याकुल हो गया और अस्त्रके तेजसे मूढ होकर नीचे मुँह किये गिरने लगा। महाबली अर्जुनने उसके फूलकी मालाओंसे सुशोभित केश पकड़ लिये और घसीटकर अपने भाइयोंके पास ले आये। अस्त्रके आघातसे वह गन्धर्व अचेत हो गया था ।। ३१-३३ ।। युधिष्ठिरं तस्य भार्या प्रपेदे शरणार्थिनी । नाम्ना कुम्भीनसी नाम पतित्राणमभीप्सती ।। ३४ ।। उस गन्धर्व की पत्नी का नाम कुम्भीनसी था। उसने अपने पतिके जीवनकी रक्षाके लिये महाराज युधिष्ठिरकी शरण ली ।। ३४ ।। गन्धर्युवाच त्रायस्व मां महाभाग पतिं चेमं विमुञ्च मे । गन्धर्वी शरणं प्राप्ता नाम्ना कुम्भीनसी प्रभो ।। ३५ ।। गन्धर्वी बोली-महाभाग ! मेरी रक्षा कीजिये और मेरे इन पतिदेवको आप छोड़ दीजिये। प्रभो! मैं गन्धर्वपत्नी कुम्भीनसी आपकी शरणमें आयी हूँ ।। ३५ ।। युधिष्ठिर उवाच युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम् । को निहन्याद् रिपुं तात मुञ्चेमं रिपुसूदन ।। ३६ ।। युधिष्ठिरने कहा-तात ! शत्रुसूदन अर्जुन ! यह गन्धर्व युद्धमें हार गया और अपना यश खो चुका। अब स्त्री इसकी रक्षिका बनकर आयी है। यह स्वयं कोई पराक्रम नहीं कर सकता। ऐसे दीन-हीन शत्रुको कौन मारता है? इसे जीवित छोड़ दो ।। ३६ ।। अर्जुन उवाच जीवितं प्रतिपद्यस्व गच्छ गन्धर्व मा शुचः । प्रदिशत्यभयं तेऽद्य कुरुराजो युधिष्ठिरः ।। ३७ ।। अर्जुन बोले- गन्धर्व! जीवन धारण करो। जाओ, अब शोक न करो। इस समय कुरुराज युधिष्ठिर तुम्हें अभयदान दे रहे हैं ।। ३७ ।। गन्धर्व उवाच जितोऽहं पूर्वकं नाम मुञ्चाम्यङ्गारपर्णताम् । न च श्लाघे बलेनाङ्ग न नाम्ना जनसंसदि ।। ३८ ।। गन्धर्वने कहा- अर्जुन ! मैं परास्त हो गया, अतः अपने पहले नाम अंगारपर्णको छोड़ देता हूँ। अब मैं जनसमुदायमें अपने बलकी श्लाघा नहीं करूँगा और न इस नामसे अपना परिचय ही दूँगा ।। ३८ ।। साध्विमं लब्धवाँल्लाभं योऽहं दिव्यास्त्रधारिणम् । गान्धर्व्या माययेच्छामि संयोजयितुमर्जुनम् ।। ३९ ।। (आजकी पराजयसे) मुझे सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि मैंने दिव्यास्त्रधारी अर्जुन को (मित्ररूप में) प्राप्त किया है और अब मैं इन्हें गन्धवों की माया से संयुक्त करना चाहता हूँ ।। ३९ ।। अस्त्राग्निना विचित्रोऽयं दग्धो मे रथ उत्तमः । सोऽहं चित्ररथो भूत्वा नाम्ना दग्धरथोऽभवम् ।। ४० ।। इनके दिव्यास्त्रकी अग्निसे मेरा यह विचित्र एवं उत्तम रथ दग्ध हो गया है। पहले मैं विचित्र रथके कारण 'चित्ररथ' कहलाता था; परंतु अब मेरा नाम 'दग्धरथ' हो गया ।। ४० ।। सम्भृता चैव विद्येयं तपसेह मया पुरा । निवेदयिष्ये तामद्य प्राणदाय महात्मने ।। ४१ ।। मैंने पूर्वकालमें यहाँ तपस्याद्वारा जो यह विद्या प्राप्त की है, उसे आज अपने प्राणदाता महात्मा मित्रको अर्पित करूँगा ।। ४१ ।। संस्तम्भयित्वा तरसा जितं शरणमागतम् । यो रिपुं योजयेत् प्राणैः कल्याणं किं न सोऽर्हति ।। ४२ ।। जिन्होंने अपने वेगसे शत्रुकी