sn vyas
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भगवान श्रीकृष्ण के परम सखा और सारथी दारुक की, जो कृष्ण के महाप्रयाण (धरती छोड़ने) के आखिरी पलों के इकलौते गवाह थे। # श्रीमद्भागवत - महापुराण गांधारी के श्राप और ऋषियों के वश में आकर पूरा यदुवंश आपस में ही लड़कर नष्ट हो चुका था। प्रभास क्षेत्र (गुजरात) की धरती अपनों के ही खून से लाल थी। भगवान कृष्ण एक पीपल के पेड़ के नीचे, शांत भाव से अपने बाएं पैर को दाहिने घुटने पर रखकर लेटे हुए थे। वे जानते थे कि उनके जाने का समय आ गया है। तभी दूर से धूल उड़ाता हुआ कृष्ण का रथ वहाँ पहुँचा। रथ से उनका सारथी दारुक नीचे उतरा। अपने पूरे परिवार और यादवों को मरा हुआ देखकर दारुक पहले ही टूट चुका था, लेकिन जब उसने अपने स्वामी को इस अवस्था में देखा, तो वह उनके चरणों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगा। दारुक ने रोते हुए कहा, "प्रभु! यह क्या हो गया? द्वारका सूनी हो गई, आपके भाई-बेटे सब चले गए। आप यहाँ अकेले इस अवस्था में क्यों लेटे हैं? उठिए नाथ! रथ पर बैठिए, हम वापस द्वारका चलेंगे।" तभी आकाश में एक अजीब सी हलचल हुई। दारुक के देखते ही देखते, भगवान कृष्ण का वह दिव्य रथ (जिस पर बैठकर उन्होंने महाभारत का युद्ध जीता था), उनके दिव्य अस्त्र (शार्ंग धनुष, पांचजन्य शंख और गदा) और उनके रथ के चारों चमत्कारी घोड़े... साक्षात दारुक की आँखों के सामने हवा में विलीन होकर आकाश की ओर चले गए। दारुक चीख पड़ा, "प्रभु! आपके अस्त्र और रथ भी आपको छोड़कर जा रहे हैं? मुझे मत छोड़िए नाथ! आपके बिना मैं सांस कैसे लूँगा? भगवान कृष्ण ने अपनी करुणामयी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में दारुक के लिए असीम प्रेम था। उन्होंने बहुत ही क्षीण और शांत स्वर में कहा: "दारुक! धीरज रखो। यह मेरी ही इच्छा से हो रहा है। इस संसार में जो भी आया है, उसे एक दिन जाना ही होता है। अब मेरा समय पूरा हुआ। तुम तुरंत द्वारका जाओ और मेरे वृद्ध माता-पिता (वसुदेव और देवकी) और अर्जुन को संदेश दो कि यदुवंश समाप्त हो चुका है। अर्जुन से कहना कि वह द्वारका की बची हुई स्त्रियों और बच्चों को लेकर हस्तिनापुर चला जाए, क्योंकि मेरे जाते ही यह सोने की द्वारका समुद्र में डूब जाएगी। दारुक का गला रुंध गया। उसने कहा, "प्रभु! मैं आपको इस सुनसान जंगल में तड़पता छोड़कर राजाओं को संदेश देने कैसे जाऊँ? मेरी उँगलियाँ आपके रथ की लगाम पकड़ने के लिए बनी हैं, आपकी मृत्यु का शोक संदेश बांटने के लिए नहीं। लेकिन स्वामी की आज्ञा टालना दारुक के वश में नहीं था। रोते-बिलखते, बार-बार पीछे मुड़कर देखते हुए दारुक द्वारका की ओर भागा। उधर, जारा नाम के एक शिकारी ने दूर से झाड़ियों के बीच हिलते हुए कृष्ण के पैर के तलवे को देखा। उसे लगा कि कोई हिरण बैठा है। उसने ज़हरीला बाण छोड़ दिया। वह बाण सीधे कृष्ण के पैर के तलवे में (मृग के धोखे में) जा लगा। जब शिकारी पास आया और उसने देखा कि उसने साक्षात भगवान को बाण मार दिया है, तो वह उनके पैरों में गिरकर रोने लगा। कृष्ण ने उसे सांत्वना दी और मुस्कुराते हुए अपने मानव शरीर का त्याग कर दिया। जब दारुक द्वारका पहुँचा और उसने यह समाचार सुनाया, तो मानो पूरी नगरी श्मशान बन गई। देवकी और वसुदेव ने तुरंत अपने प्राण त्याग दिए। अर्जुन जब वहाँ पहुँचे, तो वे कृष्ण के बिना इतने कमजोर हो गए कि उनसे अपना गांडीव धनुष भी नहीं उठा। कहा जाता है कि दारुक ने अर्जुन को सब सौंपने के बाद, अपनी आँखें बंद कीं और कृष्ण के चरणों का ध्यान करते हुए गंडकी नदी में समाधि ले ली। दारुक कोई बाहरी व्यक्ति या सामान्य सेवक नहीं था, बल्कि वह यदुवंश के राजा उग्रसेन के कुल से ही था। इस नाते वह रिश्ते में भगवान श्रीकृष्ण का भाई (चचेरा या ममेरा भाई) लगता था। वह मथुरा और द्वारका का एक अत्यंत सम्मानित यादव राजकुमार था। दारुक बचपन से ही श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप और उनके विचारों से अत्यंत प्रभावित था। जब कृष्ण ने कंस का वध किया और द्वारका नगरी की स्थापना की, तब द्वारका के शाही रथ के लिए सबसे योग्य और वफादार सारथी की खोज शुरू हुई। दारुक ने राजपाठ और ऐश्वर्य का त्याग कर स्वयं हाथ जोड़कर कृष्ण से प्रार्थना की—"प्रभु, मुझे राजा या सेनापति नहीं बनना। मेरी बस एक ही इच्छा है कि मैं जीवन भर आपके चरणों के पास बैठकर आपके रथ की लगाम संभालूँ। कृष्ण ने उसकी निष्काम भक्ति और सारथी विद्या में उसकी निपुणता को देखा और उसे अपना निजी सारथी और सखा बना लिया था । !!जय श्री कृष्णा!! 🙏हे महादेव🙏
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