#ramayan

sn vyas
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1 days ago
##रामायण #रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान 🚩 क्या आप जानते हैं माता कैकेयी ने श्री राम को वनवास क्यों भेजा था? 👑 रघुकुल का सौभाग्य: माता कैकेयी के त्याग की अनसुनी कथा 👑 ⚔️ महाराजा दशरथ और बाली का युद्ध एक बार युद्ध में महाराजा दशरथ का सामना वानरराज बाली से हो गया। उस समय अस्त्र-शस्त्र और रथ चालन में निपुण रानी कैकेयी भी उनके साथ थीं। बाली को यह वरदान प्राप्त था कि जिस पर भी उसकी दृष्टि पड़ जाए, उसका आधा बल उसमें समा जाता था। स्वाभाविक रूप से इस युद्ध में महाराजा दशरथ परास्त हो गए। 👑 राजमुकुट या रानी? विजयी बाली ने महाराजा दशरथ के सामने एक कठोर शर्त रखी— "पराजय के मोल स्वरूप या तो अपनी रानी कैकेयी को यहीं छोड़ जाओ, या फिर रघुकुल की शान अपना राजमुकुट मुझे सौंप दो।" दशरथ जी ने भारी मन से अपना मुकुट बाली के पास रख छोड़ा और कैकेयी को लेकर अयोध्या लौट आए। 💔 कैकेयी की पीड़ा और मौन बलिदान कैकेयी स्वयं एक कुशल योद्धा थीं। रघुकुल के मुकुट का इस तरह जाना उनके हृदय में शूल की तरह चुभता रहा। जब श्री राम के राजतिलक का समय आया, तब दशरथ जी और कैकेयी के बीच उस खोए हुए मुकुट की चर्चा हुई। रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए, माता कैकेयी ने एक बहुत बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने श्री राम के वनवास का कलंक अपने सिर ले लिया और राम जी को वन भिजवाया। वन जाते समय उन्होंने श्री राम को गुप्त रूप से यह आदेश भी दिया था कि— "बाली से रघुकुल का मुकुट वापस लेकर ही आना है।" 🏹 मुकुट का रहस्य और रावण की चोरी वनवास के दौरान जब श्री राम ने बाली का वध किया, तब उन्होंने अपने कुल की शान, उस राजमुकुट के बारे में पूछा। बाली ने बताया— "प्रभु! मैंने रावण को बंदी बनाया था, लेकिन जब वह भागा तो छल से आपका वह मुकुट भी चुरा ले गया। आप मेरे पुत्र अंगद को अपनी सेवा में ले लें, वह प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट वापस लाएगा।" 🦶 अंगद की चुनौती और मुकुट की वापसी जब अंगद श्री राम के दूत बनकर रावण की सभा में गए, तो उन्होंने अपना पैर जमाकर लंका के वीरों को उसे हिलाने की चुनौती दी। जब सभी वीर असफल रहे, तो अंत में स्वयं रावण अंगद का पैर डिगाने के लिए आगे आया। जैसे ही रावण अंगद के पैर पकड़ने के लिए झुका, उसका मुकुट (जिसमें रघुकुल का मुकुट भी था) गिर गया! अंगद तुरंत वह मुकुट लेकर श्री राम के पास लौट आए। 🌸 कथा का सार रघुकुल के उस राजमुकुट का ऐसा प्रताप था कि जिसने भी उसे खोया या चुराया, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी: महाराजा दशरथ ने मुकुट गंवाया, तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी और प्राण त्यागने पड़े। बाली ने मुकुट छीना, तो उसे भी अपने प्राण गंवाने पड़े। रावण ने मुकुट चुराया, तो उसे भी काल का मुंह देखना पड़ा। यदि माता कैकेयी श्री राम को वनवास न भेजतीं, तो रघुकुल का वह सौभाग्य और गौरव कभी वापस न लौटता। कुल के हित के लिए इतना बड़ा कार्य करने और जीवन भर का अपयश झेलने के कारण ही श्री राम अपनी तीनों माताओं में से कैकेयी जी से सर्वाधिक प्रेम करते थे। ।। जय श्री राम ।। 🙏✨
