श्रीरामचरितमानस 🪷

sn vyas
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26 days ago
वनवास का समय था। चित्रकूट का शांत और पावन वन—जहाँ मर्यादा #श्रीरामचरितमानस चोपाई #श्रीरामचरितमानस 🪷 , संयम और धर्म के साथ श्रीराम और माता सीता जीवन व्यतीत कर रहे थे। उसी शांत वन में एक ऐसा प्रसंग घटित हुआ, जिसने युगों के लिए यह सत्य स्थापित कर दिया कि अपराध का कोई मापदंड नहीं होता—अपराध, अपराध ही होता है। एक दिन माता सीता कुटिया के बाहर विश्राम कर रही थीं। तभी देवराज इंद्र का पुत्र जयंत, अहंकारवश कौए का रूप धारण कर वहाँ आया। उसने माता सीता के चरणों में चोंच मारी। रक्त बह निकला। यह केवल शरीर पर लगा घाव नहीं था, यह नारी की मर्यादा पर किया गया आघात था। जब श्रीराम ने यह दृश्य देखा, तो उनका क्रोध व्यक्तिगत नहीं था—वह धर्म का क्रोध था। उन्होंने कोई शस्त्र नहीं उठाया। उन्होंने केवल एक तृण उठाकर ब्रह्मास्त्र का संकल्प किया। वही तृण ब्रह्मबाण बन गया और कौए के रूप में जयंत का पीछा करने लगा। जयंत तीनों लोकों में भटका—देवलोक, ब्रह्मलोक, पितृलोक—पर कहीं भी उसे शरण नहीं मिली। अंततः वह थक-हारकर श्रीराम के चरणों में गिर पड़ा। श्रीराम ने कहा— “ब्रह्मास्त्र निष्फल नहीं जाता। दंड अवश्य मिलेगा।” अपने प्राणों की रक्षा के लिए जयंत ने स्वयं अपनी एक आँख अर्पित कर दी। उसकी एक आँख नष्ट हुई, पर जीवन बच गया। उसी दिन से कौआ काना माना जाने लगा। यह केवल दंड नहीं था, यह स्मृति थी—कि नारी के अपमान का अपराध कभी क्षम्य नहीं होता। पर यह कथा यहीं समाप्त नहीं होती। जयंत के भीतर परिवर्तन आया। देवपुत्र होने का गर्व टूट गया। उसने जाना कि धर्म के सामने पद, शक्ति और कुल—सब तुच्छ हैं। श्रीराम ने उसे केवल दंड नहीं दिया, उसे बोध दिया। माता सीता ने करुणा दिखाई, पर अपराध को उचित नहीं ठहराया। चित्रकूट का वन फिर शांत हो गया, पर उस शांति में एक चेतावनी स्थायी हो गई—मर्यादा भंग करने वाला चाहे कोई भी हो, दंड से नहीं बच सकता। युग बदला। वही कौआ, वही चोंच, वही उड़ान—पर परिस्थिति भिन्न थी। एक दिन श्रीकृष्ण भोजन कर रहे थे। तभी एक कौआ उनके हाथ से रोटी लेकर उड़ गया। लोगों को यह दृश्य हास्यास्पद लगा, वे हँस पड़े। पर श्रीकृष्ण की आँखों से आँसू बह निकले। न कोई बाण, न कोई क्रोध—केवल करुणा। लोगों ने आश्चर्य से पूछा— “जो स्वयं माखन चुराते हैं, वे आज रोटी जाने पर क्यों रो रहे हैं?” श्रीकृष्ण ने कहा— “यह चोरी आनंद से नहीं, भूख से हुई है। जहाँ भूख होती है, वहाँ पहले पीड़ा होती है, अपराध बाद में। यह कौआ दोषी नहीं—यह समाज की असफलता का संकेत है।” कृष्ण इसलिए रोए, क्योंकि किसी जीव को विवश होकर छीनना पड़ा। यहीं धर्म के दो स्वरूप प्रकट होते हैं— राम के सामने जो आया, वह अहंकार से जन्मा अपराध था—इसलिए दंड अनिवार्य था। कृष्ण के सामने जो आया, वह भूख से उपजा कृत्य था—इसलिए करुणा स्वाभाविक थी। कौआ दोनों कथाओं में उपस्थित है— एक स्थान पर नारी अपमान की चेतावनी बनकर, दूसरे स्थान पर भूख और उपेक्षा का प्रतीक बनकर। इन कथाओं का सार एक ही है— अपराध को तर्क से ढका नहीं जा सकता, और पीड़ा को दंड से मिटाया नहीं जा सकता। जहाँ अपराध है, वहाँ न्याय आवश्यक है। जहाँ भूख है, वहाँ करुणा अनिवार्य है। और समाज तभी सच्चे अर्थों में धर्मशील बनता है, जब वह दोनों में भेद करना सीख लेता है। अपराध तो अपराध है— पर हर कृत्य को समझने के लिए विवेक चाहिए। यही राम का न्याय है, और यही कृष्ण की करुणा है।
