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mytholearn
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10 hours ago
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फ्रिग – नॉर्स देवताओं की रानी, ओडिन की पत्नी, और बाल्दुर की माँ। उन्होंने अपने बेटे को अमर करने के लिए दुनिया की हर चीज़ से वादा लिया – सिर्फ एक पौधा छूट गया। और वही बन गया उसकी मौत का कारण। #mytholearn #Norse gods #देसी अंदाज #पौराणिक कथा #thor
sn vyas
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1 days ago
#भक्ति पौराणिक कथा #पौराणिक कथा #रामायण #रामायण ज्ञान #रामायण कथा क्या कभी सोचा है कि सीता स्वयंवर में पूरी दुनिया के राजा बुलाए गए, पर अयोध्या के राजा दशरथ को निमंत्रण क्यों नहीं मिला? ​इसके पीछे कोई राजनीतिक रंजिश या वैमनस्य नहीं था, बल्कि इसके पीछे छिपा था एक ऐसा सत्य जिसने राजा जनक जैसे परम ज्ञानी को भी धर्मसंकट और भय में डाल दिया था। यह कहानी है—एक शाप, एक छलनी, अयोध्या की महिमा और राजा जनक के एक छिपे हुए डर की। ​राजा जनक के शासनकाल की बात है। एक नवविवाहित युवक पहली बार अपनी ससुराल जा रहा था। रास्ते में एक दलदल था, जहाँ उसने देखा कि एक गाय फँसी हुई है। गाय की हालत ऐसी थी कि उसे निकाला नहीं जा सकता था और वह अंतिम साँसें ले रही थी। ​जल्दी में गृहस्थी के सुख की ओर बढ़ रहे उस युवक के मन में दया तो आई, लेकिन उतावलेपन में उसने एक घोर पाप कर दिया—उसने दलदल में फँसी गाय की पीठ पर पैर रखा और छलांग लगाकर आगे बढ़ गया। ​गाय ने तुरंत दम तोड़ दिया, लेकिन मरते-मरते उस पाप का फल भी दे गई। गाय की आत्मा ने शाप दिया: ​"जिस स्त्री को देखने के अति-उत्साह में तूने मुझ पर पैर रखा है, यदि तूने उसे अपनी आँखों से देखा, तो वह तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी!" ​युवक घबरा गया। ससुराल पहुँचकर वह घर के मुख्य द्वार पर अंदर की ओर पीठ करके बैठ गया। परिजनों के लाख बुलाने पर भी उसने मुँह न मोड़ा। जब उसकी नवविवाहिता पत्नी ने आकर एकांत में इसका कारण पूछा, तो उसने रोते हुए पूरी घटना बताई। ​पत्नी ने कहा, "स्वामी! यदि मेरा पतिव्रत धर्म सच्चा है, तो यह शाप आप पर निष्फल होगा। आप मेरी ओर देखिए।" ​जैसे ही पति ने अपनी पत्नी की ओर देखा, गाय के शाप का असर हुआ—पति की आँखों की रोशनी पूरी तरह चली गई! गाय की हत्या का शाप कोई साधारण बात नहीं थी। ​ ​अंधा पति और दुखी पत्नी अपनी गुहार लेकर राजा जनक के दरबार में पहुँचे। राजा जनक ने तुरंत अपने राज्य के प्रकांड विद्वानों, ज्योतिषियों और ऋषियों की सभा बुलाई। ​गहन विचार-विमर्श के बाद पंडितों ने हल निकाला: ​"यदि कोई परम पतिव्रता स्त्री एक साधारण छलनी में गंगाजल भरकर लाए और उस जल के छींटे इस व्यक्ति की आँखों पर मारे, तो गौ-हत्या के शाप का निवारण हो सकता है और इसकी दृष्टि वापस लौट सकती है।" ​राजा जनक ने पहले अपने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया, लेकिन छलनी में पानी रोकना कोई मामूली बात नहीं थी। कोई भी स्त्री इस परीक्षा में सफल न हो सकी। हारकर राजा जनक ने भारतवर्ष के अन्य सभी राज्यों में संदेश भिजवाया कि यदि उनके राज्य में कोई ऐसी परम पतिव्रता स्त्री हो, तो उसे राज-सम्मान के साथ जनकपुर भेजा जाए। ​ ​जब यह संदेश अयोध्या के महाराजा दशरथ के पास पहुँचा, तो उन्होंने अपनी रानियों से इस विषय पर चर्चा की। रानियों ने मुस्कुराते हुए कहा: ​"महाराज! आप राजमहल की बात करते हैं? अयोध्या की तो सबसे साधारण महिला, यहाँ तक कि गलियों में झाड़ू लगाने वाली स्त्री भी इतनी पवित्र और पतिव्रता है कि वह इस परीक्षा में खरी उतरेगी।" ​राजा दशरथ ने परीक्षण और अयोध्या के सामर्थ्य को सिद्ध करने के लिए राज्य की सबसे निम्न श्रेणी मानी जाने वाली एक सफाईकर्मी महिला को बुलवाया। जब उससे पूछा गया, तो उसने विनम्रता से सिर झुकाकर हाँ भर दी। ​महाराजा दशरथ ने किसी राजवंशी को भेजने के बजाय उसी सफाईकर्मी महिला को पूरे राजसी सम्मान, रथ और पालकी के साथ जनकपुर विदा किया ताकि दुनिया अयोध्या की महिमा देख सके। ​ ​जनकपुर पहुँचकर उस महिला का राजा जनक ने स्वागत किया और समस्या बताई। वह महिला निस्संकोच छलनी लेकर गंगा तट पर गई। उसने माँ गंगा का ध्यान किया और प्रार्थना की: ​"हे माँ गंगे! यदि मैंने मन, वचन और कर्म से अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष का चिंतन न किया हो और मेरा पतिव्रत धर्म सच्चा हो, तो आपकी एक बूँद भी इस छलनी से नीचे न गिरे।" ​महिला ने जल में छलनी डुबोई और उसे बाहर निकाला। चमत्कार यह हुआ कि छलनी के हज़ारों छिद्रों से भी पानी की एक बूँद नीचे नहीं गिरी! जल ऐसे जम गया मानो पारदर्शी शीशा हो। ​पूरा जनकपुर इस दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गया। महिला दरबार में आई, उसने उस अंधे युवक की आँखों पर गंगाजल के छींटे मारे और देखते ही देखते युवक की आँखों की रोशनी पूरी तरह वापस आ गई! ​ ​जब वह महिला अयोध्या लौटने के लिए राजा जनक से अनुमति माँगने लगी, तो राजा जनक ने अति-उत्सुकता और सम्मान से उसकी जाति और परिचय