sn vyas
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7 days ago
#🪔तुलसी दास जयंती 📿 #🙏🏼 🌷श्री राम लक्ष्मण सीता हनुमानजी🌷🙏🏼 #🌼🙏जय वीर हनुमानजी 💐शुभ मंगलवार 🌼श्री हनुमान चालीसा 🌼 #जय श्री राम भक्त हनुमानजी #रामायण तुलसीदास जी हनुमान जी और रामायण 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ एक प्रसिद्ध लोककथा के अनुसार, गोस्वामी तुलसीदास जी जब हनुमान चालीसा की रचना कर रहे थे, तब वे प्रतिदिन जो चौपाइयाँ लिखते, उन्हें रात्रि में बहुत संभालकर रख देते थे। परंतु जब प्रातःकाल उठकर देखते, तो आश्चर्यचकित रह जाते—रात में लिखी गई कुछ पंक्तियाँ मिट चुकी होती थीं। यह घटना कई दिनों तक होती रही। तुलसीदास जी अत्यंत व्याकुल हो उठे। उन्हें लगा कि अवश्य ही यह कोई दैवी संकेत है। तब उन्होंने पूर्ण श्रद्धा और भाव से श्री हनुमान जी की आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर पवनपुत्र हनुमान जी साक्षात प्रकट हुए। तुलसीदास जी ने विनम्रता से कहा— “हे प्रभु! मैं आपकी महिमा का गान लिखता हूँ, किंतु रात्रि में कोई उसे मिटा देता है। यह रहस्य क्या है?” हनुमान जी मुस्कराए और बोले— “हे तुलसी! वह लिखावट मैं ही मिटा देता हूँ।” यह सुनते ही तुलसीदास जी हनुमान जी के चरणों में गिर पड़े। हनुमान जी ने स्नेहपूर्वक कहा— “यदि प्रशंसा ही करनी है, तो मेरी नहीं, मेरे प्रभु श्रीराम की करो। सेवक की महिमा तभी शोभा पाती है, जब स्वामी का यश गाया जाए।” यह सुनकर तुलसीदास जी को तुरंत रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड का प्रथम दोहा स्मरण हो आया। उन्होंने हनुमान चालीसा के आरंभ में वही दोहा लिख दिया “श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि। वरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥” हनुमान जी ने कहा— “तुलसी! इसमें तो तुम ‘रघुवर’ का यश गा रहे हो। मैं तो रघुवर नहीं हूँ।” तुलसीदास जी ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया— “प्रभु! आप और श्रीराम एक ही दिव्य प्रसाद से अवतरित हुए हैं, इसलिए आप भी रघुवर ही हैं।” फिर तुलसीदास जी ने एक प्राचीन प्रसंग सुनाया— ब्रह्मलोक में सुवर्चला नाम की एक अप्सरा रहती थी। एक बार वह ब्रह्मा जी पर मोहित हो गई। इससे क्रुद्ध होकर ब्रह्मा जी ने उसे गिद्धी बनने का श्राप दे दिया। अप्सरा विलाप करने लगी। तब ब्रह्मा जी को दया आ गई और बोले— “अयोध्या में राजा दशरथ के यज्ञ में जो दिव्य प्रसाद वितरित होगा, तू कैकेयी का भाग उठाकर ले जाएगी। उसी समय मां अंजना भगवान शिव से पुत्र की कामना कर रही होंगी। तू वही प्रसाद उनके हाथों में गिरा देना। उसी से तेरा उद्धार होगा।” उसी प्रसाद से आपका अवतार हुआ, हे हनुमान! इतना ही नहीं— श्रीराम स्वयं आपको अपना भाई कहते हैं— “तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।” फिर तुलसीदास जी ने एक और प्रमाण दिया— जब आप अशोक वाटिका में माता सीता की खोज में गए, तो माता जानकी ने आपको अपना पुत्र बना लिया— “अजर अमर गुननिधि सुत होहू, करहुं बहुत रघुनायक छोहू।” और जब आप माता सीता का संदेश लेकर लौटे, तो श्रीराम ने भी आपको अपना पुत्र स्वीकार किया— “सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं, देखेउं करि विचार मन माहीं।” इस प्रकार— आप प्रभु श्रीराम के भाई भी हैं, पुत्र भी हैं और परम भक्त भी। इसलिए आप ही सच्चे अर्थों में रघुवर हैं। यह सुनकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने तुलसीदास जी को आशीर्वाद दिया और कहा— “अब तुम्हारी रचना युगों-युगों तक भक्तों के कंठ में विराज करेगी।” और तभी से हनुमान चालीसा संपूर्ण रूप में प्रकट हुई— जो आज भी करोड़ों भक्तों को संकटों से मुक्त करती है। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