शक्तिको कुण्ठित करके उसपर विजय पायी और फिर जब वह शत्रु शरणमें आ गया, तब जो उसे प्राणदान दे रहे हैं, वे किस कल्याणकी प्राप्तिके अधिकारी नहीं है? ।। ४२ ।। चाक्षुषी नाम विद्येयं यां सोमाय ददौ मनुः । ददौ स विश्वावसवे मम विश्वावसुर्ददौ ।। ४३ ।। यह चाक्षुषी नामक विद्या है, जिसे मनुने सोमको दिया। सोमने विश्वावसुको दिया और विश्वावसुने मुझे प्रदान किया है ।। ४३ ।। सेयं कापुरुषं प्राप्ता गुरुदत्ता प्रणश्यति । आगमोऽस्या मया प्रोक्तो वीर्यं प्रतिनिबोध मे ।। ४४ ।। यह गुरुकी दी हुई विद्या यदि किसी कायरको मिल गयी तो नष्ट हो जाती है। (इस प्रकार) मैंने इसके उपदेशकी परम्पराका वर्णन किया है। अब इसका बल भी मुझसे सुन लीजिये ।। ४४ ।। यच्चक्षुषा द्रष्टुमिच्छेत् त्रिषु लोकेषु किंचन । तत् पश्येद् यादृशं चेच्छेत् तादृशं द्रष्टुमर्हति ।। ४५ ।। तीनों लोकोंमें जो कोई भी वस्तु है, उसमेंसे जिस वस्तुको आँखसे देखनेकी इच्छा हो, उसे इस विद्याके प्रभावसे कोई भी देख सकता है और जिस रूपमें देखना चाहे, उसी रूपमें देख सकता है ।। ४५ ।। एकपादेन षण्मासान् स्थितो विद्यां लभेदिमाम् । अनुनेष्याम्यहं विद्यां स्वयं तुभ्यं व्रतेऽकृते ।। ४६ ।। जो एक पैरसे छः महीनेतक खड़ा रहकर तपस्या करे, वही इस विद्याको पा सकता है। परंतु आपको इस व्रतका पालन या तपस्या किये बिना ही मैं स्वयं उक्त विद्याकी प्राप्ति कराऊँगा ।। ४६ ।। विद्यया ह्यनया राजन् वयं नृभ्यो विशेषिताः । अविशिष्टाश्च देवानामनुभावप्रदर्शिनः ।। ४७ ।। राजन् ! इस विद्याके बलसे ही हमलोग मनुष्योंसे श्रेष्ठ माने जाते हैं और देवताओंके तुल्य प्रभाव दिखा सकते हैं ।। ४७ ।। गन्धर्वजानामश्वानामहं पुरुषसत्तम । भ्रातृभ्यस्तव तुभ्यं च पृथग्दाता शतं शतम् ।। ४८ ।। पुरुषशिरोमणे ! मैं आपको और आपके भाइयोंको अलग-अलग गन्धर्वलोकके सौ-सौ घोड़े भेंट करता हूँ ।। ४८ ।। देवगन्धर्ववाहास्ते दिव्यवर्णा मनोजवाः । क्षीणाक्षीणा भवन्त्येते न हीयन्ते च रंहसः ।। ४९ ।। वे घोड़े देवताओं और गन्धवोंके वाहन हैं। उनके शरीरकी कान्ति दिव्य है। वे मनके समान वेगशाली और आवश्यकताके अनुसार दुबले-मोटे होते हैं; किंतु उनका वेग कभी कम नहीं होता ।। ४९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️1614
- sn vyas#महाभारत #महाभारत दोहा #महाभारत की कथा महाभारत में विदुर की सम्पूर्ण कथा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ धर्मराज का मानव रूप महाभारत में अनेक महान योद्धा और राजा हुए, लेकिन विदुर ऐसे पात्र थे जिनकी शक्ति तलवार में नहीं, बल्कि ज्ञान, नीति और धर्म में थी। वे हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री थे, धृतराष्ट्र और पांडु के भाई थे तथा कौरव-पांडवों के चाचा थे। वे जानते थे कि आने वाले समय में हस्तिनापुर पर कितना बड़ा संकट आने वाला है, लेकिन दुर्भाग्य से उनकी धर्मपूर्ण सलाह को बार-बार अनसुना किया गया। 