sn vyas
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# श्रीमद्भागवत - महापुराण अक्रूर जी को यमुना में भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन जब मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने अक्रूर जी को श्रीकृष्ण और बलराम को वृंदावन से मथुरा लाने के लिए भेजा, तब अक्रूर जी के मन में एक ओर दायित्व था, तो दूसरी ओर प्रभु के दर्शन का अनुपम उत्साह। वे जानते थे कि यह यात्रा उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य बनने वाली है। यात्रा करते-करते जब वे पवित्र यमुना तट पर पहुँचे, तो उन्होंने श्रद्धापूर्वक स्नान करने का संकल्प लिया। जैसे ही वे यमुना के निर्मल जल में डुबकी लगाकर ध्यानमग्न हुए और नेत्र खोले, उनके सामने ऐसा दिव्य दृश्य प्रकट हुआ जिसे शब्दों में बाँधना कठिन था। उन्होंने देखा कि स्वयं श्रीहरि विष्णु अनंत शेषनाग की दिव्य शय्या पर विराजमान हैं। माता लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा कर रही हैं। चारों ओर वैकुंठ धाम का अलौकिक प्रकाश फैला हुआ था। देवता, ऋषि, सिद्ध और गंधर्व प्रभु की स्तुति में लीन थे। अक्रूर जी ने अनुभव किया कि समस्त ब्रह्मांड, सभी लोक और सम्पूर्ण सृष्टि उसी एक परम दिव्य सत्ता में समाहित है। जब वे यमुना से बाहर आए, तो आश्चर्यचकित रह गए। श्रीकृष्ण और बलराम पहले की भाँति रथ के पास मुस्कुराते हुए खड़े थे। उन्हें लगा मानो अभी जो देखा वह स्वप्न था। सत्य जानने के लिए वे पुनः यमुना में उतरे। इस बार भी वही दिव्य वैकुंठ, वही श्रीहरि का विराट स्वरूप और वही अलौकिक दर्शन उनके सामने प्रकट हो गए। अब अक्रूर जी का सारा संशय मिट चुका था। उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि वृंदावन के नंदलाल कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं परमब्रह्म, जगत के पालनकर्ता और समस्त लोकों के स्वामी हैं। प्रेम, श्रद्धा और भक्ति से उनका हृदय भर उठा। उनकी आँखों से आनंदाश्रु बहने लगे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक भगवान को बार-बार प्रणाम किया और उनकी महिमा का गुणगान किया। उस एक दिव्य दर्शन ने अक्रूर जी के जीवन को सदा के लिए प्रभु-भक्ति में समर्पित कर दिया। ✨ इस दिव्य लीला से शिक्षा: जब मन निष्कपट श्रद्धा, अटूट विश्वास और सच्ची भक्ति के साथ भगवान की शरण में जाता है, तब प्रभु स्वयं अपने दिव्य स्वरूप का अनुभव कराते हैं। जिनका हृदय निर्मल और समर्पित होता है, वे हर कण में परमात्मा की अनंत महिमा का दर्शन कर सकते हैं।
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