sn vyas
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1 months ago
#श्रीरामचरितमानस चोपाई #श्रीरामचरितमानस 🪷 श्री रामचरितमानस में भक्त तुलसी की शंकर-स्तुति श्रीरामचरितमानस में भक्त तुलसीदासजी भगवान श्री राम के साथ-साथ आदि देव भगवान शंकर की भी स्तुति करते हुए चलते हैं। रामचरितमानस के सप्त सोपानों में से छः सोपानों के प्रारंभ में मंगलाचरण के अंतर्गत भगवान शंकर की स्तुति तुलसीदास जी करते हैं। प्रथम सोपान - बालकांड (श्लोक) इस के मंगलाचरण के अंतर्गत तुलसीदास जी लिखते हैं - भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना ना पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम्।। वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्र: सर्वत्र वन्द्यते।। द्वितीय सोपान - अयोध्या कांड (श्लोक) यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापदा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि ब्यालराट्। सोऽयं भूतिविभूषण: सुरवर: सर्वाधिप: सर्वदा शर्व: सर्वगत: शिव: शशिनिभ: श्रीशंकर: पातु माम्।। तृतीय सोपान - अरण्यकांड (श्लोक) मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे: पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्व:सम्भवं शंकरं वन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्।। चतुर्थ सोपान - किष्किंधाकांड (सोरठा) मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर। जहं बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न।। जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय। तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस।। षष्ठ सोपान - लंकाकांड (श्लोक) शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दुलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशांकप्रियम्। काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शंकरम्।। सप्तम सोपान - उत्तरकांड (श्लोक) कुन्दइन्दुदरगौरसुंदरं अंबिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्। कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनङ्गमोचनम्।। पंचम सोपान - सुंदरकांड रामचरितमानस का एकमात्र यही सोपान - सुंदरकांड है , जिसमें शंकर जी की स्तुति नहीं की गई है। इस में तुलसीदासजी शंकर जी की स्तुति तो नहीं करते हैं , लेकिन शंकर जी के ही अवतार हनुमान जी की स्तुति करते हैं। एक तरह से हनुमान जी की स्तुति कर तुलसीदास जी भगवान शंकर की ही स्तुति कर रहे हैं। पूरा सुंदरकांड ही तुलसीदास जी ने शंकर जी के अवतार हनुमान जी को ही समर्पित किया है। यही नहीं बल्कि तुलसीदास जी लंकाकांड में मंगलाचरण के अंतिम श्लोक में शंकर जी की स्तुति करते हैं , ठीक इसके बाद के दोहे में प्रभु श्री राम की स्तुति करते हैं। यो ददाति सतां शम्भु: कैवल्यमपि दुर्लभम्। खलानां दण्डकृद्योऽसौ शंकर: शं तनोतु मे।। लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड। भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड।। इस प्रकार हम देखते हैं कि तुलसीदास जी प्रभु शिव एवं प्रभु श्री राम में अभेद-दृष्टि रखते थे। ।। श्री राम जय राम जय जय राम ।