ram katha

sn vyas
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4 days ago
#रामायण #रामायण कथा #रामायण ज्ञान #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🔱शिवपुराण कथा📖 क्या आप जानते हैं कि जो महादेव अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से संपूर्ण सृष्टि को कंपा सकते हैं, वही महादेव भगवान श्रीराम की सेवा करने के लिए एक साधारण वानर का रूप क्यों धारण करते हैं? आखिर ऐसा क्या कारण था कि कैलाशपति भगवान शिव स्वयं अपने आराध्य श्रीराम के चरणों में समर्पित होकर हनुमान के रूप में प्रकट हुए? इस कथा को समझने के लिए हमें उस समय में जाना होगा जब लंका का राजा रावण अपनी शक्ति और वरदानों के कारण अहंकार में डूब चुका था। वह स्वयं को इतना शक्तिशाली समझने लगा था कि देवताओं तक को चुनौती देने से पीछे नहीं हटता था। लेकिन उसके अहंकार की जड़ में एक ऐसी भूल छिपी थी, जिसने अंततः उसके पूरे साम्राज्य के विनाश का मार्ग तैयार कर दिया। कथा के अनुसार, एक समय रावण अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए कैलाश पर्वत पहुंचा। कैलाश भगवान शिव का पवित्र धाम था और वहां महादेव के परम भक्त नंदी जी सदैव उनकी सेवा में रहते थे। नंदी जी का रूप वानर जैसा था। जब रावण ने नंदी जी को देखा तो उसके भीतर का अहंकार जाग उठा। उसने नंदी जी के स्वरूप का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। रावण की हंसी और उसके अपमानजनक शब्दों से नंदी जी अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने रावण को चेतावनी दी कि अहंकार में किसी भक्त का अपमान नहीं करना चाहिए। लेकिन रावण अपने बल और सामर्थ्य के मद में इतना चूर था कि उसने नंदी जी की बात को गंभीरता से नहीं लिया। तब नंदी जी ने रावण को श्राप देते हुए कहा कि जिस वानर रूप का वह आज अपमान कर रहा है, वही वानर एक दिन उसके विनाश का कारण बनेगा। रावण ने इस श्राप को सुनकर भी उसका मजाक उड़ाया। उसे लगता था कि वानर उसके जैसे महाबली राक्षस का क्या बिगाड़ सकते हैं। उसे अपने वरदानों पर इतना विश्वास था कि उसने वानरों और मनुष्यों को अपनी शक्ति के सामने नगण्य समझ लिया था। लेकिन नियति चुपचाप अपना मार्ग बना रही थी। रावण को क्या पता था कि उसके इसी अहंकार में उसके विनाश का सबसे बड़ा बीज छिपा हुआ है। समय बीता और रावण ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया। उसने अनेक शक्तिशाली प्राणियों से अपनी रक्षा मांगी। देवता, दानव और राक्षस जैसे शक्तिशाली वर्गों से सुरक्षा प्राप्त करने के बाद रावण स्वयं को लगभग अजेय समझने लगा। लेकिन उसने मनुष्यों और वानरों को अपनी दृष्टि में इतना तुच्छ समझा कि उनसे सुरक्षा मांगना आवश्यक ही नहीं समझा। यही निर्णय आगे चलकर उसके लिए सबसे बड़ी भूल साबित हुआ। क्योंकि जिस शक्ति को वह कमजोर समझ रहा था, वही उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर आने वाली थी। धरती पर रावण और उसके अत्याचारों से धर्म कमजोर होने लगा। ऋषि-मुनि भयभीत थे, देवता चिंतित थे और संसार धर्म की रक्षा के लिए किसी दिव्य शक्ति की प्रतीक्षा कर रहा था। तब भगवान विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया। श्रीराम ने मानव रूप धारण किया, क्योंकि रावण ने मनुष्यों को अपनी सुरक्षा के योग्य भी नहीं समझा था। इस प्रकार भगवान ने उसी मार्ग को चुना जिसे रावण ने अपनी बुद्धि के अहंकार में कमजोर समझकर छोड़ दिया था। जब कैलाश पर भगवान शिव को यह समाचार मिला कि उनके आराध्य भगवान विष्णु स्वयं श्रीराम के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हो चुके हैं, तो महादेव के हृदय में अपने प्रभु की सेवा करने की तीव्र इच्छा जाग उठी। शिव और राम के संबंध को लेकर भक्ति परंपराओं में अनेक सुंदर कथाएं कही जाती हैं। भगवान शिव स्वयं श्रीराम के नाम का स्मरण करने वाले माने जाते हैं और श्रीराम भी महादेव के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। इसलिए जब उनके आराध्य पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिए आए, तो महादेव भी उनकी लीला में सहभागी बनना चाहते थे। लेकिन प्रश्न था कि वे किस रूप में श्रीराम की सेवा करें? क्या वे किसी राजा के रूप में जाएं? क्या वे किसी देवता का रूप धारण करें? क्या वे किसी महान योद्धा के रूप में प्रभु के साथ खड़े हों? महादेव के लिए इनमें से कोई भी रूप उस भाव को पूर्ण नहीं कर सकता था जिसे वे अपने हृदय में लेकर श्रीराम की सेवा करना चाहते थे। वे प्रभु के सामने अपनी शक्ति दिखाना नहीं चाहते थे। वे तो केवल सेवक बनना चाहते थे। उन्हें ऐसा रूप चाहिए था जिसमें पद, प्रतिष्ठा और अहंकार का कोई स्थान न हो। उसी समय माता अंजनी भगवान शिव की आराधना कर रही थीं। उनकी तपस्या अत्यंत श्रद्धापूर्ण थी। भक्ति परंपरा के अनुसार, माता अंजनी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके पुत्र रूप में अपने अंश के प्रकट होने का संकल्प किया। इसी दिव्य संकल्प से हनुमान जी के अवतरण की कथा जुड़ी है। धार्मिक परंपराओं में हनुमान जी को भगवान शिव का अंश या रुद्रावतार माना जाता है और कई परंपराओं में उन्हें एकादश रुद्र से भी जोड़ा जाता है। इस प्रकार महादेव ने स्वयं