karm

sn vyas
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5 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२८/३ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚 भगवान प्रारब्ध भोगने में क्या मदद करते है ? 🦚 गतांक से आगे श्री भगवान राम स्वयं कहते हैं ---- मैं जिस दिन चक्रवर्ती राजा होने वाला था ,और सिंहासन पर बैठने वाला था, उसी दिन सुबह मुझे कर्म के कायदे को मान देकर , जटाधारी तपस्वी के वेश में बन में जाना पड़ा है ,,, *भगवान राम उनके पिता दशरथ को ,, पुत्र के वियोग से होने वाले मृत्यु रूपी प्रारब्ध भोगने में मदद न कर सके। उनको कम से कम चौदह वर्ष भी पुन: जीवन दे सके नहीं।* *जिस राम के चरण रज के स्पर्श मात्र से शल्या की अहिल्या हो सकी ,,, पत्थर को भी जो जीवन दान दे सकें,,, वे भगवान खुद अपने पिता को जीवनदान दे सके नहीं ,,,, क्योंकि अहिल्या के पाप पूर्ण हो गए थे । उसका प्रारब्ध जीवन दान देने को तैयार हो गया था । जबकि राजा दशरथ ने श्रवण का वध किया था । वह पाप प्रारब्ध बनकर दशरथ को फल देने के लिए सामने खड़ा था । उसमें खुद भगवान भी हस्तक्षेप नहीं करते।* *गवर्नर ने कायदा किया हो कि वाहन बायी ओर से चलाना ,,, फिर खुद गवर्नर ही अपनी मोटर दाहिनी ओर से चलाएं तो छोटे से छोटा पुलिस भी उनकी मोटर को रोक सकता है। उसमें गवर्नर का कुछ भी नहीं चलेगा।* *भगवान के बनाए हुए कर्म के कायदे का सख्त पालन हो ऐसा भगवान चाहते हैं । तो मानव को उनकी आज्ञा अनुसार भक्ति योग के द्वारा अपने प्रारब्ध कर्म को भोग लेना चाहिए।* क्रमश: अब आगे कल नया भाग ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
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12 days ago
#कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta 🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२५/५ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚प्रारब्ध तो भोगने से ही छुटकारा मिलता है🦚 🔥(बुद्धि कर्मासारिणी)🔥 एक चींटे का प्रारब्ध, मोटर के नीचे दब कर मरने का निर्माण हुआ हो ,, तो वह चीटा जब सड़क पर से गुजरता हो और मोटर सामने से आती देख के तुरंत ही अपने बचाव की प्रबल इच्छा से घबराया हुआ दौड़ती हुई मोटर के पहिए की ओर ही दौड़ पड़ेगा ,, और पीस कर मर जाएगा । *बचने की इच्छा से दौड़ने का किया हुआ पुरुषार्थ उसके प्रारब्ध के अनुसार उसकी बुद्धि उसको मोटर के पहिए की तरफ ही दौड़ आएगी। उसके प्रारब्ध के अनुसार उसको बुद्धि सूझेगी और जानबूझकर पुरुषार्थ करके भी मोटर के पहिए के नीचे पिस कर अपना प्रारब्ध भोगेगा।* *कोई भी पुरुषार्थ न करें और जहां है ,, वहीं खड़ा रहे तो बच जाए ,,, किंतु उसका प्रारब्ध भुगताने के लिए उसकी बुद्धि उसको चक्के की ओर दौड़ने की प्रेरणा करेगी ,,, प्रारब्ध भोगने में बुद्धि कर्म का अनुसरण करती है ,,, जैसा कर्म जैसी बुद्धि सूझेगी।* *गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं ---* 💜💫💦🩸🍃🎈🌾🌻🌼🌞🔥 *तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाय।* *आपुनु आवइ ताहि पहि ताहि तहाँ लै जाय ॥* *जो होना निश्चित हो , वहां आप का प्रारब्ध आप को घसीटते हुए ले जाएगा या तो घसीटते हुए आपके पास चला आएगा ,,, और किसी भी तरह आपको प्रारब्ध फल देकर ही आपका पीछा छोड़ेगा।* *प्रारब्ध के कारण बड़े बड़े ज्ञानी और महान बुद्धिशाली की बुद्धि भी उल्टी हो जाती है। पुराण और शास्त्र उसके साक्षी दे रहे हैं कि ---* *असंभवं हेम मृगस्य जन्म* *तथापि रामो लुलुभे मृगाय।* *प्राय:समापन्न विपत्ति काले* *धीयोअपि पुंसाम् मलिनी भवन्ति।* 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 *सोने का मृग होना असंभव होने पर भी राम जैसा राम भी उसमें लुभा गए क्योंकि आगे कोई महान प्रारब्ध निर्माण हो चुका है ,,, इसलिए वह भोगने के लिए महा बुद्धि शाली आदमी की बुद्धि प्रारब्ध की ओर गमन करती है।* क्रमश: आगे अब छठवाँ भाग ✍🏽
