#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣8️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामा की उत्पत्ति तथा द्रोण को परशुरामजी से अस्त्र-शस्त्र की प्राप्ति की कथा...(दिन 382)
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जनमेजय उवाच
कृपस्यापि मम ब्रह्मन् सम्भवं वक्तुमर्हसि । शरस्तम्बात् कथं जज्ञे कथं वास्त्राण्यवाप्तवान् ।। १ ।।
जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन् ! कृपाचार्यका जन्म किस प्रकार हुआ? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। वे सरकंडेके समूहसे किस तरह उत्पन्न हुए एवं उन्होंने किस प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की? ।। १ ।।
वैशम्पायन उवाच
महर्षेर्गौतमस्यासीच्छरद्वान् नाम गौतमः । पुत्रः किल महाराज जातः सह शरैर्विभो ।। २ ।।
न तस्य वेदाध्ययने तथा बुद्धिरजायत । यथास्य बुद्धिरभवद् धनुर्वेदे परंतप ।। ३ ।।
वैशम्पायनजीने कहा- महाराज ! महर्षि गौतमके शरद्वान् गौतम नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र थे। प्रभो! कहते हैं, वे सरकंडोंके साथ उत्पन्न हुए थे। परंतप ! उनकी बुद्धि धनुर्वेदमें जितनी लगती थी, उतनी वेदोंके अध्ययनमें नहीं ।। २-३ ।।
अधिजग्मुर्यथा वेदांस्तपसा ब्रह्मचारिणः । तथा स तपसोपेतः सर्वाण्यस्त्राण्यवाप ह ।। ४ ।।
जैसे अन्य ब्रह्मचारी तपस्यापूर्वक वेदोंका ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने तपस्यायुक्त होकर सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किये ।। ४ ।।
धनुर्वेदपरत्वाच्च तपसा विपुलेन च । भृशं संतापयामास देवराजं स गौतमः ।। ५ ।।
वे धनुर्वेदमें पारंगत तो थे ही, उनकी तपस्या भी बड़ी भारी थी; इससे गौतमने देवराज इन्द्रको अत्यन्त चिन्तामें डाल दिया था ।। ५ ।।
ततो जानपदीं नाम देवकन्यां सुरेश्वरः ।
प्राहिणोत् तपसो विघ्नं कुरु तस्येति कौरव ।। ६ ।।
कौरव ! तब देवराजने जानपदी नामकी एक देवकन्याको उनके पास भेजा और यह आदेश दिया कि 'तुम शरद्वान्की तपस्यामें विघ्न डालो' ।। ६ ।।
सा हि गत्वाऽऽश्रमं तस्य रमणीयं शरद्वतः।
धनुर्बाणधरं बाला लोभयामास गौतमम् ।। ७ ।।
वह जानपदी शरद्वान् के रमणीय आश्रम पर जाकर धनुष-बाण धारण करने वाले
गौतम को लुभाने लगी ।। ७ ।।
तामेकवसनां दृष्ट्वा गौतमोऽप्सरसं वने ।
लोकेऽप्रतिमसंस्थानां प्रोत्फुल्लनयनोऽभवत् ।। ८ ।।
गौतमने एक वस्त्र धारण करनेवाली उस अप्सराको वनमें देखा। संसारमें उसके सुन्दर शरीरकी कहीं तुलना नहीं थी। उसे देखकर शरद्वान्के नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे ।। ८ ।।
धनुश्च हि शरास्तस्य कराभ्यामपतन् भुवि।
वेपथुश्चापि तां दृष्ट्वा शरीरे समजायत ।। ९ ।।
उनके हाथोंसे धनुष और बाण छूटकर पृथ्वीपर गिर पड़े तथा उसकी ओर देखनेसे उनके शरीरमें कम्प हो आया ।। ९ ।।
स तु ज्ञानगरीयस्त्वात् तपसश्च समर्थनात्।
अवतस्थे महाप्राज्ञो धैर्येण परमेण ह ।। १० ।।
शरद्वान् ज्ञानमें बहुत बढ़े-चढ़े थे और उनमें तपस्याकी भी प्रबल शक्ति थी। अतः वे महाप्राज्ञ मुनि अत्यन्त धीरतापूर्वक अपनी मर्यादामें स्थित रहे ।। १० ।।
यस्तस्य सहसा राजन् विकारः समदृश्यत । तेन सुस्राव रेतोऽस्य स च तन्नान्वबुध्यत ।। ११ ।।
राजन्! किंतु उनके मनमें सहसा जो विकार देखा गया, इससे उनका वीर्य स्खलित हो गया; परंतु इस बातका उन्हें भान नहीं हुआ ।। ११ ।।
धनुश्च सशरं त्यक्त्वा तथा कृष्णाजिनानि च । स विहायाश्रमं तं च तां चैवाप्सरसं मुनिः ।। १२ ।।
जगाम रेतस्तत् तस्य शरस्तम्बे पपात च ।
शरस्तम्बे च पतितं द्विधा तदभवन्नृप ।। १३ ।।
वे मुनि बाणसहित धनुष, काला मृगचर्म, वह आश्रम और वह अप्सरा-सबको वहीं छोड़कर वहाँसे चल दिये। उनका वह वीर्य सरकंडेके समुदाय पर गिर पड़ा। राजन् ! वहाँ गिरनेपर उनका वीर्य दो भागोंमें बँट गया ।। १२-१३ ।।
तस्याथ मिथुनं जज्ञे गौतमस्य शरद्वतः ।
मृगयां चरतो राज्ञः शन्तनोस्तु यदृच्छया ।। १४ ।।
कश्चित् सेनाचरोऽरण्ये मिथुनं तदपश्यत । धनुश्च सशरं दृष्ट्वा तथा कृष्णाजिनानि च ।। १५ ।।
ज्ञात्वा द्विजस्य चापत्ये धनुर्वेदान्तगस्य ह ।
स राज्ञे दर्शयामास मिथुनं सशरं धनुः ।। १६ ।।
स तदादाय मिथुनं राजा च कृपयान्वितः । आजगाम गृहानेव मम पुत्राविति ब्रुवन् ।। १७ ।।
तदनन्तर गौतमनन्दन शरद्वान्के उसी वीर्यसे एक पुत्र और एक कन्याकी उत्पत्ति हुई। उस दिन दैवेच्छासे राजा शन्तनु वनमें शिकार खेलने आये थे। उनके किसी सैनिकने वनमें उन युगल संतानोंको देखा। वहाँ बाणसहित धनुष और काला मृगचर्म देखकर उसने यह जान लिया कि 'ये दोनों किसी धनुर्वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणकी संतानें हैं' ऐसा निश्चय होनेपर उसने राजाको वे दोनों बालक और बाणसहित धनुष दिखाया। राजा उन्हें देखते ही कृपाके वशीभूत हो गये और उन दोनोंको साथ ले अपने घर आ गये। वे किसीके पूछनेपर यही परिचय देते थे कि 'ये दोनों मेरी ही संतानें हैं' ।। १४-१७ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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