sn vyas
ShareChat
click to see wallet page
@sn7873
sn7873
sn vyas
@sn7873
जय श्री कृष्ण घर पर रहे-सुरक्षित रहे
###श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ *#श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण_पोस्ट_क्रमांक१७२* *श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण* *अयोध्याकाण्ड* *बानबेवाँ सर्ग* *भरतका भरद्वाज मुनिसे जानेकी आज्ञा लेते हुए श्रीरामके आश्रमपर जानेका मार्ग जानना और मुनिको अपनी माताओंका परिचय देकर वहाँसे चित्रकूटके लिये सेनासहित प्रस्थान करना* परिवारसहित भरत इच्छानुसार मुनिका आतिथ्य ग्रहण करके रातभर आश्रममें ही रहे। फिर सबेरे जानेकी आज्ञा लेनेके लिये वे महर्षि भरद्वाजके पास गये॥१॥ पुरुषसिंह भरतको हाथ जोड़े अपने पास आया देख भरद्वाजजी अग्निहोत्रका कार्य करके उनसे बोले—॥२॥ 'निष्पाप भरत! क्या हमारे इस आश्रममें तुम्हारी यह रात सुखसे बीती है? क्या तुम्हारे साथ आये हुए सब लोग इस आतिथ्यसे संतुष्ट हुए हैं? यह बताओ'॥३॥ तब भरतने आश्रमसे बाहर निकले हुए उन उत्तम तेजस्वी महर्षिको प्रणाम करके उनसे हाथ जोड़कर कहा—॥४॥ 'भगवन्! मैं सम्पूर्ण सेना और सवारीके साथ यहाँ सुखपूर्वक रहा हूँ तथा सैनिकोंसहित मुझे पूर्णरूपसे तृप्त किया गया है॥५॥ 'सेवकोंसहित हम सब लोग ग्लानि और संतापसे रहित हो उत्तम अन्न-पान ग्रहण करके सुन्दर गृहोंका आश्रय ले बड़े सुखसे यहाँ रातभर रहे हैं॥६॥ 'भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! अब मैं अपनी इच्छाके अनुसार आपसे आज्ञा लेने आया हूँ और अपने भाईके समीप प्रस्थान कर रहा हूँ; आप मुझे स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखिये॥७॥ 'धर्मज्ञ मुनीश्वर! बताइये, धर्मपरायण महात्मा श्रीरामका आश्रम कहाँ है? कितनी दूर है? और वहाँ पहुँचनेके लिये कौन-सा मार्ग है? इसका भी मुझसे स्पष्टरूपसे वर्णन कीजिये'॥८॥ इस प्रकार पूछे जानेपर महातपस्वी, महातेजस्वी भरद्वाज मुनिने भाईके दर्शनकी लालसावाले भरतको इस प्रकार उत्तर दिया—॥९॥ 'भरत! यहाँसे ढाई योजन (दस कोस) की दूरीपर एक निर्जन वनमें चित्रकूट नामक पर्वत है, जहाँके झरने और वन बड़े ही रमणीय हैं (प्रयागसे चित्रकूटकी आधुनिक दूरी लगभग २८ कोस है)॥१०॥ 'उसके उत्तरी किनारेसे मन्दाकिनी नदी बहती है, जो फूलोंसे लदे सघन वृक्षोंसे आच्छादित रहती है, उसके आस-पासका वन बड़ा ही रमणीय और नाना प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। उस नदीके उस पार चित्रकूट पर्वत है। तात! वहाँ पहुँचकर तुम नदी और पर्वतके बीचमें श्रीरामकी पर्णकुटी देखोगे। वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण निश्चय ही उसीमें निवास करते हैं॥११-१२॥ 'सेनापते! तुम यहाँसे हाथी-घोड़ोसे भरी हुई अपनी सेना लेकर पहले यमुनाके दक्षिणी किनारेसे जो मार्ग गया है, उससे जाओ। आगे जाकर दो रास्ते मिलेंगे, उनमेंसे जो रास्ता बायें दाबकर दक्षिण दिशाकी ओर गया है, उसीसे सेनाको ले जाना। महाभाग! उस मार्गसे चलकर तुम शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन पा जाओगे'॥१३॥ 'अब यहाँसे प्रस्थान करना है'—यह सुनकर महाराज दशरथकी स्त्रियाँ, जो सवारीपर ही रहने योग्य थीं, सवारियोंको छोड़कर ब्रह्मर्षि भरद्वाजको प्रणाम करनेके लिये उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयीं॥१४॥ उपवासके कारण अत्यन्त दुर्बल एवं दीन हुई देवी कौसल्याने, जो काँप रही थीं, सुमित्रा देवीके साथ अपने दोनों हाथोंसे भरद्वाज मुनिके पैर पकड़ लिये॥१५॥ तत्पश्चात् जो अपनी असफल कामनाके कारण सब लोगोंके लिये निन्दित हो गयी थीं, उस कैकेयीने लज्जित होकर वहाँ मुनिके चरणोंका स्पर्श किया और उन महामुनि भगवान् भरद्वाजकी परिक्रमा करके वह दीनचित्त हो उस समय भरतके ही पास आकर खड़ी हो गयी॥१६-१७½॥ तब महामुनि भरद्वाजने वहाँ भरतसे पूछा—'रघुनन्दन! तुम्हारी इन माताओंका विशेष परिचय क्या है? यह मैं जानना चाहता हूँ'॥१८½॥ भरद्वाजके इस प्रकार पूछनेपर बोलनेकी कलामें कुशल धर्मात्मा भरतने हाथ जोड़कर कहा—॥१९½॥ 'भगवन्! आप जिन्हें शोक और उपवासके कारण अत्यन्त दुर्बल एवं दुःखी देख रहे हैं, जो देवी-सी दृष्टिगोचर हो रही हैं' ये मेरे पिताकी सबसे बड़ी महारानी कौसल्या हैं। जैसे अदितिने धाता नामक आदित्यको उत्पन्न किया था, उसी प्रकार इन कौसल्या देवीने सिंहके समान पराक्रमसूचक गतिसे चलनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामको जन्म दिया है॥२०-२१½॥ 'इनकी बायीं बाँहसे सटकर जो उदास मनसे खड़ी हैं तथा दुःखसे आतुर हो रही हैं और आभूषणशून्य होनेसे वनके भीतर झड़े हुए पुष्पवाले कनेरकी डालके समान दिखायी देती हैं, ये महाराजकी मझली रानी देवी सुमित्रा हैं। सत्यपराक्रमी वीर तथा देवताओंके तुल्य कान्तिमान् वे दोनों भाई राजकुमार लक्ष्मण और शत्रुघ्न इन्हीं सुमित्रा देवीके पुत्र हैं॥२२-२४॥ 