sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣8️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवों की पंचाल यात्रा और अर्जुन के द्वारा चित्ररथ गन्धर्व की पराजय एवं उन दोनों की मित्रता...(दिन 481) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ पुरा कृतं महेन्द्रस्य वज्र वृत्रनिबर्हणम् । दशधा शतधा चैव तच्छीर्ण वृत्रमूर्धनि ।। ५० ।। पूर्वकाल में वृत्रासुर का संहार करने के निमित्त इन्द्र के लिये जिस वज्र का निर्माण किया गया था, वृत्रासुर के मस्तक पर पड़ते ही उसके दस बड़े और सौ छोटे टुकड़े हो गये ।। ५० ।। ततो भागीकृतो देवैर्वज्रभाग उपास्यते । लोके यशो धनं किंचित् सैव वज्रतनुः स्मृता ।। ५१ ।। तबसे अनेक भागों में बँटे हुए उस वज्रके प्रत्येक भाग की देवतालोग उपासना करते हैं। लोक में उत्कृष्ट धन और यश आदि जो कुछ भी वस्तु है, उसे वज्र का स्वरूप माना गया है ।। ५१ ।। वज्रपाणिर्ब्रह्मणः स्यात् क्षत्रं वज्ररथं स्मृतम् । वैश्या वै दानवज्राश्च कर्मवज्रा यवीयसः ।। ५२ ।। (अग्नि में आहुति देने के कारण) ब्राह्मणका दाहिना हाथ वज्र है। क्षत्रियका रथ वज्र है। वैश्यलोग जो दान करते हैं, वह भी वज्र है और शूद्रलोग जो सेवाकार्य करते हैं, उसे भी वज्र ही समझना चाहिये ।। ५२ ।। क्षत्रवज्रस्य भागेन अवध्या वाजिनः स्मृताः । रथाङ्ग वडवा सूते शूराश्चाश्वेषु ये मताः ।। ५३ ।। क्षत्रिय के रथरूपी वज्रका एक विशिष्ट अंग होनेसे घोड़ों को अवध्य बताया गया है। गन्धर्वदेश की घोड़ी रथ को वहन करने वाले रथांगस्वरूप (वज्रस्वरूप) घोड़े को जन्म देती है। वे घोड़े सब अश्वोंमें शूरवीर माने जाते हैं ।। ५३ ।। कामवर्णाः कामजवाः कामतः समुपस्थिताः । इति गन्धर्वजाः कामं पूरयिष्यन्ति मे हयाः ।। ५४ ।। गन्धर्व-देश के घोड़ों की यह विशेषता है कि वे इच्छानुसार अपना रंग बदल लेते हैं। सवार की इच्छा के अनुसार अपने वेगको घटा-बढ़ा सकते हैं। जब आवश्यकता या इच्छा हो, तभी वे उपस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार मेरे गन्धर्वदेशीय घोड़े आपकी इच्छापूर्ण करते रहेंगे ।। ५४ ।। अर्जुन उवाच यदि प्रीतेन मे दत्तं संशये जीवितस्य वा । विद्याधनं श्रुतं वापि न तद् गन्धर्व रोचये ।। ५५ ।। अर्जुनने कहा- गन्धर्व! यदि तुमने प्रसन्न होकर अथवा प्राणसंकटसे बचानेके कारण मुझे विद्या, धन अथवा शास्त्र प्रदान किया है तो मैं इस तरहका दान लेना पसंद नहीं करता ।। ५५ ।। गन्धर्व उवाच संयोगो वै प्रीतिकरो महत्सु प्रतिदृश्यते । जीवितस्य प्रदानेन प्रीतो विद्यां ददामि ते ।। ५६ ।। गन्धर्व बोला- महापुरुषोंके साथ जो समागम होता है, वह प्रीतिको बढ़ानेवाला होता है-ऐसा देखनेमें आता है। आपने मुझे जीवनदान दिया है, इससे प्रसन्न होकर मैं आपको चाक्षुषी विद्या भेंट करता हूँ ।। ५६ ।। त्वत्तोऽप्यहं ग्रहीष्यामि अस्त्रमाग्नेयमुत्तमम् । तथैव योग्यं बीभत्सो चिराय भरतर्षभ ।। ५७ ।। साथ ही आपसे भी मैं उत्तम आग्नेयास्त्र ग्रहण करूँगा। भरतकुलभूषण अर्जुन! ऐसा करनेसे ही हम दोनोंमें दीर्घकालतक समुचित सौहार्द बना रहेगा ।। ५७ ।। अर्जुन उवाच त्वत्तोऽस्त्रेण वृणोम्यश्वान् संयोगः शाश्वतोऽस्तु नौ । सखे तद् ब्रूहि गन्धर्व युष्मभ्यो यद् भयं भवेत् ।। ५८ ।। अर्जुन ने कहा-ठीक है, मैं यह अस्त्र-विद्या देकर तुमसे घोड़े ले लूँगा। हम दोनोंकी मैत्री सदा बनी रहे। सखे गन्धर्वराज ! बताओ तो सही, तुम लोगों से हम मनुष्यों को क्यों भय प्राप्त होता है? ।। ५८ ।। कारणं ब्रूहि गन्धर्व किं तद् येन स्म धर्षिताः । यान्तो वेदविदः सर्वे सन्तो रात्रावरिंदमाः ।। ५९ ।। गन्धर्व ! हम सब लोग वेदवेत्ता हैं और शत्रुओंका दमन करनेकी शक्ति रखते हैं; फिर भी रातमें यात्रा करते समय जो तुमने हमलोगोंपर आक्रमण किया है, इसका क्या कारण है? इसपर भी प्रकाश डालो ।। ५९ ।। गन्धर्व उवाच अनग्नयोऽनाहुतयो न च विप्रपुरस्कृताः । यूयं ततो धर्षिताः स्थ मया वै पाण्डुनन्दनाः ।। ६० ।। गन्धर्व बोला-पाण्डुकुमारो ! आपलोग (विवाहित न होनेके कारण) त्रिविध अग्नियोंकी सेवा नहीं करते। (अध्ययन पूरा करके समावर्तन संस्कारसे सम्पन्न हो गये हैं, अतः) प्रतिदिन अग्निको आहुति भी नहीं देते। आपके आगे कोई ब्राह्मण पुरोहित भी नहीं है। इन्हीं कारणोंसे मैंने आपपर आक्रमण किया है ।। ६० ।। (जानता च मया तस्मात् तेजश्चाभिजनं च वः । इयं मतिमतां श्रेष्ठ धर्षितुं वै कृता मतिः ।। को हि वस्त्रिषु लोकेषु न वेद भरतर्षभ । स्वैर्गुणैर्विस्तृतं श्रीमद् यशोऽग्र्यं भूरिवर्चसाम् ।।) यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचोरगदानवाः । विस्तरं कुरुवंशस्य धीमन्तः कथयन्ति ते ।। ६१ ।। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! इसीलिये मैंने आपलोगोंके तेज और कुलोचित प्रभावको जानते हुए भी आपपर आक्रमण करनेका विचार किया। भरतश्रेष्ठ ! आपलोग महान् तेजस्वी हैं। आपने अपने गुणोंसे जिस शोभाशाली श्रेष्ठ यशका विस्तार किया है, उसे तीनों लोकोंमें कौन नहीं जानता। बुद्धिमान् यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पिशाच, नाग और दानव कुरुकुलकी यशोगाथाका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं ।। ६१ ।। नारदप्रभृतीनां तु देवर्षीणां मया श्रुतम् । गुणान् कथयतां वीर पूर्वेषां तव धीमताम् ।। ६२ ।। वीर! नारद आदि देवर्षियों के मुख से भी मैंने आपके बुद्धिमान् पूर्वजों का गुणगान सुना है ।। ६२ ।। स्वयं चापि मया दृष्टश्चरता सागराम्बराम् । इमां वसुमतीं कृत्स्नां प्रभावः सुकुलस्य ते ।। ६३ ।। तथा समुद्र से घिरी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरते हुए मैंने स्वयं