sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣7️⃣7️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (चैत्ररथपर्व) सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः कुन्ती की अपने पुत्रों से पूछकर पंचालदेश में जाने की तैयारी...(दिन 477) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच एतच्छ्रुत्वा तु कौन्तेया ब्राह्मणात् संशितव्रतात् । सर्वे चास्वस्थमनसो बभूवुस्ते महाबलाः ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! कठोर व्रत-वाले उस ब्राह्मणसे यह सुनकर उन सब महाबली कुन्तीपुत्रोंका मन विचलित हो गया ।। १ ।। ततः कुन्ती सुतान् दृष्ट्वा सर्वांस्तद्गतचेतसः । युधिष्ठिरमुवाचेदं वचनं सत्यवादिनी ।। २ ।। तब सत्यवादिनी कुन्तीने अपने सभी पुत्रोंका मन उस स्वयंवरकी ओर आकृष्ट देख युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा ।। २ ।। कुन्त्युवाच चिररात्रोषिताः स्मेह ब्राह्मणस्य निवेशने । रममाणाः पुरे रम्ये लब्धभैक्षा महात्मनः ।। ३ ।। कुन्ती बोली-बेटा! हमलोग यहाँ इन महात्मा ब्राह्मणके घरमें बहुत दिनोंसे रह रहे हैं। इस रमणीय नगरमें हम आनन्दपूर्वक घूमे-फिरे और यहाँ हमें (पर्याप्त) भिक्षा भी उपलब्ध हुई ।। ३ ।। यानीह रमणीयानि वनान्युपवनानि च । सर्वाणि तानि दृष्टानि पुनः पुनररिंदम ।। ४ ।। शत्रुदमन ! यहाँ जो रमणीय वन और उपवन हैं, उन सबको हमने बार-बार देख लिया ।। ४ ।। पुनर्द्रष्टुं हि तानीह प्रीणयन्ति न नस्तथा । भैक्षं च न तथा वीर लभ्यते कुरुनन्दन ।। ५ ।। वीर! यदि उन्हींको हम फिर देखनेके लिये जायँ तो वे हमें उतनी प्रसन्नता नहीं दे सकते। कुरुनन्दन! अब भिक्षा भी यहाँ हमें पहले जैसी नहीं मिल रही है ।। ५ ।। ते वयं साधु पञ्चालान् गच्छाम यदि मन्यसे । अपूर्वदर्शनं वीर रमणीयं भविष्यति ।। ६ ।। यदि तुम्हारी राय हो तो अब हमलोग सुखपूर्वक पंचालदेशमें चलें। वीर! उस देशको हमने पहले कभी नहीं देखा है, इसलिये वह बड़ा रमणीय प्रतीत होगा ।। ६ ।। सुभिक्षाश्चैव पञ्चालाः श्रूयन्ते शत्रुकर्शन । यज्ञसेनश्च राजासौ ब्रह्मण्य इति शुश्रुम ।। ७ ।। शत्रुनाशन ! सुना जाता है, पंचालदेशमें बड़ा सुकाल है (इसलिये भिक्षा बहुतायतसे मिलती है)। हमने यह भी सुना है कि राजा यज्ञसेन ब्राह्मणोंके बड़े भक्त हैं ।। ७ ।। एकत्र चिरवासश्च क्षमो न च मतो मम । ते तत्र साधु गच्छामो यदि त्वं पुत्र मन्यसे ।। ८ ।। बेटा! एक स्थानपर बहुत दिनोंतक रहना मुझे उचित नहीं जान पड़ता; अतः यदि तुम ठीक समझो तो हमलोग सुखपूर्वक वहाँ चलें ।। ८ ।। युधिष्ठिर उवाच भवत्या यन्मतं कार्यं तदस्माकं परं हितम् । अनुजांस्तु न जानामि गच्छेयुर्नेति वा पुनः ।। ९ ।। युधिष्ठिरने कहा- माँ! आप जिस कार्यको ठीक समझती हैं, वह हमारे लिये परम हितकर है; परंतु अपने छोटे भाइयोंके सम्बन्धमें मैं नहीं जानता कि वे जानेके लिये उद्यत हैं या नहीं ।। ९ ।। वैशम्पायन उवाच ततः कुन्ती भीमसेनमर्जुनं यमजी तथा । उवाच गमनं ते च तथेत्येवाब्रुवंस्तदा ।। १० ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तब कुन्तीने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे भी चलनेके विषयमें पूछा। उन सबने भी 'तथास्तु' कहकर स्वीकृति दे दी ।। १० ।। तत आमन्त्र्य तं विप्रं कुन्ती राजन् सुतैः सह । प्रतस्थे नगरीं रम्यां द्रुपदस्य महात्मनः ।। ११ ।। राजन् ! तब कुन्तीने उन ब्राह्मणदेवतासे विदा लेकर अपने पुत्रोंके साथ महात्मा द्रुपदकी रमणीय नगरीकी ओर जानेकी तैयारी की ।। ११ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि पञ्चालदेशयात्रायां सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें पंचालदेशकी यात्राविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६७ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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