sn vyas
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#पौराणिक कथा इंद्रदेव को कब बदलकर दूसरा इन्द्र मिलता है आइए जानते है। : अब देवर्षि नारद जी के मन में ज्योतिषाशास्त्र (काल-ज्ञान) के गणितीय सिद्धान्तों और ब्रह्मांडीय काल-चक्र को और अधिक गहराई से समझने की लालसा उत्पन्न हुई। नारद जी ने महर्षि सनन्दन जी के चरणों में दंडवत प्रणाम करके पूछा: "हे ब्रह्मर्षि! आपने ज्योतिष शास्त्र को वेदों के नेत्र बताकर उसकी महिमा गाई। अब कृपा करके मुझे काल (समय) की सबसे सूक्ष्म इकाई से लेकर सबसे विशाल इकाई का मान बताइए। सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की गति से निर्मित होने वाले 'काल-चक्र' युगों की अवधि और ब्रह्मा जी की आयु का क्या गणितीय विधान है? सनन्दन जी ने बताया कि काल असीम है, लेकिन मनुष्यों और देवताओं के समझ के लिए शास्त्रों में काल का बहुत ही सटीक विभाजन किया गया है: आँख की पलक झपकने का जो सबसे छोटा हिस्सा होता है, उसे 'त्रुटि' और 'लव' कहते हैं। १५ निमेष की एक 'काष्ठा' होती है, और ३० काष्ठा की एक 'कला' बनती है। ३० कला का एक 'मुहूर्त' (लगभग ४८ मिनट) होता है, और ३० मुहूर्त का एक मनुष्य का 'अहोरात्र' (एक पूरा दिन और रात) बनता है। सनन्दन जी ने बताया कि जैसे-जैसे हम अलग-अलग लोकों में ऊपर जाते हैं, काल की गति और अवधि बदल जाती है। पितरों का दिन-रात: मनुष्य का एक 'मास' (महीना) पितरों का एक दिन-रात होता है। कृष्ण पक्ष उनका दिन और शुक्ल पक्ष उनकी रात होती है। मनुष्य का एक 'वर्ष' देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) होता है। उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायन उनकी रात होती है। चारों युगों का मान (दिव्य वर्ष): सत्ययुग: ४,८०० दिव्य वर्ष (१७,२८,००० सौर वर्ष) त्रेतायुग: ३,६०० दिव्य वर्ष (१२,९६,००० सौर वर्ष) द्वापरयुग: २,४०० दिव्य वर्ष (८,६४,००० सौर वर्ष) कलि युग: १,२०० दिव्य वर्ष (४,३२,००० सौर वर्ष) चारों युगों को मिलाकर एक 'महायुग' (चतुर्युगी) बनता है, जिसकी अवधि ४३ लाख २० हजार मनुष्य वर्ष होती है। सनन्दन जी ने आगे ब्रह्मा जी की आयु की विशाल काल-गणना समझाई: ७१ महायुगों का एक 'मन्वंतर' होता है। प्रत्येक मन्वंतर में एक मनु, सप्तर्षि और इंद्र बदलते हैं ऐसे १४ मन्वंतरों को मिलाकर ब्रह्मा जी का 'एक दिन' (कल्प) बनता है। यानी एक कल्प में १,००० महायुग बीतते हैं। जितनी लंबी ब्रह्मा जी की दिन की अवधि होती है, उतनी ही लंबी उनकी 'रात' भी होती है, जिसे 'नैमित्तिक प्रलय' कहते हैं। उस समय तीनों लोक (भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक) जलमग्न हो जाते हैं और भगवान श्रीहरि शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। ब्रह्मा जी का सौ वर्ष का जीवन (परम आयु) पूरा होने पर संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल प्रकृति में लय हो जाता है, जिसे 'प्राकृतिक प्रलय' कहा जाता है। सनन्दन जी ने खगोलीय सिद्धांतों के आधार पर बताया कि: सूर्य संपूर्ण सौरमंडल का आधार और आत्मा है। सूर्य की गति से ही ऋतुएँ, अयन (उत्तरायण-दक्षिणायन), मास और दिन बनते हैं। राशि चक्र में १२ राशियाँ (मेष से मीन तक) और २७ नक्षत्र (अश्विनी से रेवती तक) स्थित हैं जब ग्रह इन नक्षत्रों और राशियों में भ्रमण करते हैं, तो वे काल-चक्र के अनुसार जीवों को उनके कर्मों का शुभ और अशुभ फल प्रदान करते हैं। !! जय श्री कृष्णा!!
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