sn vyas
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11 days ago
#रामायण ज्ञान #वाल्मीकि रामायण #रामायण #भक्ति #भक्ति भावना भगवान श्रीराम और काकभुशुण्डि (काग) की कथा भक्ति और ज्ञान का एक अद्भुत प्रसंग है। अयोध्या के एक भक्त बालक से लेकर कौवे (काग) योनि तक की उनकी यात्रा और राम-भक्ति पाने की यह कहानी अत्यंत प्रेरणादायक है। काकभुशुण्डि परमज्ञानी रामभक्त हैं। रावण के पुत्र मेघनाथ ने राम से युद्ध करते हुये राम को नागपाश से बाँध दिया था। देवर्षि नारद के कहने पर गरूड़, जो कि सर्पभक्षी थे, ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर राम को नागपाश के बंधन से छुड़ाया। राम के इस तरह नागपाश में बँध जाने पर राम के परमब्रह्म होने पर गरुड़ को सन्देह हो गया। गरुड़ का सन्देह दूर करने के लिये देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्मा जी के पास भेजा। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि तुम्हारा सन्देह भगवान शंकर दूर कर सकते हैं। भगवान शंकर ने भी गरुड़ को उनका सन्देह मिटाने के लिये काकभुशुण्डि जी के पास भेज दिया। अन्त में काकभुशुण्डि जी राम के चरित्र की पवित्र कथा सुना कर गरुड़ के सन्देह को दूर किया। गरुड़ के सन्देह समाप्त हो जाने के पश्चात् काकभुशुण्डि जी गरुड़ को स्वयं की कथा सुनाया जो इस प्रकार हैः पूर्व के एक कल्प में कलियुग का समय चल रहा था। उसी समय काकभुशुण्डि जी का प्रथम जन्म अयोध्या पुरी में एक शूद्र के घर में हुआ। उस जन्म में वे भगवान शिव के भक्त थे किन्तु अभिमानपूर्वक अन्य देवताओं की निन्दा करते थे। एक बार अयोध्या में अकाल पड़ जाने पर वे उज्जैन चले गये। वहाँ वे एक दयालु ब्राह्मण की सेवा करते हुये उन्हीं के साथ रहने लगे। वे ब्राह्मण भगवान शंकर के बहुत बड़े भक्त थे किन्तु भगवान विष्णु की निन्दा कभी नहीं करते थे। उन्होंने उस शूद्र को शिव जी का मन्त्र दिया। मन्त्र पाकर उसका अभिमान और भी बढ़ गया। वह अन्य द्विजों से ईर्ष्या और भगवान विष्णु से द्रोह करने लगा। उसके इस व्यवहार से उनके गुरु (वे ब्राह्मण) अत्यन्त दुःखी होकर उसे श्री राम की भक्ति का उपदेश दिया करते थे। एक बार उस शूद्र ने भगवान शंकर के मन्दिर में अपने गुरु, अर्थात् जिस ब्राह्मण के साथ वह रहता था, का अपमान कर दिया। इस पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके उसे शाप दे दिया कि रे पापी! तूने गुरु का निरादर किया है इसलिये तू सर्प की अधम योनि में चला जा और सर्प योनि के बाद तुझे 1000 बार अनेक योनि में जन्म लेना पड़े। गुरु बड़े दयालु थे इसलिये उन्होंने शिव जी की स्तुति करके अपने शिष्य के लिये क्षमा प्रार्थना की। गुरु के द्वारा क्षमा याचना करने पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके कहा, "हे ब्राह्मण! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायेगा। इस शूद्र को 1000 बार जन्म अवश्य ही लेना पड़ेगा किन्तु जन्मने और मरने में जो दुःसह दुःख होता है वह इसे नहीं होगा और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। इसे अपने प्रत्येक जन्म का स्मरण बना रहेगा जगत् में इसे कुछ भी दुर्लभ न होगा और इसकी सर्वत्र अबाध गति होगी मेरी कृपा से इसे भगवान श्री राम के चरणों के प्रति भक्ति भी प्राप्त होगी।" इसके पश्चात् उस शूद्र ने विन्ध्याचल में जाकर सर्प योनि प्राप्त किया। कुछ काल बीतने पर उसने उस शरीर को बिना किसी कष्ट के त्याग दिया वह जो भी शरीर धारण करता था उसे बिना कष्ट के सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नया वस्त्र पहन लेता है। प्रत्येक जन्म की याद उसे बनी रहती थी। श्री रामचन्द्र जी के प्रति भक्ति भी उसमें उत्पन्न हो गई। अन्तिम शरीर उसने ब्राह्मण का पाया। ब्राह्मण हो जाने पर ज्ञानप्राप्ति के लिये वह लोमश ऋषि के पास गया। जब लोमश ऋषि उसे ज्ञान देते थे तो वह उनसे अनेक प्रकार के तर्क-कुतर्क करता था। उसके इस व्यवहार से कुपित होकर लोमश ऋषि ने उसे शाप दे दिया कि जा तू चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। वह तत्काल कौआ बनकर उड़ गया। शाप देने के पश्चात् लोमश ऋषि को अपने इस शाप पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस कौए को वापस बुला कर राममन्त्र दिया तथा इच्छा मृत्यु का वरदान भी दिया। कौए का शरीर पाने के बाद ही राममन्त्र मिलने के कारण उस शरीर से उन्हें प्रेम हो गया और वे कौए के रूप में ही रहने लगे तथा काकभुशुण्डि के नाम से विख्यात हुये। जय श्रीराम 🙏
JEKH11
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1 months ago
रामायण का एक रोचक प्रसंग "जटायु का बलिदान" #रामायण #रामायण ज्ञान #❤️जीवन की सीख #gk
sn vyas
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2 months ago
#रामायण #रामायण ज्ञान रामायण में छुपे दस रहस्य,जिनसे हम अपरिचित हैं...अंत तक जरुर पढें🧵 रामायण की लगभग सभी कथाओं से हम परिचित ही हैं , लेकिन इस महाकाव्य में रहस्य बनकर छुपी हैं कुछ ऐसी छोटी छोटी कथाएं जिनसे हम लोग परिचित नहीं हैं , तो आइये जानते हैं वे कौन सी दस बातें है। 1. रामायण राम के जन्म से कई साल पहले लिखी जा चुकी थी | रामायण महाकाव्य की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की है। इस महाकाव्य में 24 हजार श्लोक, पांच सौ उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड हैं। 2. वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, पुनर्वसु नक्षत्र में कर्क लग्न में हुआ था। उस समय सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चंद्रमा के साथ गुरु विराजमान थे। यह सबसे उत्कृष्ट ग्रह दशा होती है , इस घड़ी में जन्म बालक अलौकिक होता है। 3. जिस समय भगवान श्रीराम वनवास गए, उस समय उनकी आयु लगभग 27 वर्ष थी। राजा दशरथ श्रीराम को वनवास नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।4. रामायण के अनुसार समुद्र पर पुल बनाने में पांच दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था। (एक योजन लगभग 13-16 किमी होता है)। 