के लिए किसी राजसी रूप का चयन नहीं किया। उन्होंने वानर रूप को स्वीकार किया। क्योंकि उनके लिए यह रूप शक्ति के प्रदर्शन का नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण का प्रतीक बनने वाला था। हनुमान जी के रूप में भगवान शिव ने संसार को यह संदेश दिया कि सबसे बड़ी शक्ति वह नहीं है जो दूसरों को पराजित कर दे, बल्कि वह है जो अपनी सारी शक्ति अपने आराध्य की सेवा में समर्पित कर दे। बाल रूप में हनुमान जी असाधारण तेज और शक्ति से संपन्न थे। उनके भीतर अपार सामर्थ्य था, लेकिन उनका हृदय अत्यंत सरल था। बचपन से ही उनमें अद्भुत उत्साह और निर्भीकता दिखाई देती थी। उनकी बाल लीलाओं में उनकी असाधारण शक्ति के दर्शन होते हैं, लेकिन आगे चलकर जब उन्हें श्रीराम की सेवा का अवसर मिला, तब उनकी सारी शक्ति एक ही उद्देश्य में लग गई—प्रभु की सेवा। जब श्रीराम वनवास के दौरान सीता जी की खोज में निकले और उनकी भेंट हनुमान जी से हुई, तब दोनों के बीच ऐसा संबंध बना जिसे भक्ति परंपरा में अद्वितीय माना जाता है। हनुमान जी ने जब पहली बार श्रीराम को देखा, तो उनके हृदय ने अपने आराध्य को पहचान लिया। श्रीराम ने भी हनुमान जी के ज्ञान, विनम्रता, वाणी और समर्पण को देखकर उन्हें अपने हृदय के अत्यंत निकट स्थान दिया। इसके बाद हनुमान जी की हर सांस श्रीराम के कार्य के लिए समर्पित हो गई। समुद्र के किनारे जब वानर सेना सीता जी की खोज के लिए खड़ी थी और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि विशाल समुद्र को पार करके लंका कौन जाएगा, तब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। हनुमान जी ने प्रभु श्रीराम का नाम लिया और उनका आत्मविश्वास जाग उठा। उन्होंने विशाल समुद्र को पार किया और लंका पहुंचकर माता सीता का पता लगाया। हनुमान जी के सामने उस समय लंका की पूरी शक्ति थी। लेकिन उनके मन में अपने बल का अहंकार नहीं था। वे बार-बार यही सोचते थे कि मैं कुछ नहीं कर रहा, यह सब मेरे प्रभु श्रीराम की कृपा से हो रहा है। यही भावना उनके चरित्र को अद्वितीय बनाती है। जिस महाशक्ति के बारे में कहा जाता है कि वह पर्वत उठा सकती है, समुद्र पार कर सकती है और राक्षसों की विशाल सेना का सामना कर सकती है, वही शक्ति अपने हर कार्य का श्रेय अपने प्रभु को देती है। जब हनुमान जी ने माता सीता को श्रीराम की अंगूठी दी और प्रभु का संदेश सुनाया, तब उन्हें विश्वास हुआ कि श्रीराम उन्हें अवश्य मुक्त कराने आएंगे। इसके बाद हनुमान जी ने लंका में अपने पराक्रम का परिचय दिया और वापस लौटकर श्रीराम को माता सीता का समाचार दिया। आगे चलकर जब श्रीराम और रावण के बीच युद्ध हुआ, तब हनुमान जी केवल एक योद्धा नहीं रहे। वे पूरी सेना के लिए आशा, साहस और विश्वास का आधार बन गए। युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण जी गंभीर संकट में पड़े, तब हनुमान जी जीवनदायिनी औषधि की खोज में पर्वत की ओर गए। जब उन्हें सही औषधि पहचानने में कठिनाई हुई तो उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया और युद्धभूमि में ले आए। यह प्रसंग बताता है कि जब सेवा के मार्ग में कोई बाधा आती है तो सच्चा सेवक रास्ते की कठिनाई देखकर रुकता नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य को पूरा करने का मार्ग खोज लेता है। अंततः श्रीराम की सेना ने रावण की विशाल शक्ति का सामना किया। जिस रावण ने कभी नंदी जी के वानर रूप का मजाक उड़ाया था, उसी रावण के सामने वानर सेना खड़ी थी। जिस शक्ति को उसने तुच्छ समझा था, वही शक्ति अब उसके अहंकार को चुनौती दे रही थी। इस प्रकार नंदी जी के श्राप से जुड़ी लोकमान्यता और रावण के वरदान की भूल, दोनों का अद्भुत मेल श्रीराम की लीला में दिखाई देता है। युद्ध का अंत हुआ और रावण का अहंकार समाप्त हुआ। श्रीराम की विजय हुई और धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। हनुमान जी ने इस पूरे प्रसंग में असाधारण पराक्रम दिखाया, लेकिन विजय के बाद भी उनके भीतर अभिमान नहीं आया। उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने कितने राक्षसों का सामना किया या कितने कठिन कार्य पूरे किए। उनके लिए सबसे बड़ा सौभाग्य यही था कि उन्हें श्रीराम की सेवा करने का अवसर मिला। इसीलिए जब पूछा जाता है कि महादेव ने वानर का रूप क्यों चुना, तो इस कथा का सबसे सुंदर उत्तर यही माना जाता है कि उन्होंने शक्ति दिखाने के लिए नहीं, सेवा करने के लिए यह रूप स्वीकार किया। उन्होंने संसार को बताया कि भगवान के सबसे निकट पहुंचने का मार्ग हमेशा सामर्थ्य का प्रदर्शन नहीं होता। कभी-कभी अपने अहंकार को पूरी तरह छोड़कर स्वयं को प्रभु के चरणों में समर्पित करना ही सबसे बड़ी साधना होती है। हनुमान जी के चरित्र में इसी कारण शक्ति और विनम्रता दोनों साथ दिखाई देती हैं। वे पर्वत उठा सकते हैं, लेकिन प्रभु के सामने हाथ जोड़कर खड़े होते हैं। वे समुद्र पार कर सकते हैं, लेकिन अपनी सफलता का श्रेय स्वयं को नहीं देते। वे बड़े-बड़े संकटों का सामना कर सकते हैं, लेकिन अपने हृदय में केवल श्रीराम का नाम रखते हैं। यही कारण है कि भक्तों के लिए हनुमान जी केवल शक्ति के देवता नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा और अटूट भक्ति