🌿 विदुर का दिव्य जन्म बहुत समय पहले हस्तिनापुर के राजा शांतनु के वंश में विचित्रवीर्य नाम के राजा हुए। उनका विवाह अंबिका और अंबालिका से हुआ था। लेकिन विचित्रवीर्य की अकाल मृत्यु के बाद दोनों रानियाँ संतानहीन रह गईं। वंश को आगे बढ़ाने के लिए सत्यवती ने अपने पुत्र महर्षि वेदव्यास से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न करने का अनुरोध किया। सबसे पहले व्यास अंबिका के पास गए। व्यास का तेजस्वी और तपस्वी रूप देखकर अंबिका ने भय से अपनी आँखें बंद कर लीं। उनसे धृतराष्ट्र का जन्म हुआ, जो जन्म से ही नेत्रहीन थे। इसके बाद व्यास अंबालिका के पास गए। उन्हें देखकर अंबालिका का चेहरा भय के कारण पीला पड़ गया। उनसे पांडु का जन्म हुआ। फिर जब तीसरी बार व्यास को बुलाया गया, तो अंबिका ने स्वयं जाने के बजाय अपनी एक दासी को उनके पास भेज दिया। वह दासी भयभीत नहीं हुई। उसने अत्यंत सम्मान और शांत मन से महर्षि व्यास की सेवा की। उसके गर्भ से एक अत्यंत बुद्धिमान बालक का जन्म हुआ—विदुर। ⚖️ विदुर कौन थे? महाभारत की परंपरा के अनुसार विदुर वास्तव में धर्मराज अर्थात यमराज के अंशावतार माने जाते हैं। कथा के अनुसार मांडव्य ऋषि को एक अन्यायपूर्ण दंड दिया गया था। उन्होंने धर्मराज से पूछा कि उन्हें यह दंड किस कर्म के कारण मिला। धर्मराज ने उनके बाल्यकाल के एक कर्म का उल्लेख किया। मांडव्य ऋषि ने कहा कि इतने छोटे बालक के कर्म के लिए इतना कठोर दंड उचित नहीं था और उन्होंने धर्मराज को शाप दिया कि उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ेगा। इसी कारण धर्मराज ने विदुर के रूप में जन्म लिया—ऐसी महाभारत-परंपरा में कथा मिलती है। 👑 तीन भाई—धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर इस प्रकार हस्तिनापुर को तीन अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व मिले— धृतराष्ट्र — ज्येष्ठ, लेकिन जन्म से नेत्रहीन। पांडु — योग्य और पराक्रमी राजा। विदुर — अत्यंत बुद्धिमान, धर्मज्ञ और नीतिवान। विदुर दासी के पुत्र होने के कारण स्वयं राजा नहीं बन सके, लेकिन उनकी बुद्धि और नीति के कारण वे हस्तिनापुर के सबसे महत्वपूर्ण सलाहकारों में से एक बन गए। वे जानते थे कि केवल राजवंश में जन्म लेना महानता नहीं देता। मनुष्य को महान उसके कर्म और चरित्र बनाते हैं। 🏛️ विदुर बने हस्तिनापुर के महामंत्री समय बीतता गया और विदुर अपनी बुद्धिमत्ता के कारण हस्तिनापुर के प्रमुख सलाहकार बन गए। धृतराष्ट्र जब राजा बने, तब विदुर ने उन्हें हमेशा धर्म और न्याय का मार्ग दिखाने का प्रयास किया। विदुर जानते थे कि राजा का सबसे बड़ा कर्तव्य अपने परिवार से अधिक प्रजा और न्याय के प्रति होता है। लेकिन धृतराष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी उनका पुत्र-मोह था। वे दुर्योधन के गलत कार्यों को जानते हुए भी उसके विरुद्ध कठोर निर्णय लेने में असमर्थ रहते थे। विदुर बार-बार उन्हें समझाते— यदि राजा अपने प्रिय व्यक्ति के अपराध को केवल इसलिए क्षमा करता रहे क्योंकि वह उसका अपना है, तो धीरे-धीरे पूरा राज्य अन्याय का शिकार हो जाता है। 