'और जिसके कारण पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण यहाँसे प्राण-सङ्कटकी अवस्था (वनवास) में जा पहुँचे हैं तथा राजा दशरथ पुत्रवियोगका कष्ट पाकर स्वर्गवासी हुए हैं, जो स्वभावसे ही क्रोध करनेवाली, अशिक्षित बुद्धिवाली, गर्वीली, अपने-आपको सबसे अधिक सुन्दरी और भाग्यवती समझनेवाली तथा राज्यका लोभ रखनेवाली है, जो शक्ल-सूरतसे आर्या होनेपर भी वास्तवमें अनार्या है, इस कैकेयीको मेरी माता समझिये। यह बड़ी ही क्रूर और पापपूर्ण विचार रखनेवाली है। मैं अपने ऊपर जो महान् संकट आया हुआ देख रहा हूँ, इसका मूल कारण यही है'॥२५-२७॥ अश्रुगद्‌गद वाणीसे इस प्रकार कहकर लाल आँखें किये पुरुषसिंह भरत रोषसे भरकर फुफकारते हुए सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचने लगे॥२८॥ उस समय ऐसी बातें कहते हुए भरतसे श्रीरामावतारके प्रयोजनको जाननेवाले महाबुद्धिमान् महर्षि भरद्वाजने उनसे यह बात कही—॥२९॥ 'भरत! तुम कैकेयीके प्रति दोष-दृष्टि न करो। श्रीरामका यह वनवास भविष्यमें बड़ा ही सुखद होगा॥३०॥ 'श्रीरामके वनमें जानेसे देवताओं, दानवों तथा परमात्माका चिन्तन करनेवाले महर्षियोंका इस जगत्‌में हित ही होनेवाला है'॥३१॥ श्रीरामका पता जानकर और मुनिका आशीर्वाद पाकर कृतकृत्य हुए भरतने मुनिको मस्तक झुका उनकी प्रदक्षिणा करके जानेकी आज्ञा ले सेनाको कूचके लिये तैयार होनेका आदेश दिया॥३२॥ तदनन्तर अनेक प्रकारकी वेश-भूषावाले लोग बहुत-से दिव्य घोड़ों और दिव्य रथोंको, जो सुवर्णसे विभूषित थे, जोतकर यात्राके लिये उनपर सवार हुए॥३३॥ बहुत-सी हथिनियाँ और हाथी, जो सुनहरे रस्सोंसे कसे गये थे और जिनके ऊपर पताकाएँ फहरा रही थीं, वर्षा-कालके गरजते हुए मेघोंके समान घण्टानाद करते हुए वहाँसे प्रस्थित हुए॥३४॥ नाना प्रकारके छोटे-बड़े बहुमूल्य वाहनोपर सवार हो उनके अधिकारी चले और पैदल सैनिक अपने पैरोंसे ही यात्रा करने लगे॥३५॥ तत्पश्चात् कौसल्या आदि रानियाँ उत्तम सवारियोंपर बैठकर श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी अभिलाषासे प्रसन्नतापूर्वक चलीं॥३६॥ इसी प्रकार श्रीमान् भरत नवोदित चन्द्रमा और सूर्यके समान कान्तिमती शिविकामें बैठकर आवश्यक सामग्रियोंके साथ प्रस्थित हुए। उस शिविकाको कहाँरोंने अपने कंधोंपर उठा रखा था॥३७॥ हाथी-घोड़ोंसे भरी हुई वह विशाल वाहिनी दक्षिण दिशाको घेरकर उमड़ी हुई महामेघोंकी घटाके समान चल पड़ी॥३८॥ गङ्गाके उस पार पर्वतों तथा नदियोंके निकटवर्ती वनोंको, जो मृगों और पक्षियोंसे सेवित थे, लाँघकर वह आगे बढ़ गयी॥३९॥ उस सेनाके हाथी और घोड़ोंके समुदाय बड़े प्रसन्न थे। जंगलके मृगों और पक्षिसमूहोंको भयभीत करती हुई भरतकी वह सेना उस विशाल वनमें प्रवेश करके वहाँ बड़ी शोभा पा रही थी॥४०॥ *इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥९२॥*
##श्रीमद्वाल्मिकी_रामायण२०२५ - हरि शरणं देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर तुलसी सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असनि अहि तुलसीदास जी कहते हैं कि सुंदर वेश देखकर न केवल मूर्ख बल्कि चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं। उदाहरण के लिए, मोर को देखो, वह दिखने में कितना सुंदर है और उसकी बोली भी मीठी लगती है, लेकिन उसका आहार सांपं है। अर्थात बाहरी सुंदरता पर नहीं, गुणों पर ध्यान देना चाहिए। हरि शरणं देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर तुलसी सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असनि अहि तुलसीदास जी कहते हैं कि सुंदर वेश देखकर न केवल मूर्ख बल्कि चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं। उदाहरण के लिए, मोर को देखो, वह दिखने में कितना सुंदर है और उसकी बोली भी मीठी लगती है, लेकिन उसका आहार सांपं है। अर्थात बाहरी सुंदरता पर नहीं, गुणों पर ध्यान देना चाहिए। - ShareChat
#☝आज का ज्ञान || शरणागति ही सुख है|| 🌟 शरणागति में ही जीवन का वास्तविक सुख भी है। आप जैसे भी रहें बस प्रभु के बनकर प्रभु शरणागत रहें, यही जीवन आनंद का मार्ग है। अपने आप को सदैव प्रभु का अंश समझते हुए आनंदित रहकर जीवन जीने का अभ्यास करना चाहिए। अपनी मानते ही वस्तु अशुद्ध हो जाती है एवं भगवान की मानते ही वह शुद्ध और भगवद् स्वरुप हो जाती है। इसी तरह अपने आपको भी भगवान से दूर और पृथक मानते ही आप अशुद्ध हो जाते हैं। प्रत्येक पल भगवान का स्मरण करो और उन्हें अपना मानो, इससे भगवद् चरणों में प्रीति उत्पन्न हो जाएगी। भगवान का हृदय से आश्रय करते ही भगवदीय गुण भी स्वतः प्रगट होने लगते हैं। निश्चित ही आश्रय में अद्भुत सामर्थ्य है। बूँद समुद्र का आश्रय लेती है तो समुद्र में मिलते ही वो भी स्वयं समुद्र ही हो जाती है। प्रत्येक परिस्थिति में भगवद् चरणों का आश्रय जीव को निर्भयता प्रदान कर देता है।🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
☝आज का ज्ञान - ग्वालन की टोली लिए, नंद को कुमार खेलन चल्यो है सज साज सबै होरी के। रंगर्पचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ सादर जय श्री कृष्ण ग्वालन की टोली लिए, नंद को कुमार खेलन चल्यो है सज साज सबै होरी के। रंगर्पचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ सादर जय श्री कृष्ण - ShareChat
