sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣4️⃣9️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(हिडिम्बवधपर्व)
त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
हिडिम्बा का कुन्ती आदि से अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेन के द्वारा हिडिम्बासुर का वध...(दिन 449)
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वैशम्पायन उवाच
अर्जुनेनैवमुक्तस्तु भीमो रोषाज्ज्वलन्निव । बलमाहारयामास यद् वायोर्जगतः क्षये ।। २४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- अर्जुनके यों कहनेपर भीम रोषसे जल उठे और प्रलयकालमें वायुका जो बल प्रकट होता है, उसे उन्होंने अपने भीतर धारण कर लिया ।। २४ ।।
ततस्तस्याम्बुदाभस्य भीमो रोषात् तु रक्षसः । उत्क्षिप्याभ्रामयद् देहं तूर्ण शतगुणं तदा ।। २५ ।।
तत्पश्चात् काले मेघके समान उस राक्षसके शरीरको भीमने क्रोधपूर्वक तुरंत ऊपर उठा लिया और उसे सौ बार घुमाया ।। २५ ।।
भीम उवाच
वृथामांसैर्वृथापुष्टो वृथावृद्धो वृथामतिः । वृथामरणमर्हस्त्वं वृथाद्य न भविष्यसि ।। २६ ।।
इसके बाद भीम उस राक्षससे बोले- अरे निशाचर ! तू व्यर्थ मांससे व्यर्थ ही पुष्ट होकर व्यर्थ ही बड़ा हुआ है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है। इसीसे तू व्यर्थ मृत्युके योग्य है। इसलिये आज तू व्यर्थ ही अपनी इहलीला समाप्त करेगा (बाहुयुद्धमें मृत्यु होनेके कारण तू स्वर्ग और कीर्तिसे वंचित हो जायगा) ।। २६ ।।
क्षेममद्य करिष्यामि यथा वनमकण्टकम् । न पुनर्मानुषान् हत्वा भक्षयिष्यसि राक्षस ।। २७ ।।
राक्षस ! आज तुझे मारकर मैं इस वनको निष्कण्टक एवं मंगलमय बना दूँगा, जिससे फिर तू मनुष्योंको मारकर नहीं खा सकेगा ।। २७ ।।
अर्जुन उवाच
यदि वा मन्यसे भारं त्वमिमं राक्षसं युधि । करोमि तव साहाय्यं शीघ्रमेष निपात्यताम् ।। २८ ।।
अर्जुन बोले- भैया ! यदि तुम युद्धमें इस राक्षसको अपने लिये भार समझ रहे हो तो मैं तुम्हारी सहायता करता हूँ। तुम इसे शीघ्र मार गिराओ ।। २८ ।।
अथवाप्यहमेवैनं हनिष्यामि वृकोदर । कृतकर्मा परिश्रान्तः साधु तावदुपारम ।। २९ ।।
वृकोदर ! अथवा मैं ही इसे मार डालूँगा। तुम अधिक युद्ध करके थक गये हो। अतः कुछ देर अच्छी तरह विश्राम कर लो ।। २९ ।।
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षणः । निष्पिष्यैनं बलाद् भूमौ पशुमारममारयत् ।। ३० ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! अर्जुनकी यह बात सुनकर भीमसेन अत्यन्त क्रोधमें भर गये। उन्होंने बलपूर्वक राक्षसको पृथ्वीपर दे मारा और उसे रगड़ते हुए पशुकी तरह मारना आरम्भ किया ।। ३० ।।
स मार्यमाणो भीमेन ननाद विपुलं स्वनम् । पूरयंस्तद् वनं सर्वं जलार्द्र इव दुन्दुभिः ।। ३१ ।।
इस प्रकार भीमसेनकी मार पड़नेपर वह राक्षस जलसे भीगे हुए नगारेकी-सी ध्वनिसे सम्पूर्ण वनको गुँजाता हुआ जोर-जोरसे चीखने लगा ।। ३१ ।।
बाहुभ्यां योक्त्रयित्वा तं बलवान् पाण्डुनन्दनः । मध्ये भङ्क्त्वा महाबाहुर्हर्षयामास पाण्डवान् ।। ३२ ।।
तब महाबाहु बलवान् पाण्डुनन्दन भीमसेनने उसे दोनों भुजाओंसे बाँधकर उलटा मोड़ दिया और उसकी कमर तोड़कर पाण्डवोंका हर्ष बढ़ाया ।। ३२ ।।
हिडिम्बं निहतं दृष्ट्वा संहृष्टास्ते तरस्विनः । अपूजयन् नरव्याघ्रं भीमसेनमरिंदमम् ।। ३३ ।।
हिडिम्बको मारा गया देख वे महान् वेगशाली पाण्डव अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो उठे और उन्होंने शत्रुओंका दमन करनेवाले नरश्रेष्ठ भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ३३ ।।
अभिपूज्य महात्मानं भीमं भीमपराक्रमम् ।
पुनरेवार्जुनो वाक्यमुवाचेदं वृकोदरम् ।। ३४ ।।
इस प्रकार भयंकर पराक्रमी महात्मा भीमकी प्रशंसा करके अर्जुनने पुनः उनसे यह बात कही- ।। ३४ ।।
न दूरं नगरं मन्ये वनादस्मादहं विभो ।
शीघ्रं गच्छाम भद्रं ते न नो विद्यात् सुयोधनः ।। ३५ ।।
'प्रभो! मैं समझता हूँ, इस वनसे नगर अब दूर नहीं है। तुम्हारा कल्याण हो। अब हमलोग शीघ्र चलें, जिससे दुर्योधनको हमारा पता न लग सके' ।। ३५ ।।
ततः सर्वे तथेत्युक्त्वा सह मात्रा महारथाः । प्रययुः पुरुषव्याघ्रा हिडिम्बा चैव राक्षसी ।। ३६ ।।
तब सभी पुरुषसिंह महारथी पाण्डव (ठीक है,) ऐसा ही करें' यों कहकर माताके साथ वहाँसे चल दिये। हिडिम्बा राक्षसी भी उनके साथ हो ली ।। ३६ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि हिडिम्बवधे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें हिडिम्बासुरके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५३ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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