👶 दुर्योधन के जन्म पर विदुर की चेतावनी जब दुर्योधन का जन्म हुआ, तब अनेक अशुभ संकेत दिखाई देने की कथा महाभारत में मिलती है। विदुर ने परिस्थितियों को देखकर धृतराष्ट्र को चेतावनी दी कि यदि एक पुत्र के कारण पूरे कुल पर संकट आने वाला हो, तो राजा को कठिन निर्णय लेने में भी पीछे नहीं हटना चाहिए। लेकिन पुत्र-मोह में डूबे धृतराष्ट्र ने विदुर की बात नहीं मानी। यही निर्णय आगे चलकर हस्तिनापुर के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। 🔥 लाक्षागृह में पांडवों की रक्षा दुर्योधन और उसके साथियों ने पांडवों को समाप्त करने के लिए लाक्षागृह की योजना बनाई। वारणावत में पांडवों के रहने के लिए ऐसा भवन बनवाया गया था जिसमें ज्वलनशील पदार्थों का उपयोग किया गया था। विदुर को इस षड्यंत्र की जानकारी हो गई। वे सीधे सब कुछ कहकर पांडवों को सावधान नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने संकेतों में युधिष्ठिर को खतरे की सूचना दी। विदुर की योजना से एक गुप्त सुरंग तैयार कराई गई, जिसके रास्ते पांडव उस भयंकर षड्यंत्र से बच निकलने में सफल हुए। इस प्रकार विदुर ने बिना किसी युद्ध के पांडवों के जीवन की रक्षा की। 🦚 दुर्योधन के सामने विदुर की निर्भीकता विदुर दुर्योधन से कभी भयभीत नहीं हुए। जब दुर्योधन अन्यायपूर्ण योजनाएँ बनाता, विदुर खुलकर उसका विरोध करते। वे जानते थे कि दुर्योधन का अहंकार धीरे-धीरे पूरे कुरुवंश को विनाश की ओर ले जा रहा है। धृतराष्ट्र को वे बार-बार समझाते रहे कि— अधर्म से प्राप्त विजय वास्तव में विजय नहीं होती। लेकिन धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह और दुर्योधन का अहंकार इतना बढ़ चुका था कि विदुर की नीतिपूर्ण बातें उनके कानों तक पहुँचती तो थीं, पर हृदय तक नहीं पहुँचती थीं। 🎲 द्यूत क्रीड़ा और द्रौपदी का अपमान जब शकुनि की सहायता से पांडवों को जुए के खेल में बुलाया गया, तब विदुर ने इस योजना का विरोध किया। उन्हें पता था कि यह खेल विनाश का कारण बनेगा। द्यूत क्रीड़ा में पांडव अपना राज्य और सब कुछ हार गए। इसके बाद सभा में द्रौपदी का अपमान करने का प्रयास हुआ। विदुर ने सभा में धर्म और न्याय की बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि अन्यायपूर्ण तरीके से किसी स्त्री को अपमानित करना पूरे कुरुवंश के लिए विनाश का कारण बन सकता है। लेकिन उस सभा में उनकी धर्मपूर्ण आवाज दब गई। 