पूछा। महिला ने बताया कि वह अयोध्या राज्य में गलियों और महल के बाहर सफाई का कार्य करती है। ​यह सुनते ही राजा जनक के पैर तले जमीन खिसक गई। वे सोचने लगे: ​"जिस राज्य की सफाई करने वाली साधारण महिला इतनी शक्तिशाली और महा-पतिव्रता है, वहाँ के पुरुष और राजकुमार कितने शक्तिशाली और तेजस्वी होंगे? यदि अयोध्या से स्वयंवर में कोई भी साधारण व्यक्ति या सैनिक आ गया और उसने धनुष उठा लिया, तो मेरी राजकुमारी सीता का विवाह किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति या साधारण सेवक से भी हो सकता है!" ​इसी एक डर और भ्रम के कारण, जब सीता स्वयंवर का समय आया, तो राजा जनक ने दुनिया भर के राजाओं, महाराजाओं और दैत्यों तक को आमंत्रण भेजा—परंतु अयोध्या नरेश महाराजा दशरथ को आमंत्रण पत्र नहीं भेजा! ​ ​राजा जनक ने तो अपनी बुद्धि से अयोध्या को दूर रखा था, लेकिन विधाता ने तो सीता जी के लिए अयोध्या के ही जेष्ठ राजकुमार श्री राम को चुना था। ​नियति अपना खेल रच चुकी थी। महर्षि विश्वामित्र ताड़का और सुबाहु के वध के बाद श्री राम और लक्ष्मण को अपने साथ जनकपुर की रक्षा और धनुष-यज्ञ दिखाने ले गए। वहाँ जब कोई भी राजा शिव-धनुष को हिला तक न सका, तब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्री राम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और वह टूट गया। ​इस प्रकार, राजा जनक का भय भी दूर हुआ, अयोध्या की मर्यादा भी बनी रही और जगज्जननी सीता का विवाह मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के साथ संपन्न हुआ। जय श्री राम 🙏🚩
sn vyas
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2 days ago
#पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा सतयुग में एक महापराक्रमी राजा हुए, जिनका पृथ्वी के सातो द्वीपों पर एकछत्र राज्य था। उनका नाम था अम्बरीष। राजा अम्बरीष प्रजावत्सल तो थे ही, भगवान विष्णु के परम भक्त भी थे। भागवत पुराण में राजा अम्बरीष की निर्मल भक्ति का बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है। एक बार राजा अम्बरीष ने सपत्नीक एकादशी का ब्रत रखा। द्वादशी लगने पर वह व्रत का पारण करने जा ही रहे थे कि ठीक उसी समय वहां ऋषि दुर्वासा का आगमन हुआ। अब ब्राह्मण अतिथि सामने हो तो उसे भोजन को पूछे बिना पारण करना उचित नहीं माना जाता। सो राजा ने भी ऋषि दुर्वासा से भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। दुर्वासा ने कहा ठीक है, पर मैं अभी यमुना स्नान करके आता हूं। उस दिन द्वादशी थी, अर्थात एकादशी का पारण और समस्या ऐसी थी कि इंतजार में थोड़ी ही देर में अर्थात जल्द ही त्रयोदशी लगने को हो आयी। पारण द्वादशी में ही करना होता है प्रदोष लगने से पहले। दुर्वासा ऋषि फिर भी लेट हो रहे थे। अब अम्बरीष जी ने अपने पुरोहित जी से पूछा कि, प्रभु ये बताएं कि दरवाजे पर कोई अतिथि आया हो, तो हम बिना उन्हें भोजन करवाए स्वयं पारण कैसे कर सकते हैं। और ना करें, तो मुहूर्त निकला जा रहा है, ऐसे में हम करें तो क्या करें। पुरोहित जी ने कहा, राजन! अगर आप ठाकुर जी का चरणोदक ग्रहण कर लेंगे, तो आतिथ्य का अपमान भी नहीं होगा और आपकी पारण की प्रक्रिया भी पूरी हो जाएगी। राजा अम्बरीष ने वैसा ही किया, लेकिन दुर्वासा जी जब आए तो भड़क गए और गुस्से से जलते हुए कहा कि, राजन तुझे इसका दण्ड मिलेगा, और अपनी जटाओं से एक बाल उखाड़कर पृथ्वी पर पटक दिया। उससे एक भयंकर कृत्या उत्पन्न हुई और अग्नि कि ज्वाला के सामान धधकती हुई, जलाकर भस्म कर देने के लिए राजा अम्बरीष की ओर बढ़ी। लेकिन अम्बरीष इतने बड़े भगवान के भक्त थे, कि उनकी रक्षा के लिए भगवान ने स्वयं अपने सुदर्शन चक्र को नियुक्त कर रखा था। अब कृत्या जैसे ही आगे बढ़ी, राजा घबराए नहीं, अपने स्थान पर खड़े रहे। लेकिन सुदर्शन महाराज ने काम करना शुरू किया और कृत्या को जलाकर भस्म कर दिया। कृत्या को जलाने के बाद चक्र महाराज चुप नहीं बैठे, दुर्वासा जी की ओर लपके। अब दुर्वासा घबराए, लगे भागने। आगे आगे दुर्वासा जी, पीछे पीछे सुदर्शन चक्र। दुर्वासा इन्द्रादि सभी समर्थ यजमानों के पास गए, लेकिन सबने कहा, महाराज यहाँ से आप जाइए, वरना ये सुदर्शन महाराज हमें भी नहीं छोड़ेंगे। फिर शिव जी और ब्रह्मा जी के पास गये, सबने हाथ खड़े कर दिए। उन्हें विष्णु जी के पास जाने की सलाह दी। अंत में भगवान नारायण की शरण में पहुंचे दुर्वासा जी और अपने बचाव की गुहार लगाई। भगवान ने कहा, दुर्वासा मैं पूरी तरह से भक्तों के अधीन हूँ, मेरे वश में कुछ भी नहीं है। अब तुम्हें तो अम्बरीष ही बचा सकते हैं, उन्हीं के पास जाओ। अंत में दुर्वासा अम्बरीष के पास पहुचे और क्षमा याचना की। दयालु अम्बरीष ने सुदर्शन की स्तुति की तब वह शांत हुए। दुर्वासा की जान बची। 🙏🙏
mytholearn
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2 days ago
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होडर अंधा था, अकेला था, और उसकी किस्मत कभी उसकी अपनी नहीं रही। लोकी ने उसे इस्तेमाल किया, देवताओं ने उसे मार डाला। अंधक की तरह, वह अंधकार का शिकार बना। यह mytholearn पर होडर की कहानी है – जहाँ हम दुनिया की पौराणिक कथाओं को देसी अंदाज़ में पेश करते हैं। #mytholearn #Norse gods #Hodr #पौराणिक कथा #देसी अंदाज