के सबसे सुंदर प्रतीक हैं। इस कथा का सबसे बड़ा संदेश भी यही है कि संसार में शक्ति मिलना बड़ी बात नहीं है, उस शक्ति का सही उपयोग करना बड़ी बात है। ज्ञान हो तो विनम्रता के साथ, धन हो तो सेवा के लिए, सामर्थ्य हो तो दूसरों की सहायता के लिए और भक्ति हो तो बिना किसी स्वार्थ के प्रभु के चरणों में समर्पित करने के लिए। रावण के पास शक्ति थी, लेकिन उसके साथ अहंकार जुड़ गया और वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया। हनुमान जी के पास भी अपार शक्ति थी, लेकिन उसके साथ विनम्रता और भक्ति जुड़ी थी और यही उन्हें महान बनाती है। इसलिए हनुमान जी की कथा हमें यह याद दिलाती है कि सच्ची महानता इस बात में नहीं कि दुनिया हमें कितना शक्तिशाली मानती है, बल्कि इस बात में है कि हम अपनी शक्ति का उपयोग किसके लिए करते हैं। महादेव ने स्वयं को सेवक बनाया और हनुमान जी के रूप में यह संदेश दिया कि प्रभु के चरणों में समर्पित सेवा से बड़ा कोई पद नहीं है। इसी भाव के साथ भक्त आज भी हनुमान जी को श्रीराम का सबसे प्रिय सेवक और अनन्य भक्त मानकर उनका स्मरण करते हैं। अगर आपके हृदय में भी श्रीराम और हनुमान जी के प्रति श्रद्धा है, तो पूरे विश्वास और प्रेम से बोलिए—जय श्रीराम, जय बजरंगबली, हर हर महादेव।
sn vyas
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7 days ago
#रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान *क्या आपको पता है,रघुवंश के पहले चक्रवर्ती राजा। *अयोध्या के सम्राट। जिनके वंश में राम पैदा हुए,उन्हे गाय क्यों चरानी पड़ी? 😱 🔥 एक समय ऐसा आया कि ये चक्रवर्ती राजा जंगल में गाय चराने लगे। मुकुट उतार दिया, धनुष रख दिया। हाथ में लाठी ली। 🌺 क्योंकि गुरु वशिष्ठ ने कहा था,पुत्र चाहिए तो नंदिनी की सेवा करो।" नंदिनी कौन? *कामधेनु की पुत्री* कामधेनु, जो सब इच्छा पूरी करती है। वंशावली:- मनु → इक्ष्वाकु → विकुक्षि → दिलीप → रघु → अज → दशरथ → राम। मतलब राम जी के परदादा के पिता। रघुवंश शिरोमणि राजा दिलीप, 😱 *कथा:- राजा बूढ़े हो रहे थे। सिंहासन का वारिस नहीं। कुल का दीपक बुझ रहा था। रानी सुदक्षिणा छुप-छुपकर रोतीं। दिलीप रातों को जागते। मंत्री कहते: "दूसरा विवाह कर लो।" राजा कहते,"सुदक्षिणा मेरी आत्मा है। दूसरी पत्नी नहीं, पुत्र चाहिए।" राज्य, यश, पत्नी। पर 'वारिस' नहीं था। राजा दिलीप- सुदक्षिणा गुरु वशिष्ठ के आश्रम गए,और पैरों में गिर पड़े, "गुरुदेव, पुत्र दे दो। कुल डूब जाएगा।" वशिष्ठ ने आँखें बंद कीं। ध्यान से देखा। बोले: "राजन, तुम्हें गौ-हत्या का शाप है। याद करो, एक बार तुम इंद्र से मिलकर लौट रहे थे। रास्ते में कामधेनु बैठी थी। तुम रथ पर थे। अभिमान में झुके नहीं। प्रणाम नहीं किया। कामधेनु ने शाप दिया 'जिस कुल को आगे बढ़ाना चाहता है, वो आगे नहीं बढ़ेगा'।" दिलीप चौंके: "गुरुदेव, मुझे याद नहीं। अनजाने में हुआ।" वशिष्ठ: "अनजाने का पाप भी पाप है। पर उपाय है। कामधेनु की पुत्री नंदिनी मेरे आश्रम में है। 21 दिन उसकी सेवा करो। वो प्रसन्न हुई, तो शाप कटेगा।" शर्त ये है,खुद चराओगे, नौकर नहीं। जहाँ वो बैठे, तुम बैठो। जहाँ वो चले, तुम चलो। शेर आए, तो पहले तुम्हारा शरीर जाएगा, फिर गाय का, राजा ने स्वीकार कर लिया। दिलीप ने मुकुट उतारा। रानी से बोला: "21 दिन मैं राजा नहीं, ग्वाला हूँ।" सुबह: ब्रह्ममुहूर्त में उठते। नंदिनी को प्रणाम करते उसका गोबर उठाते, गौ-मूत्र से धरती पवित्र करते। दोपहर: जंगल ले जाते। नंदिनी जहाँ घास खाए, वहीं बैठते। धूप, बारिश सहते। शाम: नंदिनी को पानी पिलाते, पैर दबाते। खुर में कांटा देखते तो मुँह से निकालते। रात: जब नंदिनी सो जाए, तब सोते। वो भी उसके पास, जमीन पर। रानी सुदक्षिणा मिलने आतीं। रोतीं: "महाराज, आप चक्रवर्ती। ये क्या हाल?" दिलीप: "रानी, पुत्र चाहिए तो 'पुत्र-धर्म' निभाना होगा। गाय माता है। माता की सेवा से ही माता बनोगी।" 20 दिन बीत गए। नंदिनी ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिलीप को डर "कहीं सेवा में कमी तो नहीं?" 21वां दिन। आखिरी दिन। दिलीप खुश आज शाप कटेगा।" नंदिनी चरते-चरते हिमालय की तराई में चली गई। एक गुफा के पास पहुंची। तभी *दहाड़* एक विशाल सिंह कूदा। सीधा नंदिनी पर झपटा। दिलीप ने धनुष उठाया। प्रत्यंचा चढ़ाई। पर *हाथ जम गया* शरीर लकवा मार गया। मंत्र भूल गए। अस्त्र नहीं चला। सिंह बोला: "राजा दिलीप, मैं शिव का सेवक हूँ। इस पहाड़ की रक्षा करता हूँ। ये गाय मेरा भोजन है। तू बाण नहीं चला सकता। वरदान है मुझे। जा, लौट जा।" दिलीप ने धनुष फेंका। सिंह के आगे लेट गए। बोले: "गौ-माता को छोड़ दे। उसके बदले मुझे खा ले। मेरा मांस, रक्त, हड्डी सब तेरी। पर गौ-हत्या का पाप मेरे जीते-जी नहीं होगा। मैंने वचन दिया है — पहले मेरा शरीर, फिर नंदिनी।" आँख बंद कर ली। मृत्यु का इंतजार। तभी फूल बरसे। शरीर का लकवा खुला। आँख खोली। न सिंह था, न गुफा। सामने नंदिनी दिव्य रूप में खड़ी। कामधेनु जैसी, पर छोटी। बोली: "उठो पुत्र दिलीप, ये माया थी, तुम्हें परखा सिंह ने नहीं, मैंने था। तुम्हारा हाथ मैंने ही जकड़ा था देखना था तुम बाण चलाते हो या जान देते हो।" "तुम पास हुए। गौ-शाप कट गया। वर माँगो।" दिलीप पैरों में गिर पड़े, बोले "माता, पुत्र चाहिए। रघुकुल का दीपक।" नंदिनी: "तथास्तु। तुम्हें पुत्र होगा ,*रघु* वो इतना प्रतापी होगा कि तुम्हारा वंश 'रघुवंश' कहलाएगा। वो इंद्र को भी हरा देगा। जाओ, रानी सुदक्षिणा को ये दूध पिलाओ।" नंदिनी ने दूध का पात्र दिया। 🙏 दिलीप आश्रम लौटे। सुदक्षिणा को दूध पिलाया। 9 महीने बाद पुत्र जन्म। नाम रखा *रघु* क्योंकि 'रघु' माने 'वेगवान' ये बालक पैदा होते ही इतना तेजस्वी था कि सूर्य भी शरमा जाए। बड़े होकर रघु ने दिग्विजय की, चारों दिशा जीती स्वर्ग पर चढ़ाई की इंद्र डरकर भागा इसीलिए कुल 'रघुवंश' कहलाया। रघु → अज → दशरथ → राम। मतलब: अगर दिलीप 21 दिन गाय न चराते, तो राम न होते, राम के जन्म की पहली सीढ़ी 'गौ-सेवा' थी। जय श्रीराम 🚩
