sn vyas
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#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-4️⃣1️⃣8️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कणिक का धृतराष्ट्र को कूटनीति का उपदेश...(दिन 418)
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जम्बुक उवाच
असकृद् यतितो ह्येष हन्तुं व्याघ्र वने त्वया ।। २८ ।।
युवा वै जवसम्पन्नो बुद्धिशाली न शक्यते । मूषिकोऽस्य शयानस्य चरणौ भक्षयत्वयम् ।। २९ ।।
यथैनं भक्षितैः पादैर्व्याघ्रो गृह्णातु वै ततः । ततो वै भक्षयिष्यामः सर्वे मुदितमानसाः ।। ३० ।।
गीदड़ने कहा- भाई बाघ ! तुमने वनमें इस हरिणको मारनेके लिये कई बार यत्न किया, परंतु यह बड़े वेगसे दौड़नेवाला, जवान और बुद्धिमान् है, इसलिये पकड़में नहीं आता। मेरी राय है कि जब यह हरिण सो रहा हो, उस समय यह चूहा इसके दोनों पैरोंको काट खाये। (फिर कटे हुए पैरोंसे यह उतना तेज नहीं दौड़ सकता।) उस अवस्थामें बाघ उसे पकड़ ले; फिर तो हम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर उसे खायँगे ।। २८-३० ।।
जम्बुकस्य तु तद् वाक्यं तथा चक्रुः समाहिताः । मूषिकाभक्षितैः पादैर्मृगं व्याघ्रोऽवधीत् तदा ।। ३१ ।।
गीदड़की वह बात सुनकर सबने सावधान होकर वैसा ही किया। चूहेके द्वारा काटे हुए पैरोंसे लड़खड़ाते हुए मृगको बाघने तत्काल ही मार डाला ।। ३१ ।।
दृष्ट्ववाचेष्टमानं तु भूमौ मृगकलेवरम् ।
स्नात्वाऽऽगच्छत भद्रं वो रक्षामीत्याह जम्बुकः ।। ३२ ।।
पृथ्वी पर हरिण के शरीर को निश्चेष्ट पड़ा देख गीदड़ने कहा- 'आपलोगोंका भला हो।
स्नान करके आइये। तबतक मैं इसकी रखवाली करता हूँ' ।। ३२ ।।
शृगालवचनात् तेऽपि गताः सर्वे नदीं ततः । स चिन्तापरमो भूत्वा तस्थौ तत्रैव जम्बुकः ।। ३३ ।।
गीदड़के कहनेसे वे (बाघ आदि) सब साथी नदीमें (नहानेके लिये) चले गये। इधर वह गीदड़ किसी चिन्तामें निमग्न होकर वहीं खड़ा रहा ।। ३३ ।।
अथाजगाम पूर्व तु स्नात्वा व्याघ्रो महाबलः । ददर्श जम्बुकं चैव चिन्ताकुलितमानसम् ।। ३४ ।।
इतनेमें ही महाबली बाघ स्नान करके सबसे पहले वहाँ लौट आया। आनेपर उसने देखा, गीदड़का चित्त चिन्तासे व्याकुल हो रहा है ।। ३४ ।।
व्याघ्र उवाच
किं शोचसि महाप्राज्ञ त्वं नो बुद्धिमतां वरः । अशित्वा पिशितान्यद्य विहरिष्यामहे वयम् ।। ३५ ।।
तब बाघने पूछा- महामते! क्यों सोचमें पड़े हो? हमलोगोंमें तुम्हीं सबसे बड़े बुद्धिमान् हो। आज इस हरिणका मांस खाकर हमलोग मौजसे घूमें-फिरेंगे ।। ३५ ।।
जम्बुक उवाच
शृणु मे त्वं महाबाहो यद् वाक्यं मूषिकोऽब्रवीत् । धिग् बलं मृगराजस्य मयाद्यायं मृगो हतः ।। ३६ ।।
गीदड़ बोला- महाबाहो ! चूहेने (तुम्हारे विषयमें) जो बात कही है, उसे तुम मुझसे सुनो। वह कहता था, 'मृगोंके राजा बाघके बलको धिक्कार है! आज इस मृगको तो मैंने मारा है ।। ३६ ।।
मद्बाहुबलमाश्रित्य तृप्तिमद्य गमिष्यति । गर्जमानस्य तस्यैवमतो भक्ष्यं न रोचये ।। ३७ ।।
'मेरे बाहुबलका आश्रय लेकर आज वह अपनी भूख बुझायेगा।' उसने इस प्रकार गरज-गरजकर (घमंडभरी) बातें कहीं हैं, अतः उसकी सहायतासे प्राप्त हुए इस भोजनको ग्रहण करना मुझे अच्छा नहीं लगता ।। ३७ ।।
व्याघ्घ्र उवाच
ब्रवीति यदि स ह्येवं काले ह्यस्मिन् प्रबोधितः । स्वबाहुबलमाश्रित्य हनिष्येऽहं वनेचरान् ।। ३८ ।।
