sn vyas
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#पौराणिक कथा #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🔱शिवपुराण कथा📖 #🔱हर हर महादेव #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 दैत्यराज बलि का पुत्र था बाणासुर। वह शोणितपुर (वर्तमान असम का तेजपुर क्षेत्र) का महाप्रतापी राजा था। बाणासुर ने भगवान शिव की अत्यंत कठोर तपस्या करके सहस्र (एक हज़ार) भुजाओं का बल और अजेय होने का वरदान प्राप्त किया था महादेव उसकी निष्ठा से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने बाणासुर को अपना 'पुत्र' माना और स्वयं उसके नगर के मुख्य द्वार पर रक्षक बनकर रहने का वचन दिया। समय बीतने के साथ बाणासुर के मन में अपनी एक हज़ार भुजाओं के बल का प्रचंड अहंकार समा गया। एक दिन वह भगवान शिव के पास जाकर बोला: "हे महादेव! मेरी इन एक हज़ार भुजाओं में युद्ध करने की भयंकर खुजली हो रही है, परंतु तीनों लोकों में मेरे समान कोई योद्धा ही नहीं बचा। मैं किससे युद्ध करूँ?भगवान शिव ने उसके अहंकार को देखकर गंभीर वाणी में कहा रे मूर्ख! जब तेरे महल की ध्वजा (झंडा) बिना आंधी के अचानक टूटकर गिर जाएगी, तब समझ लेना कि तुझसे युद्ध करने वाला तेरा महाकाल आ पहुँचा है। बाणासुर की एक परम सुंदरी कन्या थी—उषा। उषा ने स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र (प्रद्युम्न के पुत्र) अनिरुद्ध को देखा और उनके प्रति समर्पित हो गई। उषा की सखी चित्रलेखा ने अपनी योग-विद्या से द्वारका से सोते हुए अनिरुद्ध का हरण कर बाणासुर के महल के अंतःपुर में पहुँचा दिया जब बाणासुर को इस गुप्त प्रेम का पता चला, तो उसने नागपाश में बांधकर अनिरुद्ध को बंदी बना लिया। उसी क्षण बाणासुर के महल की मुख्य ध्वजा टूटकर गिर पड़ी। नारद जी से जब यह समाचार द्वारका पहुँचा, तो भगवान श्रीकृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न और गरुड़ जी के साथ यदुवंशियों की विशाल सेना शोणितपुर पर चढ़ाई करने पहुँच गई जब श्रीकृष्ण नगर के द्वार पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि बाणासुर की रक्षा की अपनी प्रतिज्ञा निभाने के लिए साक्षात भगवान शिव, अपने पुत्र कार्तिकेय, गणेश और समस्त भूत-प्रेत-गणों के साथ त्रिशूल ताने द्वार पर खड़े हैं! एक ओर जगतपालक श्रीहरि विष्णु (श्रीकृष्ण) थे, तो दूसरी ओर प्रलयंकारी देवाधिदेव महादेव। प्रद्युम्न और कार्तिकेय के बीच भीषण द्वंद्व हुआ बलराम जी ने बाणासुर के प्रधान सेनापतियों को धूल चटा दी गरुड़ जी ने शिव जी के विषैले नागों और भूत-गणों को भगा दिया इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शिव आमने-सामने आ गए महादेव ने अपना प्रलयंकारी 'पाशुपतास्त्र' चलाया, तो श्रीकृष्ण ने उसे 'नारायणास्त्र' से शांत कर दिया शिव जी ने जब प्रचंड अग्नि-बाण चलाए, तो श्रीकृष्ण ने 'पर्जन्यास्त्र' से घनघोर जल बरसाकर उसे बुझा दिया अंत में, भगवान श्रीकृष्ण ने महादेव के सम्मान की रक्षा करते हुए उन पर 'जृम्भाणास्त्र' (जम्हाई/निद्रा अस्त्र) का संधान किया। इसके प्रभाव से भगवान शिव कुछ क्षणों के लिए समाधिस्थ (योगनिद्रा में लीन) हो गए। शिव जी के समाधिस्थ होते ही बाणासुर अपनी एक हज़ार भुजाओं में विभिन्न अस्त्र लेकर श्रीकृष्ण पर झपटा श्रीकृष्ण ने अपना प्रज्वलित सुदर्शन चक्र छोड़ा। सुदर्शन चक्र ने देखते ही देखते बाणासुर की नौ सौ छियानवे (९९६) भुजाओं को पेड़ की डालियों की तरह काट डाला! अब उसके पास केवल चार भुजाएँ शेष बची थीं जैसे ही श्रीकृष्ण बाणासुर का मस्तक काटने के लिए चक्र उठाने लगे, भगवान शिव अपनी योगनिद्रा से जागे और तुरंत बीच में आ खड़े हुए। भगवान शिव ने हाथ जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की: "हे कृष्ण! आप ही अनादि, अनंत और परब्रह्म परमात्मा हैं। बाणासुर मेरे भक्त प्रह्लाद और बलि का वंशज है। मैंने इसे अभय का वचन दिया था। कृपा करके इसके प्राण मत लीजिए भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपना सुदर्शन चक्र वापस बुला लिया और कहा: हे महादेव! जो आपका द्रोही है, वह मेरा कभी प्रिय नहीं हो सकता। और जो मुझमें और आपमें भेद देखता है, उसका कभी कल्याण नहीं हो सकता। 'हरि और हर' में कोई अंतर नहीं है। मैंने बाणासुर को मारा नहीं, केवल उसके अहंकार रूपी भुजाओं को काटा है। इसकी बची हुई चार भुजाएँ अमर रहेंगी और यह सदा आपका प्रधान गण बनकर आपकी सेवा करेगा। बाणासुर का सारा मद और अहंकार भस्म हो गया। उसने श्रीकृष्ण और शिव दोनों के चरणों में मस्तक रख दिया उसने पूरे विधि-विधान और राजसी ठाठ-बाट के साथ अपनी पुत्री उषा का विवाह अनिरुद्ध के साथ संपन्न कराया। श्रीकृष्ण अपने पौत्र और पुत्रवधू को लेकर ससम्मान द्वारका लौट आए। !! जय श्री कृष्णा!!
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