sn vyas
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3 days ago
#पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा राजा मुचुकुंद की संपूर्ण कथा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ सूर्यवंश में अनेक महान और धर्मात्मा राजाओं का जन्म हुआ। इन्हीं में एक थे राजा मुचुकुंद। वे चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता के पुत्र और भगवान श्रीराम के पूर्वज थे। राजा मुचुकुंद सत्यनिष्ठ, पराक्रमी, दयालु और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनका जीवन धर्म, त्याग और भक्ति का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। देवताओं की सहायता एक समय असुरों का अत्याचार इतना बढ़ गया कि देवता बार-बार पराजित होने लगे। उन्होंने देवराज इंद्र के साथ भगवान ब्रह्मा से सहायता माँगी। उस समय देवताओं के पास ऐसा कोई महान योद्धा नहीं था जो लंबे समय तक असुरों का सामना कर सके। तब देवताओं ने पृथ्वी पर राज्य करने वाले राजा मुचुकुंद से सहायता की प्रार्थना की। धर्म की रक्षा को अपना कर्तव्य मानकर राजा मुचुकुंद स्वर्ग पहुँचे और देवताओं की ओर से असुरों के विरुद्ध युद्ध करने लगे। यह युद्ध कुछ दिन या कुछ वर्ष नहीं, बल्कि बहुत लंबे समय तक चलता रहा। इस दौरान राजा मुचुकुंद अपने परिवार, राज्य और सुख-सुविधाओं से पूरी तरह दूर रहे। पृथ्वी पर समय बीतता गया। उनके परिवार के लोग, मित्र और प्रजा भी काल के प्रवाह में बदल गए, परंतु राजा मुचुकुंद देवताओं की रक्षा में लगे रहे। इंद्र का वरदान अंततः भगवान कार्तिकेय देवसेना के सेनापति बने और देवताओं की रक्षा का दायित्व संभाल लिया। तब देवराज इंद्र ने राजा मुचुकुंद से कहा— "राजन! आपने देवताओं के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। हम आपके इस उपकार का प्रतिदान नहीं दे सकते। आप कोई भी वर माँगिए।" राजा मुचुकुंद अत्यंत थक चुके थे। उन्होंने कहा— "मैं बहुत वर्षों से सोया नहीं हूँ। मुझे केवल विश्राम चाहिए।" तब इंद्र ने उन्हें वरदान दिया— "आप जितनी इच्छा हो उतनी देर तक सो सकते हैं। जो भी आपकी नींद भंग करेगा, आपकी दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण भस्म हो जाएगा।" यह वरदान पाकर राजा मुचुकुंद पृथ्वी पर आए और एक विशाल पर्वतीय गुफा में जाकर गहरी निद्रा में लीन हो गए। कालयवन का जन्म और अहंकार बहुत समय बाद द्वापर युग आया। उस समय मथुरा पर भगवान श्रीकृष्ण का राज्य था। उसी समय एक अत्यंत शक्तिशाली यवन राजा कालयवन ने विशाल सेना लेकर मथुरा पर आक्रमण कर दिया। कालयवन को वरदान प्राप्त था कि उसे सामान्य अस्त्र-शस्त्र से कोई नहीं मार सकता। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने उसे युद्ध में मारने के बजाय एक दिव्य योजना बनाई। श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला भगवान श्रीकृष्ण बिना शस्त्र उठाए युद्धभूमि से निकल पड़े। कालयवन उन्हें कायर समझकर उनके पीछे दौड़ा। श्रीकृष्ण उसे पहाड़ों के बीच स्थित उसी गुफा तक ले गए जहाँ राजा मुचुकुंद युगों से सो रहे थे। गुफा के भीतर घना अंधकार था। भगवान श्रीकृष्ण एक ओर छिप गए। कालयवन ने अंधेरे में सोए हुए राजा मुचुकुंद को ही श्रीकृष्ण समझ लिया। उसने क्रोध में आकर उन्हें पैर से लात मार दी। कालयवन का अंत लात लगते ही राजा मुचुकुंद की नींद खुल गई। उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और सामने खड़े कालयवन को देखा। इंद्र के वरदान के प्रभाव से जैसे ही उनकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी, वह तुरंत अग्नि के समान जल उठा और उसी क्षण भस्म होकर राख बन गया। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने बिना अस्त्र चलाए कालयवन का अंत करा दिया। भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य चतुर्भुज स्वरूप में राजा मुचुकुंद के सामने प्रकट हुए। उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था। पीताम्बर धारण किए, वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह, गले में कौस्तुभ मणि और मुख पर मधुर मुस्कान देखकर राजा मुचुकुंद समझ गए कि ये कोई साधारण पुरुष नहीं, स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे भाव-विभोर होकर भगवान के चरणों में गिर पड़े। मुचुकुंद की प्रार्थना राजा मुचुकुंद ने कहा— "प्रभु! मैंने राज्य, वैभव और पराक्रम में जीवन व्यतीत किया, पर अब समझ आया कि संसार का सब सुख क्षणभंगुर है। आपकी भक्ति ही जीवन का सच्चा धन है। मुझे ऐसा वर दीजिए कि मेरा मन सदैव आपके चरणों में लगा रहे।" भगवान श्रीकृष्ण उनकी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा— "राजन! तुम्हारा हृदय निर्मल हो गया है। इस जन्म में तपस्या करके अपने शेष कर्मों का क्षय करो। अगले जन्म में तुम महान ब्राह्मण रूप में जन्म लेकर अंततः मुझे प्राप्त करोगे।" गंधमादन पर्वत की तपस्या भगवान के दर्शन के बाद राजा मुचुकुंद