🕊️ श्रीकृष्ण और विदुर महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण स्वयं हस्तिनापुर गए। उनका उद्देश्य था—कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध को रोकना और शांति स्थापित करना। दुर्योधन चाहता था कि श्रीकृष्ण उसके महल में भोजन करें। लेकिन श्रीकृष्ण ने दुर्योधन का आतिथ्य स्वीकार नहीं किया। वे अपने प्रिय भक्त विदुर के घर गए। विदुर के घर में राजसी वैभव नहीं था, लेकिन वहाँ सच्चा प्रेम और भक्ति थी। श्रीकृष्ण ने विदुर के प्रेम को स्वीकार किया। यह प्रसंग बताता है कि भगवान के लिए बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण भक्त का प्रेम और भाव होता है। ⚔️ विदुर ने युद्ध से स्वयं को अलग कर लिया जब यह स्पष्ट हो गया कि दुर्योधन शांति के लिए तैयार नहीं है और युद्ध टलना कठिन है, तब विदुर ने हस्तिनापुर की राजनीति से स्वयं को अलग कर लिया। वे जानते थे कि जिस युद्ध को धर्म और विवेक से रोका जा सकता था, उसे अहंकार ने अनिवार्य बना दिया है। उन्होंने तीर्थयात्रा का मार्ग अपनाया और सांसारिक राजनीति से दूरी बना ली। 📖 विदुर नीति विदुर के ज्ञान का सबसे प्रसिद्ध भाग विदुर नीति है। यह धृतराष्ट्र और विदुर के संवाद के रूप में सामने आती है। इसमें विदुर ने राजा को बताया कि— - सच्चा मित्र कौन होता है। - बुद्धिमान और मूर्ख में क्या अंतर है। - क्रोध मनुष्य का कैसे विनाश करता है। - लोभ से व्यक्ति का विवेक कैसे नष्ट होता है। - राजा को प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। - कठिन परिस्थितियों में धर्म का पालन कैसे किया जाए। - किन गुणों से मनुष्य सम्मान प्राप्त करता है। विदुर नीति आज भी नीति, नेतृत्व और जीवन-मूल्यों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जाती है। 🌳 युद्ध के बाद विदुर का जीवन महाभारत का भयंकर युद्ध समाप्त हुआ। कौरवों का लगभग पूरा वंश नष्ट हो गया। युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने। समय बीतने के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती ने राजमहल छोड़कर वन का मार्ग अपनाया। विदुर भी उनके साथ वन में रहने लगे। वहाँ उन्होंने सांसारिक जीवन से पूरी तरह विरक्त होकर तप और ध्यान में अपना समय बिताया। 🕉️ विदुर का देह त्याग एक दिन युधिष्ठिर विदुर को देखने वन में पहुँचे। उन्होंने देखा कि विदुर अत्यंत तपस्वी अवस्था में थे और संसार से लगभग पूरी तरह विरक्त हो चुके थे। महाभारत की परंपरा में वर्णित है कि विदुर ने ध्यान की अवस्था में अपना शरीर त्याग दिया और उनकी दिव्य सत्ता युधिष्ठिर में समाहित हो गई। यह उनके जीवन की अंतिम और रहस्यमय घटना मानी जाती है। 🌺 विदुर के जीवन की सबसे बड़ी सीख विदुर के पास राजसिंहासन नहीं था, लेकिन उनके पास वह चीज थी जो बड़े-बड़े राजाओं के पास नहीं थी—धर्म का ज्ञान। उन्होंने सत्ता से अधिक सत्य को महत्व दिया। उन्होंने रिश्तों से अधिक न्याय को महत्व दिया। उन्होंने भय से अधिक धर्म को महत्व दिया। और सबसे महत्वपूर्ण बात— उन्होंने सही बात कहने से कभी समझौता नहीं किया, चाहे सामने राजा हो या राजकुमार। इसी कारण महाभारत के असंख्य पात्रों के बीच विदुर आज भी बुद्धि, नीति, सत्य और धर्म के प्रतीक के रूप में स्मरण किए जाते हैं। #कृष्णा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️1424
