श्रीमद्भागवत

sn vyas
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9 days ago
# श्रीमद्भागवत - महापुराण श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में वर्णित 'गजेंद्र मोक्ष' की कथा केवल एक हाथी के उद्धार की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीव के अहंकार, संसार के मोह और अंततः ईश्वर की शरणागति का एक अद्भुत दर्शन है। आइए इस पावन कथा को विस्तार से समझते हैं: त्रिकूट पर्वत और गजेंद्र का वैभव क्षीरसागर के बीच में एक अत्यंत सुंदर त्रिकूट पर्वत था। उसकी तलहटी में एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली हाथियों का राजा रहता था, जिसका नाम था गजेंद्र। वह इतना बलवान था कि उसकी गंध मात्र से शेर और व्याघ्र जैसे हिंसक जीव भी दूर भाग जाते थे। एक दिन गजेंद्र अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ विहार करते हुए प्यास बुझाने के लिए एक विशाल सरोवर के पास पहुँचा। वह अपनी शक्ति के मद (अहंकार) में चूर था और सरोवर के जल में खूब क्रीड़ा करने लगा। काल रूपी 'ग्राह' का आक्रमण जब गजेंद्र अपनी पत्नियों को अपनी सूंड से जल छिड़क कर नहला रहा था, तभी अचानक एक बहुत बड़े और शक्तिशाली मगरमच्छ (ग्राह) ने पानी के भीतर से उसका पैर पकड़ लिया। * संघर्ष: गजेंद्र और ग्राह के बीच भयानक युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध एक-दो दिन नहीं, बल्कि एक हजार वर्षों तक चला। * परिणाम: पानी के भीतर मगरमच्छ की शक्ति बढ़ती गई और गजेंद्र का बल धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। जब उसके परिवार और साथियों ने देखा कि गजेंद्र हार रहा है, तो वे भी एक-एक कर उसे अकेला छोड़कर चले गए। अहंकार का पतन और पुकार जब गजेंद्र बिल्कुल असहाय हो गया और उसका शरीर पानी में डूबने लगा, तब उसे बोध हुआ कि संसार का कोई भी संबंधी या शारीरिक बल उसे मृत्यु से नहीं बचा सकता। उसका अहंकार टूट गया। तब उसे अपने पूर्व जन्म (राजा इंद्रद्युम्न) के पुण्य से भगवान विष्णु की स्तुति याद आई। उसने सरोवर से एक कमल का फूल अपनी सूंड में लिया, उसे ऊपर की ओर उठाया और अत्यंत आर्त स्वर (दुख भरी पुकार) में भगवान को पुकारा: "नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायैद्भुतकारणाय..." (हे समस्त जगत के कारण, हे निराकार प्रभु! मैं आपकी शरण में हूँ।) भगवान का आगमन और उद्धार जैसे ही गजेंद्र ने हृदय से पुकारा, भगवान विष्णु वैकुंठ में अपनी सभा छोड़कर नंगे पैर दौड़ पड़े। वे गरुड़ पर सवार होकर तुरंत उस सरोवर पर पहुंचे। * करुणा: भगवान ने देखा कि गजेंद्र डूब रहा है। उन्होंने अपनी करुणा से उसे जल से बाहर निकाला। * चक्र का प्रहार: भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का मुख फाड़ दिया और गजेंद्र को उसके चंगुल से मुक्त किया। * पूर्व जन्म का रहस्य: वह मगरमच्छ वास्तव में 'हूहू' नाम का गंधर्व था जिसे श्राप मिला था, और गजेंद्र 'इंद्रद्युम्न' नाम का राजा था। भगवान के स्पर्श से दोनों का उद्धार हो गया। इस कथा का गहरा अर्थ * सरोवर: यह संसार है। * गजेंद्र: हम सभी जीव हैं, जो अपने बल और परिवार के मोह में डूबे हैं। * ग्राह (मगरमच्छ): यह 'काल' या मृत्यु है, जिसने हमें पैरों से पकड़ रखा है। * शिक्षा: जब तक हम अपनी शक्ति पर भरोसा करते हैं, भगवान प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन जिस क्षण हम मान लेते हैं कि "प्रभु, अब मैं हार गया, केवल आप ही सहारा हो," उसी क्षण वे प्रकट हो जाते हैं।
sn vyas
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1 months ago