गुफा से बाहर निकले। उन्होंने देखा कि संसार पूरी तरह बदल चुका है। मनुष्य छोटे हो गए हैं, आयु कम हो गई है और युग भी बदल चुका है। उन्हें समझ आ गया कि अनेक युग बीत चुके हैं। उन्होंने संसार का त्याग कर उत्तर दिशा में स्थित गंधमादन पर्वत की ओर प्रस्थान किया। वहाँ उन्होंने वर्षों तक भगवान विष्णु का ध्यान, जप और कठोर तप किया। उनकी तपस्या से उनका मन पूर्णतः निर्मल हो गया और अंततः उन्हें भगवान की परम कृपा प्राप्त हुई। कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ धर्म की रक्षा के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए अद्भुत और अप्रत्याशित उपाय करते हैं। अहंकार का अंत निश्चित है, चाहे व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो। सांसारिक वैभव क्षणिक है, जबकि भगवान की भक्ति ही शाश्वत सुख देती है। सच्चे मन से भगवान की शरण लेने वाला अंततः मोक्ष का अधिकारी बनता है। जय श्रीकृष्ण। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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3 days ago
#पौराणिक कथा शिव धनुष पिनाक की कथा.……. राजा जनक से महर्षि विश्वामित्र ने कहा, "हे राजन्! दशरथ के इन दोनों कुमारों की इच्छा पिनाक नामक धनुष को देखने की है। अतः आप इनकी इच्छा पूर्ण करने की व्यस्था कर कीजिये।" राजा जनक के कुछ कहने से पूर्व ही रामजी ने कहा, "हे नरश्रेष्ठ! पहले आप हमें पिनाक का वृत्तान्त सुनाइये। हमने सुना है कि पिनाक शंकर जी का प्रिय धनुष है। शिव जी के पास से यह आपके पास कैसे आया?" इस पर मिथिलापति जनक बोले, "हे राम! एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बड़ा विशाल यज्ञ किया। दक्ष जी शंकर जी के श्वसुर थे। अपने जामाता से अप्रसन्न के कारण उन्होंने उस यज्ञ में न तो शिव जी को आमन्त्रित किया और न ही अपनी पुत्री सती को। पति के समझाने बुझाने की परवाह न करके सती अपने पिता के यहाँ यज्ञ में पहुँच गईं। वहाँ सती का बहुत अपमान हुआ। सती ने देखा कि देवताओं के लिये यज्ञ का जो भाग निकाला गया था उसमें शिव जी का भाग था ही नहीं। इससे क्रुद्ध होकर सतीजी ने यज्ञकुण्ड मेंकूद कर अपने प्राण त्याग दिये। महादेव जी के गणों ने, जो सतीजी के साथ राजा दक्ष के यहाँ आये थे, लौट कर महादेव जी को सारा वृत्तान्त बताया। सतीजी की मृत्यु की सूचना पाकर महादेव जी बड़े क्रुद्ध हुये। उन्होंने राजा दक्ष की यज्ञ भूमि में जाकर उस यज्ञ को नष्ट कर डाला। फिर वे अपना पिनाक नामक धनुष चढ़ा कर देवताओं को मारने के लिए अग्रसर हुए क्योंकि देवताओं ने उस यज्ञ का भाग महादेव जी को नहीं दिया था। महादेव जी का यह रौद्र रूप देखकर सारे देवता बहुत भयभीत हुये। देवताओं ने अनुनय विनय करके महादेव जी का क्रोध शान्त कराया। क्रोध शान्त होने पर महादेव जी ने पिनाक को देवताओं को दे दिया और कैलाश पर्वत पर लौट गये। "देवताओं ने उस धनुष को हमारे पूर्वपुरुष देवरात को दे दिया। तभी से वह धनुष हमारे यहाँ रखा है। हमारे पूर्वजोंका स्मृति-चिह्न होने के कारण हम इस धनुष की देखभाल सम्मान के साथ करते आ रहे हैं। इसी बीच एक बार हमारे राज्य में अनावृष्टि के कारण सूखा पड़ गया जिससे प्रजाजनों को भयंकर कष्ट का सामना करना पड़ा। उस कष्ट से मुक्ति पाने के लिये मैंने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। पुरोहितों के आदेशानुसार मैंने अपने हाथों से खेतों में हल चलाया। हल से भूमि खोदते खोदते भगवान की इच्छा से मुझे एक परम रूपवती कन्या प्राप्त हुई। उसे मैं अपने राजमहल में ले आया और उसका नाम सीता रखकर अपनी पुत्री के समान उसका लालन-पालन करने लगा। जब सीता किशोरावस्था को प्राप्त हुई तो दूर दूर तक उसके सौन्दर्य एवं गुणों की ख्याति फैलने लगी। देश- देशान्तर के राजकुमार उसके साथ विवाह करने के लिये लालायित होने लगे। मैं अद्भुत पराक्रमी योद्धा के साथ ही सीता का विवाह करना चाहता था अतः मैंने यह प्रतिज्ञा कर ली कि शिव जी के धनुष पिनाक पर प्रत्यंचा चढ़ा देने वाला वीर राजकुमार ही सीता का पति होगा। "मेरी प्रतिज्ञा की सूचनापाकर सहस्त्रों राजकुमार और राजा- महाराजा समय समय पर अपने बल की परीक्षा करने के लिये यहाँ आये किन्तु पिनाक पर प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर वे उसे तिल भर खिसका भी न सके। जब वे अपने उद्देश्यमें इस प्रकार निराश हो गये तो वे सब मिलकर मेरे राज्य में उत्पात मचाने लगे। मेरे प्रदेश को चारों ओर से घेर लिया और निरीह प्रजाजनों को लूटकर आतंक फैलाने लगे। मैंअपनी सेना को लेकर उनके साथ निरन्तर युद्ध करता रहा। वे अनेक राजा थे। उनके पास सेना भी बहुत अधिक थी। इसलिये इस संघर्ष में मेरी बहुत सी सेना नष्ट हो गई। इस पर मैंने भगवान को सहारा मान कर उनकी तपस्या की। मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने मुझे देवताओं की चतुरंगिणी सेना प्रदान की। उस सेना ने आततायी राजाओं के साथ भयंकर युद्ध किया और सभी उपद्रवी राजकुमारों को भगाया। उनके भाग जाने के बाद मैंने सोचा कि एक विशाल यज्ञ करके इस अवसर पर ही अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूँ और सीता का विवाह कर निश्चिन्त हो जाऊँ। इसी लिये मैंने इस महान यज्ञ का आयोजन किया है। "अब जो कोई भी महादेव जी के इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा देगा उसी वीर पुरुषके साथ मेँ अपनी अनुपम गुणवती पुत्री सीता का विवाह करके निश्चिन्त हो जाउँगा।