sn vyas
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7 days ago
#रामायण #रामायण कथा #रामायण ज्ञान रामायण के सात काण्ड - मानव की उन्नति के सात सोपान 1 बालकाण्ड 👉 बालक प्रभु को प्रिय है क्योकि उसमेँ छल ,कपट , नही होता । विद्या , धन एवं प्रतिष्ठा बढने पर भी जो अपना हृदय निर्दोष निर्विकारी बनाये रखता है , उसी को भगवान प्राप्त होते है। बालक जैसा निर्दोष निर्विकारी दृष्टि रखने पर ही राम के स्वरुप को पहचान सकते है। जीवन मेँ सरलता का आगमन संयम एवं ब्रह्मचर्य से होता है। बालक की भाँति अपने मान अपमान को भूलने से जीवन मेँ सरलता आती है।बालक के समान निर्मोही एवं निर्विकारी बनने पर शरीर अयोध्या बनेगा । जहाँ युद्ध, वैर ,ईर्ष्या नहीँ है , वही अयोध्या है। 2. अयोध्याकाण्ड 👉 यह काण्ड मनुष्य को निर्विकार बनाता है l जब जीव भक्ति रुपी सरयू नदी के तट पर हमेशा निवास करता है, तभी मनुष्य निर्विकारी बनता है। भक्ति अर्थात् प्रेम , अयोध्याकाण्ड प्रेम प्रदान करता है । राम का भरत प्रेम , राम का सौतेली माता से प्रेम आदि ,सब इसी काण्ड मेँ है ।राम की निर्विकारिता इसी मेँ दिखाई देती है । अयोध्याकाण्ड का पाठ करने से परिवार मेँ प्रेम बढता है । उसके घर मेँ लडाई झगडे नहीँ होते । उसका घर अयोध्या बनता है । कलह का मूल कारण धन एवं प्रतिष्ठा है । अयोध्याकाण्ड का फल निर्वैरता है ।सबसे पहले अपने घर की ही सभी प्राणियोँ मेँ भगवद् भाव रखना चाहिए। 3. अरण्यकाण्ड 👉 यह निर्वासन प्रदान करता है ।इसका मनन करने से वासना नष्ट होगी । बिना अरण्यवास (जंगल) के जीवन मेँ दिव्यता नहीँ आती l रामचन्द्र राजा होकर भी सीता के साथ वनवास किया । वनवास मनुष्य हृदय को कोमल बनाता है । तप द्वारा ही कामरुपी रावण का बध होगा । इसमेँ सूपर्णखा (मोह ) एवं शबरी (भक्ति) दोनो ही है। भगवान राम सन्देश देते हैँ कि मोह को त्यागकर भक्ति को अपनाओ । 4. किष्किन्धाकाण्ड 👉 जब मनुष्य निर्विकार एवं निर्वैर होगा तभी जीव की ईश्वर से मैत्री होगी । इसमे सुग्रीव और राम अर्थात् जीव और ईश्वर की मैत्री का वर्णन है। जब जीव सुग्रीव की भाँति हनुमान अर्थात् ब्रह्मचर्य का आश्रय लेगा तभी उसे राम मिलेँगे । जिसका कण्ठ सुन्दर है वही सुग्रीव है। कण्ठ की शोभा आभूषण से नही बल्कि राम नाम का जप करने से है। जिसका कण्ठ सुन्दर है , उसी की मित्रता राम से होती है किन्तु उसे हनुमान यानी ब्रह्मचर्य की सहायता लेनी पडेगी । 5. सुन्दरकाण्ड 👉 जब जीव की मैत्री राम से हो जाती है तो वह सुन्दर हो जाता है । इस काण्ड मेँ हनुमान को सीता के दर्शन होते है। सीताजी पराभक्ति है , जिसका जीवन सुन्दर होता है उसे ही पराभक्ति के दर्शन होते है ।संसार समुद्र पार करने वाले को पराभक्ति सीता के दर्शन होते हैl ब्रह्मचर्य एवं रामनाम का आश्रय लेने वाला संसार सागर को पार करता है । संसार सागर को पार करते समय मार्ग मेँ सुरसा बाधा डालने आ जाती है , अच्छे रस ही सुरसा है , नये नये रस की वासना रखने वाली जीभ ही सुरसा है। संसार सागर पार करने की कामना रखने वाले को जीभ को वश मे रखना होगा । जहाँ पराभक्ति सीता है वहाँ शोक नही रहता , जहाँ सीता है वहाँ अशोकवन है। 6. लंकाकाण्ड 👉 जीवन भक्तिपूर्ण होने पर राक्षसो का संहार होता है काम क्रोधादि ही राक्षस हैँ । जो इन्हेँ मार सकता है , वही काल को भी मार सकता है जिसे काम मारता है उसे काल भी मारता है , लंका शब्द के अक्षरो को इधर उधर करने पर होगा कालं । काल सभी को मारता है l किन्तु हनुमान जी काल को भी मार देते हैँ । क्योँकि वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैँ पराभक्ति का दर्शन करते है । 7. उत्तरकाण्ड 👉 इस काण्ड मेँ काकभुसुण्डि एवं गरुड संवाद को बार बार पढना चाहिए । इसमेँ सब कुछ है । जब तक राक्षस , काल का विनाश नहीँ होगा तब तक उत्तरकाण्ड मे प्रवेश नही मिलेगा । इसमेँ भक्ति की कथा है । भक्त कौन है ? जो भगवान से एक क्षण भी अलग नही हो सकता वही भक्त है । पूर्वार्ध मे जो काम रुपी रावण को मारता है उसी का उत्तरकाण्ड सुन्दर बनता है , वृद्धावस्था मे राज्य करता है । जब जीवन के पूर्वार्ध मे युवावस्था मे काम को मारने का प्रयत्न होगा तभी उत्तरार्ध - उत्तरकाण्ड सुधर पायेगा । अतः जीवन को सुधारने का प्रयत्न युवावस्था से ही करना चाहिए। जय श्री राम जय श्री सीताराम जय श्री लखन जय श्री हनुमान
sn vyas
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13 days ago