sn vyas
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13 days ago
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२५/०३ संक्षिप्त सार🩸 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 *कर्म का सिद्धांत पुस्तक में से अभी तक आपने पढ़ा और विस्तार से व्याख्या भी पढ़ी, उसका ही संक्षिप्त सार है।* *(1) गहना कर्मणो गति:* भगवान श्री कृष्ण कहते हैं,, कर्म की गति बड़ी गहन है *(2)कर्म का अटल सिद्धांत* करम प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहिं सो तस फल चाखा॥ *(3) कर्म माने क्या ? कर्म किसको कहते हैं ?* कर्म तीन प्रकार के होते हैं *(4) क्रियमाण कर्म* हम जो सुबह से शाम तक कर्म करते हैं वह क्रियमाण कर्म कहलाते हैं *(5) संचित कर्म* ऐसे कर्म जो तत्काल फल नहीं देते वह संचित में जमा हो जाते हैं उसे संचित कर्म कहते हैं *(6) प्रारब्ध कर्म* संचित कर्म पक कर फल देने के लिए तैयार हो जाता है , उसे प्रारब्ध कर्म कहते हैं *(7) किए हुए कर्म भोगने ही पड़ते हैं* कर्म किया कि उसका फल चिपका ही समझ लो *(8)धर्मी के घर डाका ,अधर्मी के घर विवाह* कर्म का अटल सिद्धांत है ,जैसा बोओगे वैसा पाओगे, जैसी करनी वैसी भरनी *(9) कर्म फल देकर ही शांत होते हैं* भगवान की माया के यह तीन गुण ,,, सतोगुण ,,, रजोगुण तमोगुण ,, *(10) क्रियमाण कर्म करने की पद्धति* जीव जिस स्वभाव का होता है, फल भोग उसी गुण को ग्रहण कर फल भोगता है *(11) प्रारब्ध में होगा उतना ही मिलेगा* कहां जन्म होना है , जीवन काल दरमियान जो भी दुख सुख मिलना है , और मृत्यु कब होनी है *(12) तो फिर क्या आदमी को पुरुषार्थ नहीं करना चाहिए ?* प्रारब्ध में हो तो ही मिलेगा , यह बात अटल सत्य है , किंतु प्रारब्ध कहां लगाना है और पुरुषार्थ कहां करना ,, उसका विवेक आदमी को ठीक तरह समझ लेना चाहिए *(13)प्रारब्ध कहां अजमाना, है और पुरुषार्थ कहां करना* मनुष्य को अपने जीवन काल में अर्थ ,धर्म ,काम , मोक्ष की कामनाएं होती हैं , अर्थ और काम को प्रारब्ध पर छोड़कर धर्म और मोक्ष के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए *(14)प्रारब्ध और पुरुषार्थ एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक है* *(15) कर्म करने में स्वतंत्र हैं फल भोगने में परतंत्र* *(16)फल भोगने के लिए देह धारण करनी ही पड़ेगी* फल भोगने का साधन देह ही है,, देह धारण करके ही हम फल भोग सकते हैं, इसलिए शरीर को भोगा जतन कहा है *(16 -अ )कर्म में घटाना (बाद बाकी) नहीं है ।* शुभ कर्म सोने की बेडी है और अशुभ कर्म लोहे की बेडी है,, दोनों का कर्म फल अलग-अलग भोगना पड़ता है *(17) तो फिर मोक्ष कब ?* मानव मात्र मोक्ष का अधिकारी है ,,, मानव शरीर मोक्ष प्राप्त करने के लिए ही मिला है। *(18) किंतु कोई कर्म ही न करें तो ?* कोई भी आदमी कर्म बिना रह नहीं सकता ,,, कर्म तो जन्म से लेकर मरण तक करने पड़ेंगे *(19) कौन से क्रियमाण कर्म संचित में जमा नहीं होते ?* निम्नलिखित कर्म संचित में जमा नहीं होते *(20)अबुध और अभान अवस्था किये हुए कर्म* (1)बाल्यावस्था में किए हुए कर्म (2) नशे की अवस्था में किए हुए कर्म *(21)मनुष्येतर योनि में किए हुए कर्म* (3) मनुष्य योनि के अलावा जितनी भी योनिया है उनके कर्म संचित में जमा नहीं होते,वह सब भोग योनिया है। *(22) कर्तापन के अभिमान के बिना किए हुए कर्म* (4) ऐसे कर्म जो अकर्म बन जाते हैं , संचित में जमा नहीं होते *(23 समष्टि के कल्याण के लिए किए हुए कर्म* (5) जो जगत कल्याण के लिए कर्म होते हैं वह संचित में जमा नहीं होते *(24)निष्काम कर्म* (6) राग द्वेष रहित,, कर्तापन के अभिमान रहित,, कामना से रहित,,, इत्यादि वह निष्काम कर्म संचित में जमा नहीं होते *(25) प्रारब्ध को भोगने से ही छुटकारा मिलता है* सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ ॥ उसके निमित्त तीन हो सकते हैं *स्वेच्छाकृत-फल भोग* *परेच्छाकृत- फल भोग* *अनिच्छाकृत-फल भोग* *बुद्धि कर्मानुसारिणी* प्रारब्ध फल भोगने में बुद्धि भी कर्म का ही अनुसरण करती है *कर्म बुद्धि अनुसरणीय* प्रारब्ध फल भोगने में जैसा कर्म बैसी बुद्धि भी हो जाती है। *संक्षिप्त सार* यहा तक लिखा है ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
sn vyas
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26 days ago
🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग१० 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🥰 क्रियमाण कर्म करने के पद्धति 🥰 सतोगुण , रजोगुण और तमोगुण तीनों प्रकार के जीवों के लिए क्रियमाण कर्म करने की पद्धति भी अलग-अलग होती है, कर्म का फल तो तीनों प्रकार के जीवो को अवश्य ही मिलेगा , किंतु ;* *सतोगुणी जीव कहता है* *मैं कर्म करूंगा फल मिले या न मिले* *रजोगुणी जीव कहता है* *मैं कर्म करुगा किंतु फल नहीं छोडूंगा* *तमोगुणी जीव कहता है* *फल न मिले तब तक मैं कर्म नहीं करूंगा* *एक आदमी का बेटा अचानक रात्रि को बारह बजे बीमार पड़ गया, वह आदमी आधी रात को डॉक्टर को विजिट के लिए बुलाने गया, डॉक्टर सतोगुणी था, उसने निंद्रा में से उठकर जाना कि इस आदमी का बेटा सख्त बीमार है, तुरंत ही दवाई तथा इंजेक्शन की बैग लेकर विजिट के लिए तैयार हो गया।* *उस आदमी ने डॉक्टर को विजिट फीस के संबंध में पूछा ? किंतु सतोगुणी डॉक्टर ने कहा--- कि विजिट फीस की बात बाद में, पहले तेरे बेटे का दर्द मिटाने दे,,, विजिट फीस तो उसको मिलने वाली ही है,* *किंतु सतोगुणी जीव कहता है--- कि मैं दर्द मिटा ऊगा , विजिट फीस मिले या ना मिले ।* *यह डॉक्टर अगर रजोगुणी होता तो ऐसा कहता कि दर्द मिटा ऊगा किंतु मेरी विजिट फीस दस रुपये देने पड़ेंगे* *यह डॉक्टर अगर तमोगुणी होता तो ऐसा कहता कि पहले बजट के दस रुपये रख दो फिर मैं आऊंगा।* *तीनों की विजिट फीस तो मिलेगी ही , किंतु तीनों की क्रियमाण कर्म करने की पद्धति में फर्क पड़ेगा ,* *यानी वह आदमी सतोगुणी डॉक्टर को खुश होकर ₹10 देगा और तमोगुणी डॉक्टर को मन में संकोच से ₹10 देगा* *सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी, माल खरीदने जाएं , उसमें भी ऐसा ही होता है। आप घी खरीदने जाएं तो घी का व्यापारी कहेगा--- कि भाई घी ठीक से चख लेना, सूंघ लेना, पसंद पड़े तो लेना और घी लेकर घर जाने के बाद थोड़ा इस्तेमाल करने के बाद भी पसंद नहीं पड़ेगा तो बचा हुआ कि वापस कर देना। और पैसे वापस ले जाना।* *रजोगुण वस्तु खरीदने जाओ। रेडियो, क्रोकरी ट्यूबलाइट ,इलेक्ट्रॉनिक , का सामान आदि रजोगुणी भौतिक सुख के साधन खरीदेंगे तो व्यापारी उसके बिल में छप कर ही देगा , कि माल एक दफे लेकर दुकान की सीढ़ी उतरकर घर जाने के बाद माल में किसी प्रकार का टूट-फूट अगर खराबी निकले तो माल वापस नहीं लिया जाएगा और पैसे भी वापस नहीं मिलेंगे।* *तमोगुणी चीज लेने जाओगे तो व्यापारी पहले पैसे लिए बिना माल दिखाएगा ही नहीं। सिनेमा वाला ऐसा ही कहेगा कि टिकट खिड़की से नगद पैसा देकर टिकट खरीद लो, फिर सिनेमा में अंधेरे में बैठकर अगर आपको पसंद पड़े तो देखो या चलते बनो।पैसे तो पहले ही ले लेगा* *वैद्य , वेश्या और वकील पहले पैसा हाथ में ना आने तक तो आपके साथ बात भी नहीं करेंगे , पहले पैसे रख दो फिर आपके सामने देखेंगे।* विश्राम ... क्रमश ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