5. सभी जानते हैं कि लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नाक काटे जाने से क्रोधित होकर ही रावण ने सीता का हरण किया था, लेकिन स्वयं शूर्पणखा ने भी रावण का सर्वनाश होने का श्राप दिया था। क्योंकि रावण की बहन शूर्पणखा के पति विद्युतजिव्ह का वध रावण ने कर दिया था। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।6. कहते हैं जब हनुमान जी ने लंका में आग लगाई थी, और वे एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा रहे थे, तो उनकी नजर शनी देव पर पड़ गयी ! वे एक कोठरी में बंधे पड़े थे ! हनुमान जी ने उन्हें बंधन मुक्त किया ! मुक्त होने पर उन्होंने हनुमान जी के बल बुद्धी की भी परिक्षा ली और जब उन्हें यकीन हो गया कि वह सचमुच में भगवान रामचंद्र जी के दूत हनुमान जी हैं तो उन्होंने हनुमान जी से कहा कि "इस पृश्वी पर जो भी आपका भक्त होगा उसे मैं अपनी कुदृष्टि से दूर ही रखूंगा, उसे कभी कोइ कष्ट नहीं दूंगा " ! इस तरह शनिवार को भी मदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ होता है तथा आरती गाई जाती है ! 7. जब खर दूषण मा रे गए, तो एक दिन भगवान राम चन्द्र जी ने सीता जी से कहा, "प्रिये अब मैं अपनी लीला शुरू करने जा रहा हूँ ! खर दूषण मारे गए, सूर्पनखां जब यह समाचार लेकर लंका जाएगी तो रावण आमने सामने की लड़ाई तो नहीं करेगा बल्की कोई न कोई चाल खेलेगा और मुझे अब दुष्टों को मारने के लिए लीला करनी है ! जब तक मैं पूरे राक्षसों को इस धरती से नहीं मिटा देता तब तक तुम अग्नि की सुरक्षा में रहो" ! भगवान् रामचंद्र जी ने उसी समय अग्नि प्रज्वलित की और सीता जी भगवान जी की आज्ञा लेकर अग्नि में प्रवेश कर गयी ! सीता माता जी के स्थान पर ब्रह्मा जी ने सीता जी के प्रतिबिम्ब को ही सीता जी बनाकर उनके स्थान पर बिठा दिया !8. अग्नि परीक्षा का सच :- रावण जिन सीतामाता का हरण कर ले गया था वे सीता माता का प्रतिबिम्ब थीं , और लौटने पर श्री राम ने यह पुष्टि करने के लिए कि कहीं रावण द्वारा उस प्रतिबिम्ब को बदल तो नहीं दिया गया , सीतामाता से अग्नि में प्रवेश करने को कहा जो कि अग्नि के घेरे में पहले से सुरक्षित ध्यान मुद्रा में थीं , अपने प्रतिबिम्ब का संयोग पाकर वे ध्यान से बाहर आईं और राम से मिलीं। 9. आधुनिक काल वाले वानर नहीं थे हनुमान जी :- कहा जाता है कि कपि नामक एक वानर जाति थी। हनुमानजी उसी जाति के ब्राह्मण थे।शोधकर्ताओं के अनुसार भारतवर्ष में आज से 9 से 10 लाख वर्ष पूर्व बंदरों की एक ऐसी विलक्षण जाति में विद्यमान थी, जो आज से लगभग 15 हजार वर्ष पूर्व विलुप्त होने लगी थी और रामायण काल के बाद लगभग विलुप्त ही हो गई। इस वानर जाति का नाम `कपि` था। मानवनुमा यह प्रजाति मुख और पूंछ से बंदर जैसी नजर आती थी। भारत से दुर्भाग्यवश कपि प्रजाति समाप्त हो गई, लेकिन कहा जाता है कि इंडोनेशिया देश के बाली नामक द्वीप में अब भी पुच्छधारी जंगली मनुष्यों का अस्तित्व विद्यमान है। 10. विश्व में रामायण का वाचन करने वाले पहले वाचक कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान श्री राम के पुत्र लव और कुश थे | जिन्होंने रामकथा स्वयं अपने पिता श्री राम के आगे गायी थी | पहली रामकथा पूरी करने के बाद लव कुश ने कहा भी था हे "पितु भाग्य हमारे जागे, राम कथा कहि श्रीराम के आगे"। जय श्री राम🌹🌹🌹 🙏🙏🙏🙏🙏