#🌈हैप्पी रंग पंचमी #रंग पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏 माधविका-परिमल-ललिते नवमालिकयातिसुगन्धौ । मुनिमनसामपि मोहनकारिणी तरुणाकारणबन्धौ ॥ [ गीतगोविन्द - १/३३ ] अर्थात् 👉🏻 यह वसन्त काल माधविका पुष्प की सुगन्धि से ललित एवं नई मालती की सुगंध से परिपूर्ण है , मुनियों के मन को भी मोहित करनेवाला है तथा तरूणों का सहज बन्धु है । 💐🌻🌄 प्रभातवन्दन 🌄🌻💐 🌸समस्तको रंग पञ्चमी की कोटिशः शुभ एवं मङ्गलकामनाए🌸
🌈हैप्पी रंग पंचमी - ShareChat
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣2️⃣ 〰️〰️🌼〰️ 〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टाधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्र आदि के जन्म तथा भीष्मजी के धर्मपूर्ण शासन से कुरुदेश की सर्वांगीण उन्नति का दिग्दर्शन...(दिन 332) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ स देशः परराष्ट्राणि विमृज्याभिप्रवर्धितः । भीष्मेण विहितं राष्ट्र धर्मचक्रमवर्तत ।। १४ ।। वह देश दूसरे राष्ट्रोंका भी शोधन करके निरन्तर उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहा था। राष्ट्रमें सब ओर भीष्मजीके द्वारा चलाया हुआ धर्मका शासन चल रहा था ।। १४ ।। क्रियमाणेषु कृत्येषु कुमाराणां महात्मनाम् । पौरजानपदाः सर्वे बभूवुः सततोत्सवाः ।। १५ ।। उन महात्मा कुमारोंके यज्ञोपवीतादि संस्कार किये जानेके समय नगर और देशके सभी लोग निरन्तर उत्सव मनाते थे ।। १५ ।। गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप । दीयतां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूयन्त सर्वशः ।। १६ ।। जनमेजय! कुरुकुलके प्रधान-प्रधान पुरुषों तथा अन्य नगरनिवासियोंके घरोंमें सदा सब ओर यही बात सुनायी देती थी कि 'दान दो और अतिथियोंको भोजन कराओ' ।। १६ ।। धृतराष्ट्रश्च पाण्डुश्च विदुरश्च महामतिः । जन्मप्रभृति भीष्मेण पुत्रवत् परिपालिताः ।। १७ ।। धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा परम बुद्धिमान् विदुर- इन तीनों भाइयोंका भीष्मजीने जन्मसे ही पुत्रकी भाँति पालन किया ।। १७ ।। संस्कारैः संस्कृतास्ते तु व्रताध्ययनसंयुताः । श्रमव्यायामकुशलाः समपद्यन्त यौवनम् ।। १८ ।। उन्होंने ही उनके सब संस्कार कराये। फिर वे ब्रह्मचर्यव्रतके पालन और वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर हो गये। परिश्रम और व्यायाममें भी उन्होंने बड़ी कुशलता प्राप्त की। फिर धीरे-धीरे वे युवावस्थाको प्राप्त हुए ।। १८ ।। धनुर्वेदेऽश्वपृष्ठे च गदायुद्धेऽसिचर्मणि । तथैव गजशिक्षायां नीतिशास्त्रेषु पारगाः ।। १९ ।। धनुर्वेद, घोड़ेकी सवारी, गदायुद्ध, ढाल-तलवारके प्रयोग, गजशिक्षा तथा नीतिशास्त्रमें वे तीनों भाई पारंगत हो गये ।। १९ ।। इतिहासपुराणेषु नानाशिक्षासु बोधिताः । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः सर्वत्र कृतनिश्चयाः ।। २० ।। उन्हें इतिहास, पुराण तथा नाना प्रकारके शिष्टाचारोंका भी ज्ञान कराया गया। वे वेद-वेदांगोंके तत्त्वज्ञ तथा सर्वत्र एक निश्चित सिद्धान्तके माननेवाले थे ।। २० ।। पाण्डुर्थनुषि विक्रान्तो नरेष्वभ्यधिकोऽभवत् । अन्येभ्यो बलवानासीद् धृतराष्ट्रो महीपतिः ।। २१ ।। पाण्डु धनुर्विद्या में उस समय के मनुष्यों में सबसे बढ़-चढ़कर पराक्रमी थे। इसी प्रकार राजा धृतराष्ट्र दूसरे लोगोंकी अपेक्षा शारीरिक बलमें बहुत बढ़‌कर थे ।। २१ ।। त्रिषु लोकेषु न त्वासीत् कश्चिद् विदुरसम्मितः । धर्मनित्यस्तथा राजन् धर्मे च परमं गतः ।। २२ ।। राजन्! तीनों लोकोंमें विदुरजीके समान दूसरा कोई भी मनुष्य धर्मपरायण तथा धर्म में ऊँची अवस्था को प्राप्त (आत्मद्रष्टा) नहीं था ।। २२ ।। प्रणष्टं शन्तनोर्वशं समीक्ष्य पुनरुद्धृतम् । ततो निर्वचनं लोके सर्वराष्ट्रेष्ववर्तत ।। २३ ।। नष्ट हुए शान्तनुके वंशका पुनः उद्धार हुआ देखकर समस्त राष्ट्रके लोग परस्पर कहने लगे ।। २३ ।। वीरसूनां काशिसुते देशानां कुरुजाङ्गलम् । सर्वधर्मविदां भीष्मः पुराणां गजसाह्वयम् ।। २४ ।। धृतराष्ट्रस्त्वचक्षुष्ट्वाद् राज्यं न प्रत्यपद्यत । पारसवत्वाद् विदुरो राजा पाण्डुर्बभूव ह ।। २५ ।। 'वीर पुत्रोंको जन्म देनेवाली स्त्रियोंमें काशिराजकी दोनों पुत्रियाँ सबसे श्रेष्ठ हैं, देशोंमें कुरुजांगल देश सबसे उत्तम है, सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें भीष्मजीका स्थान सबसे ऊँचा है तथा नगरोंमें हस्तिनापुर सर्वोत्तम है।' धृतराष्ट्र अंधे होनेके कारण और विदुरजी पारशव (शूद्राके गर्भसे ब्राह्मणद्वारा उत्पन्न) होनेसे राज्य न पा सके; अतः सबसे छोटे पाण्डु ही राजा हुए ।। २४-२५ ।। कदाचिदथ गाङ्गेयः सर्वनीतिमतां वरः । विदुरं धर्मतत्त्वज्ञं वाक्यमाह यथोचितम् ।। २६ ।। एक समयकी बात है, सम्पूर्ण नीतिज्ञ पुरुषोंमें श्रेष्ठ गंगानन्दन भीष्मजी धर्मके तत्त्वको जाननेवाले विदुरजीसे इस प्रकार न्यायोचित वचन बोले है।।। २६ ।। इति श्र आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुराज्याभिषेकेऽष्टाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुराज्याभिषेकविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०८ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️ #महाभारत
महाभारत - श्रीमहाभारतम् श्रीमहाभारतम् - ShareChat
