sn vyas
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#पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा एक दिन स्वर्गलोक की अनुपम अप्सरा रंभा दिव्य आभूषणों से अलंकृत होकर अपने प्रिय नलकुबेर से मिलने जा रही थीं। उनके प्रत्येक कदम के साथ पुष्पों की सुगंध वातावरण में फैल रही थी। उसी समय लंका का राजा रावण वहाँ से गुज़रा। उसकी दृष्टि जैसे ही रंभा पर पड़ी, उसका मन वासना और अहंकार से भर उठा। उसने रंभा का मार्ग रोक लिया। रंभा भय से काँप उठीं। हाथ जोड़कर उन्होंने विनती की, "हे लंकेश, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर की प्रिय हूँ। इस संबंध से मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूँ। कृपया धर्म का पालन कीजिए।" लेकिन अहंकार से अंधा हो चुका रावण किसी की मर्यादा सुनने की स्थिति में नहीं था। उसने रंभा की विनती को अनसुना कर दिया और उनका घोर अपमान किया। अपमान और पीड़ा से व्याकुल रंभा किसी तरह वहाँ से निकलकर नलकुबेर के पास पहुँचीं। उनकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। जब नलकुबेर ने पूरी घटना सुनी तो उनका क्रोध प्रचंड अग्नि की तरह भड़क उठा। उन्होंने अपने हाथों में जल लेकर संकल्प किया और कहा, "आज मैं रावण को ऐसा श्राप देता हूँ कि यदि वह भविष्य में किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श करेगा, तो उसी क्षण उसका मस्तक सौ टुकड़ों में विभाजित हो जाएगा।" नलकुबेर के इस श्राप की गूँज तीनों लोकों में फैल गई। उसी क्षण से रावण के विनाश का एक अदृश्य अध्याय प्रारंभ हो चुका था। समय बीतता गया। हिमालय के निर्जन वनों में एक महान तपस्विनी कठोर तप कर रही थीं। उनका नाम था वेदवती। बचपन से ही उन्होंने भगवान विष्णु को अपना पति मान लिया था और संकल्प लिया था कि वे केवल उन्हीं को अपना सर्वस्व स्वीकार करेंगी। वर्षों की कठिन तपस्या के बाद भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा, "देवि, इस जन्म में नहीं, लेकिन मेरे अगले अवतार में तुम मेरी अर्धांगिनी बनोगी।" यह सुनकर वेदवती का हृदय आनंद से भर उठा। इसी बीच वहाँ रावण पहुँचा। उसने तपस्विनी वेदवती का दिव्य तेज और अद्भुत सौंदर्य देखा तो उसका अहंकार फिर जाग उठा। उसने वेदवती से कहा, "त्रिलोक में मुझसे बड़ा कोई नहीं। मुझे अपना पति स्वीकार करो।" वेदवती ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "मैंने अपने जीवन, मन और आत्मा को भगवान विष्णु को समर्पित कर दिया है। तुम्हारे लिए मेरे मन में कोई स्थान नहीं है।" रावण का अहंकार इस उत्तर को सहन नहीं कर सका। उसने क्रोध में आकर वेदवती के केश पकड़ लिए। अगले ही क्षण वेदवती की आँखों में अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने अपने केश स्वयं काट डाले और दृढ़ स्वर में कहा, "हे अधर्मी रावण! तूने मेरी तपस्या और मर्यादा का अपमान किया है। मैं इस शरीर का त्याग करती हूँ, लेकिन पुनर्जन्म लेकर तेरे सर्वनाश का कारण अवश्य बनूँगी।" इतना कहकर वे अग्नि में प्रवेश कर गईं। देखते ही देखते उनका शरीर अग्नि में विलीन हो गया, लेकिन उनकी प्रतिज्ञा वन की प्रत्येक दिशा में गूँजती रही—"मैं लौटूँगी... और तेरे अहंकार का अंत करूँगी।" कालचक्र निरंतर घूमता रहा। वर्षों ने शताब्दियों का रूप ले लिया। एक ओर लंका में रावण का अत्याचार बढ़ता गया। देवता, ऋषि और समस्त पृथ्वी उसके आतंक से व्याकुल हो उठे। दूसरी ओर धर्म की रक्षा के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ श्रीराम के रूप में अवतार लिया। उधर मिथिला में भी नियति अपना चमत्कार रच रही थी। भयंकर अकाल से पीड़ित राज्य को बचाने के लिए राजा जनक स्वयं स्वर्ण का हल लेकर भूमि जोतने निकले। जैसे ही हल धरती में चला, भूमि के भीतर से एक दिव्य कलश प्रकट हुआ। उस कलश के भीतर एक तेजस्विनी कन्या विराजमान थी। राजा जनक ने उस दिव्य बालिका को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उसका नाम रखा—सीता। ऋषियों ने कहा कि यह कोई साधारण कन्या नहीं, बल्कि वही वेदवती थीं जिन्होंने रावण के विनाश का संकल्प लिया था। अब वे सीता के रूप में पुनर्जन्म लेकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने आई थीं। समय के साथ श्रीराम और सीता का दिव्य विवाह हुआ। संपूर्ण पृथ्वी इस मंगल मिलन की साक्षी बनी। किंतु किसी को ज्ञात नहीं था कि यह केवल एक विवाह नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के अंतिम युद्ध की भूमिका थी। कुछ समय बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए निकल पड़े। वहीं पंचवटी के वन में रावण की बहन शूर्पणखा का अपमान हुआ और प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए उसने रावण को सीता के अद्वितीय सौंदर्य का वर्णन किया। रावण का अहंकार और वासना एक बार फिर जाग उठी। उसने छलपूर्वक स्वर्ण मृग की योजना बनाई। जब श्रीराम और लक्ष्मण कुटिया से दूर गए, तब रावण साधु का वेश धारण कर सीता के द्वार पहुँचा। सीता ने अतिथि समझकर उसका सम्मान किया, लेकिन अगले ही क्षण रावण ने अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया। उसने माता सीता का हरण अवश्य किया, परंतु नलकुबेर के श्राप के कारण वह उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें स्पर्श करने का साहस नहीं कर सका। वह केवल उन्हें पृथ्वी सहित उठाकर पुष्पक विमान में बैठा ले गया। यही कारण था कि अशोक वाटिका में रहते हुए भी रावण कभी माता सीता की मर्यादा भंग नहीं कर सका। उसे ज्ञात नहीं था कि जिस स्त्री को वह अपनी विजय समझ रहा है, वही उसके विनाश का कारण बनने वाली है। वेदवती की प्रतिज्ञा अब पूर्ण होने वाली थी। श्रीराम की सेना समुद्र पार करेगी, लंका की स्वर्णिम दीवारें ध्वस्त होंगी, कुंभकर्ण और मेघनाद जैसे महाबली योद्धा धराशायी होंगे और अंततः स्वयं रावण अपने ही अहंकार के कारण युद्धभूमि में श्रीराम के बाणों से पराजित होगा। इस प्रकार रंभा का अपमान, नलकुबेर का श्राप, वेदवती की प्रतिज्ञा और सीता का अवतार—ये सभी घटनाएँ अलग-अलग नहीं थीं। ये सब उस दिव्य योजना के सूत्र थे, जिन्हें स्वयं समय ने रावण के अंत के लिए जोड़ा था। यह कथा हमें सिखाती है कि शक्ति, ज्ञान और वैभव तभी तक शोभा देते हैं जब तक उनके साथ विनम्रता और मर्यादा हो। जिस दिन अहंकार धर्म की सीमा लाँघ देता है, उसी दिन उसके पतन की शुरुआत हो जाती है।
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