- sn vyas#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣7️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवों की पंचाल यात्रा और अर्जुन के द्वारा चित्ररथ गन्धर्व की पराजय एवं उन दोनों की मित्रता...(दिन 479) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच गते भगवति व्यासे पाण्डवा हृष्टमानसाः । ते प्रतस्थुः पुरस्कृत्य मातरं पुरुषर्षभाः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! भगवान् व्यासके चले जानेपर पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव प्रसन्नचित्त हो अपनी माताको आगे करके वहाँसे पंचालदेशकी ओर चल दिये ।। १ ।। आमन्त्र्य ब्राह्मणं पूर्वमभिवाद्यानुमान्य च । समैरुदङ्मुखैर्मार्गेर्यथोद्दिष्टं परंतपाः ।। २ ।। परंतप ! कुन्तीकुमारोंने पहले ही अपने आश्रयदाता ब्राह्मणसे पूछकर जानेकी आज्ञा ले ली थी और चलते समय बड़े आदरके साथ उन्हें प्रणाम किया। वे सब लोग उत्तर दिशाकी ओर जानेवाले सीधे मार्गोंद्वारा उत्तराभिमुख हो अपने अभीष्ट स्थान पंचालदेशकी ओर बढ़ने लगे ।। २ ।। ते त्वगच्छन्नहोरात्रात् तीर्थं सोमाश्रयायणम् । आसेदुः पुरुषव्याघ्रा गङ्गायां पाण्डुनन्दनाः ।। ३ ।। एक दिन और एक रात चलकर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव गंगाजीके तटपर सोमाश्रयायण नामक तीर्थमें जा पहुँचे ।। ३ ।। उल्मुकं तु समुद्यम्य तेषामग्रे धनंजयः । प्रकाशार्थं ययौ तत्र रक्षार्थं च महारथः ।। ४ ।। उस समय उनके आगे-आगे महारथी अर्जुन उजाला तथा रक्षा करनेके लिये जलती हुई मशाल उठाये चल रहे थे ।। ४ ।। तत्र गङ्गाजले रम्ये विविक्ते क्रीडयन् स्त्रियः । ईष्र्युर्गन्धर्वराजो वै जलक्रीडामुपागतः ।। ५ ।। उस तीर्थकी गंगाके रमणीय तथा एकान्त जलमें गन्धर्वराज अंगारपर्ण (चित्ररथ) अपनी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा कर रहा था। वह बड़ा ही ईर्ष्यालु था और जलक्रीड़ा करनेके लिये ही वहाँ आया था ।। ५ ।। शब्दं तेषां स शुश्राव नदीं समुपसर्पताम् । तेन शब्देन चाविष्टश्चक्रोध बलवद् बली ।। ६ ।। उसने गंगाजीकी ओर बढ़ते हुए पाण्डवोंके पैरोंकी धमक सुनी। उस शब्दको सुनते ही वह बलवान् गन्धर्व क्रोधके आवेशमें आकर बड़े जोरसे कुपित हो उठा ।। ६ ।। स दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सह मात्रा परंतपान् । विस्फारयन् धनुर्घोरमिदं वचनमब्रवीत् ।। ७ ।। परंतप पाण्डवोंको अपनी माताके साथ वहाँ देख वह अपने भयानक धनुषको टंकारता हुआ इस प्रकार बोला- ।। ७ ।। संध्या संरज्यते घोरा पूर्वरात्रागमेषु या । अशीतिभिर्लवैर्तीनं तन्मुहुर्त प्रचक्षते ।। ८ ।। विहितं कामचाराणां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । शेषमन्यन्मनुष्याणां कर्मचारेषु वै स्मृतम् ।। ९ ।। 