#रामायण जौं न होत जग जनम भरत को 〰️〰️🔸〰️〰️〰️🔸〰️〰️ पूरे " श्रीरामचरितमानस " में भरत के चरित्र को गोस्वामी बाबा तुलसीदास जी ने बेमसाल गौरव दिया है । जहाँ उन्होंने राम को साक्षात् ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित किया है , वहीं श्रीभरतलाल जी को मूर्तिमन्त भक्त के रूप में । जहाँ राम दुस्सह वेदना को सहकर भी मर्यादा की स्थापना करते हुए दिखाई देते हैं , वहाँ श्रीभरत जी उनके अनुपम सहयोगी बनकर खड़े हो जाते हैं । श्रीराम जी यदि सम्पूर्ण सत्त्व के साथ खिले हुए फूल हैं तो श्रीभरतलाल जी वह उर्वर भूमि हैं , जो नायाब फूल खिलने का अवसर और गौरव प्रदान करती है । श्रीराम के चरित्र को आकाश - सी ऊँचाई इसीलिए मिल सकी , क्योंकि उसे श्रीभरतलाल जी के त्यागमय एवं निस्वार्थ जीवन की ठोस जमीन प्राप्त थी । श्रीराम जी हमेशा श्रीभरतलाल जी को अपने मन - प्राण में बसाकर रखते हैं और श्रीभरत जी की साँसों की हर धड़कन श्रीराम को समर्पित होती है । लौकिक दृष्टि से देखें तो भाई के रूप में राम और भरतलाल जी का एक - दूसरे के प्रति व्यवहार परिवार को स्वर्ग बनाने के लिए एक श्रेष्ठ उदाहरण है । मानवीय सम्बन्धों की कोई तथा इतनी प्रेरक और प्रभावपूर्ण नहीं है । श्रीभरतलाल जी राम के लिए बड़े - से - बड़ा त्याग करने में भी हिचकिचाये नहीं । उन्होंने चौदह वर्षों तक तपस्वी का जीवन व्यतीत किया था । अवसर होते हुए भी जीवन के समस्त सुखोपभोगों को हीन और हेय समझकर ठुकरा दिया था । लौकिक जीवन का प्रेम ही आध्यात्मिक जीवन में भक्ति बनता है । जैसे प्रेम से मानवीय सम्बन्धों को उष्मता और ताजगी मिलती है वैसे ही भक्ति से दैवी सम्बन्धों में एकात्मता स्थापित होती है । भक्त भगवान् में समर्पित और लय होता है । प्रेम का रूपान्तरण ही भक्ति है । भरत भाई के रूप में प्रेम के श्रेष्ठ प्रतीक हैं और भक्त के रूप में भक्ति के अन्यतम उदाहरण हैं । वे हमारे जीवन के दोनों पक्षों को ऊँचाई प्रदान करते हैं। तुलसी बाबा ने भरत जी का चरित्र गाते समय उनके चरित्र के इन दोनों पक्षों को खूब निखारा है । भगत पग - पग पर भाई के रूप में हमें श्रेष्ठ पारिवारिक सम्बन्धों की सीख देते हैं और भक्त के रूप में प्रभु के लिये कुछ भी न्योछावर करने की उदात्त कामना हमारे भीतर जगाते हैं । इसी कारण भरत जी का चरित्र गंगा जैसा पवित्र बन गया है । राम हमेशा उन्हें अपने हृदय में बराये रखते हैं । जब राम किसीके प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हैं तो उसे " भरतहि सम भाई " कहकर पुकारते हैं । भरत को मिला यह गौरव मानवीय सम्बन्धों और आध्यात्मिक उपलब्धियों का चरम बिन्दु है । श्रीरामकथा में भरत का चरित्र सबसे अधिक विवादास्पद हो सकता था , लेकिन वाबा तुलसी ने उसे सर्वाधिक विश्वसनीय बना दिया है । जिस परिस्थिति में कैकयी ने दशरथ से भरत के लिए राज्य और राम के लिए वनवास माँगा था , उसमें कोई भी सासानी से यह अटकल भिड़ा सकता था कि भरत का भी उसमें हाथ था । इसके लिए उपयुक्त तर्क खोजना भी कठिन नहीं था । भरत के विरोधियों या यूँ कहें कि राम के समर्थकों को भी कोई - न - कोई मन्थरा मिल ही सकती थी । लेकिन पूरे " श्रीरामचरितमानस " में भर का चरित्र इस प्रकार उभरकर सामने आया है कि कोई स्वप्न में भी नहीं सोच पाता कि कैकेयी के विचारों में भरत की सम्मति है । इतना ही नहीं , यह विश्वसनीयता इस सीमा तक दृढ बन गयी कि भरत के चरित्र पर आक्षेप लगानेवाले को लोग दुत्कार कर भगा देते ; उसे संसार का घोर पातकी करार देते । भरत के चरित्र को आरम्भ से ही बाबा तुलसी इस प्रकार गढ़ते हैं कि भरत के प्रति कोई आरोप या आक्षेप की भावना से सोच ही नहीं पाता है । प्रत्येक पात्र भरत की प्रशंसा करते नहीं अघाता । यदि केवल कैकयी ही भरत की बड़ाई करतीं , तो वे रामकथा में एक खलानायक बनकर रह जाते । यदि केवल राम ही वन जाते समय भरत की बड़ाई करते , तो यह केवल राम का शिष्टभाव या बड़प्पन ही होता । यदि बाबा तुलसी चित्रकूट में राम- भरत मिलाप के अवसर पर भरत के बारे में दो - चार अच्छे शब्द लिख देते तो यह भरत के प्रति तुलसी की कवि - सुलभ करुणा होती । इससे भरत का अनुकरणीय व्यक्तित्व नहीं उभरता । तब भरत के प्रति हम किंचित् द्रवित होते , उनसे हमें प्रेरणा नहीं मिलती । भरत के चरित्र को बाबा तुलसी बाहर से नहीं , भीतर से सँवारते हैं ; उसे बड़ी सहजता और स्वाभाविकता से उभारते हैं । जैसे राम का नाम - स्मरण सुखदायी है उसी तरह भरत का नाम पवित्र बनानेवाला है । इसका कारण साफ है । भरत राम को प्राणों से भी प्रिय हैं । जिसे राम प्रिय हों, वही महान् बन जाता है ; किन्तु जो राम को प्रिय हो , उसकी महानता का कहना ही क्या ! भरत में दोनों गुण घुले - मिले हैं । राम तो उन्हें प्रेम करते ही हैं , साथ - ही - साथ भरत को भी राम प्राणाधिक प्रिय हैं । जो राम का प्रिय हो या जिसे राम प्यारे हों उसपर कोई आक्षेप लगाना, उसके बारे में अनुचित बोलना राम का अपमान होगा , राम की भक्ति का अपमान होगा । इससे सत्कर्म नष्ट तो होंगे ही , पाप भी बढ़ेगा । धर्म का यही मूलाधार है । जब भक्त प्रभुमय हो जाता है तब उसके समूचे चरित्र में प्रभुता प्रकाशित हो उठती है । भरत की स्थिति भी यही थी । राम उनके मन - प्राण में बसे थे । इसीलिए वे राममय हो उठे थे । उनकी सिद्धि की महिमा