भी आपके उत्तमकुल का प्रभाव प्रत्यक्ष देखा है ।। ६३ ।। वेदे धनुषि चाचार्यमभिजानामि तेऽर्जुन । विश्रुतं त्रिषु लोकेषु भारद्वाजं यशस्विनम् ।। ६४ ।। अर्जुन ! तीनों लोकों में विख्यात यशस्वी भरद्वाजनन्दन द्रोणको भी, जो आपके वेद और धनुर्वेदके आचार्य रहे हैं, मैं अच्छी तरह जानता हूँ ।। ६४ ।। धर्म वायुं च शक्रं च विजानाम्यश्विनौ तथा । पाण्डुं च कुरुशार्दूल षडेतान् कुरुवर्धनान् । पितृनेतानहं पार्थ देवमानुषसत्तमान् ।। ६५ ।। कुरुश्रेष्ठ ! धर्म, वायु, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार तथा महाराज पाण्डु-ये छः महापुरुष कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले हैं। पार्थ! ये देवताओं तथा मनुष्योंके सिरमौर छहों व्यक्ति आपलोगोंके पिता हैं। मैं इन सबको जानता हूँ ।। ६५ ।। दिव्यात्मानो महात्मानः सर्वशस्त्रभृतां वराः । भवन्तो भ्रातरः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः ।। ६६ ।। आप सब भाई देवस्वरूप, महात्मा, समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ शूरवीर हैं तथा आपलोगोंने ब्रह्मचर्यव्रतका भलीभाँति पालन किया है ।। ६६ ।। उत्तमां च मनोबुद्धिं भवतां भावितात्मनाम् । जानन्नपि च वः पार्थ कृतवानिह धर्षणाम् ।। ६७ ।। आपलोगोंका अन्तःकरण शुद्ध है, मन और बुद्धि भी उत्तम है। पार्थ! आपके विषयमें यह सब कुछ जानते हुए भी मैंने यहाँ आक्रमण किया था ।। ६७ ।। स्त्रीसकाशे च कौरव्य न पुमान् क्षन्तुमर्हति । धर्षणामात्मनः पश्यन् बाहुद्रविणमाश्रितः ।। ६८ ।। कुरुनन्दन! इसका कारण यह है कि अपने बाहुबलका भरोसा रखनेवाला कोई भी पुरुष जब स्त्रीके समीप अपना तिरस्कार होता देखता है, तब उसे सहन नहीं कर पाता ।। ६८ ।। नक्तं च बलमस्माकं भूय एवाभिवर्धते । यतस्ततो मां कौन्तेय सदारं मन्युराविशत् ।। ६९ ।। कुन्तीनन्दन ! इसके सिवा एक बात यह भी है कि रातके समय हमलोगोंका बल बहुत बढ़ जाता है। इसीसे स्त्रीके साथ रहनेके कारण मुझमें क्रोधका आवेश हो गया था ।। ६९ ।। सोऽहं त्वयेह विजितः संख्ये तापत्यवर्धन । येन तेनेह विधिना कीर्त्यमानं निबोध मे ।। ७० ।। तपतीके कुल की वृद्धि करनेवाले अर्जुन ! आपने जिस कारण युद्धमें मुझे पराजित किया है, उसे (भी) बतलाता हूँ; सुनिये ।। ७० ।। ब्रह्मचर्य! सबसे बड़ा धर्म है और वह तुममें निश्चितरूपसे विद्यमान है। कुन्तीनन्दन ! इसीलिये युद्धमें मैं तुमसे हार गया हूँ ।। ७१ ।। तुमस यस्तु स्यात् क्षत्रियः कश्चित् कामवृत्तः परंतप । नक्तं च युधि युध्येत न स जीवेत् कथंचन ।। ७२ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! यदि दूसरा कोई कामासक्त क्षत्रिय रातमें मुझसे युद्ध करने आता तो किसी प्रकार जीवित नहीं बच सकता था ।। ७२ ।। यस्तु स्यात् कामवृत्तोऽपि पार्थ ब्रह्मपुरस्कृतः । जयेन्नक्तंचरान् सर्वान् स पुरोहितधूर्गतः ।। ७३ ।। किंतु कुन्तीकुमार ! कामासक्त होनेपर भी यदि कोई पुरुष किसी ब्राह्मणको आगे करके चले तो वह समस्त निशाचरोंपर विजय पा सकता है; क्योंकि उस दशामें उसका सारा भार पुरोहितपर होता है ।। ७३ ।। तस्मात् तापत्य यत्किंचिन्नृणां श्रेय इहेप्सितम् । तस्मिन् कर्मणि योक्तव्या दान्तात्मानः पुरोहिताः ।। ७४ ।। अतः तपतीनन्दन ! मनुष्योंको इस लोकमें जो भी कल्याणकारी कार्य करना अभीष्ट हो, उसमें वह मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पुरोहितोंको नियुक्त करे ।। ७४ ।। वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः । धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ।। ७५ ।। जो छहों अंगोंसहित वेदके स्वाध्यायमें तत्पर, ईमानदार, सत्यवादी, धर्मात्मा और मनको वशमें रखनेवाले हों, ऐसे ही ब्राह्मण राजाओंके पुरोहित होने चाहिये ।। ७५ ।। जयश्च नियतो राज्ञः स्वर्गश्च तदनन्तरम् । यस्य स्याद् धर्मविद् वाग्मी पुरोधाः शीलवान् शुचिः ।। ७६ ।। जिसके यहाँ धर्मज्ञ, वक्ता, शीलवान् और ईमानदार ब्राह्मण पुरोहित हो, उस राजाको इस लोकमें निश्चय ही विजय प्राप्त होती है और मरनेके बाद उसे स्वर्गलोक मिलता है ।। ७६ ।। लाभं लब्धुमलब्धं वा लब्धं वा परिरक्षितुम् । पुरोहितं प्रकुर्वीत राजा गुणसमन्वितम् ।। ७७ ।। राजाको किसी अप्राप्त वस्तु या धनको प्राप्त करने अथवा उपलब्ध धन आदिकी रक्षा करनेके लिये गुणवान् ब्राह्मणको पुरोहित बनाना चाहिये ।। ७७ ।। पुरोहितमते तिष्ठेद् य इच्छेद् भूतिमात्मनः । प्राप्तुं वसुमतीं सर्वां सर्वशः सागराम्बराम् ।। ७८ ।। जो समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीपर अपना अधिकार चाहे या अपने लिये ऐश्वर्य पाना चाहे, उसे पुरोहितकी आज्ञाके अधीन रहना चाहिये ।। ७८ ।। न हि केवलशौर्येण तापत्याभिजनेन च । जयेदब्राह्मणः कश्चिद् भूमिं भूमिपतिः क्वचित् ।। ७९ ।। तपतीनन्दन ! कोई भी राजा कहीं भी पुरोहितकी सहायताके बिना केवल अपने बल अथवा कुलीनताके भरोसे भूमिपर विजय नहीं पाता ।। ७९ ।। तस्मादेवं विजानीहि कुरूणां वंशवर्धन । ब्राह्मणप्रमुखं राज्यं शक्यं पालयितुं चिरम् ।। ८० ।। अतः कौरवोंके कुलकी वृद्धि करनेवाले अर्जुन! आप यह जान लें कि जहाँ विद्वान् ब्राह्मणोंकी प्रधानता हो, उसी राज्यकी दीर्घकालतक रक्षा की जा सकती है ।। ८० ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि गन्धर्वपराभवे एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६९ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्व में गन्धर्वपराभवविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६९ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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