'रात्रि प्रारम्भ होनेके पहले जो पश्चिम दिशामें भयंकर संध्याकी लाली छा जाती है, उस समय अस्सी लवको छोड़कर सारा मुहूर्त इच्छानुसार विचरनेवाले यक्षों, गन्धों तथा राक्षसोंके लिये निश्चित बताया जाता है। शेष दिनका सब समय मनुष्योंके कार्यवश विचरनेके लिये माना गया है ।। ८-९ ।। लोभात् प्रचारं चरतस्तासु वेलासु वै नरान् । उपक्रान्तानि गृह्णीमो राक्षसैः सह बालिशान् ।। १० ।। 'जो मनुष्य लोभवश हमलोगोंकी वेलामें इधर घूमते हुए आ जाते हैं, उन मूखौँको हम गन्धर्व और राक्षस कैद कर लेते हैं ।। १० ।। अतो रात्रौ प्राप्नुवन्तो जलं ब्रह्मविदो जनाः । गर्हयन्ति नरान् सर्वान् बलस्थान् नृपतीनपि ।। ११ ।। 'इसीलिये वेदवेत्ता पुरुष रातके समय जलमें प्रवेश करनेवाले सम्पूर्ण मनुष्यों और बलवान् राजाओंकी भी निन्दा करते हैं ।। ११ ।। आरात् तिष्ठत मा मह्यं समीपमुपसर्पत । कस्मान्मां नाभिजानीत प्राप्तं भागीरथीजलम् ।। १२ ।। अङ्गारपर्ण गन्धर्वं वित्त मां स्वबलाश्रयम् । अहं हि मानी चेर्युश्च कुबेरस्य प्रियः सखा ।। १३ ।। 'अरे, ओ मनुष्यो ! दूर ही खड़े रहो। मेरे समीप न आना। तुम्हें ज्ञात कैसे नहीं हुआ कि मैं गन्धर्वराज अंगारपर्ण गंगाजीके जलमें उतरा हुआ हूँ। तुमलोग मुझे (अच्छी तरह) जान लो, मैं अपने ही बलका भरोसा करनेवाला स्वाभिमानी, ईर्ष्यालु तथा कुबेरका प्रिय मित्र हूँ ।। १२-१३ ।। अङ्गारपर्णमित्येवं ख्यातं चेदं वनं मम । अनुगङ्गं चरन् कामांश्चित्रं यत्र रमाम्यहम् ।। १४ ।। मेरा यह वन भी अंगारपर्ण नामसे विख्यात है। मैं गंगाजीके तटपर विचरता हुआ इस वनमें इच्छानुसार विचित्र क्रीड़ाएँ करता रहता हूँ ।। १४ ।। न कौणपाः शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषाः । इदं समुपसर्पन्ति तत् किं समनुसर्पथ ।। १५ ।। 'मेरी उपस्थितिमें यहाँ राक्षस, यक्ष, देवता अथवा मनुष्य- कोई भी नहीं आने पाते; फिर तुमलोग कैसे आ रहे हो?' ।। १५ ।। अर्जुन उवाच समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां च दुर्मते । रात्रावहनि संध्यायां कस्य गुप्तः परिग्रहः ।। १६ ।। अर्जुन बोले- दुर्मते ! समुद्र, हिमालयकी तराई और गंगानदीके तटपर रात, दिन अथवा संध्याके समय किसका अधिकार सुरक्षित है? ।। १६ ।। भुक्तो वाप्यथवाभुक्तो रात्रावहनि खेचर । न कालनियमो ह्यस्ति गङ्गां प्राप्य सरिद्वराम् ।। १७ ।। आकाशचारी गन्धर्व! सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजीके तटपर आनेके लिये यह नियम नहीं है कि यहाँ कोई खाकर आये या बिना खाये, रातमें आये या दिनमें। इसी प्रकार काल आदिका भी कोई नियम नहीं है ।। १७ ।। वयं च शक्तिसम्पन्ना अकाले त्वामधृष्णुम । अशक्ता हि रणे क्रूर युष्मानर्चन्ति मानवाः ।। १८ ।। अरे, ओ क्रूर ! हमलोग तो शक्तिसम्पन्न हैं। असमयमें भी आकर तुम्हें कुचल सकते हैं। जो युद्ध करनेमें असमर्थ हैं, वे दुर्बल मनुष्य ही तुमलोगोंकी पूजा करते हैं ।। १८ ।। पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद् विनिस्सृता । गङ्गा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा समपद्यत ।। १९ ।। गङ्गां च यमुनां चैव प्लक्षजातां सरस्वतीम् । रथस्थां सरयूं चैव गोमतीं गण्डकीं तथा ।। २० ।। अपर्युषितपापास्ते नदीः सप्त पिबन्ति ये । इयं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः ।। २१ ।। देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम् । तथा पितृन् वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः । गङ्गा भवति वै प्राप्य कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।। २२ ।। प्राचीन कालमें हिमालयके स्वर्णशिखरसे निकली हुई गंगा सात धाराओंमें विभक्त हो समुद्रमें जाकर मिल गयी हैं। जो पुरुष गंगा, यमुना, प्लक्षकी जड़से प्रकट हुई सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी- इन सात नदियोंका जल पीते हैं, उनके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। ये गंगा बड़ी पवित्र नदी हैं। एकमात्र आकाश ही इनका तट है। गन्धर्व! ये आकाशमार्गसे विचरती हुई गंगा देवलोकमें अलकनन्दा नाम धारण करती हैं। ये ही वैतरणी होकर पितृलोकमें बहती हैं। वहाँ पापियोंके लिये इनके पार जाना अत्यन्त कठिन होता है। इस लोकमें आकर इनका नाम गंगा होता है। यह श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीका कथन है ।। १९-२२ ।। असम्बाधा देवनदी स्वर्गसम्पादनी शुभा । कथमिच्छसि तां रोद्धं नैष धर्मः सनातनः ।। २३ ।। ये कल्याणमयी देवनदी सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंसे रहित एवं स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाली हैं। तुम उन्हीं गंगाजीपर किसलिये रोक लगाना चाहते हो? यह सनातन धर्म नहीं है ।। २३ ।। अनिवार्यमसम्बाधं तव वाचा कथं वयम् । न स्पृशेम यथाकामं पुण्यं भागीरथीजलम् ।। २४ ।। जिसे कोई रोक नहीं सकता, जहाँ पहुँचनेमें कोई बाधा नहीं है, भागीरथीके उस पावन जलका तुम्हारे कहनेसे हम अपने इच्छानुसार स्पर्श क्यों न करें? ।। २४ ।। वैशम्पायन उवाच अङ्गारपर्णस्तच्छ्रुत्वा क्रुद्ध आनम्य कार्मुकम् । मुमोच बाणान् निशितानहीनाशीविषानिव ।। २५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! अर्जुनकी वह बात सुनकर अंगारपर्ण क्रोधित हो गया और धनुष नवाकर विषैले साँपोंकी भाँति तीखे बाण छोड़ने लगा ।। २५ ।। उल्मुकं भ्रामयंस्तूर्णं पाण्डवश्चर्म चोत्तरम् । व्यपोहत शरांस्तस्य सर्वानेव धनंजयः ।। २६ ।। यह देख पाण्डुनन्दन धनंजयने तुरंत ही मशाल घुमाकर और उत्तम ढालसे रोककर उसके सभी बाण व्यर्थ कर दिये ।। २६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️914