# श्रीमद्भागवत - महापुराण जड़भरत के पिता उन्हें पंडित बनाना चाहते थे, किंतु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे एक भी श्लोक याद न कर सके। उनके पिता ने उन्हें जड़ समझ लिया। पिता की मृत्यु के पश्चात माँ भी चल बसी। कुटुंब में रह गये भाई और भाभियाँ, जड़भरत के साथ बहुत बुरा व्यवहार करती थीं। जड़भरत इधर-उधर मजदूरी करते थे। जो कुछ मिल जाता था, खा लिया करते थे और जहाँ जगह मिलती थी, सो जाया करते थे। सुख-दु:ख और मान-सम्मान को एक समान समझते थे। भाईयों ने जब देखा कि उनके छोटे भाई के कारण उनकी अप्रतिष्ठा हो रही है, तो उन्होंने उन्हें खेती के काम में लगा दिया। जड़भरत रात-दिन खेतों की मेड़ों पर बैठकर खेतों की रखवाली करने लगे। वे शरीर से बड़े स्वस्थ और हट्टे-कट्टे थे। एक दिन राजा रहूगण पालकी पर बैठकर, आत्मज्ञान की शिक्षा लेने के लिए कपिल मुनि के पास जा रहे थे। मार्ग में पालकी के एक कहार की मृत्यु हो गई। राजा रहूगण ने अपने सेवकों से कहा कि वे कोई दूसरा कहार खोजकर लाएं। रहूगण के सेवक किसी दूसरे कहार की खोज में निकल पड़े। उनकी दृष्टि खेत की मेड़ पर बैठे हुए जड़भरत पर पड़ी। सेवक उन्हें पकड़कर ले गए। जड़भरत ने बिना कुछ आपत्ति किए हुए, कहारों के साथ पालकी कंधे पर रख ली और बहुत संभल-संभल कर चलने लगे। उनके पैरों के नीचे कोई जीव दब न जाए इसलिए उनके पैर डगमगा उठते थे। इससे राजा रहूगण को झटका लगता था, उन्हें कष्ट होता था। राजा रहूगण ने कहारों से कहा, तुम लोग किस तरह चल रहे हो? संभलकर, सावधानी के साथ क्यों नहीं चलते?’ कहारों ने उत्तर दिया, ‘महाराज, हम तो सावधानी के साथ चल रहे हैं, किंतु यह नया कहार हमारे चलने में विघ्न पैदा करता है। इसके पैर रह-रह कर डगमगा उठते हैं।’ राजा रहूगण ने जड़भरत को सावधान करते हुए कहा, तुम ठीक से क्यों नहीं चलते? देखने में तो हट्टे-कट्टे मालूम होते हो। क्या पालकी लेकर ठीक से चला नहीं जाता? सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करो, नहीं तो दंड दूँगा।’ रहूगण का कथन सुनकर जड़भरत मुस्करा उठे। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘आप शरीर को दंड दे सकते हैं, पर मुझे नहीं दे सकते, मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ। मैं दंड और पुरस्कार दोनों से परे हूँ। दंड देने की तो बात ही क्या, आप तो मुझे छू भी नहीं सकते।’ जड़भरत की ज्ञान भरी वाणी सुनकर रहूगण विस्मय की लहरों में डूब गए। उन्होंने आज्ञा देकर पालकी नीचे रखवा दी। पालकी से उतरकर कहा, ‘महात्मन, मुझे क्षमा कीजिए। कृपया बताइए आप कौन हैं? कहीं आप वे कपिल मुनि ही तो नहीं हैं जिनके पास मैं आत्मज्ञान की शिक्षा लेने जा रहा था?’ जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन! मैं न तो कपिल मुनि हूँ और न कोई ॠषि हूँ। मैं पूर्वजन्म में एक राजा था। मेरा नाम भरत था। मैंने भगवान श्रीहरि के प्रेम और भक्ति में घर-द्वार छोड़ दिया था। मैं हरिहर क्षेत्र में जाकर रहने लगा था। किंतु एक मृग शिशु के मोह में फँसकर मैं भगवान को भी भूल गया। मृगशिशु का ध्यान करते हुए जब शरीर त्याग किया, तो मृग का शरीर प्राप्त हुआ। मृग का शरीर प्राप्त होने पर भी भगवान की अनुकंपा से मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर बड़ा दु:खी हुआ कि मैंने कितनी अज्ञानता की थी! एक मृगी के बच्चे के मोह में फँसकर मैंने भगवान श्रीहरि को भुला दिया था। राजन, जब मैंने मृग शरीर का त्याग किया, तो मुझे यह शरीर प्राप्त हुआ। यह शरीर प्राप्त होने पर भी मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर कि मेरा यह जन्म व्यर्थ न चला जाए, अपने को छिपाए हुए हूँ। मैं दिन-रात परमात्मारूपी आत्मा में लीन रहता हूँ, मुझे शरीर का ध्यान बिलकुल नहीं रहता। राजन! इस जगत में न कोई राजा है न प्रजा, न कोई अमीर है, न कोई ग़रीब, न कोई कृषकाय है, न कोई स्थूलकाय, न कोई मनुष्य है, न कोई पशु। सब आत्मा ही आत्मा हैं। ब्रह्म ही ब्रह्म हैं। ‘राजन, मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए। यही मानव-जीवन की सार्थकता है। यही श्रेष्ठ ज्ञान है, और यही श्रेष्ठ धर्म है।’ रहूगण जड़भरत से अमृत ज्ञान पाकर तृप्त हो गए। उन्होंने जड़भरत से निवेदन किया, ‘महात्मन! मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।’ जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन जो मैं हूँ, वही आप हैं। न कोई गुरु है, न कोई शिष्य। सब आत्मा हैं, ब्रह्म हैं।’ जड़भरत जब तक संसार में रहे, अपने आचरण और व्यवहार से अपने ज्ञान को प्रकट करते रहे। जब अंतिम समय आया, तो चिरनिद्रा में सो गए, ब्रह्म में समा गए। यह सारा जगत ब्रह्म से निकला है और ब्रह्म में ही समा जाता है। ब्रह्म की इस लीला को जो समझ पाता है, उसी को जगत में सुख और शांति प्राप्त होती है
sn vyas