sn vyas
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4 days ago
क्या आप जानते हैं कि इस सृ #पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा ष्टि के सबसे पहले राक्षस कौन थे? अधिकांश लोग हिरण्यकश्यपु, रावण या महिषासुर का नाम लेते हैं, लेकिन सत्य इससे भी कहीं अधिक प्राचीन है। सृष्टि की रचना से पहले, जब न पृथ्वी थी, न आकाश, न सूर्य, न चंद्रमा और न ही समय का कोई अस्तित्व था, तभी दो ऐसे महादैत्यों का जन्म हुआ जिन्होंने स्वयं भगवान विष्णु को भी हजारों वर्षों तक युद्ध करने पर विवश कर दिया। उनका नाम था—मधु और कैटभ। यह कथा केवल दो दैत्यों के जन्म की नहीं, बल्कि सृष्टि की रक्षा, वेदों की महिमा और भगवान विष्णु की दिव्य बुद्धि की भी है। सृष्टि के आदि काल में चारों ओर केवल अनंत जल ही जल था। उस विराट जलराशि के मध्य अनंत शेषनाग की दिव्य शय्या पर भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा में लीन थे। उनके हृदय में संपूर्ण सृष्टि का भविष्य छिपा था, किंतु अभी सृष्टि का विस्तार प्रारंभ नहीं हुआ था। उसी समय भगवान विष्णु के कानों की मैल से दो अत्यंत विशाल, भयानक और तेजस्वी दैत्यों का जन्म हुआ। जन्म लेते ही उनका शरीर पर्वतों के समान विशाल और उनकी शक्ति असाधारण थी। भगवान की दिव्य शक्ति से उत्पन्न होने के कारण वे साधारण असुर नहीं थे। दोनों दैत्यों ने जन्म के बाद एक-दूसरे से कहा, "यदि हमें इस ब्रह्मांड में सबसे शक्तिशाली बनना है, तो हमें ऐसी शक्ति प्राप्त करनी होगी जिसे कोई देवता भी न जीत सके।" इसके बाद दोनों ने समस्त भोगों का त्याग कर महाशक्ति आदिशक्ति देवी की कठोर तपस्या आरंभ कर दी। हजारों वर्षों तक वे निरंतर तप में लीन रहे। उनका तप इतना प्रचंड था कि तीनों लोकों में उसकी आभा फैल गई। अंततः आदिशक्ति उनके सामने प्रकट हुईं और बोलीं, "वत्स, मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं। मांगो, क्या वरदान चाहते हो?" दोनों दैत्यों ने बिना विलंब किए कहा, "मां, हमें ऐसा वरदान दीजिए कि हमारी मृत्यु केवल तभी हो, जब हम स्वयं उसे स्वीकार करें।" महादेवी ने कुछ क्षण विचार किया और बोलीं, "तथास्तु। तुम्हारी इच्छा के बिना कोई भी तुम्हारा वध नहीं कर सकेगा।" यह वरदान प्राप्त होते ही मधु और कैटभ के मन में भयंकर अहंकार उत्पन्न हो गया। उन्हें लगने लगा कि अब तीनों लोकों में कोई उनका सामना नहीं कर सकता। वे जहां जाते, वहां भय और विनाश फैलने लगता। धीरे-धीरे उनका अभिमान इतना बढ़ गया कि उन्होंने स्वयं ब्रह्मा जी को चुनौती दे दी। उस समय ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना करने की तैयारी कर रहे थे। उनके पास चारों वेद थे, जिनके आधार पर संपूर्ण सृष्टि का निर्माण होना था। मधु और कैटभ वहां पहुंचे और बोले, "यदि तुम सृष्टि के निर्माता हो, तो पहले अपनी शक्ति सिद्ध करो।" ब्रह्मा जी कुछ समझ पाते, उससे पहले ही दोनों दैत्यों ने उनके हाथों से चारों वेद छीन लिए और उन्हें लेकर महासागर की अथाह गहराइयों में छिप गए। वेदों के बिना सृष्टि की रचना रुक गई। समय जैसे ठहर गया। देवताओं में चिंता फैल गई। ब्रह्मा जी ने तब भगवान विष्णु का स्मरण किया। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "हे जगतपालक, यदि वेद वापस नहीं मिले तो सृष्टि की रचना कभी प्रारंभ नहीं हो सकेगी। हमारी रक्षा कीजिए।" ब्रह्मा जी की करुण पुकार सुनते ही भगवान विष्णु ने अपनी योगनिद्रा त्याग दी। उन्होंने नेत्र खोले और संपूर्ण स्थिति को समझ लिया। वे तुरंत महासागर की ओर बढ़े, जहां मधु और कैटभ वेदों को छिपाकर बैठे थे। भगवान विष्णु ने शांत स्वर में कहा, "मधु, कैटभ, वेद सृष्टि की धरोहर हैं। उन्हें वापस लौटा दो।" दोनों दैत्य जोर से हंस पड़े। उन्होंने कहा, "अब यह वेद हमारे हैं। यदि इन्हें चाहिए, तो पहले हमें युद्ध में पराजित करो।" इसके बाद भगवान विष्णु और दोनों दैत्यों के बीच ऐसा भीषण युद्ध प्रारंभ हुआ, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। महासागर की लहरें प्रचंड हो उठीं। पर्वतों के समान प्रहार होने लगे। हजारों वर्षों तक यह युद्ध चलता रहा। भगवान विष्णु ने अपने अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन महादेवी के वरदान के कारण दोनों दैत्य बार-बार बच जाते। वे जितनी बार घायल होते, उतनी ही शक्ति से फिर खड़े हो जाते। भगवान विष्णु समझ गए कि केवल बल से इस युद्ध को नहीं जीता जा सकता। तब उन्होंने अपनी दिव्य बुद्धि का प्रयोग करने का निश्चय किया। युद्ध के बीच भगवान मुस्कुराए और बोले, "मधु और कैटभ, तुम दोनों वास्तव में अद्वितीय योद्धा हो। आज तक मैंने तुम्हारे समान पराक्रमी किसी को नहीं देखा। मैं तुम्हारे शौर्य से अत्यंत प्रसन्न हूं।" दोनों दैत्य अपने पराक्रम की प्रशंसा सुनकर अत्यंत प्रसन्न हो