#गरूड़ पुराण #गरूड़ पुराण✍ सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में) बभ्रुवाहनप्रेतसंस्कार नामक {सातवां अध्याय} 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ इस अध्याय में पुत्र की महिमा, दूसरे के द्वारा दिये गये पिण्डदान आदि से प्रेतत्व से मुक्ति की बात कही गई है – इस संदर्भ में राजा बभ्रुवाहन तथा एक प्रेत की कथा का वर्णन है। सूत उवाच सूतजी ने कहा – ऎसा सुनकर पीपल के पत्ते की भाँति काँपते हुए गरुड़जी ने प्राणियों के उपकार के लिए पुन: भगवान विष्णु से पूछा। गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा – हे स्वामिन ! किस उपाय से मनुष्य प्रमादवश अथवा जानकर पापकर्मों को करके भी यम की यातना को न प्राप्त हो, उसे कहिए। संसार रूपी सागर में डूबे हुए, दीन चित्तवाले, पाप से नष्ट बुद्धिवाले तथा विषयों के कारण दूषित आत्मा वाले मनुष्यों के उद्धार के लिये हे माधव! पुराणों में सुनिश्चित किये गये उपाय को बताइए, जिससे मनुष्य सद्गति प्राप्त कर सकें। श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान बोले – हे तार्क्ष्य ! मनुष्यों के हित की कामना से तुमने अच्छी बात पूछी है। सावधान होकर सुनो, मैं तुम्हें सब कुछ बताता हूँ। हे खगेश्वर! मैंने इसके पहले पुत्ररहित और पापी मनुष्यों की यातना का वर्णन किया है। पुत्रवान तथा धार्मिक मनुष्यों की पूर्वोक्त दुर्गति कभी नहीं होती। यदि अपने पूर्वार्जित कर्मों के कारण पुत्रोत्पत्ति में विघ्न हो तो किसी उपाय से पुत्र की उत्पत्ति सम्पन्न करें। हरिवंशपुराण की कथा सुनकर, विधानपूर्वक शतचण्डी यज्ञ करके तथा भक्तिपूर्वक शिव की आराधना करके विद्वान को पुत्र उत्पन्न करना चाहिए। यत: पुत्र पितरों की पुम् नामक नरक से रक्षा करता है, अत: स्वयं भगवान ब्रह्मा ने ही उसे पुत्र नाम से कहा है। एक धर्मात्मा पुत्र सम्पूर्ण कुल को तार देता है। पुत्र के द्वारा व्यक्ति लोकों को जीत लेता है, ऎसी सनातनी श्रुति है। इस प्रकार वेदों ने भी पुत्र के उत्तम माहात्म्य को कहा है। इसलिए पुत्र का मुख देख करके मनुष्य पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है। पौत्र का स्पर्ष करके मनुष्य तीनों ऋणों – देव, ऋषि, पितृ – से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार पुत्र-पौत्र तथा प्रपौत्रों से यमलोक का अतिक्रमण करके स्वर्ग आदि को प्राप्त करता है। ब्राह्मविवाह की विधि से ब्याही गई पत्नी से उत्पन्न औरस पुत्र ऊर्ध्वगति प्राप्त कराता है और संगृहीत पुत्र अधोगति की ओर ले जाता है। हे खगश्रेष्ठ ! ऎसा जान करके व्यक्ति हीनजाति की स्त्री से उत्पन्न पुत्रों को त्याग दे। हे खग ! सवर्ण पुरुषों से सवर्णा स्त्रियों में जो पुत्र उत्पन्न होते हैं, वे औरस पुत्र कहे जाते हैं और वे ही श्राद्ध प्रदान करके पितरों को स्वर्ग प्राप्त कराने के कारण होते हैं। औरस पुत्र के द्वारा किए गये श्राद्ध से पिता को स्वर्ग प्राप्त होता है, इस विषय में क्या कहना? दूसरे के द्वारा दिये गये श्राद्ध से भी प्रेत स्वर्ग को चला जाता है, इस विषय में सुनो। यहाँ मैं एक प्राचीन इतिहास कहूँगा, जो और्ध्वदैहिक दान के श्रेष्ठ माहात्म्य को सूचित करता है। हे तार्क्ष्य ! पूर्वकाल में त्रेता युग में महोदय नाम के रमणीय नगर में महाबलशाली और धर्मपरायण बभ्रुवाहन नामक एक राजा रहता था। वह यज्ञानुष्ठानपरायण, दानियों में श्रेष्ठ, लक्ष्मी से सम्पन्न, ब्राह्मणभक्त तथा साधु पुरुषों के प्रति अनुराग रखने वाला, शील तथा आचार आदि गुणों से युक्त, स्वजनों के प्रति अपनत्व और इतरजनों के प्रति दया के भाव से सम्पन्न था। क्षात्रधर्मपरायण वह राजा औरस पुत्र की भाँति धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करता था और दण्ड देने योग्य अपराधियों को दण्ड देता था। वह महाबाहु किसी समय सेना के साथ मृगया के लिए नाना वृक्षों से युक्त एक घनघोर वन में प्रविष्ट हुआ। वह वन नाना मृग गणों से व्याप्त और अनेक पक्षियों से भरा हुआ था। उस समय राजा ने वन के मध्य में दूर से एक मृग को देखा। राजा के द्वारा सुदृड़ बाण से विद्ध वह मृग बान सहित जंगल में अदृश्य हो गया। रुधिर से गीली हुई घास पर अंकित चिह्न से राजा ने उसका पीछा किया तब मृग के प्रसंग से वह राजा दूसरे वन में जा पहुंचा। भूख-प्यास से सूखे हुए कण्ठ वाला तथा परिश्रम के संताप से पीड़ित उस राजा ने एक जलाशय के समीप पहुँचकर घोड़े के साथ उसमें स्नान किया तथा कमल की गन्धादि से सुगन्धित शीतल जल का पान किया। इसके बाद उस जलाशय से बाहर निकलकर श्रमरहित राजा बभ्रुवाहन ने वृक्ष रूपी विशाल शाखाओं के कारण फैले हुए, मनोहर और शीतल छाया वाले तथा पक्षी समूहों से कूजित एक वट वृक्ष देखा। वह वृक्ष सम्पूर्ण वन की महती पताका की भाँति स्थित था। उसकी जड़ के पास जाकर राजा बैठ गया। उसके बाद राजा ने भूख और प्यास से व्याकुल इन्द्रियों वाले, ऊपर की ओर उठे हुए बालों वाले, अत्यन्त मलिन, कुबड़े और माँस रहित एक भयावह प्रेत को देखा। उस विकृत आकृति वाले भयावह प्रेत को देखकर बभ्रुवाहन विस्मित हो गया। प्रेत भी घने जंगलों में आये हुए राजा को देखकर चकित हो