इतनी मुखर थी कि इस स्थिति से हर एक परिचित था । सभी भरत राममय रूप को पहचानते थे । यह पहचान इतनी गहरी और विश्वस्त है कि इसे कैकेयी का पाप छू भी नहीं सका । भरत का चरित्र यदि चन्दन - सा नहीं होता तो अयोध्या का सर्वनाश हो जाता । राजभवन कैकेयी के अहंकार से जल उठता और प्रजाजन राम एवं भरत का पक्ष लेकर मर मिटते । कोई कुछ भी बचा पाने में समर्थ नहीं होता । लेकिन भरत के दैवी चरित्र ने सबकुछ बचा लिया । उत्पात , उपद्रव और वैमनस्य के दानव अयोध्याजी को छू भी नहीं सके । प्रेम का देवता सबके हृदयों में भरत के चरित्र का चन्दन बनकर गमकता रहा। अपने चरित्र से भरत ने हर एक को पवित्र बनाया । पूरी कलंक – कथा में माँ कैकेयी सबसे अधिक अपराधिनी दिखाई दे रही थीं । उनके मुख पर जो कालिख लगी थी , उसका धुल पाना सहज स्थिति में असम्भव लगता था । लेकिन भरत जी ने अपने शील - स्नेह से उन्हें भी एक सहानुभूति योग्य चरित्र बना दिया । भरत के ऐसे देवोपम चरित्र की महिमा गाते हुए तुलसी बाबा थकते नहीं हैं । " श्रीरामचरितमानस " के आरम्भ में सबको वन्दना करते समय वह भरत जी को सबसे अधिक सम्मान देते हैं – प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना । जासु नेम ब्रत जाइ न बरना ॥ - सबसे पहले मैं भरत के चरणों को प्रणाम करता हूँ , जिनका विनय और व्रत वर्णन नहीं किया जा सकता । भरत जी का यह नियम और व्रत किसी सांसारिक चीज को पाने के लिए नहीं था । वह स्वर्ग या मोक्ष के लिए भी एकान्त साधना नहीं कर रहे थे । उनके जीवन का एक लक्ष्य था – राम चरन पंकज मन जासू । लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ॥ - भरत का मन राम के चरण - कमलों में भौंरे की तरह लुभाया हुआ है । कभी उनका पास नहीं छोड़ता यही भरत जी के जीवन का सनातन सत्य है । इसी को पाने के लिये भरत तपस्वी बने थे । उनका मन राम के पास रहने में सुख का अनुभव करता था । इसीलिए जब माँ कौशल्या जी उन्हें राजा बनने के लिए कहती हैं तो वे रो पड़ते हैं । उनकी दशा देखकर वहाँ बैठे सभी लोग भावविभोर हो जाते हैं । सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की । तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की ॥ - भरतलाल की दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीर की सुध भूल गयी । तुलसी बाबा कहते हैं कि " स्वाभाविक स्नेह की सीमा " भरत की सब लोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे । यह " सहज सनेह " ही भरतलाल जी की पूँजी है । यदि वह झूठ - मूठ में रोते तो लोग अपने शरीर की सुध नहीं भूलते , भरत की खबर लेते ; उनके दिखावटी शोकभाव की निन्दा करते । सराहना का भाव किसी के मन में नहीं आता । किन्तु भरत जी का सहज सनेह सभी को बाँधे रखता है । निर्मल प्रेम में विकर्षण के लिए कोई स्थान नहीं होता । भरत जब राम से मिलने चित्रकूट जा रहे होते हैं तब उनके " सहज सनेह " का चमत्कार हमें दिखाई देता है । जबहि रामु कहि लेहिं उसासा । उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा ॥ - भरत जब " राम " कहकर लम्बी साँस लेते हैं तब चारों ओर प्रेम उमड़ पड़ता है । उनका प्रेम पूरे वातावरण को प्रभावित कर रहा है । उसमें राम नाम का चुम्बक लगा हुआ है । जो राम को पा लेता है , वह सबका बन जाता है । लक्ष्मण के क्रोध के बाद जब राम ने भरत पर अपना विश्वास प्रकट किया था तब देवताओं को बड़ी प्रसन्नता हुई थी । उन्होंने भरत के बारे में बड़ी उँची बात कही थी – जौं न होत जग जनम भरत को । सकल धरम धुर धरनि धरत को ॥ - यदि संसार में भरत का जन्म नहीं होता तो पृथ्वी पर सम्पूर्ण धर्मों की धुरी को कौन धारण करता ? इस संसार में सभी को धर्म ही धारण करता है । अपने आधार को पैरों के नीचे से हटाकर आदमी खड़ा नहीं हो सकता । धर्म मनुष्य को सँभालता है ; पर कोई है , जो धर्म को भी टिकाये रखता है । यह है प्रेम । संघर्ष करके संसार नहीं चल सकता । संघर्ष में ही जीने से धर्म नहीं बढ़ सकता । प्रेम जरूरी है । लेकिन प्रेम को भी आधार चाहिए । प्रेम का आधार क्या है ? प्रेम का आधार है विश्वास । विश्वास के बिना आप जी नहीं सकते । यात्रा में चालक पर , घर में नौकर पर , काम में सहयोगियों पर , आराम में कुटुम्बियों पर , बीमार में दवा और डॉक्टर पर आपको विश्वास करना पड़ता है । विश्वास न हो तो आदमी अकेला हो जाये । एकदम अपरिचित रह जाये । भरत जी विश्वास के अनुपम प्रतीक हैं । कोई लाख समझाये , राम नहीं मान सकते कि भरत उनके विरुद्ध हो सकते हैं । यह भाव वन्दनीय है । जीवन को जीने योग्य बनाने के लिए भरत जी का - सा विश्वास जरूरी है । इससे मनुष्य की जीवन में हर मनचाही चीज़ मिल सकती है । कहत सुनत सति भाउ भरत को । सीय राम पद होई न रत को ॥ - भरत के सद्भाव को कहते - सुनते कौन मनुष्य सीताराम के चरणों में अनुरक्त न हो जायेगा । जिसे पाने के लिए जन्म - जन्मान्तर तक ऋषि - मुनि तरसते हैं , उसे भरत जी चुटकी बजाते आदमी को दे सकते हैं । भरत के माध्यम से कितना आसान है प्रभु को पाना ! जो भरत के सद्भाव को अपने जीवन में उतारेगा , सीताराम उसके पास दौड़ आयेंगे । भरत का नाम सुनकर राम का दौड़ पड़ना भाई के प्रति पक्षपात नहीं था । भरत ने अपने शील - स्नेह से राम की कृपा पायी थी ; अपनी तपस्या और साधना से राम के हृदय में स्थान बनाया था । भूषण बसन भोग सुख भूरी । मन तन बचन तजे तिन तूरी ॥ - गहने , कपड़े तथा अन्य प्रकार के सभी सुख - भोगों को भरत ने तन , मन और वचन से एक तिनके की तरह तोड़ दिया था । यह त्याग सराहनीय है । राम के लिए भरत तपस्वी बन गये हैं । सबकुछ उन्होंने तन , मन और वचन से छोड़ दिया है । अगर वह ढोंग करते तो केवल वचन से छोड़ते । अपने त्याग के बारे में एक बयान जारी करवा देते । आधुनिक त्यागियों की तरह शम्पू से सूखे बालों को दिखाकर कहते कि बहुत दिनों से तेल नहीं मिल रहा है । मालपूआ और मलाई खाकर निराहार व्रत के महत्त्व पर भाषण देते । उन्होंने उसे तन , मन और वचन से छोड़ दिया । वचन से किसी चीज को छोड़ना आसान है ; किन्तु उसे तन - मन से छोड़ पाना बड़ा कठिन है । तन आदत का गुलाम होता है और मन आकर्षण का । आदतें जल्दी छोड़ी नहीं जातीं । मन प्रेयस छोड़कर श्रेयस की ओर जाता ही नहीं । वचन का त्याग तब तक सार्थक नहीं होता जब तक तन और मन उसे मान न लें । भरत जी का तीनों पर नियन्त्रण था । इसीलिए वे सबकुछ एक झटके से छोड़ सके । त्याग एक झटके में ही किया जा सकता है । संकल्प वह है जो तुरन्त आचरण में आ जाये । घोषणाओं , सभाओं और यात्राओं से संकल्प नहीं साधा जा सकता । उसे साधने के लिए आचरण चाहिए । भरत जी ने जो संकल्प किया , उसे अपने आचरण से साधा । परम पुनीत भरत आचरनू । मधुर मंजु मुद मंगल करनू ॥ - भरत का परम पवित्र आचरण मधुर , सुन्दर और आनन्द - मङ्गलों को देने वाला है । मनुष्य को इस संसार में और क्या चाहिए ! कितनी कोशीश करता है वह , लेकिन जीवन में मधुरता नहीं आती है । संसार के जंजाल उसे लटकाते - भटकाते रहते हैं , कठोरता - कड़ुवाहट उसे दबोचने को दौड़ती रहती हैं ; ऐसे में यदि तनिक भी मधुरता मिल जाय तो लोग धन्य हो जाते हैं । सुन्दरता की प्यास किसे नहीं होती ! बदसूरती को सँजोने में कोई रुचि नहीं लेता है ; लेकिन जीवन में वही ज्यादा मिलती है । इसीलिए आदमी ने बाग - बगीचे बना रखे हैं , क्यारियाँ - फुलवारियाँ बना रखी हैं । कारण एक है कि वह कहीं तो सुन्दरता , केवल सुन्दरा देख सके । वहाँ बदसूरती का नामोनिशान न हो । आनन्द और मङ्गल भी बड़े दुर्लभ हैं । इनकी चाह सभी को होती है ; पर वे विरलों को चाहते हैं । उनके दरबार में बड़ी लम्बी " क्यु " होती है । परमात्मा की यह दुर्लभ देन हर एक को सुलभ नहीं होती । जीवन - भर अथक उपाय करके भी आदमी इन्हें पूरी तौर पर पाने में समर्थ नहीं हो पाता । भरतलाली जी का आचरण इन्हें दिला पाने का अचूक रास्ता है । जो भरत भाव का स्मरण करता है उसे जीवन में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता । यह अनुभव सिद्ध है । भरतलाल जी की महिमा गाते - गाते बाबा तुलसीदास अपने आपको भी दाँव पर लगा देते हैं – सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को । मुनि मन अगम जम नियम सम दम विषम ब्रत आचरत को ॥ दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को । कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को ॥ - सीताराम के प्रेम रूपी अमृत से परिपूर्ण भरत का जन्म यदि न होता तो मुनियों के मन को भी अगम यम , नियम , शम , दम आदि कठिन आचरणों को कौन करता ? दुःख , दाह , दरिद्रता , दम्भ आदि दोषों को अपने सुयश के बहाने कौन हरण करता ? तुलसीदास जैसे शठों को कलियुग में हठपूर्वक राम के सन्मुख कौन करता ? नारायण ! श्रीभरतलाल जी की महिमा का इससे बढ़कर बखान नहीं किया जा सकता । मुनियों के लिए भी जो आचरण कठिन है , उसे भरत जी ने सहज कर दिया । अपने सुयश से उन्होंने संसार के सभी दुःखों को दूर करने का रास्ता बता दिया । भरत ने ही सिखाया कि बगैर आचरण में पवित्रता लाये दुःखों से छुटकारा नहीं पाया जा सकता । इतना ही नहीं , तुलसी बाबा यह भी कहते हैं कि यदि भरत जैसा राम का प्रेमपात्र पैदा नहीं हृ होता तो तुलसी जैसे शठों को राम के पास और कोई नहीं बिठा सकता था । यह कहकर तुलसी बाबा अपनी सारी उपलब्धि भरत के चरणों में समर्पित कर देते हैं । बाबा तुलसी जी ने भरत के चरित्र को बड़ा महत्त्व दिया है । राम को पाने के लिए भरत का आचरण मार्ग है । परिवार में रहते हुए , परिवार छोड़कर साधना करते हुए आदमी प्रभु की कृपा चाहता है । जो संसारी है उसे सुख - समृद्धि चाहिए , जो असंसारी है उसे मुक्ति चाहिए । दोनों के लिए प्रभु की कृपा जरूरी है । इसे पाने के लिए एक ही मार्ग है - श्रीभरतलाल जी का आचरण अपनाना । जो इसे अपनायेगा वह निश्चय ही धन्य हो जायेगा। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान
sn vyas
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23 days ago