गए। अहंकार से भरकर बोले, "यदि तुम हमसे प्रसन्न हो, तो वरदान मांगो। आज हम तुम्हें वर देंगे।" भगवान विष्णु ने शांत स्वर में कहा, "यदि तुम सचमुच मुझे वर देना चाहते हो, तो मुझे यही वरदान दो कि तुम्हारा वध मेरे हाथों से हो।" भगवान की बात सुनते ही दोनों दैत्य एक क्षण के लिए मौन हो गए। उन्हें समझ आ गया कि वे अपनी ही वाणी के जाल में फंस चुके हैं। फिर भी वे अपने वचन से पीछे नहीं हट सकते थे। उन्होंने कहा, "हम अपना वचन नहीं तोड़ेंगे। लेकिन हमारी एक शर्त है। हमारा वध ऐसी जगह होना चाहिए जहां जल न हो, क्योंकि इस समय तो संपूर्ण सृष्टि जल से भरी हुई है।" भगवान विष्णु मुस्कुराए। उन्होंने तुरंत अपने विराट स्वरूप को धारण किया। फिर अपनी दोनों जांघों को महासागर के जल से ऊपर उठा दिया। उनकी जांघें ही उस समय जलरहित स्थान बन गईं। भगवान ने मधु और कैटभ को अपनी जांघों पर रखा और अगले ही क्षण सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। सुदर्शन चक्र बिजली की गति से घूमता हुआ आया और देखते ही देखते दोनों महादैत्यों का अंत हो गया। उनके प्राण निकलते ही महासागर शांत हो गया। देवताओं ने राहत की सांस ली। भगवान विष्णु ने तत्पश्चात चारों वेदों को सुरक्षित निकाला और उन्हें ब्रह्मा जी को सौंप दिया। ब्रह्मा जी ने वेदों को अपने हृदय से लगाया और भगवान को प्रणाम करते हुए कहा, "प्रभु, आपके बिना सृष्टि की रचना कभी संभव नहीं थी।" इसके बाद वेदों के आधार पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण प्रारंभ किया। पृथ्वी बनी, आकाश बना, सूर्य और चंद्रमा प्रकट हुए, देवता उत्पन्न हुए और जीवन का विस्तार प्रारंभ हुआ। यह कथा हमें केवल यह नहीं बताती कि मधु और कैटभ पहले राक्षस थे, बल्कि यह भी सिखाती है कि केवल बल कभी पर्याप्त नहीं होता। अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंततः वह बुद्धि, धर्म और ईश्वर की इच्छा के सामने टिक नहीं सकता। यही कारण है कि भगवान विष्णु को केवल पालनकर्ता ही नहीं, बल्कि धर्म और नीति के सर्वोच्च रक्षक भी कहा जाता है। जय श्रीहरि विष्णु। जय श्री लक्ष्मी नारायण।
sn vyas
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4 days ago
#पौराणिक अनसुनी कहानियाँ #पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण को शुकदेवजी के जन्म से पहले गर्भ में ही उनकी जमानत क्यों देनी पड़ी? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ महर्षि वेदव्यास के पुत्र, परम ज्ञानी, वैराग्य और ब्रह्मज्ञान के साकार स्वरूप श्रीशुकदेवजी का जन्म भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की सबसे अद्भुत घटनाओं में से एक माना जाता है। उनका जन्म केवल एक ऋषिपुत्र के रूप में नहीं, बल्कि संसार को यह बताने के लिए हुआ कि सच्चा ज्ञान और वैराग्य क्या होता है। महर्षि वेदव्यास ने लोककल्याण के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उन्होंने प्रार्थना की कि उन्हें ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो स्वयं समाधि के आनंद का अनुभव करे और उसी दिव्य आनंद का मार्ग संसार को दिखाए। भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर वरदान स्वीकार किया। समय आने पर व्यासजी की पत्नी वाटिका गर्भवती हुईं, किंतु यह कोई साधारण गर्भ नहीं था। एक-दो नहीं, पूरे बारह वर्ष बीत गए, फिर भी बालक ने जन्म नहीं लिया। इस दौरान व्यासजी के आश्रम में प्रतिदिन वेद, पुराण, उपनिषद और भगवान की कथाओं का श्रवण होता था। गर्भस्थ बालक सब कुछ सुनता, समझता और स्मरण कर लेता। कहते हैं कि उसने गर्भ में ही समस्त शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। समय बीतने के साथ माता को अत्यंत कष्ट होने लगा। तब महर्षि वेदव्यास ने गर्भस्थ बालक से कहा— "पुत्र! अब बाहर आओ। तुम्हारी माता अत्यधिक पीड़ा सह रही है।" गर्भ से उत्तर आया— "मैं असंख्य जन्मों में चौरासी लाख योनियों का भ्रमण कर चुका हूँ। अब मैं इस संसार में पुनः माया के बंधन में नहीं पड़ना चाहता। गर्भ में रहते हुए आत्मज्ञान, वैराग्य और पूर्वजन्मों की स्मृति बनी रहती है, लेकिन जन्म लेते ही भगवान की माया जीव को सब कुछ भुला देती है। इसलिए मैं बाहर नहीं आऊँगा।" व्यासजी ने समझाया— "तुम्हें माया स्पर्श भी नहीं करेगी। मेरी बात मानो और जन्म लेकर अपनी माता को इस कष्ट से मुक्त करो।" तब गर्भस्थ बालक ने एक अद्भुत शर्त रखी— "यदि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण यह वचन दें कि जन्म के बाद भी मैं उनकी योगमाया से मोहित नहीं होऊँगा, तभी मैं गर्भ से बाहर आऊँगा।" यह सुनकर महर्षि वेदव्यास तत्काल भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुँचे और सारी बात निवेदित की। भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण स्वयं आश्रम आए और गर्भस्थ बालक से बोले— "हे महात्मा! मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि जन्म लेने के बाद भी मेरी माया तुम्हें स्पर्श नहीं करेगी। तुम सदैव आत्मज्ञान में स्थित रहोगे। अब निश्चिंत होकर बाहर आओ।" भगवान के इस आश्वासन के बाद ही वह दिव्य बालक