गया और समुत्सुक मन वाला होकर वह प्रेतराज उसके पास आया। हे तार्क्ष्य ! तब उस प्रेतराज ने राजा से कहा – हे महाबाहो ! आपके संबंध से मैंने प्रेत भाव का त्याग कर दिया है अर्थात मेरा प्रेत भाव छूट गया है और मैं परम शान्ति को प्राप्त हो गया हूँ तथा धन्यतर हो गया हूँ। राजोवाच राजा ने कहा – हे कृष्णवर्ण वाले तथा भयावह रूप वाले प्रेत ! किस कर्म के प्रभाव से देखने में डरावने लगने वाले और बहुत ही अमंगलकारी इस प्रेतत्व-स्वरूप को तुमने प्राप्त किया है। हे तात ! अपने प्रेतत्व की प्राप्ति का सारा कारण बतलाओ। तुम कौन हो और किस दान से तुम्हारा प्रेतत्व नष्ट होगा? प्रेत उवाच प्रेत ने कहा – हे श्रेष्ठ राजन ! मैं आरंभ से आपको सब कुछ बतलाता हूँ। प्रेतत्व का कारण सुनकर आप कृपया उसे दूर करने की दया कीजिए। वैदिश नाम का एक नगर था जो सभी प्रकार की सम्पत्तियों से समृद्ध, नाना जनपदों से व्याप्त, अनेक प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण, धनिकों के भवनों तथा देव एवं राजप्रसादों से सुशोभित और अनेक प्रकार के धर्मानुष्ठानों से युक्त था। हे तात ! मैं वहाँ रहता हुआ निरन्तर देवपूजा किया करता था। आपको विदित होना चाहिए कि मैं वैश्य जाति में उत्पन्न हुआ और मेरा नाम सुदेव था। मैंने हव्य प्रदान करके देवताओं का तथा कव्य प्रदान करके पितरों का तर्पण किया। अनेक प्रकार के दानों से मैंने ब्राह्मणों को सन्तुष्ट किया था और अनेक बार दीन, अंधे एवं कृपण मनुष्यों को अन्न दिया था। किंतु हे राजन ! मेरा यह सारा सत्कर्म मेरे दुर्दैव से निष्फल हो गया। जिस कारण मेरा सुकृत निष्फल हुआ, वह मैं आपको बताता हूँ। मुझे कोई सन्तान नहीं है, मेरा कोई सुहृद नहीं है, कोई बान्धव नहीं है और न ऎसा कोई मित्र ही है जो मेरी और्ध्वदैहिक क्रिया करता। हे महाराज ! मृत्यु के अनन्तर जिस व्यक्ति के उद्देश्य से षोडश मासिक श्राद्ध नहीं दिए जाते, सैकड़ों श्राद्ध करने पर भी उसका प्रेतत्व सुस्थिर ही रहता है अर्थात दूर नहीं होता। हे महाराज ! आप मेरा और्ध्वदैहिक कृत्य करके मेरा उद्धार कीजिए। क्योंकि इस लोक में राजा सभी वर्णों का बन्धु कहा जाता है। इसलिए हे राजेन्द्र ! आप मेरा उद्धार कीजिए, मैं आपको मणिरत्न देता हूँ। हे वीर ! यदि आप मेरा हित चाहते हैं तो जैसे मेरी सद्गति हो सके और मेरी प्रेत योनि से जैसे मुक्ति हो सके, वैसा आप करें। भूख-प्यास आदि दु:खों के कारण यह प्रेत योनि मेरे लिये दु:सह हो गई है। इस वन में सुन्दर स्वाद वाले शीतल जल और फल विद्यमान हैं फिर भी मैं भूख तथा प्यास से पीड़ित हूँ। मुझे जल व फल की प्राप्ति नहीं हो पाती। हे राजन ! यदि मेरे उद्देश्य से यथा विधि नारायण बलि की जाए, उसके बाद वेदमन्त्रों के द्वारा मेरी सभी और्ध्वदैहिक क्रिया सम्पन्न की जाए तो निश्चित ही मेरा प्रेतत्व नष्ट हो जाएगा, इसमें कोई संशय नहीं है। मैंने सुन रखा है कि वेद के मन्त्र, तप, दान और सभी प्राणियों में दया, सत-शास्त्रों का श्रवण, भगवान विष्णु की पूजा और सज्जनों की संगति – ये सब प्रेत योनि के विनाश के लिए होते हैं। इसलिए मैं आपसे प्रेतत्व को नष्ट करने वाली विष्णु पूजा को कहूँगा। हे राजन ! न्यायोपार्जित दो सुवर्ण (32 माशा) भार का सोना लेकर उससे नारायण की एक प्रतिमा बनवाए, जिसे विविध पवित्र जलों से स्नान कराकर दो पीले वस्त्रों से वेष्टित करके सभी अलंकारों से विभूषित कर अधिवासित करें, तदनन्तर उसका पूजन करें। उस प्रतिमा के पूर्व भाग में श्रीधर, दक्षिण में मधुसूदन, पश्चिम में वामन और उत्तर में गदाधर, मध्य में पितामह ब्रह्मा तथा महादेव शिव की स्थापना करके गन्ध-पुष्पादि द्रव्यों के द्वारा विधि-विधान से पृथक-पृथक पूजन करें। उसके बाद प्रदक्षिणा करके अग्नि में हवन करके देवताओं को तृप्त करके घृत, दधि तथा दूध से विश्वेदेवों को तृप्त करें। तदनन्तर सामहित चित्तवाला यजमान स्नान करके नारायण के आगे विनीतात्मा होकर विधिपूर्वक मन में संकल्पित और्ध्वदैहिक क्रिया का आरंभ करें। इसके बाद क्रोध तथा लोभ से रहित होकर शास्त्रविधि से सभी श्राद्धों को करें तथा वृषोत्सर्ग करे। तदनन्तर ब्राह्मणों को तेरह पददान करे, फिर शय्यादान देकर प्रेत के लिए घट का दान करे। राजोवाच राजा ने कहा – हे प्रेत ! किस विधान से प्रेत घट का निर्माण करना चाहिए और किस विधान से उसका दान करना चाहिए। सभी प्राणियों के ऊपर अनुकम्पा करने के हेतु से प्रेतों को मुक्ति दिलाने वाले प्रेतघट-दान के विषय में बताइए। प्रेत उवाच प्रेत ने कहा – हे महाराज ! आपने ठीक पूछा है, जिस सुदृढ़ दान से प्रेतत्व नहीं होता है, उसे मैं कहता हूँ, आप ध्यान से सुनें। प्रेतघट का दान, सभी प्रकार के अमंगलों का विनाश करने वाला, सभी लोकों में दुर्लभ और दुर्गति को नष्ट करने वाला है। ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु सहित लोकपालों युक्त तपाये हुए सोने का एक घट बनाकर उसे दूध, घी आदि से पूरा भरकर, भक्तिपूर्वक प्रणाम करके ब्राह्मण को दान करें। इसके अतिरिक्त तुम्हें अन्य सैकड़ों दानों को देने की क्या आवश्यकता? हे राजन ! उस घट के मध्य में ब्रह्मा, विष्णु तथा कल्याण करने वाले अविनाशी शंकर की स्थापना करें एवं घट के कण्ठ में पूर्व आदि दिशाओं में क्रमश: लोकपालों का आवाहन करके उनकी धूप, पुष्प, चन्दन आदि से विधिवत पूजा करके दूध और घी के साथ उस हिरण्यमय घट का ब्राह्मण को दान करना चाहिए। हे राजन ! प्रेतत्व की निवृत्ति के लिए सभी दानों में श्रेष्ठ और महापातकों का नाश करने वाले इस दान को श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। भगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा – हे कश्यपपुत्र गरुड़ ! प्रेत के साथ इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि उसी समय हाथी, घोड़े आदि से व्याप्त राजा की सेना पीछे से वहाँ आ गई। सेना के आने के बाद राजा को महामणि देकर उन्हें प्रणाम करके पुन: अपने उद्धार के लिए और्ध्वदैहिक क्रिया करने की प्रार्थना करके वह प्रेत अदृश्य हो गया। हे पक्षिन् उस वन से निकलकर राजा भी अपने नगर को चला गया और अपने नगर में पहुँचकर प्रेत के द्वारा बताये हुए वचनों के अनुसार उसने विधि-विधान से और्ध्वदैहिक क्रिया का अनुष्ठान किया। उसके पुण्यप्रदान से मुक्त होकर प्रेत स्वर्ग को चला गया। जब दूसरे के द्वारा दिये हुए श्राद्ध से प्रेत की सद्गति हो गई तो फिर पुत्र के द्वारा प्रदत्त श्राद्ध से पिता की सद्गति हो जाए, इसमें क्या आश्चर्य!! इस पुण्यप्रद इतिहास को जो सुनता है और जो सुनाता है, वे दोनों पापाचारों से युक्त होने पर भी प्रेतत्व को प्राप्त नहीं होते। ।।इस प्रकार गरुड़्पुराण के अन्तर्गत सारोद्धार “बभ्रुवाहनप्रेतसंस्कार” नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ।। क्रमश... अगले लेख में श्री गरुड़ पुराण का आठवां अध्याय साभार~ पं देव शर्मा💐 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
गरूड़ पुराण - सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में) बभ्रुवाहनप्रेतसंस्कार नामक {सातवां अध्याय} सम्पूर्ण गरुड़ पुराण (हिन्दी में) बभ्रुवाहनप्रेतसंस्कार नामक {सातवां अध्याय} - ShareChat
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘ *परमात्मा ने मनुष्य को अनमोल उपहार के रूप में यह शरीर प्रदान किया है | इस शरीर के विषय में यह भी कहा जाता है कि यह शरीर चौरासी लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ है | जिस प्रकार कहीं की यात्रा करने के लिए वाहन का ठीक होना आवश्यक होता है उसी प्रकार जीवन रूपी यात्रा पूरी करने के लिए इस शरीर रूपी वाहन को स्वस्थ एवं ठीक रखना परम आवश्यक है | शरीर को ठीक रखने का एक ही माध्यम है सुपाच्य भोजन एवं समय-समय पर व्यायाम | यदि शरीर स्वस्थ नहीं है तो मनुष्य कोई भी कार्य सुचारु ढंग से नहीं कर सकता है | इसी को ध्यान में रखते हुए प्राचीन काल से ही हमारे महापुरुषों / पूर्वजों जगह-जगह मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य के लिए तरह - तरह के खेल एवं व्यायाम की व्यवस्था बनायी थी |इसके साथ ही मनुष्य सुंदर आहार , सुपाच्य भोजन लेकरके अपने शरीर को स्वस्थ बनाए रखता था | सामाजिक कार्य , धार्मिक कार्य या संसार का कोई भी कार्य हो उसे संपन्न करने के लिए शरीर का स्वस्थ होना बहुत आवश्यक है | हमारे धर्म ग्रंथों में लिखा गया है :- "शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्" यदि शरीर स्वस्थ रहेगा जब पूजा पाठ की तैयारी हो पाना संभव है , इसलिए शरीर को स्वस्थ रखने के प्रमुख अवयव भोजन पर ध्यान देना परम आवश्यक है | हमारे पूर्वज भोजन व्यवस्था पर ध्यान देते हुए अपने शरीर को स्वस्थ रखते हुए कई वर्षों तक जीवित रहे हैं |* *आज जिधर देखो उधर मनुष्य शारीरिक रोग से पीड़ित दिखता है , इसका मुख्य कारण है आज के मनुष्य का भोजन | मनुष्य को भोजन सदैव संतुलित एवं सुपाच्य ही करना चाहिए | आज व्यायाम के कोई साधन दिखायी नहीं पड़ते हैं | गांव में अखाड़े , कबड्डी एवं शरीर को स्वस्थ रखने के अन्य साधन भी समाप्त होते जा रहे हैं | यही कारण है कि मनुष्य का स्वास्थ्य गिरता चला जा रहा है | भोजन की बात कर ली जाए तो आज के युग में मनुष्य इतना व्यस्त है उसको भोजन करने का भी समय नहीं है | कभी चलते - चलते तो कभी खड़े - खड़े भोजन करके आज का मनुष्य किसी तरह पेट भर कर अपना काम कर रहा है | जबकि मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" जहां तक जान पाया हूँ उसके अनुसार भोजन सदैव आराम से बैठकर एवं खूब चबाकर करना चाहिए , क्योंकि ऐसा करने से भोजन सुपाच्य हो जाता है एवं मनुष्य को कोई रोग नहीं पकड़ता है | आज मनुष्य का भोजन इस प्रकार का हो गया है कि वह मनुष्य को रोगी बना रहा है | भक्ष - अभक्ष खाता हुआ मनुष्य अपने शरीर को दिन प्रतिदिन बीमार कर रहा है , और उसका सारा दोष परमात्मा को देता है | विचार कीजिए यदि किसी यात्रा में आपका वाहन ठीक नहीं है तो आप की यात्रा कैसे पूरी होगी ! उसी प्रकार यदि शरीर स्वस्थ नहीं है तो जीवन रूपी यात्रा बीच में ही रुक जाती है अर्थात मनुष्य असमय काल के गाल में समा रहा है | जबकि इसके लिए मनुष्य को बहुत ज्यादा प्रयास नहीं करना है , मात्र इतना ही करना है कि अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए समय-समय पर व्यायाम एवं सुपाच्य भोजन की ओर ध्यान देता रहे | परंतु आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य नहीं कर पा रहा है |* *अनेक योनियों में भ्रमण करके यह शरीर बहुत मुश्किल से प्राप्त हुआ है , इसको स्वस्थ बनाए रखते हुए आप संसार के सभी कार्य सुचारु ढंग से कर सकते हैं | अतः सुपाच्य भोजन एवं शारीरिक श्रम करते रहना चाहिए |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🀊 *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟 #🕉️सनातन धर्म🚩 #👫 हमारी ज़िन्दगी
