sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣3️⃣5️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(जतुगृहपर्व)
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
लाक्षागृह का दाह और पाण्डवों का सुरंग के रास्ते निकल जाना...(दिन 435)
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पौरा ऊचुः
दुर्योधनप्रयुक्तेन पापेनाकृतबुद्धिना ।
गृहमात्मविनाशाय कारितं दाहितं च तत् ।। १४ ।।
अहो धिग् धृतराष्ट्रस्य बुद्धिर्नातिसमञ्जसा ।
यः शुचीन् पाण्डुदायादान् दाहयामास शत्रुवत् ।। १५ ।।
पुरवासी बोले-अहो ! पुरोचनका अन्तःकरण अपने वशमें नहीं था। उस पापीने दुर्योधनकी आज्ञासे अपने ही विनाशके लिये इस घरको बनवाया और जला भी दिया ! अहो ! धिक्कार है, धृतराष्ट्रकी बुद्धि बहुत बिगड़ गयी है, जिसने शुद्ध हृदयवाले पाण्डुपुत्रोंको शत्रुकी भाँति आगमें जला दिया ।। १४-१५ ।।
दिष्ट्या त्विदानीं पापात्मा दग्धोऽयमतिदुर्मतिः ।
अनागसः सुविश्वस्तान् यो ददाह नरोत्तमान् ।। १६ ।।
सौभाग्यकी बात है कि यह अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला पापात्मा पुरोचन भी इस समय दग्ध हो गया है, जिसने बिना किसी अपराधके अपने ऊपर पूर्ण विश्वास करनेवाले नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको जला दिया है ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं ते विलपन्ति स्म वारणावतका जनाः।
परिवार्य गृहं तच्च तस्थू रात्री समन्ततः ।। १७ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! इस प्रकार वारणावत के लोग विलाप करने लगे। वे रातभर उस घर को चारों ओर से घेरकर खड़े रहे ।। १७ ।।
पाण्डवाश्चापि ते सर्वे सह मात्रा सुदुःखिताः ।
बिलेन तेन निर्गत्य जग्मुर्दुतमलक्षिताः ।। १८ ।।
उधर समस्त पाण्डव भी अत्यन्त दुःखी हो अपनी माताके साथ सुरंगके मार्गसे निकलकर तुरंत ही दूर चले गये। उन्हें कोई भी देख न सका ।। १८ ।।
तेन निद्रोपरोधेन साध्वसेन च पाण्डवाः ।
न शेकुः सहसा गन्तुं सह मात्रा परंतपाः ।। १९ ।।
नींद न ले सकने के कारण आलस्य और भय से युक्त परंतप पाण्डव अपनी माता के साथ जल्दी-जल्दी चल नहीं पाते थे ।। १९ ।।
भीमसेनस्तु राजेन्द्र भीमवेगपराक्रमः । जगाम भ्रातृनादाय सर्वान् मातरमेव च ।। २० ।।
स्कन्धमारोप्य जननीं यमावङ्केन वीर्यवान् । पार्थों गृहीत्वा पाणिभ्यां भ्रातरौ सुमहाबलः ।। २१ ।।
राजेन्द्र ! भयंकर वेग और पराक्रमवाले भीमसेन अपने सब भाइयों तथा माताको भी साथ लिये चल रहे थे। वे महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे। उन्होंने माताको तो कंधेपर चढ़ा लिया और नकुल-सहदेवको गोदमें उठा लिया तथा शेष दोनों भाइयोंको दोनों हाथोंसे पकड़कर उन्हें सहारा देते हुए चलने लगे ।। २०-२१ ।।
उरसा पादपान् भञ्जन् महीं पद्भ्यां विदारयन् । स जगामाशु तेजस्वी वातरंहा वृकोदरः ।। २२ ।।
तेजस्वी भीम वायुके समान वेगशाली थे। वे अपनी छातीके धक्केसे वृक्षोंको तोड़ते और पैरोंकी ठोकरसे पृथ्वीको विदीर्ण करते हुए तीव्र गतिसे आगे बढ़े जा रहे थे ।। २२ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि जतुगृहदाहे सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें जतुगृहदाहविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४७ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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