गर्भ से बाहर आया। आश्चर्य की बात यह थी कि वह नवजात शिशु नहीं, बल्कि लगभग बारह वर्ष के तेजस्वी कुमार के रूप में प्रकट हुआ। जन्म लेते ही उसने भगवान श्रीकृष्ण, माता-पिता को प्रणाम किया और बिना किसी मोह के वन की ओर चल पड़ा। व्यासजी ने प्रेमपूर्वक पुकारा— "पुत्र! ठहरो। तुम्हारे संस्कार तो अभी शेष हैं।" शुकदेवजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया— "पिताश्री, अनगिनत जन्मों में मैं असंख्य संस्कार करा चुका हूँ। अब मुझे केवल परमात्मा की प्राप्ति करनी है।" भगवान श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले— "यह बालक शुक (तोते) के समान मधुर वाणी वाला है। इसका नाम शुक होगा। यह जन्म से ही मोह और माया से परे है। इसे इसकी इच्छा के अनुसार जाने दीजिए।" भगवान के प्रस्थान के बाद महर्षि वेदव्यास और शुकदेवजी के बीच गहन आध्यात्मिक संवाद हुआ। व्यासजी ने गृहस्थ धर्म, संस्कार और पुत्रधर्म का महत्व बताया, जबकि शुकदेवजी ने समझाया कि केवल बाहरी कर्म, आश्रम या संबंध मुक्ति का कारण नहीं बनते। यदि ऐसा होता तो प्रत्येक गृहस्थ, प्रत्येक पुत्रवान, प्रत्येक वानप्रस्थ या प्रत्येक निर्धन व्यक्ति स्वतः ही मुक्त हो जाता। उन्होंने स्पष्ट कहा— "मुक्ति केवल आत्मज्ञान, वैराग्य, निष्काम भक्ति और परमात्मा की अनुभूति से प्राप्त होती है; केवल बाहरी आडंबरों से नहीं।" कहा जाता है कि जब व्यासजी पुत्र-मोह में उनके पीछे-पीछे वन तक पहुँचे, तब स्वयं वृक्षों ने उत्तर देकर उन्हें समझाया— "हे महर्षि! कौन किसका पिता और कौन किसका पुत्र? यह संबंध केवल शरीर और वासना तक सीमित है। जीव का वास्तविक और शाश्वत संबंध केवल परमात्मा से है।" यह सुनकर व्यासजी का मोह दूर हुआ और शुकदेवजी वन में तप एवं समाधि के लिए चले गए। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने शुकदेवजी को केवल जन्म लेने की अनुमति नहीं दी थी, बल्कि उन्हें यह दिव्य आश्वासन दिया था कि वे संसार में रहते हुए भी माया से अछूते रहेंगे। इसलिए शुकदेवजी जन्म से ही पूर्ण ब्रह्मज्ञानी और जीवन्मुक्त महापुरुष कहलाए। ॥ जय श्री कृष्ण ॥ 🙏 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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4 days ago
#पौराणिक अनसुनी कहानियाँ #पौराणिक कथा #भक्ति पौराणिक कथा राजा बलि और भक्त प्रह्लाद की मार्मिक बाते जो आपके दिल को छू लेगा जरूर पढ़े : पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद बाणासुर के लौट आने पर फिर दानव तुरंत शस्त्र लेकर देवताओं से युद्ध करने की इच्छा से लौट पड़े। अत्यधिक तेजस्वी विष्णु ने बलि के पुत्र बाण को अजेय जान करके देवताओं को बुलाकर कहा—आप लोग निर्भय होकर (सतर्कता से) युद्ध कीजिये। विष्णु से आदेश पाकर इन्द्र आदि देवता दानवों के साथ युद्ध करने लगे। किंतु विष्णु अदृश्य हो गये। विष्णु को वहाँ से चला गया जानकर शुक्र ने बलि से कहा—बले! विष्णु ने देवताओं को अकेले युद्ध के लिये छोड़ दिया है। अब तुम जय प्राप्त करो॥ दुष्टजनों को ताड़ना देने वाले भगवान् विष्णु के चले जाने पर तेजस्वी बलि पुरोहित (शुक्राचार्य)-के वाक्य से हर्षित हो गदा लेकर देवसेना की ओर दौड़ा। बाणासुर ने हजार हाथों में अस्त्र-शस्त्र लेकर देवसेना पर चढ़ाई कर दी और हजारों का वध कर दिया। मुने! बलवान् मय दानव भी माया के द्वारा विभिन्न रूपों को धारणकर अमरों की सेना के साथ युद्ध करने लगा। विद्युज्जिह्व, पारिभद्र, वृषपर्वा, शतेक्षण, विपाक तथा विक्षर भी देवताओं की सेना पर टूट पड़े॥ भगवान् विष्णु के चले जाने पर इन्द्र आदि देवता दैत्यों के द्वारा मारे जाने पर युद्ध से पराङ्मुख हो गये। तीनों लोकों पर विजय पाने की इच्छा वाले बलि एवं बाण आदि सभी (दैत्य) भागते हुए देवताओं के पीछे दौड़ पड़े। दैत्यों के द्वारा पीड़ित इन्द्र आदि देवता डरकर और स्वर्ग को छोड़कर ब्रह्मलोक चले गये। फिर तो इन्द्र के साथ ही देवताओं के ब्रह्मलोक चले जाने पर बलि अपने पुत्र, भाई और बान्धवों के साथ स्वर्गका भोक्ता हो गया॥ ब्रह्मन्! भाग्यशाली बलि इन्द्र हुआ और बाण यम बना। मय दानव वरुण बन गया, राहु चन्द्र बना और ह्राद अग्नि बन गया। केतु सूर्य बना और शुक्राचार्य बृहस्पति बन गये। इसी प्रकार अन्य विभिन्न अधिकार-प्राप्त देवताओं के पदों पर असुरों ने अधिकार जमा लिया। पाँचवें कलियुग के प्रारम्भ और द्वापरयुग के आखिरी भाग में देवताओं और दैत्योंका भयङ्कर युद्ध हुआ, जब कि बलि इन्द्र बन गया। सातों पाताल और भूः, भुवः, स्वः नामके प्रसिद्ध तीनों लोक उसके वश में हो गये थे। इस प्रकार बलि दस लोकों का शासक बन गया था॥ इन्द्र बना हुआ बलि अत्यन्त दुर्लभ भोगों को स्वयं भोगता हुआ स्वर्ग में रहने लगा। वहाँ विश्वावसु आदिगन्धर्व उसकी सेवा करने लगे। देवर्षे! तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ (उसे प्रसन्न करने के लिये) नृत्य किया करती थीं और यक्ष तथा विद्याधर आदि बाजे बजाते थे। ब्रह्मन्! विविध भोगोंका भोग करते हुए दैत्येश्वर बलिने अपने पितामह प्रह्लादका मनसे स्मरण किया। पौत्र (बलि)-के स्मरण करते ही वे महान् भागवत (विष्णु के परम भक्त) असुर प्रह्लादजी पाताल से अक्षय स्वर्गलोक में चले आये॥ उन्हें आया हुआ देखते ही बलि ने सिंहासन छोड़कर और हाथ जोड़कर उनके चरणों की वन्दना की। प्रह्लाद चरणों में पड़े हुए वीर बलि को जल्दी से उठाकर और गले लगाकर उचित सुन्दर आसन पर बैठ गये। बलि ने उनसे कहा—अये तात! मैंने आपके पुण्य-प्रसाद से (प्राप्त) पराक्रम और बलसे देवताओंको जीत लिया और इन्द्रके राज्य को छीन लिया है। तात! आप मेरे पराक्रम से जीते गये देवों वाले इन उत्तम तीनों लोकों के राज्यका भोग करें और मैं आपके सामने नौकर बनकर रहूँ॥ तात! इस प्रकार आपके चरणों की पूजा से और आपके जूठे अन्नका भोजन करने से मैं पुण्यवान् हो जाऊँगा। सत्तम! विभो! राज्य का पालन करने वाले शासक में वह धीरता नहीं होती, जो धीरता गुरु की सेवा करने वालों में होती है। द्विजोत्तम! उसके बाद प्रह्लाद ने बलि के कहे वचन को सुनकर धर्म, अर्थ और कामका साधक वचन कहा। बलिराज! मैंने पहले शत्रुओं की विघ्न-बाधा से रहित राज्य किया है। (मैं) पृथ्वी का शासन और मित्रों का सत्कार कर चुका हूँ, इच्छानुसार दान दे चुका हूँ। (गृहस्थ-धर्मके नाते) मैंने पुत्रों को भी उत्पन्न किया है। किंतु (इन सबसे शान्ति न पाकर) इस समय मैं योगसाधक बन गया हूँ॥ पुत्र! मैंने तुम्हारे दिये (राज्य)-को विधिपूर्वक ग्रहणकर पुनः तुमको दे दिया। तुम गुरुओंकी सेवा में इसी प्रकार सदा लगे रहो। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) ब्रह्मन्! ऐसा वचन कहकर (प्रह्लाद ने बलि का) दाहिना हाथ पकड़कर उसे तुरंत इन्द्र के सिंहासन पर आसीन करा दिया। महेन्द्र के सभी रत्नों से बने शुभ सिंहासन पर बैठा हुआ वह दैत्यपति बलि इन्द्र के समान शोभितहुआ। उसपर बैठने के बाद उसने विनय पूर्वक हाथ जोड़कर मेघके गर्जन के समान गम्भीर वाणी में प्रह्लाद से कहा॥ तात! तीनों लोकों की रक्षा करते हुए जो मेरे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—(इन चारों पुरुषार्थों)-के लिये करणीय कार्य है, उसके लिये आप मुझे आदेश दें। उस (बलि)-के वाक्य के साथ ही शुक्रने (भी) प्रह्लाद से कहा—महाबाहो! जो उचित हो वह उत्तर दीजिये। विष्णु के भक्त प्रह्लादने बलि और शुक्र की बात सुनकर धर्म और अर्थ से युक्त श्रेष्ठ वचन कहा—पुत्र! भविष्य के लिये जो उपयुक्त हो, संसार के लिये जो हितकारी हो और धर्म के अनुकूल जो अर्थका उपार्जन और सभी प्राणियोंके अनुकूल जो काम वर्ग का फल है एवं इस लोक और परलोक में जो कल्याणकारी कर्म हो उसका आचरण करो। महामते! तुम जैसे प्रशंसनीय बन सको तथा जैसे तुम्हें यश प्राप्त हो एवं अकीर्ति न हो वैसे ही कर्तव्य को किया करो॥ उत्तम पुरुष उत्कृष्ट लक्ष्मीकी अभिलाषा इसीलिये करते हैं कि विपत्ति में पड़ा हुआ अच्छे कुल का व्यक्ति, धनहीन मित्र, वृद्ध, ज्ञाति, गुणी ब्राह्मण एवं यशोदायिनी कीर्ति उनके गृह में शान्तिपूर्वक निवास कर सकें। अतः हे पवित्र विचार एवं चेष्टावाले पुत्र! राज्यके स्थिर हो जानेपर जैसे (उपर्युक्त) कुलोत्पन्नादि (तुम्हारे गृह में) रह सकें एवं जैसे तुम लोक में यशस्वी हो सको वैसा ही प्रयत्न करो। पृथ्वी के सदा ब्राह्मणों से सुशोभित होने, क्षत्रियों से सनाथ होने, (वैश्योंद्वारा) भली भाँति (जोते)-बोये जाने तथा सेवारत (शूद्रों)-से सम्पन्न होने पर अच्छे राजाओं को समृद्धि प्राप्त होती है॥ इसलिये (तुम्हारे शासन में) वेद-शास्त्र से सम्पन्न उत्तम ब्राह्मण राजाओं से यज्ञ करवावें एवं श्रेष्ठ द्विजगण दिव्य यज्ञ किया करें। यज्ञकी अग्नि के धूएँ से राजा को शान्ति मिलती है। बले! तपस्या और वेदाध्ययन से संयुक्त यजन और अध्यापन में लगे रहने वाले ब्राह्मण तुम्हारी अनुमति पाकर पूजित हों। दैत्येन्द्र! क्षत्रिय स्वाध्याय एवं यज्ञ में निरत, दान देनेवाले, शस्त्र-जीवी तथा प्रजा-पालन करने वाले हों। वैश्यगण यज्ञाध्ययन से सम्पन्न, दाता, कृषिकर्त्ता एवं वाणिज्यजीवी हों तथा पशुपालन का कर्म करें॥ असुरश्रेष्ठ! शूद्रगण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा में सदा लगे रहें और तुम्हारे आदेश का सदा पालन करें। दितिजेश्वर! जब सभी वर्णके लोग अपने-अपने धर्म में स्थित रहते हैं तब निश्चय ही धर्म की वृद्धि होती है और धर्मकी वृद्धि होनेपर राजाकी उन्नति होती है। इसलिये बले! तुम सभी वर्णों को उनके धर्म में सदा लगाये रहो। उसकी (स्वधर्म की) वृद्धि से राजा की वृद्धि होती है। उसकी हानि से हानि कही गयी है। महासुरेन्द्र महात्मा प्रह्लाद बलि से ऐसा कहकर मौन हो गये। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) महर्षे! उसके बाद बलि ने इस प्रकार कहा—आपने जो आदेश दिया, उसी के अनुसार मैं कार्य करूँगा॥ !!जय श्री कृष्णा!!
mytholearn
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21 days ago
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योर्द – नॉर्स कथाओं की वह देवी जो खुद धरती हैं। न तो महल, न सिंहासन – वह खुद पहाड़ हैं, नदियाँ हैं, जंगल हैं। थोर की माँ, ओडिन की पत्नी, और प्रकृति की आदिम शक्ति। #Jord #Norse gods #hindi story #desi aesthetic #नॉर्स पौराणिक कथा #पौराणिक कथा #देसी अंदाज