🕉️सनातन धर्म🚩 - Pushti Surandli Sarar Pushti Surandli Sarar - ShareChat
#❤️जीवन की सीख 🌟 || समर्पण, सहयोग और सद्भाव || 🌟 समर्पण, सहयोग और सद्भाव ही जीवन में किसी संबंध को प्रेमपूर्ण बनाते हैं। संबंधों को संभालना भी जीवन की एक बहुत बड़ी कला है। आज के आधुनिक समय में हम अन्तरिक्ष में उड़ना सीख गए, समुद्र में तैरना भी सीख गए लेकिन जमीन पर रहना भूल गए। हमने इमारतें बड़ी बना ली पर दिल छोटा कर लिया। हमने मार्गों का चौड़ीकरण कर दिया पर जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को अति संकीर्ण बना दिया है। हमने साधन कई गुना बढ़ा लिए पर अपना मूल्य कम कर लिया। हमने ज्यादा बोलना सीख लिया पर प्रिय बोलना छोड़ दिया। हम विचारों से तो सम्पन्न हो गये पर आचरण से बड़े दरिद्र हो गये हैं। वर्तमान के इस भौतिक युग में प्रगति के साथ हमारी दुर्गति भी बहुत हुई है। नित्य भगवद् चिंतन और भगवदाश्रय से इस मानव जीवन को आनंदमय बनायें।प्रभु परायण बनें क्योंकि प्रभु परायणता जीवन में हमें संबंधों के प्रति हमारे कर्तव्यों का बोध भी कराती है।🖋️ जय श्री राधे कृष्ण ⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥⛓️‍💥
❤️जीवन की सीख - सुविचार आप जिसपर ध्यान देना छोड़ देंगे उसका नष्ट होना स्वभाविक है फिर चाहे बह स्वास्थ्य हो, धन हो, संगत हो या कोई रिश्ता सुविचार आप जिसपर ध्यान देना छोड़ देंगे उसका नष्ट होना स्वभाविक है फिर चाहे बह स्वास्थ्य हो, धन हो, संगत हो या कोई रिश्ता - ShareChat
#☝आज का ज्ञान गुणिनि गुणज्ञो रमते नागुणशीलस्य गुणिनि परितोषः । अलिरेति वनात् कमलं न दर्दुरस्तन्निवासोsपि ॥ [ वल्लभदेव - २५३ ] अर्थात् 👉🏻 गुण की परख रखनेवाला गुणी को पाकर प्रसन्न हो जाता है , किन्तु निर्गुण व्यक्ति गुणवान से सन्तुष्ट नहीं होता । भ्रमर तो जंगल से कमल के पास चला आता है किन्तु मेढक जलाशय में कमल के अत्यन्त समीप होते हुए भी उसके समीप नहीं जाता । 🌄🌄 प्रभात वंदन 🌄🌄
☝आज का ज्ञान - अनंत प्रेम का एक ही प्रमाण 8. किसी के प्रति निस्वार्थ हो আনা अनंत प्रेम का एक ही प्रमाण 8. किसी के प्रति निस्वार्थ हो আনা - ShareChat
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣3️⃣1️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टाधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्र आदि के जन्म तथा भीष्मजी के धर्मपूर्ण शासन से कुरुदेश की सर्वांगीण उन्नति का दिग्दर्शन...(दिन 331) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच (धृतराष्ट्र च पाण्डौ च विदुरे च महात्मनि ।) तेषु त्रिषु कुमारेषु जातेषु कुरुजाङ्गलम् । कुरवोऽथ कुरुक्षेत्रं त्रयमेतदवर्धत ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! धृतराष्ट्र, पाण्डु और महात्मा विदुर-इन तीनों कुमारोंके जन्मसे कुरुवंश, कुरुजांगल देश और कुरुक्षेत्र- इन तीनोंकी बड़ी उन्नति हुई ।। १ ।। ऊर्ध्वसस्याभवद् भूमिः सस्यानि रसवन्ति च । यथर्तुवर्षी पर्जन्यो बहुपुष्पफला द्रुमाः ।। २ ।। पृथ्वीपर खेतीकी उपज बहुत बढ़ गयी, सभी अन्न सरस होने लगे, बादल ठीक समयपर वर्षा करते थे, वृक्षोंमें बहुत-से फल और फूल लगने लगे ।। २ ।। वाहनानि प्रहृष्टानि मुदिता मृगपक्षिणः । गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ।। ३ ।। घोड़े हाथी आदि वाहन हृष्ट-पुष्ट रहते थे, मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे दिन बिताते थे, फूलों और मालाओंमें अनुपम सुगन्ध होती थी और फलोंमें अनोखा रस होता था ।। ३ ।। वणिग्भिश्चान्वकीर्यन्त नगराण्यथ शिल्पिभिः । शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन् ।। ४ ।। सभी नगर व्यापार-कुशल वैश्यों तथा शिल्पकलामें निपुण कारीगरोंसे भरे रहते थे। शूर-वीर, विद्वान् और संत सुखी हो गये ।। ४ ।। नाभवन् दस्यवः केचिन्नाधर्मरुचयो जनाः । प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ।। ५ ।। कोई भी मनुष्य डाकू नहीं था। पापमें रुचि रखनेवाले लोगोंका सर्वथा अभाव था। राष्ट्र के विभिन्न प्रान्तों में सत्ययुग छा रहा था ।। ५ ।। धर्मक्रिया यज्ञशीलाः सत्यव्रतपरायणाः । अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ।। ६ ।। उस समय की प्रजा सत्य-व्रत के पालन में तत्पर हो स्वभावतः यज्ञ-कर्म में लगी रहती और धर्मानुकूल कर्मों में संलग्न रहकर एक-दूसरे को प्रसन्न रखती हुई सदा उन्नतिके पथ पर बढ़ती जाती थी ।। ६ ।। मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः। अन्योन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ।। ७ ।। सब लोग अभिमान और क्रोधसे रहित तथा लोभसे दूर रहनेवाले थे; सभी एक-दूसरेको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करते थे। लोगोंके आचार-व्यवहारमें धर्मकी ही प्रधानता थी ।। ७ ।। तन्महोदधिवत् पूर्ण नगरं वै व्यरोचत । द्वारतोरणनिर्यू हैर्युक्तमभ्रचयोपमैः ।। ८ ।। समुद्रकी भाँति सब प्रकारसे भरा-पूरा कौरवनगर मेघसमूहोंके समान बड़े-बड़े दरवाजों, फाटकों और गोपुरोंसे सुशोभित था ।। ८ ।। प्रासादशतसम्बाधं महेन्द्रपुरसंनिभम् । नदीषु वनखण्डेषु वापीपल्वलसानुषु । काननेषु च रम्येषु विजहुर्मुदिता जनाः ।। ९ ।। सैकड़ों महलोंसे संयुक्त वह पुरी देवराज इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी। वहाँके लोग नदियों, वनखण्डों, बावलियों, छोटे-छोटे जलाशयों, पर्वतशिखरों तथा रमणीय काननोंमें प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे ।। ९ ।। उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तथा। विस्पर्धमाना व्यचरंस्तथा देवर्षिचारणैः ।। १० ।। उस समय दक्षिणकुरु देशके निवासी उत्तरकुरुमें रहनेवाले लोगों, देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंके साथ होड़-सी लगाते हुए स्वच्छन्द विचरण करते थे ।। १० ।। नाभवत् कृपणः कश्चिन्नाभवन् विधवाः स्त्रियः । तस्मिञ्जनपदे रम्ये कुरुभिर्बहुलीकृते ।। ११ ।। कौरवोंद्वारा बढ़ाये हुए उस रमणीय जनपदमें न तो कोई कंजूस था और न विधवा स्त्रियाँ देखी जाती थीं ।। ११ ।। कूपारामसभावाप्यो ब्राह्मणावसथास्तथा । बभूवुः सर्वर्द्धियुतास्तस्मिन् राष्ट्र सदोत्सवाः ।। १२ ।। उस राष्ट्रके कुओं, बगीचों, सभाभवनों, बावलियों तथा ब्राह्मणोंके घरोंमें सब प्रकारकी समृद्धियाँ भरी रहती थीं और वहाँ नित्य-नूतन उत्सव हुआ करते थे ।। १२ ।। भीष्मेण धर्मतो राजन् सर्वतः परिरक्षिते । बभूव रमणीयश्च चैत्ययूपशताङ्कितः ।। १३ ।। जनमेजय ! भीष्मजीके द्वारा सब ओरसे धर्मपूर्वक सुरक्षित भूमण्डलमें वह कुरुदेश सैकड़ों देवस्थानों और यज्ञस्तम्भोंसे चिह्नित होनेके कारण बड़ी शोभा पाता था ।। १३ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभारतम् श्रीमहाभारतम् - ShareChat
. #जय श्री कृष्ण “ वृंदावन आगमन “ मथुरा का राजा कंस बहुत क्रूर और अत्याचारी था। उसे यह भविष्यवाणी सुनने को मिली थी कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र ही उसका वध करेगा। इसी भय से कंस ने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब वसुदेव जी उन्हें रात के अंधेरे में गोकुल ले आए और उन्हें नंदबाबा और माता यशोदा को सौंप दिया। गोकुल में श्रीकृष्ण बड़े प्रेम से पले-बढ़े। लेकिन कंस को जब पता चला कि देवकी का पुत्र जीवित है और कहीं गोकुल में छिपा हुआ है, तो उसने कई राक्षसों को कृष्ण को मारने के लिए भेजा। कभी पूतना, कभी त्रिणावर्त, तो कभी अन्य दुष्ट राक्षस गोकुल पर हमला करने लगे। हालांकि भगवान कृष्ण हर बार अपनी दिव्य शक्ति से उन राक्षसों का अंत कर देते थे। गोकुल के लोगों को धीरे-धीरे यह डर सताने लगा कि कंस के अत्याचार से उनका गांव सुरक्षित नहीं है। तब एक दिन नंदबाबा ने सभी ग्वालों और परिवार के लोगों को बुलाकर विचार किया। उन्होंने कहा, “हमारे बच्चों की सुरक्षा सबसे जरूरी है। कंस बार-बार गोकुल पर संकट भेज रहा है, इसलिए हमें किसी सुरक्षित स्थान पर जाना चाहिए।” सभी ने मिलकर निर्णय लिया कि वे वृंदावन चलेंगे। वृंदावन एक सुंदर और शांत वन प्रदेश था, जहाँ चारों ओर हरियाली, पेड़-पौधे, और बहती हुई यमुना नदी थी। यह स्थान गोकुल से अधिक सुरक्षित और रमणीय था। फिर एक दिन गोकुल के सभी लोग अपनी बैलगाड़ियों में सामान लेकर, गायों और बछड़ों के साथ वृंदावन की ओर चल पड़े। उस यात्रा में छोटा सा कृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम भी बहुत प्रसन्न थे। कृष्ण रास्ते भर बांसुरी बजाते और ग्वालबालों के साथ हँसी-मजाक करते जाते थे। जब सभी लोग वृंदावन पहुँचे, तो वहाँ की सुंदरता देखकर सबका मन प्रसन्न हो गया। ऊँचे-ऊँचे पेड़, हरी घास के मैदान, और पास में बहती यमुना नदी उस स्थान को स्वर्ग जैसा बना रहे थे। नंदबाबा और सभी ग्वालों ने वहीं अपने घर बना लिए और वृंदावन में बस गए। वृंदावन में ही श्रीकृष्ण ने अपनी कई अद्भुत लीलाएँ कीं। वे गायों को चराने जाते, ग्वालबालों के साथ खेलते, और बांसुरी की मधुर धुन से पूरे वन को आनंदित कर देते थे। यहीं पर उन्होंने कालिया नाग का दमन भी किया। यमुना नदी में रहने वाला विषैला कालिया नाग सबको परेशान करता था। तब श्रीकृष्ण ने नदी में कूदकर उस नाग को वश में किया और उसके फनों पर नृत्य करके उसे पराजित कर दिया। वृंदावन की यही भूमि श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से पवित्र हो गई। आज भी लोग मानते हैं कि वृंदावन में हर कण-कण में कृष्ण का प्रेम और उनकी दिव्य लीलाओं की सुगंध बसती है। इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए हर समय साथ रहते हैं और प्रेम, भक्ति तथा साहस से हर संकट का सामना किया जा सकता है। राधे राधे…. जय श्रीकृष्ण…. .
जय श्री कृष्ण - ShareChat