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2 months ago
# श्रीमद्भागवत - महापुराण श्रीमद्भागवत महापुराण में एक बहुत ही सुंदर और गहरी शिक्षा देने वाली कथा आती है — भक्ति महारानी और उनके दो पुत्र ज्ञान व वैराग्य की कथा। यह कथा बताती है कि कलियुग में भक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है। 🌼 भक्ति महारानी, ज्ञान और वैराग्य की कथा एक समय की बात है। देवर्षि नारद मुनि पृथ्वी पर घूम रहे थे। वे यह देखने निकले थे कि कलियुग में धर्म की क्या स्थिति है और लोग भगवान का स्मरण कितना करते हैं। घूमते-घूमते वे पवित्र भूमि वृन्दावन पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा। एक सुंदर, तेजस्वी और युवा स्त्री बैठी थी, लेकिन उसके पास दो बहुत ही बूढ़े और दुर्बल पुरुष पड़े हुए थे। वे इतने कमजोर थे कि उठ भी नहीं पा रहे थे। उस स्त्री के आसपास कई पवित्र नदियाँ उसकी सेवा कर रही थीं। नारद मुनि यह देखकर आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने उस स्त्री से पूछा— “हे देवी! आप कौन हैं? और ये दोनों बूढ़े पुरुष कौन हैं?” 🌺 भक्ति महारानी का परिचय वह स्त्री बोली— “हे नारद जी! मेरा नाम भक्ति है। ये मेरे दो पुत्र हैं — ज्ञान और वैराग्य। कलियुग के प्रभाव से ये दोनों बहुत कमजोर और बूढ़े हो गए हैं।” फिर भक्ति देवी ने अपनी जीवन यात्रा बताई। उन्होंने कहा— मेरा जन्म द्रविड़ देश (दक्षिण भारत) में हुआ। कर्नाटक में मैं बड़ी हुई। महाराष्ट्र में मुझे बहुत सम्मान मिला। लेकिन गुजरात पहुँचते-पहुँचते कलियुग के प्रभाव से मैं बूढ़ी और कमजोर हो गई। भक्ति ने आगे कहा— “जब मैं यहाँ वृन्दावन आई, तो इस पवित्र भूमि के प्रभाव से मैं फिर से युवा और सुंदर हो गई। लेकिन मेरे दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य अभी भी बूढ़े और निर्बल ही पड़े हैं।” 😔 कलियुग का प्रभाव भक्ति महारानी ने दुःखी होकर कहा— “कलियुग में लोग धन, भोग, अहंकार और विषय-वासनाओं में डूबे हुए हैं। उन्हें न ज्ञान की परवाह है और न वैराग्य की। इस कारण मेरे पुत्र बहुत कमजोर हो गए हैं।” नारद मुनि यह सुनकर बहुत दुखी हुए। 📖 नारद जी का प्रयास नारद मुनि ने सोचा कि इन दोनों को ठीक करना चाहिए। उन्होंने वेद, वेदांत और भगवद्गीता का उपदेश सुनाया। लेकिन आश्चर्य की बात यह हुई कि ज्ञान और वैराग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे वैसे ही कमजोर पड़े रहे। नारद मुनि चिंतित हो गए। 👼 सनकादिक ऋषियों का उपाय तभी वहाँ चार महान ऋषि आए— सनक सनंदन सनातन सनत्कुमार इन ऋषियों को सनकादिक कहा जाता है। उन्होंने नारद जी से कहा— “कलियुग में केवल एक ही उपाय है — भागवत कथा का श्रवण।” 📜 भागवत सप्ताह का आयोजन सनकादिक ऋषियों के कहने पर नारद मुनि ने श्रीमद्भागवत की सप्ताह कथा (भागवत सप्ताह) का आयोजन किया। जब ज्ञान और वैराग्य ने श्रद्धा से भागवत कथा सुनी, तो एक अद्भुत चमत्कार हुआ। उनका शरीर धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा उनका बुढ़ापा समाप्त हो गया वे फिर से युवा और शक्तिशाली बन गए भक्ति महारानी भी अत्यंत प्रसन्न हो गईं। 🌟 कथा की शिक्षा यह कथा हमें बहुत गहरी शिक्षा देती है— कलियुग में भक्ति सबसे बड़ी शक्ति है। जहाँ भगवान की कथा और नाम-स्मरण होता है, वहाँ ज्ञान और वैराग्य अपने-आप जाग जाते हैं। भागवत कथा सुनना और भगवान का भजन करना मनुष्य को पवित्र और जागृत बनाता है। इसलिए संत कहते हैं— “कलियुग में भगवान की भक्ति ही सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग है।”