खादिष्ये तत्र मांसानि इत्युक्त्वा प्रस्थितो वनम् । एतस्मिन्नेव काले तु मूषिकोऽप्याजगाम ह ।। ३९ ।।
तमागतमभिप्रेत्य शृगालोऽप्यब्रवीद् वचः ।
बाघने कहा-यदि वह ऐसी बात कहता है, तब तो उसने इस समय मेरी आँखें खोल दीं-मुझे सचेत कर दिया। आजसे मैं अपने ही बाहुबलके भरोसे वन-जन्तुओंका वध किया करूँगा और उन्हींका मांस खाऊँगा। यों कहकर बाघ वनमें चला गया। इसी समय चूहा भी (नहा-धोकर) वहाँ आ पहुँचा। उसे आया देख गीदड़ने कहा ।। ३८-३९३ ।।
जम्बुक उवाच
शृणु मूषिक भद्रं ते नकुलो यदिहाब्रवीत् ।। ४० ।।
गीदड़ बोला-चूहा भाई! तुम्हारा भला हो। नेवलेने यहाँ जो बात कही है, उसे सुन लो ।। ४० ।।
मृगमांसं न खादेयं गरमेतन्न रोचते ।
मूषिकं भक्षयिष्यामि तद् भवाननुमन्यताम् ।। ४१ ।।
वह कह रहा था कि 'बाघके काटनेसे इस हरिणका मांस जहरीला हो गया है, मैं तो इसे खाऊँगा नहीं; क्योंकि यह मुझे पसंद नहीं है। यदि तुम्हारी अनुमति हो तो मैं चूहेको ही खा लूँ' ।। ४१ ।।
तच्छ्रुत्वा मूषिको वाक्यं संत्रस्तः प्रगतो बिलम् ।
ततः स्नात्वा स वै तत्र आजगाम वृको नृप ।। ४२ ।।
यह बात सुनकर चूहा अत्यन्त भयभीत होकर बिलमें घुस गया। राजन् ! तत्पश्चात् भेड़िया भी स्नान करके वहाँ आ पहुँचा ।। ४२ ।।
तमागतमिदं वाक्यमब्रवीज्जम्बुकस्तदा । मृगराजो हि संक्रुद्धो न ते साधु भविष्यति ।। ४३ ।।
सकलत्रस्त्विहायाति कुरुष्व यदनन्तरम् । एवं संचोदितस्तेन जम्बुकेन तदा वृकः ।। ४४ ।।
ततोऽवलुम्पनं कृत्वा प्रयातः पिशिताशनः । एतस्मिन्नेव काले तु नकुलोऽप्याजगाम ह ।। ४५ ।।
उसके आनेपर गीदड़ने इस प्रकार कहा- 'भेड़िया भाई! आज बाघ तुमपर बहुत नाराज हो गया है, अतः तुम्हारी खैर नहीं; वह अभी बाघिनको साथ लेकर यहाँ आ रहा है। इसलिये अब तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो।' गीदड़के इस प्रकार कहनेपर कच्चा मांस खानेवाला वह भेड़िया दुम दबाकर भाग गया। इतनेमें ही नेवला भी आ पहुँचा ।। ४३ - ४५ ।।
तमुवाच महाराज नकुलं जम्बुको वने ।
स्वबाहुबलमाश्रित्य निर्जितास्तेऽन्यतो गताः ।। ४६ ।।
मम दत्त्वा नियुद्धं त्वं भुङ्क्ष्व मांसं यथेप्सितम् ।
महाराज ! उस नेवलेसे गीदड़ने वनमें इस प्रकार कहा- 'ओ नेवले! मैंने अपने बाहुबलका आश्रय ले उन सबको परास्त कर दिया है। वे हार मानकर अन्यत्र चले गये। यदि तुझमें हिम्मत हो तो पहले मुझसे लड़ ले; फिर इच्छानुसार मांस खाना' ।। ४६३ ।।
नकुल उवाच
मृगराजो वृकश्चैव बुद्धिमानपि मूषिकः ।। ४७ ।।
निर्जिता यत् त्वया वीरास्तस्माद् वीरतरो भवान् ।
न त्वयाप्युत्सहे योद्धमित्युक्त्वा सोऽप्युपागमत् ।। ४८ ।।
नेवलेने कहा-जब बाघ, भेड़िया और बुद्धिमान् चूहा- ये सभी वीर तुमसे परास्त हो गये, तब तो तुम वीरशिरोमणि हो। मैं भी तुम्हारे साथ युद्ध नहीं कर सकता। यों कहकर नेवला भी चला गया ।। ४७-४८ ।।
कणिक उवाच
एवं तेषु प्रयातेषु जम्बुको हृष्टमानसः ।
खादति स्म तदा मांसमेकः सन् मन्त्रनिश्चयात् ।। ४९ ।।
कणिक कहते हैं- इस प्रकार उन सबके चले जानेपर अपनी युक्तिमें सफल हो जानेके कारण गीदड़का हृदय हर्षसे खिल उठा। तब उसने अकेले ही वह मांस खाया ।। ४९ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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