रामचरित के आधार पर भाईचार प्रसंग में 'संगति' और सिक्के का दोनों तरफ : ------------------------------------------------------------------ त्रेता और द्वापर युग में भाईचार की निदर्शन कुछ अलग होने से भी इसकी मौलिक अंतःस्वर में कुछ भी फर्क नहीं आती है। इसीलिए सार्वजनीन और सर्वकालीन मंथन योग्य होकर, आजतक भारतीय आर्यों के सामाजिक तथा सांस्कृतिक चेतना के अंदर उज्जीवित रहा है। भाई के लिए भाई कैसे आंख बन्द कर उच्छर्गीकृत होता है, रोचक शैली में इसकी अनेकानेक उदाहरण योग्य कथावस्तु को हमलोग रामायण और महाभारत से जानते है। लेकिन कुछ वस्तुवादी लोगों इन बातों को सिर्फ काव्यमयी कहानियां समझकर, असल में इनकी अंतर्निहित दिव्य सन्देश को महत्व नहीं दे पाते हैं।। इस कलियुग में श्रीक्षेत्र- पूरी में विराजित श्रीमंदिर के अंदर रत्न- सिंघासनोपरि दोनों भ्राता श्रीजगन्नाथ जी और श्रीबलभद्र जी के साथ, बहन सुभद्रा जी को कोई दर्शन करें, तो वंहा विश्व- भाईचार के अनोखा प्रतीकात्मक स्वरूप, मतलब भाई- बहनों का पवित्र- अटूट- अनमोल रिस्ते को अवश्य प्रत्यक्ष कर पाएंगे। सिर्फ इतनी सी बात नहीं, जब वंहा कोई आषाढ़ शुक्ल दशमी के अवसर पर अनुष्ठित विश्व प्रसिद्ध 'रथ- यात्रा' में तीनों भाई- बहनों की नगर परिक्रमा दृश्य देखते हैं, तब लाखों लोगों के भव्य समारोह में वंहा रगरग से अभूतपूर्व भाईचार की शिहरण फैल जाते हैं।। त्रेता युगीय रामायण में रघुकुल- नन्दन चारो भाइयों के आपस में उच्छर्गीकृत प्रेमभाव को कौन सभ्य इंसान नहीं जानता ! वंहा भी विश्रवा- कुल के सिर्फ हरिभक्त बिभीषण को छोड़कर, लंकपति असुरराज रावण समेत उनके पुत्र और भाइयों तथा कुटुंब के अन्यान्य लोगों में भी मरते दम तक कैसे एकता रूपी भाईचार सम्पर्क अटूट रहा था, ये बात को कोई नजर अंदाज नहीं कर सकते हैं।। ऐसे, कोई भी द्वापर कालीन महाभारत को मंथन करेंगे, तो वंहा पांडवों का आपस में भाईचार को देखकर अभिभूत होना कोई नयी बात नहीं है। और दूसरे तरफ पंच पांडवों से अलग धृतराष्ट्र नन्दन दुर्योधन समेत कौरवों शत भाइयों तथा कुटुंब और बन्धुओं में जीवदशा व्यापी जिस हिसाब से इच्छाकृत या अनिच्छाकृत "संगति" अटूट रहा था, ओ सब भी चिन्तन योग्य उदाहरण होकर सामने है।। 💐 गोस्वामी तुलसी दास जी श्री रामचरित मानस- अरण्य काण्ड- दोहा- 1, 2, 4, 5 में लिखे है-- "जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहिं बिलोकत पातक भारी। निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्र क दुख रज मेरु समयााना। कुपथ निवारि सुपंथ चलावा, गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा। देत लेत मन संक न धरई, बल अनुमान सदा हित करई। बिपति काल कर सतगुन नेहा, श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।" उपरोक्त दोहे की भावार्थ है-- "जो लोग किसी को अपना मित्र तो मानते है, पर मित्र के दुख में न तो दुख महसूस करते है और न ही अपने मित्र का सहयोग करते है-- दुख के समय मित्र के दुख में दुखी न होने वाले ऐसे स्वार्थी मित्रो को देखने से भी पाप लगता है। जो अपने बड़े से बड़े दुख को बहुत छोटा मानकर अनदेखा कर अपने मित्र के छोटे से छोटे दुख को बड़ा मानकर प्राथमिकता दे, जो अपने मित्र को कुपथ (बुरी संगति और बुरे रास्ते) से दूर हटा कर सुपथ (सुसंगति और सही मार्ग) पर ले जाये, मित्र के अवगुणों को दूर कर मित्र के अंदर सद्गुणों को विकसित करे, मित्र से लेन- देन करते समय छल- कपट- भेदभाव- शंका- संदेह न करे तथा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार सदैव मित्र का हित करे, सामान्य परिस्थितियो की तुलना में बिपत्ति के समय सौ गुना अधिक मित्र से प्रेम करते हुए उसकी परवाह करे, श्रुति (वेद) के अनुसार वही सज्जन (सच्चा) मित्र होता है।" इसीलिए कोई समाज में अपने लिए अच्छा, सच्चा और सज्जन मित्र चाहते है, तो स्वयं में इन गुणों का विकास कर, पहले स्वयं एक आदर्श मित्र बने और गुण- दोष का परीक्षण कर उचित व्यक्ति के साथ ही मित्रता करें।। फिर गोस्वामी जी निष्कर्ष में कहते हैं की-- हमेशा "संगति' अच्छा रखना चाहिए; यथा-- "तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ। नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ।" इस एक ही दोहा में अति सुंदर व रोचक शैली में सन्त गोस्वामी जी "संगति" से उपजे दोनों किसम के 'अछे' और 'बुरे' "भाईचार" को विश्लेषण करने की दिगदर्शन अर्पित किया है। उनके दिव्यदृष्टि से-- "अच्छे लोगों की संगति से मनुष्य अच्छा और बुरे लोगों की संगति से बुरा हो जाता है।।" सामान्यतः लोहा पानी में डूब जाता है; लेकिन लोहे को नाव का कील बना देने से वह लोगों को पार करने वाला हो जाता है। संगीत यंत्र में वह लोहा लग गया तो सुमधुर संगीत निकलता है, जिससे आनंद की अनुभूति होती है। परन्तु यदि वही लोहा कुसंगति में पड़ गया तो, घातक या नाशक बन जाता है। जैसे, कसाई के जीव हत्या वाला तीर- तलवार- छुरी- चाकू आदि आखिर यह भी तो लोहा ही है ना, पर हत्या आदि कार्यों में प्रयुक्त होता है। अतः "भूलि न करिय कुसंग"-- अर्थात, अच्छे लोगों की संगति हमेशा श्रेयष्कर होते है।। गोस्वामी जी की उपरोक्त सन्देश में रघुकुल के चारों भ्राता, सुग्रीब- हनुमान आदि बानर मित्र, असुर कुल से होने भी हरिभक्त मित्र विभीषण-- एक- एक सही मित्र होने की कर्त्तव्य- कर्म के साथ भाईचार का भी अनमोल दृष्टान्त योग्य बने थे। ऐसे द्वापर में भी त्रेता युगीय रावण वंश तुल्य कुरुकुल- भाईचार की प्राचुर्य तो देखने लायक है, जंहा "सत्ता" हासिल की "स्वार्थ" ही मुख्य रूप में अंत:स्वर बन गयी थी। और इसीलिए त्रेता युगीय रघुवंशी चारों भ्राताओं में "संगति" जैसी "निःस्वार्थ भाईचार" की अनन्य आदर्श एक विरल दृष्टान्त होकर रह गया है।। ##रामायण #रामायण महाभारत #रामायण कथा #रामायण ज्ञान #रामायण चौपाई