sn vyas
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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-4️⃣3️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (जतुगृहपर्व) सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः लाक्षागृह का दाह और पाण्डवों का सुरंग के रास्ते निकल जाना...(दिन 434) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच तांस्तु दृष्ट्वा सुमनसः परिसंवत्सरोषितान् । विश्वस्तानिव संलक्ष्य हर्ष चक्रे पुरोचनः ।। १ ।। पुरोचने तथा हृष्टे कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिरः । भीमसेनार्जुनौ चोभौ यमौ प्रोवाच धर्मवित् ।। २ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! पाण्डवोंको एक वर्षसे वहाँ प्रसन्नचित्त हो विश्वस्तकी तरह रहते हुए देख पुरोचनको बड़ा हर्ष हुआ। उसके इस प्रकार प्रसन्न होनेपर धर्मके ज्ञाता कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे इस प्रकार कहा ।। १-२ ।। अस्मानयं सुविश्वस्तान् वेत्ति पापः पुरोचनः । वञ्चितोऽयं नृशंसात्मा कालं मन्ये पलायने ।। ३ ।। 'पापी पुरोचन हमलोगोंको पूर्ण विश्वस्त समझ रहा है। इस क्रूरको अबतक हमलोगोंने धोखा दिया है। अब मेरी रायमें हमारे भाग निकलनेका यह उपयुक्त अवसर आ गया है ।। ३ ।। आयुधागारमादीप्य दग्ध्वा चैव पुरोचनम्। षट् प्राणिनो निधायेह द्रवामोऽनभिलक्षिताः ।। ४ ।। 'इस आयुधागारमें आग लगाकर पुरोचनको जला करके इसके भीतर छः प्राणियोंको रखकर हम इस तरह भाग निकलें कि कोई हमें देख न सके' ।। ४ ।। अथ दानापदेशेन कुन्ती ब्राह्मणभोजनम्। चक्रे निशि महाराज आजग्मुस्तत्र योषितः ।। ५ ।। ता विहृत्य यथाकामं भुक्त्वा पीत्वा च भारत । जग्मुर्निशि गृहानेव समनुज्ञाप्य माधवीम् ।। ६ ।। महाराज ! तदनन्तर एक दिन रात्रिके समय कुन्तीने दान देनेके निमित्त ब्राह्मण-भोजन कराया। उसमें बहुत-सी स्त्रियाँ भी आयी थीं। भारत! वे सब स्त्रियाँ इच्छानुसार घूम-फिरकर खा-पी लेनेके बाद कुन्तीदेवीसे आज्ञा ले रातमें फिर अपने-अपने घरोंको ही लौट गयीं ।। ५-६ ।। निषादी पञ्चपुत्रा तु तस्मिन् भोज्ये यदृच्छया । अन्नार्थिनी समभ्यागात् सपुत्रा कालचोदिता ।। ७ ।। सा पीत्वा मदिरां मत्ता सपुत्रा मदविह्वला । सह सर्वैः सुतै राजंस्तस्मिन्नेव निवेशने ।। ८ ।। सुष्वाप विगतज्ञाना मृतकल्पा नराधिप । अथ प्रवाते तुमुले निशि सुप्ते जने तदा ।। ९ ।। तदुपादीपयद् भीमः शेते यत्र पुरोचनः । ततो जतुगृहद्वारं दीपयामास पाण्डवः ।। १० ।। परंतु दैवेच्छासे उस भोजके समय एक भीलनी अपने पाँच बेटोंके साथ वहाँ भोजनकी इच्छासे आयी, मानो कालने ही उसे प्रेरित करके वहाँ भेजा था। वह भीलनी मदिरा पीकर मतवाली हो चुकी थी। उसके पुत्र भी शराब पीकर मस्त थे। राजन् ! शराबके नशेमें बेहोश होनेके कारण अपने सब पुत्रोंके साथ वह उसी घरमें सो गयी। उस समय वह अपनी सुध-बुध खोकर मृतक-सी हो रही थी। रातमें जब सब लोग सो गये, उस समय सहसा बड़े जोरकी आँधी चली। तब भीमसेनने उस जगह आग लगा दी, जहाँ पुरोचन सो रहा था। फिर उन्होंने लाक्षागृहके प्रमुख द्वारपर आग लगायी ।। ७-१० ।। समन्ततो ददौ पश्चादग्निं तत्र निवेशने । ज्ञात्वा तु तद् गृहं सर्वमादीप्तं पाण्डुनन्दनाः ।। ११ ।। सुरङ्गां विविशुस्तूर्ण मात्रा सार्धमरिंदमाः । ततः प्रतापः सुमहाञ्छब्दश्चैव विभावसोः ।। १२ ।। प्रादुरासीत् तदा तेन बुबुधे स जनव्रजः । तदवेक्ष्य गृहं दीप्तमाहुः पौराः कृशाननाः ।। १३ ।। इसके पश्चात् उन्होंने उस घरके चारों ओर आग लगा दी। जब वह सारा घर अग्निकी लपेटमें आ गया, तब यह जानकर शत्रुओंका दमन करनेवाले पाण्डव अपनी माताके साथ सुरंगमें घुस गये; फिर तो वहाँ अग्निकी भयंकर लपटें उठने लगीं, भीषण ताप फैल गया। घरको जलानेवाली उस आगका महान् चट-चट शब्द सुनायी देने लगा। इससे उस नगरका जनसमूह जाग उठा। उस घरको जलता देख पुरवासियोंके मुखपर दीनता छा गयी। वे व्याकुल होकर कहने लगे ।। ११-१३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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